Saturday, 13 July 2019

कर्म सिद्धान्त

किसी ने इनबॉक्स में मुझसे पूछा है कि जैसा कि कहा जाता है कि वर्तमान जन्म में जो मनुष्य अत्यधिक पाप करता है वो अगले जन्म में मनुष्य योनि की बजाय कीट,पशु योनि आदि में जन्म लेकर दुःख भोगता है क्या ये सही बात है?

मेरा मानना है कि एक बार जो मानव योनि में जन्म ले लेता है वह अपने आने वाले हर जन्म में मनुष्य ही रहता है। प्रारब्ध के पुण्य और पाप भोगने के लिए मनुष्य योनि ही सर्वश्रेष्ठ है। ईश्वर ने ऐसी सृष्टि रची जिसमें अपने को सबसे अधिक विकसित करने वाली प्रजाति मानव जाति हुई। लेकिन यह बौद्धिक विकास उसके लिए वरदान भी है और अभिशाप भी है।
पाप कर्मों के भोगने के लिए उसे मानव के अतिरिक्त किसी अन्य योनि में भेजने से उसे दुखों का उतना अनुभव नहीं हो सकता जितना कि मानव योनि में वह दुखों का अनुभव कर सकता है।

इसे एक उदाहरण से भी समझा जा सकता है कि मान लीजिये कोई व्यक्ति किसी जन्म में बहुत नीच कर्म करता है और कर्म सिद्धांत के अनुसार वह अगले जन्म में किसी श्वान (कुत्ते) की योनि प्राप्त करता है अब चूँकि किसी को अपना पिछला जन्म याद तो रहता नहीं तो वो कुत्ता होकर भी उतना दुख नहीं पा सकता क्योंकि उसके पास उतनी बुद्धि ही नहीं होगी कि वह मानव जीवन के सुखों से अपने श्वान योनि के जीवन की तुलना कर सके। परन्तु अब वही मनुष्य यदि मनुष्य जन्म प्राप्त करता है परन्तु एक आवारा कुत्ते की तरह दुत्कार और तिरस्कार का जीवन जीता है तो वह उस कष्ट को अधिक अनुभव करेगा क्योंकि उसके पास इतनी बुद्धि तो है कि वह अपने जीवन और किसी कुत्ते के जीवन की तुलना कर सके।

#तुषारापात®

Friday, 12 July 2019

देवशयनी

तेज बारिश में भीग तो नहीं रहा पर खिड़की से बारिश होते देख रहा हूँ, स्ट्रीट लाइट की रोशनी में ऐसा लग रहा है आसमान से हजारों तार फेंककर कोई धरती पे टाँक रहा है, हर तार जब धरती से जुड़ता है तो टप की एक आवाज़ आती है और ये आवाज़ नहीं टप टप की असंख्य आवाज़ें हैं मानों निद्रा के सारे घोड़े, आँखों के अस्तबल से पलकों की रस्सियाँ तोड़ के भाग रहे हैं पर किस ओर..किसकी आँखों में?
टप टप की इन्हीं आवाज़ों के बीच बिजली कड़कने की बहुत तेज आवाज़ आ रही है, कोई महामानव धरती को विशाल सितार बना के गीत शुरू करने से पहले अपना गला बार बार खंकार रहा है पर कौन? जानने को ऊपर देखता हूँ तो मुझपे अपनी टॉर्च की तेज रोशनी मारके वो मेरी आँखें चौंधिया देता है और जोर से अपना गला खंकारता है।
मैं ऊपर देखना छोड़ के जल्दी से उसके द्वारा गाया जाने वाला गीत लिखने का सोचता हूँ पर यह क्या?
मेरी डायरी बारिश में भीग रही है और कलम नृत्य करते हुए फुसफुसा के कहता है "शsssश...देव शयन पर जाने वाले हैं और स्वयं को लोरी सुनाने वाले हैं।"

#तुषारापात®

Tuesday, 9 July 2019

चना भटूरा

इश्क की खौलती कड़ाही में जब हुस्न के छींटे लगते हैं
भटूरे से नाज़ुक दिल को तब लोहे के चने चबाने पड़ते हैं

