Friday, 15 September 2017

सुबह का सूरज

वो अकेले में रोता है और तुम्हारे सामने मुस्कुराता है
रात कैसी बीती ये सुबह का सूरज कभी नहीं बताता है

-तुषारापात®

Saturday, 9 September 2017

उँगलियाँ तेरी मेरी उँगलियों में उलझीं

उँगलियाँ तेरी मेरी उँगलियों में उलझीं
साँसों के तेरे ज़ोर से ज़ुल्फ़ें मेरी सुलझीं

लाल डिब्बे में अब एक हुआ अपना पता
लबों पे मेरे लगा के अपने होठों की मुहर
इश्क की चिट्ठियाँ तूने बदन पे लिक्खीं

उँगलियाँ तेरी मेरी उँगलियों में उलझीं.....

धड़कनों के शोर से नहीं जागे हैं ये
उनींदे अरमानों की नींद टूटी है आज
चूड़ियाँ कलाइयों में हैं बार बार खनकीं

उँगलियाँ तेरी मेरी उँगलियों में उलझीं.....

कोई खतरे का नहीं है अब नामोंनिशाँ
लाँघ जाऊँ जो तेरे साथ लाज की रेखा
माँग में एक,गाल पे कई लाल रेखाएं हैं चमकीं

उँगलियाँ तेरी मेरी उँगलियों में उलझीं.....

सितारे मिलते हैं सितारों से मुश्किल से
मोम के ये टुकड़े आसमाँ में जो चमकते
मन्नतों की शमाएँ हैं जो थीं कभी पिघलीं

उँगलियाँ तेरी मेरी उँगलियों में उलझीं
साँसों के तेरे ज़ोर से ज़ुल्फ़ें मेरी सुलझीं

-तुषारापात®

Monday, 4 September 2017

पश्चिम का सूर्योदय

"शर्मा..बहुत बड़ी नादानी कर रहे हो...रिटायर हो चुके हो..यहीं रहो ये सब कुछ बेचके..कहाँ अपने लड़के के पास जा रहे हो..." गुप्ता जी ने अपने चालीस साल पुराने दोस्त शर्मा के इलाहाबाद से दिल्ली शिफ्ट होने के फैसले पे ऐतराज जताते हुए कहा

शर्मा जी मुस्कुराए और बोले "भाई गुप्ता..बच्चों के बगैर दिल नहीं लगता...जिंदगी के पूरे दिन तो उन्हें पालने पोसने में लगा दिए..अब जिंदगी की आखिरी कुछ शामें बच्चों और उनके बच्चों के साथ भी न बिताने को मिले तो क्या फायदा..वैसे भी अब हम और तुम्हारी भाभी दिन पर दिन कमजोर हो रहे हैं..बेटे के पास रहेंगे तो वो खयाल रखेगा रात बिरात दवा दारू के लिए भागना अब मुझसे नहीं हो पाता"

"भूल गए वो रमन लाल का क्या हश्र किया था उसके बेटे और बहू ने...वो भी तुम्हारी तरह सब कुछ बेच के गया था...खाली हाथ लौटा और अब दोनों बुढ्ढे बुढ़िया यहीं किराए पे रह रहे हैं" गुप्ता ने तीखे स्वर में ऐसे कहा मानो उन्हें कोई अपना पुराना जख्म याद आ गया हो

"नहीं भाई गुप्ता...मेरा बेटा ऐसा नहीं है...पता है जब उसकी नौकरी इंफोसिस में लगी थी...उसने हमारे पैर छूते हुए कहा था कि पापा..मम्मी ये आप लोगों के कारण ही मैं आज यहाँ पहुँचा हूँ..और मैं ये बात कभी भूल नहीं सकता कि आप लोगों ने कितनी तकलीफों से मुझे पाला है...गुप्ता..वो और मेरी बहू बहुत अच्छे हैं मुझे यकीन है वो हमारा ख्याल अच्छे से रखेंगे.." शर्मा जी थोड़ा भावुक होते हुए बोले

गुप्ता ने बुरा सा मुँह बनाते हुए कहा "मुगालते में हो शर्मा..ये आजकल के लड़के..बहुएं..माँ बाप को नौकर बना के रखते हैं...ऐसी बेतुकी बाते तुम मुझसे तो मत ही करो..अक्ल से काम लो..तुम पश्चिम में सूरज उदय होने जैसी बात कर रहे हो..पछताओगे एक दिन.."

