Wednesday, 15 July 2015

अपराध बोध

-"तुमसे तो घर का कोई भी काम...सही से नहीं होता....बच्चों तक को संभाल नहीं सकती तुम...टिपण्णी को बुखार था और तुम कॉलेज चली गयीं.." सन्दर्भ बरस रहा था

"क्यूँ..कौन सा काम..मैं सही से नहीं करती...और जब मैं कॉलेज गई थी..तब टिपण्णी बिलकुल ठीक थी..और तुम भी तो उसे देख सकते थे..क्या घर की जिम्मेदारी अकेले मेरी है.....और लौटते में..मैं ही उसे डॉक्टर को दिखा के लाइ हूँ..तुम नहीं" व्याख्या की दुखती नस फड़क उठी

"कुछ ढंग से नहीं होता तुमसे....और मैं क्या..अपना ऑफिस छोड़ के..अब घर बैठ जाऊँ.....कॉलेज जाने के अलावा करती ही क्या हो.." सन्दर्भ ने गहरा तीर उतार दिया

" हाँ..हाँ.. मैं कुछ नहीं करती...बहुत बुरी हूँ मैं...यही कहना चाहते हो न तुम...सन्दर्भ ऐसा कह भी कैसे सकते हो तुम..." व्याख्या की आँखों से पीड़ा पिघलने लगी

" रोज..सुबह सबसे पहले उठो....जल्दी जल्दी नहाओ....दिया जलाओ...किसके लिए...मैं पूजा पाठ करती हूँ?....हम सबके लिए ही न..फिर तुम सबके लिए नाश्ता बनाओ... निष्कर्ष को जगा के उसे तैयार करके टिफिन देकर...आठ मंजिल उतर के नीचे स्कूल बस में बिठा के आओ..." व्याख्या का बांध टूट चूका था

"उसके बाद..टिपण्णी को जगाओ..उसे तैयार करो..कामवाली से घर की सारी सफाई करवाओ....लंच तैयार करूँ....तुम्हारे हिसाब से नाश्ता सजाऊँ..एक कप चाय तक पीने की फुरसत नहीं होती...जल्दी से तैयार होकर...टिपण्णी को चाची जी के यहाँ..छोड़ के कॉलेज जाऊँ..वहाँ इतने बड़े बड़े ..ढीठ..मुस्टंडे लड़कों को लगातार पाँच घंटे खड़े खड़े पढ़ाऊँ.....और फिर टिपण्णी को लेते हुए वापस घर आकर..पूरा घर समेटूं...बच्चों को होमवर्क करवाऊं....शाम की चाय पे ...मुस्कुराते हुए...तुम्हारा इंतज़ार करूँ.... फिर डिनर बनाऊँ .......... उसके बाद चैन से अपने कमरे में सो भी न पाऊँ...तुम रात के दो दो बजे तक टीवी चलाते रहो......जरा सा भी .....तरस नहीं आता..तुम्हें मुझपर....."व्याख्या 'कैकेयी-जोन' में पहुँच चुकी थी जहाँ बड़े से बड़े दशरथ निहत्थे हो जाते हैं

"पापा...जब आप जानते हो..कि..आप..आप..मम्मा से नहीं..जीत पाते हो.. तो झगड़ते क्यूँ हो?" अचानक से आकर निष्कर्ष ने बड़े ही ज्ञान की बात सन्दर्भ के कान में फुसफुसाईं

सन्दर्भ अच्छी तरह समझ चुका था कि कम से कम एक घंटे बाद ..हाँ एक घंटा तो अभी ज्वालामुखी शांत होने में लगेगा उसके बाद उसे ही सफ़ेद झंडा फहराकर ,व्याख्या को मनाना पड़ेगा। उसने बाहर से डिनर आर्डर किया और निष्कर्ष को लेकर बच्चों के रूम में टिपण्णी के पास आ गया।

'वर्किंग लेडी कहीं न कहीं पहले से ही मन में एक अपराध बोध के साथ जीती है कि वो अपने परिवार को पूरा समय नहीं दे पा रही है उसपर घर और ऑफिस दोनों की जिम्मेदारी रहती है उनपर दो तरफ़ा दबाव बना रहता है इसलिये उन्हें मानसिक सहारे की बहुत अधिक आवश्यकता होती है।'

-तुषारापात®™