~तुषारापात®

Friday, 5 July 2019

पाप और पुण्य

कभी कभी आपकी कुछ कामनाओं की पूर्ति इसलिए नहीं होती कि आपने पूर्वजन्म में कुछ पाप किये होते हैं बल्कि मनोकामनाएं इसलिए बाधित हैं क्योंकि ईश्वर आपसे इस जन्म में कुछ पुण्य कराना चाहते हैं।

#तुषारापात®

Wednesday, 3 July 2019

ओट

अल्फ़ाज़ की ओट में छुपा बैठा हूँ मैं
तुम पढ़ लो इस पर्दे को हटा देता हूँ मैं

#तुषारापात®

Sunday, 23 June 2019

पीर लाएगा हँसता हफ़्ता

के कोई पीर लाएगा हँसता हुआ हफ़्ता, इस
ऐतबार की हालत अब जाते हुए इतवार सी है

#तुषारापात®

Friday, 7 June 2019

विश्व महासागर दिवस

चलो इस बरस का
दिन-ए-समंदर कुछ ऐसे मनाएं

उँगलियों की नावें मेरी
तेरे गेसुओं के सागर में हिचकोले खाएं

~तुषारापात®

Thursday, 30 May 2019

रंग

तुमने तानी है गर्दन मज़हब के रंग पे मगर
'तुषार' लाल लहू ढोती नसों का रंग हरा है

#तुषारापात®

Friday, 17 May 2019

पूर्णिमा को देखा

नीले हरे
एक लड्डू पे
हम चींटियों को बाँध रखा है
और ललचाने को
वर्क लगा एक लड्डू
उसने ऊपर टांग रखा है

#तुषारापात®

Sunday, 12 May 2019

माँ

नहीं जानता
खाली बर्तन देख के
घर से निकलो तो
अपशगुन होता है

नहीं मानता
गंगाजल की दो कटोरियाँ
देख, बाहर जाओ तो
शुभ-शगुन होता है

जब किसी खास काम पे
जाना होता है मुझे
तो दही-चीनी
चटा दिया करती है

हाँ,अब कुछ कुछ समझा हूँ
आखिर क्यों
माँ,भरी आँखों से,मुझे
विदा किया करती है।

#तुषारापात®

Thursday, 9 May 2019

हथेली का खाली तरकश

खाली हाथों को नहीं मिलती कोई कमान
ऐ खुदा हथेली के तरकश में तीरे मुकद्दर भर दे

#तुषारापात®

Saturday, 4 May 2019

राइटर अब सोता है

अगर तुम्हें लगता है कि
सुबह अपने आप हो जाती है तो
तुमने कभी किसी राइटर की
टेबल नहीं देखी
मेरी मेज पर कई
कोरी डायरियाँ पड़ी हैं
अनगिनत सुबहें इनमें कैद हैं
एक डायरी उठा के
रात को उसमें भरने लगता हूँ तो
पन्नों से सफेदी खिसकने लगती है जो
इकठ्ठी होके सुबह बन जाती है
इस काम को मुझे लंबा और
उबाऊ बनाये रखना पड़ता है अगर
एक झटके से सारी रात
कलम के पतीले से
डायरी के हलक में उतार दी तो पता चला कि
तुम अभी सोए थे और अभी सवेरा हो गया
हाँ कभी थोड़ा कम तो
कभी बहुत ज्यादा लिखता हूँ
इसीलिए तुम्हारी हर सुबह का
टाइम एक सा नहीं रहता
जब कम लिखता हूँ तो
कई रातों तक लिखना
कम से कम करता जाता हूँ और
सफेदी कम रिहा कर पाता हूँ
वे रातें पिछली सर्दियों की
इसीलिए लंबी रह गयीं थीं
लेकिन आजकल अपना काम मैं
मन लगा के कर रहा हूँ
रातों को ज्यादा से ज्यादा
डायरियों में भर रहा हूँ
देखो ये रात भी लगभग मैंने
डायरी में पूरी कर दी है
जाग जाओ
डायरी की सारी सफेदी  रिहा हो चुकी है
एक बार फिर से तुम्हारी सुबह हो चुकी हो।