"ठीक है यार कुछ हुआ तो तेरा घर तो रहेगा ही मेरे लिए..वैसे ये मेरे बेटे की नहीं..मेरे दिए संस्कारों की परीक्षा है..अब देखना है कि क्या मैं इसमें पास होता हूँ या फिर..." शर्मा जी गुप्ता से गले लगते हुए भावुक स्वर में बोले और फिर अपनी पत्नी के साथ दिल्ली के लिए निकल गए

आज शर्मा जी को दिल्ली आए एक साल हो गया है उनके बेटे बहू दोनों जॉब करते हैं..वे दोनों अपनी अपनी कंपनी में बहुत ऊँची पोस्ट पे पहुँच चुके हैं...शर्मा और उनकी पत्नी घर मे अपने  पोते के साथ खेलते जिंदगी की शामें सुख से बिता रहे हैं

"पापा..एक खुशखबरी है..मुझे कंपनी से बहुत बड़ा ऑफर मिला है..मैं अपनी कंपनी से छः महीने के लिए अमेरिका जा रहा हूँ...आई टी इंडस्ट्री में ये मौका बहुत कम लोगों को मिलता है..हाँ कहने से पहले सोचा आपसे पूछ लूँ " शर्मा जी के बेटे राघवेंद्र ने सबसे पहले ये खुशखबरी अपने पिता को सुनाई

शर्मा जी ने गदगद होते हुए कहा "वाह बेटा ये तो बहुत फक्र की बात है..तेरे पापा मम्मी तो कभी यू.पी के भी बाहर नहीं निकले...और हमारे बेटे को सीधे अमेरिका जाने का मौका मिल रहा है..सब जगदम्बा की कृपा है..जरूर जाओ बेटा"

राघवेंद्र अमेरिका चला जाता है उसके पीछे शर्मा जी की बहू वैदेही ने उनकी जिम्मेदारी बहुत अच्छी तरह से संभाल ली और तीन महीने यूँ ही बीत गए एक दिन शर्मा जी के बेटे का अमेरिका से फोन आता है

"पापा..आपको याद है एक बार संगम के मेले में..एक हवाई जहाज वाला बड़ा सा झूला लगा था...वो जिसका चार्ज एक आदमी के लिए दो रुपैये था उस वक्त..उसमें कई बच्चे अपने अपने पापा मम्मी के साथ बैठ के झूल रहे थे...मैंने भी आपसे जिद की थी कि मुझे आपके साथ बैठना है..पर आपने मुझे किसी और अंकल के साथ बिठा दिया था.. मैं झूले में तो बैठा था पर बाद में आपसे बहुत गुस्सा हुआ था कि आप साथ में क्यों नहीं बैठे थे..पर बड़े होके मुझे समझ आ गया था कि आपके लिए उस समय दो रुपैये भी बहुत होते थे" राघवेंद्र का गला रुंध आया,उसने आगे कहा "पापा मेरी अमेरिका से वापसी का समय पास आ रहा है...आप मना मत करना..मैंने वैदेही को सब समझा दिया है वो वीजा टिकेट वगैरह का इंतजाम कर लेगी..आप और मम्मी वैदेही और कुशेन्द्र के साथ अमेरिका घूमने आ जाओ..वापसी हम सब साथ मे करेंगे...मैं इस बार अपने मम्मी पापा के साथ सच के हवाई जहाज में बैठना चाहता हूँ" राघवेंद्र की बात सुनकर शर्मा जी के गाल आँसूओं से भीगे चले जा रहे थे..वैदेही उनके पास खड़ी थी उसे फोन पकड़ा के वो घर के मंदिर में माँ अम्बे के पास नयनों में भर आए जल का अर्पण करने चले गए