~तुषार सिंह #तुषारापात®

Thursday, 2 May 2019

चचा से मुआफी के साथ

हजारों फॉलोवर्स ऐसे कि हर फॉलोवर पे दम निकले
बहुत निकले उनके लाइक्स मगर फिर भी कम निकले

कहाँ मोटी आँटी की लंगड़ी कविता और कहाँ बुद्धिजीवी
बस इतना जानते हैं वहाँ भी तुम्हारे दो दो कमेंट निकले

निकलना हाई कमिश्नरों का सुनते आए हैं दुश्मन देशों से
बड़े ब्लॉक हो के तेरी फ्रेंड लिस्ट से बाहर हम निकले

फेसबुक पे नहीं है लुत्फ अब साहित्य लिखने का
उसी को लोग पढ़ते हैं जो इंस्टा-गरम निकले

खुदा के वास्ते अँगूठा न पोस्ट पे लगा तुषार
कहीं ऐसा न हो यहाँ भी आधार का भरम निकले

~तुषारापात®

Monday, 29 April 2019

प्रयाग/इलाहाबाद

तुम्हारे बाद भी
इलाही ये शहर बहुत आबाद रहा
गंगा है जमुना है मगर ओ सरस्वती!
तुम्हारे बाद प्रयाग न रहा, इलाहाबाद रहा।

#तुषारापात®

द पोएटेस विद द रेडिश ब्राउन हेयर

तुम्हारी कविताएं
पहले पढ़ती थी तो
बिल्कुल समझ नहीं आतीं थीं
और बहुत
जोर डालने पे
दिमाग का फ्यूज उड़ जाया करता था
अरे हाँ
फ्यूज से याद आया कि
पिछले दिनों
जब कमरे के बोर्ड का
फ्यूज उड़ा था
तो तुम एक तार के टुकड़े का
मांस छील रहे थे
और अंदर से
तार की लाल हड्डियां निकाल रहे थे
मैं तुम्हें देख रही थी ध्यान से
तुमने फ्यूज स्विच के दोनों त्रिशूलों पे
तार की लाल हड्डियों को
अंग्रेजी के एस आकार में लपेटा
स्विच को फ्यूज सॉकेट में लगाया
और कमरे की लाइट जगमगा उठी थी
मानो किसी तांत्रिक ने
किसी हवन कुंड में हड्डियों की आहुति दे
कोई जादू कर दिखाया हो
तार छीलते हुए तुमने एक बात बुदबुदाई थी
कि ताँबा बिजली का बढ़िया सुचालक है
हमारे दिमाग में भी क्या
ताँबे के तार होते हैं
जिसपे ये विचारों की विद्युत
सरपट दौड़ा करती है
तुम्हारी उस बुदबुदाहट से
बचपन का एक खेल याद आया था
सूखे बालों में कंघी करके
कागज़ के टुकड़ों को चिपकाने का खेल
दिमाग के ऊपर
ये बालों की बाइंडिंग यूँ ही नहीं की गई होगी
बस यही सोचकर बालों में तबसे
खूब मेहंदी लगाने लगी हूँ
एन्ड यस कॉपर इज द बेस्ट कंडक्टर
तुम्हारी कविताएं तो अब भी नहीं समझ आतीं पर
अब मैं अपनी कविताएं करने लगी हूँ।


~तुषार सिंह #तुषारापात®

Friday, 26 April 2019

चक्षु मिलन

सुन ओ चंचल मन
सप्त चक्र हैं बंधन

ज्यूँ होता चक्षु मिलन
स्वतंत्र न रहते स्वप्न

#तुषारापात®

Tuesday, 23 April 2019

काली का तुषारापात

"ये संसार ससुराल के जैसा है..कितने ताने हैं..उलाहने हैं यहाँ...माँ.. मैं तेरे पास आया हूँ ..अपने मायके..तू पूरे ब्रह्माण्ड की रानी..तू भी मेरा कष्ट नहीं हर सकती क्या.." दक्षिणेश्वर मंदिर के प्रांगण में काली की मूर्ति के ठीक सामने बैठा वो बुदबुदा रहा था

अचानक से तेज हवाएं चलने लगतीं हैं,हुगली नदी की ओर से हवा का एक बहुत ही तेज झोंका पसीने से लथपथ मंत्र बुदबुदाते उस आदमी को ठंडक से भर देता है "इस ब्रह्माण्ड में ऐसा कोई भी कर्म है क्या..जिसे मुझे करने की आवश्यकता पड़े...मेरे सोचने से पहले ही वो कार्य सम्पन्न हो जाता है" काली ने मानों काल पर अपनी पकड़ बताई और आगे बोली "मैं सब कुछ कर सकती हूँ..पर मायके और ससुराल का भेद भी तो मुझे बनाये रखना है..अगर मैं ससुराल के तेरे सारे दुख दूर कर दूँगी तो मायके और ससुराल का अंतर न समाप्त हो जाएगा"

"समझा..मतलब..ब्याही गयी बेटी की तरह..मुझे मायके आकर भी चूल्हा चौकी में लगना होगा..तुझे प्रसन्न करने के लिए और कितना जप मुझे करना होगा" वो ऐसे बिलखा जैसे माँ को देखकर कोई बच्चा बिलखने लगता है

काली मुस्कुरा रही थी "मैंने कब कहा कि तू यहाँ के चूल्हे चौके को संभाल... तू ही हठ करके बैठा है कि मैं इतनी माला फेरूँगा... मैंने तो तुझे बस देखने को बुलाया था.. देखना था कि तू तैयार है न और दुख सहने को...ये जाप छोड़ इसकी तुझे कोई आवश्यकता नहीं..मुझसे वार्ता कर.. पुत्र..मुझसे वार्ता कर..तेरी जपी हर माला मुझे भीतर तक चुभ जाती है...मुझे अनुभव कराती है तेरे दुखों से..कौन माँ अपने पुत्र को दुखी देखना चाहती है..उसकी आँखों को तरसते हुए देखना चाहती है..यूँ भूखे प्यासे जप तप में पड़े अपने पुत्र को देख कर प्रसन्न होती है.."

काली की मुस्कुराहट गंगा की आई लहर की तरह लौट गई वो आगे कहती है "मेरी कुंडली बाचेगा...मैं गदाधर को रोगमुक्त न कर सकी..नरेंद्र को दीर्घायु न दे सकी..मेरे पास देने को सुख नहीं है पुत्र..मैं तुझे और कष्ट देने वाली हूँ .. इसलिए सोचा एक बार अपने इस लाल को निहार लूँ..स्नेह के दो शब्द सुन लूँ..बस..जप छोड़ मुझसे वार्ता कर.."

" कुंडली बाच लेने से अगर कष्ट दूर हो जाते तो मैं प्रथम अपनी ही बाच लेता..प्रारब्ध के विषैले बीजों से उत्पन्न फलों को तो चखना ही होगा..पर बालक माँ से अपने मन की बात तो कर ही सकता है..अपनी पीड़ा माँ से भी न कहूँ तो कहाँ जाऊँ... तू भी उल्टे मुझे अपनी पीड़ा बताने लगी.." मंत्र जपने वाले के चक्षुओं में गंगा यमुना उतर आईं

"संभवतः यही तेरा प्रारब्ध है...तुझे सबके कष्ट सुनने का दण्ड मिला हो.. यह तेरा सौभाग्य है या दुर्भाग्य इसका निर्णय तुझपर छोड़ती हूँ...जब तू यहाँ आया था तब तेरे मन में एक प्रश्न था" काली रहस्यमयी मुस्कान के साथ उससे बोली

"अब उस प्रश्न का औचित्य है क्या?..तूने खुद ही कह दिया...परन्तु पूछ ही लेता हूँ...मैं सदैव तुझसे ये प्रश्न करना चाहता था कि विवेकानंद को इतनी कम उम्र क्यों दी तूने..क्यों परमहंस को इतनी पीड़ा दी..कुछ माँगने नहीं बस यही प्रश्न लेकर आया था तेरे पास" तपस्वी ने स्वयं को व्यवस्थित कर कहा