आखिर वो दिन भी आता है जब शर्मा जी सपरिवार अमेरिका में राघवेंद्र के पास पहुँच जाते हैं और रात में आराम करने के बाद वहाँ की पहली सुबह देख रहे होते हैं वो राघवेंद्र से इलाहाबाद गुप्ता का नंबर मिलाने को कहते हैं

"हेल्लो कौन? अरे..हाँ शर्मा..बोल कैसा है..सब ठीक तो है..बड़े दिनों बाद याद आई.." इलाहाबाद में संगम के पश्चिमी किनारे पर सूरज डुबोते हुए गुप्ता ने एक साँस में कहा

इधर शर्मा ने अमेरिका से कहा "सब ठीक है गुप्ता..अमेरिका में हूँ..अपने बेटे के साथ 'पश्चिम' में सूरज को उगता देख रहा हूँ।"

-तुषारापात®

Friday, 1 September 2017

ऑफिस लव

एक बार कहा था उसने
यूँ ही हँसी हँसी में
कभी तुम्हारे साथ डिनर करेंगे
लंच पे भला क्यों बहक रहे हैं

और जमाना ले उड़ा वो बात
दोस्तों ने भी खूब खिंचाई की
उस एक हँसी ठिठोली के
कई किस्से अब तक महक रहे हैं

लंच में खिचड़ी खाती थी
डाल के मक्खन मेरे साथ
अब उसकी लाज के चावल
किसी और घी में लहक रहे हैं

हमसे मत पूछो 'तुषार'
क्या हुआ था हमारा हाल
कई ख्याली पुलाव पके थे
आँख के चूल्हे अब तक दहक रहे हैं

-तुषारापात®

Tuesday, 29 August 2017

कायर

पत्थर के बदले फल देने वाले पेड़ को बाँझ झाड़ियाँ कायर कहती हैं।

-तुषारापात®

Saturday, 26 August 2017

आस्था की आँखें

"बाबा जी..बाबा जी नमस्ते...मेरे पति बहुत बीमार हैं..अपना आशीर्वाद हमे प्रदान करें..बाबा जी उन्हें जल्दी से अच्छा कर दीजिए" माइक पकड़ते ही आस्था ने रोते रोते बाबा जी के दरबार मे गुहार लगाई, बाबा हजारों भक्तों की गोलाकार भीड़ से कोई दो सौ मीटर की दूरी पर बने एक ऊँचे सिंहासननुमा आसन पे बैठे थे उनकी सफेद रंगी दाढ़ी जो कि वास्तव में काली थी उनके चारों ओर लगे स्टैंडिंग एसीयों  की ठंडी हवा से हल्के हल्के उड़ रही थी आस्था की पुकार सुनते ही वो अपनी बड़ी गोल आँखों से उसे देखते हुए रटे रटाये शब्द बोलते हैं "चिंता मत कर बेटी...सब ठीक होगा..कल्याण होगा"

आस्था रुआंसे स्वर में बोली "बाबा जी..उनका बड़े डॉक्टर के पास इलाज चल रहा है डॉक्टरों का कहना है आधे आधे चांस हैं..आपकी कृपा हो जाती तो.." अभी वो अपनी बात पूरी कर भी नहीं पाती है कि पास खड़े बाउंसर टाइप का शख्स उसके हाथ से माइक छीन के दूसरे व्यक्ति को थमा देता है बाबा आस्था के लिए आशीर्वाद की मुद्रा में अपना दायाँ हाथ उठाते हैं और अगले ग्राहक मतलब भक्त की ओर चेहरा कर लेते हैं

पाँच हजार रुपये 'दान' करके वह अस्पताल में अपने पति के पास आती है उसका पति विश्वास कुछ बोलने की स्थिति में नहीं है,विश्वास के बेड के पास बैठे उसके ससुर सेठ सूरदास ने उससे कहा "बहू..हो आई बाबाजी के पास क्या कहा उन्होंने..वैसे तो मैं ही जाता उनके दर्शनों को..पर सुना है वो औरतों की फरियाद जल्दी सुनते हैं..तो तुझे भेजा था.. जल्दी ही उनके आशीर्वाद से विश्वास ठीक हो जाएगा .. हाँ..ये साले डॉक्टर पता नहीं क्या ऑपरेशन वगैरह बता रहे हैं..चल तो मेरे साथ जरा डॉक्टर विवेक के पास"