काली,मूर्ति छोड़कर प्रांगण में ठीक उसके सामने आकर खड़ी हो गयी और कहने लगी "जानती हूँ कि तुझे स्नेह और प्रेम से अधिक तर्क की भाषा भाती है तो सुन....दीपक देर तक जलता है दियासलाई नहीं...पाषाणों की रगड़ से उत्पन्न चिंगारी की आयु कितनी..ये महत्वपूर्ण नहीं ...परन्तु वो वन को भस्म कर सकती है इससे उसका महत्व है..दियासलाई की आयु क्षण भर की है परन्तु उससे प्रज्ज्वलित दीपक का प्रकाश एक युग है..एक दीपक से असंख्य दीपक प्रकाशित होते रहते हैं....गदाधर में पाषाण का प्रकाश था और पाषाण अचल रहते हैं ....उसने नरेंद्र को चलित अग्नि प्रदान की..उसे दियासलाई सम बनाया जो कहीं भी जाकर किसी को भी प्रकाशित कर सकती थी और एक बार उनको सौंपें कार्य सम्पन्न हुए तो वे विदा हुए...शेष उनके कष्ट के लिए क्या कहूँ प्रकाश देने वाले को स्वयं को अग्नि को समर्पित करना ही पड़ता है...तू भी प्रकाशित हुई इस दीप-श्रखंला का एक चलित दीपक है..बस स्मरण रखना राजमहल रात्रि में भी प्रकाशित रहते हैं किंतु मलिन बस्तियों में सूर्य भी नहीं पहुँचता.. तुझे वहाँ अपना प्रकाश लेकर जाना है"

"समझा..मुझे अपने प्रथम प्रश्न का उत्तर मिल गया..माँ और कितने दुख हैं मेरे लिए तेरी झोली में... मुझे सब स्वीकार हैं" तपस्वी के चक्षुओं की गंगा यमुना अब मुख की सरस्वती से मिलन कर चुकी थी

महाकाली ने सरस्वती रूप में उससे कहा "तुझे और कष्ट यूँ दूँगी कि... औरों के सब कष्ट तुझे दूँगी..अर्थात तुझे अपने समीप आने वाले सभी के कष्ट सुनने होंगें.. उन्हें ग्रहों के प्रकाश से सत्य का मार्ग दिखाना होगा... जा तुझे यह वर देती हूँ..जिसका भी कष्ट तू मन से सुन लेगा उसका प्रारब्ध कट जाएगा...जा अपनी मीठी ज्ञान 'गंगा' को संसार के दुख के इस खारे 'सागर' में मिला दे...यही तेरे भी प्रारब्ध का मोक्ष होगा"

तपस्वी ने अपनी कंठी माला छोड़ दी, अपने आसन से उठकर उसने काली को दण्डवत प्रणाम किया, काली वहाँ से जा चुकी थी वह भी वहाँ से चल दिया।

~तुषारापात®

Friday, 19 April 2019

गंगासागर की रबड़ी

आकाश एक बहुत विशाल घड़ी की तरह मुझे दिखाई दे रहा है जिसका सेकण्ड का सरपट भागने वाले काँटा है चाँद, और इस समय आसमानी घड़ी का ये चलता पुर्जा, चाँद, मेरे बाएं से मेरी दाहिनी ओर आ चुका है।

सागर खुद तो पूरा काला दिखाई दे रहा है मगर गोरे चाँद को लपकने के लिए शाम से अपना पूरा दम लगाए हुए है वो अपना सर किनारे पे लाकर बार बार पटकता है और हर बार हारकर और जोर से कराह के,लौट जाता है।

किनारे पे आती सागर की सिर्फ वे लहरें ही चमक रहीं हैं जो गंगा की हैं, रेत कोयले की तरह कहीं काली तो कहीं भूरी है कहीं अगर जरा  सी भी कोई रोशनी है तो बस चाँदनी की है और चाँदनी आती हुई लहरों को दूधिया  मगर हल्की लालिमा सी पहना रही है।

सागर खौलती कड़ाही बना हुआ है, लाली लिए आती हर दूधिया लहर पगे दूध की मलाई की तरह इस कड़ाही के किनारे लग जाती है कोई आसमानी हलवाई है तो यहाँ जो ये रबड़ी बना रहा है लोग मुझे पागल कह सकते हैं पर मैं इस हलवाई के दर्शन साक्षात कर रहा हूँ और मैं,सिर्फ मैं उसकी बनाई ये रबड़ी चख रहा हूँ।

#तुषारापात®
(चैत्र पूर्णिमा लाइव फ्रॉम गंगासागर)

Thursday, 11 April 2019

चंदा

तुमसे मिलना तो था गले लग के मगर
ईद से पहले इंतिखाबी चंदा दिख गया था मुझे

~तुषारापात®

कौन कहता है रो रहा हूँ मैं

हक़ीक़त का एक ज़र्रा आँखों में आ गिरा है
पलकें दौड़ रहीं हैं बहते ख़्वाब पकड़ने को

~तुषारापात®

Sunday, 7 April 2019

चाँद

पहली से दूसरी के घर जाते उसे देखा है
परेवा और दूज के बीच एक महीन रेखा है

#तुषारापात®

Monday, 1 April 2019

मूर्खता की शक्ति

किसी मूर्ख को मूर्ख सिद्ध करने के लिए बुद्धिमानों के एक समूह की आवश्यकता पड़ती है परंतु एक मूर्ख,भरे समूह में स्वयं की मूर्खता प्रकट कर पूरे समूह को बुद्धिमान सिद्ध कर देता है।

~तुषारापात®

Saturday, 30 March 2019

रात का सरकना

जैसे जैसे रात सरकती जाती है
मेरी डायरी में छुपती छपती जाती है
पन्नों से सफेदी को खिसका के
धीरे धीरे सुबह को रिहा करती जाती है

~तुषारापात®

Friday, 15 March 2019

कमतर है बेहतर

बेहतर दिखने के लिए अपने से कमतर के साथ बैठिये पर बेहतर होने के लिए अपने से बेहतर के पास खड़े होइए।

~तुषारापात®

Monday, 11 March 2019

आँखों के कुल्हड़

आँखें मेरी चूमते थे जो अब नज़र यूँ फेर बैठें हैं
चाय पीने के बाद लोग कुल्हड़ ज्यूँ फेंक देतें हैं

#तुषारापात®

Sunday, 10 March 2019

शातिर कुम्हार

रोज़ एक ख़्वाब टूट जाता है
आँखें शातिर कुम्हार हैं टूटने वाले खिलौने बनाती हैं

~तुषारापात®

Thursday, 7 March 2019

उतरता सूरज

चढ़ते सूरज को मिलता है एक लोटा जल
दरिया आता है उतरते सूरज को संभालने मगर

#तुषारापात®

Wednesday, 13 February 2019

3 2 4 कविता

शाम का उतरता
नारंगी सूरज
दिन का फुलस्टॉप है।

~तुषारापात®

Wednesday, 30 January 2019

चिताएं जली?

वृक्ष हैं कटे
मनुज मर मिटे
चिताएं जलीं

~तुषारापात®

Saturday, 26 January 2019

जन गण मन

ज ग म अ ना ज ह भा भा वि
पं सि गु म द्रा उ ब
बि हि य ग उ ज त
त शु ना जा त शु आ मा
गा त ज गा
ज ग म दा ज हे भा भा वि
ज हे ज हे ज हे ज ज ज ज हे।

यदि पीछे के अक्षरों के बिना राष्ट्रगान ऐसा दिखता है
तो सोचिये पीछे छूटे लोगों को साथ लिए बिना राष्ट्र कैसा दिखेगा?
#गणतन्त्र_दिवस #तुषारापात®

Thursday, 24 January 2019

बैसाखी पे पायल

उसे जाने दिया मैंने कदम खींच लिए पीछे
बैसाखियों पे पायलें क्या अच्छी लगतीं

#तुषारापात®

अँगूठा

प्रशंसा हुई
दक्षिणा माँगी गई
अँगूठा दिखा

#तुषारापात®

Wednesday, 23 January 2019

हक़

उन्हें किसी बंदोबस्त पे उँगली उठाने का हक़ नहीं
जिनकी उंगलियों पे इंतिखाबी सियाही का वरक नहीं

-तुषारापात®

प्रथम हायकू

भीष्म का अंत
खंडित दृढ़ दंत
जिह्वा शिखण्डी।

#तुषारापात #प्रथम_हायकू

हायकू,लेखन की एक ऐसी जापानी विधा है जो तीन पंक्तियों या पदों में लिखी जाती है इस काव्य विधा में प्रथम पंक्ति में पाँच अक्षर,द्वितीय में सात और तृतीय पंक्ति में पाँच अक्षर होते हैं। कुल सत्रह अक्षरों की सीमा में आपको काव्य का आविष्कार करना होता है। हलंत अर्थात आधे अक्षरों और मात्राओं तथा बिंदुओं आदि को इसमें नहीं गिना जाता है जैसे कि यदि शब्द है 'आरम्भ' तो इसमें बड़े आ की मात्रा और आधे म को छोड़ते हुए इस शब्द के तीन अक्षर ही गिने जायेंगे।संयुक्त अक्षरों जैसे कि 'युद्ध' में 'द्ध' को एक ही अक्षर गिना जाता है।

हायकू में पहली पंक्ति में शब्दों द्वारा एक चित्र खींचा जाता है और दूसरी पंक्ति में प्रथम पंक्ति से सर्वथा भिन्न या पूर्ण विपरीत एक अन्य चित्र प्रस्तुत किया जाता है और फिर तीसरी पंक्ति में बात को एक घुमाव (ट्विस्ट) के साथ दोनों पंक्तियों से जोड़ के एक सार्थक काव्य रचना पूर्ण की जाती है। ये सब पाँच-सात-पाँच अक्षरों के क्रमशः प्रथम द्वितीय व तृतीय पदों की सीमा के भीतर ही किया जाता है।

कुछ विद्वान कहते हैं कि हायकू की प्रथम पंक्ति में ऋतू सूचक शब्द होना चाहिए तथा तीसरी पंक्ति द्वारा प्रथम पंक्ति की बात पूर्ण होनी चाहिए और इसीप्रकार तीसरी पंक्ति द्वारा दूसरी पंक्ति की भी स्वतन्त्र रूप से एक बात पूर्ण होनी चाहिए एक और सामान्य (अनिवार्य नहीं) नियम ये है कि प्रथम व तृतीय पंक्तियों के तुक (काफिया) मिलना चाहिए या प्रथम व द्वितीय पंक्तियों में तुक होना चाहिए। परन्तु प्रायः व्यवहार में ये नियम देखने को कम ही मिलते हैं।

अंत में एक विशेष बात-सत्रह अक्षरों के एक वाक्य को तोड़कर तीन पदों में प्रस्तुत कर देना हायकू नहीं है इसकी प्रायः आलोचना ही की जाती है यद्यपि सम्भव है वह बात बहुत ही प्रभावी हो पर ऐसी रचना इस विधा के नियमों के विपरीत है।

अब वो अवांछित कार्य जो मुझे करना कतई अच्छा नहीं लगता, ऊपर लिखे मेरे हायकू की व्याख्या करना-
भीष्म का अंत
खंडित दृढ़ दंत
जिह्वा शिखण्डी।

प्रथम पंक्ति में गंगापुत्र भीष्म के अंत का दृश्य बताया गया है और दूसरी पंक्ति में अचानक से एक भिन्न दृश्य टूटे और गिरे हुए दाँतो का कहा गया है परंतु ध्यान से पढ़ने पर स्पष्ट होता है कि भीष्म की दृढ़ता जिससे सब परिचित हैं को दाँत जो कि कठोर होते हैं उनसे मिलान किया गया है परंतु सर्वथा भिन्न बात कहकर। प्रथम और द्वितीय पंक्ति में अंत और दंत का तुक भी स्पष्ट ही है।
अब आते हैं तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण पंक्ति यहाँ दो शब्द है जिह्वा और शिखण्डी, महाभारत से आप सभी परिचित ही होंगे और ये भी जानते होंगे कि भीष्म का वध शिखण्डी को आगे करके अर्जुन ने किया था।
जिह्वा के दो अर्थ होते हैं एक है जीभ और दूसरा है अग्नि की लपट
अब प्रथम और अंतिम पंक्ति को एक साथ रख के पढिये -

भीष्म का अंत
जिह्वा शिखण्डी

यहाँ जिह्वा का अर्थ आग की लपटों लिया गया है और शिखण्डी रूपी ज्वाला से भीष्म का अंत दिखाया गया अर्थात प्रथम और तृतीय पंक्ति से एक पूर्ण बात हुई।
दूसरी और तीसरी पंक्ति को एक साथ रखने पर

खंडित दृढ़ दंत
जिह्वा शिखण्डी

यहाँ कहा गया है कि कठोर दाँत खंडित होकर गिर जाते हैं परंतु जीभ कोमल होने के कारण बनी रहती है । जीभ की कोमलता और चपलता के के लिए शिखण्डी शब्द का प्रयोग हुआ है क्योंकि शिखण्डी में नारी तुल्य कोमलता और चपलता थी।

तीनो पंक्तियों से क्या अर्थ निकलता है ये आप पर छोड़ता हूँ क्योंकि कुछ काम बुद्धिमान पाठकों पर भी छोड़ना चाहिए अगर कवि ही अपनी रचना की व्याख्या प्रस्तुत करे तो काव्य की आत्मा ही समाप्त हो जाती है।
आशा है आपको मेरा यह प्रथम हायकू पसन्द आया होगा।

-तुषारापात®

Saturday, 19 January 2019

किरदार या कद्दावर

ये जादू है कलम का जो ताज़ा हैं कुछ किरदार
वरना अख़बारों में बासी हो गए कई कद्दावर

#तुषारापात®

Thursday, 17 January 2019

कोहरा या कपास

वो शायर है,पागल है, नहीं मानेगा कि कोहरा पड़ रहा है
कहेगा,चाँद पर चरखा कातती बुढ़िया का कपास गिर रहा है।

~तुषारापात®

Wednesday, 16 January 2019

निशाना

जो देखे सबको इक नज़र से दिवाना जग उसे समझता है
दो आँखों वाले वाइज़ क्या जाने निशाना इक से लगता है

#तुषारापात®

Saturday, 12 January 2019

गोधूलि

उगते रहो!
स्मरण रहे!
अस्ताचलगामी सूर्य भी
पशुओं तक से धूल ही पाते हैं!

#तुषारापात®

Saturday, 5 January 2019

घड़ी को देखना सीखो

दस बजकर दस मिनट पर घड़ी अपनी मुस्कान नहीं दिखा रही होती बल्कि वक़्त अपनी दोनो बाहें खोल के अपनी ताक़त दिखा रहा होता है।

~तुषारापात®

Friday, 4 January 2019

खालीदिमाग

कागज़ भरना खालीदिमाग वाले ही कर पाते हैं।
कागज़ भरना खाली दिमागवाले ही कर पाते हैं।

(कृपया अपनी सामर्थ्यानुसार इसे ग्रहण करें)
~तुषारापात®

Wednesday, 2 January 2019

अँगूठाछाप

कि पसंद,मोहब्बत,हँसी,हैरत,ग़म या गुस्सा
अँगूठाछाप-ता है सारे जज़्बात,तुम लिखो जो भी किस्सा

~तुषारापात®

Tuesday, 1 January 2019

इक्कीस

जाता हुआ दिसम्बर कह गया जनवरी से
सब इक्कीस हों कोई उन्नीस न रहे इस सदी में

~तुषारापात®

Monday, 31 December 2018

बालिग सदी

आई है शगुन लेकर दिसम्बर के घर जनवरी
रचाओ स्वयंवर बालिग हुई है इक्कीसवीं सदी

#तुषारापात®

Wednesday, 19 December 2018

माथे की दरारों में मिट्टी है

मैं किस्मत,सोने सी करने को,सजदा करता हूँ
मेरे माथे की दरारों में,अब हर दर की,मिट्टी है

~तुषारापात®

Friday, 14 December 2018

त्रिवेणी

छोड़ जाने वालों के नाम बुदबुदाने से
जान बच गई मगर होठ नीले पड़ गए

सांप काटे का अब वो जानता है मंतर

(पहली पंक्ति के साथ तीसरी पंक्ति पढ़िए और दूसरी पंक्ति के साथ तीसरी पंक्ति पढ़िए दो शे'र मिलेंगें बाकी त्रिवेणी तो है ही)
~तुषारापात®