वह अपने ससुर के साथ डॉक्टर के केबिन में पहुँचती है कुछ देर इंतजार करने के बाद वो और उसके ससुर डॉक्टर विवेक के सामने बैठे हुए थे

उसके ससुर ने डॉक्टर से पूछा "कौन सा ऑपरेशन बता रहे थे आप?"

"देखिए सूरदास जी..आपके बेटे की स्प्लीन से खून रिस रहा है इसके लिए हमे एक विशेष तरह का ऑपरेशन करना पड़ेगा जिसमें उसकी पैर की नस के रास्ते एक पतला तार डाल कर स्प्लीन में खून बहने की जगह को ब्लॉक किया जाता है" अनुभवी और बेहद ईमानदार बड़े डॉक्टर विवेक ने उन्हें एम्बलॉइज़ेशन को सरल शब्दों में समझाते हुए कहा

"इस ऑपरेशन की कितनी गारंटी है? मतलब इसके बाद विश्वास ठीक तो हो जाएगा ?

"अब गारंटी तो मैं नहीं ले सकता मगर 90 फीसदी केसेस में मरीज पूरी तरह ठीक हो जाता है"

"पैसा कितना लगेगा डॉक्टर साहब" सेठ ने सीधे स्वर में डॉक्टर से पूछा

"अ..जी देखिए ये थोड़ा महँगा ऑपरेशन है पहले तो इसमें लाखों रुपये लगते थे पर अब ये काफी सस्ता हुआ है ..आपके केस में एक लाख पचीस हजार के आसपास लगेगा ये मान के चलिए..."

आस्था जानती थी कि ये उसके धनाढ्य परिवार के लिए कोई खास रकम नहीं है तो जल्दी से हाँ कहने वाली थी पर उसके ससुर ने उसे चुप रहने का इशारा कर डॉक्टर से कहा "ये तो बहुत ज्यादा है..डॉक्टर साहब कुछ गुंजाइश हो जाती तो.. "

"ठीक है अगर आपको पैसों की दिक्कत है तो मैं अपनी फीस छोड़ देता हूँ..आप एक लाख जमा कर दीजिए..." डॉक्टर विवेक ने उनसे यह कहा एक पर्चा लिखा और अपने काम मे व्यस्त हो गया

सेठ जी डॉक्टर के केबिन से निकलते ही आस्था से बोले "देखा बहू कैसे इन कांइयां डॉक्टरों को सीधा किया जाता है..ला ये पर्चा मुझे दे..और तू विश्वास के पास जाकर बैठ..मैं रुपैया जमा करा के आता हूँ"

अगले दिन विश्वास का ऑपरेशन होता है और वो सफल रहता है चार दिनों के बाद उसे अस्पताल से छुट्टी मिल जाती है सेठ सूरदास उसे लेकर बाबा जी के आश्रम पहुँचते हैं और बाबा के चरणों मे गिरकर कहते हैं "बाबा जी ये मेरा बच्चा विश्वास आपकी ही कृपा से ठीक हुआ है..आपकी सदा जय हो..."

"तुम्हारी बहू नहीं आई" बाबा ने अपनी दाढ़ी सहलाते हुए पूछा

"जी वो जरा...इन दिनों..अशुद्ध...मतलब बीमार है" विश्वास ने सकुचाते हुए कहा

इसी बीच सेठ सूरदास ने अपने बैग से 2000 के 25 नोटों की एक गड्डी निकालकर बाबा की ओर बढ़ाई "एक भक्त की ओर से ये छोटी सी भेंट स्वीकार करें"

बाबा ने आशीर्वाद देने को बढ़ाया अपना हाथ पीछे करते हुए कहा "न न बच्चा..हम माया को हाथ भी नहीं लगाते..ये सहजयोगी परमानंद जी को दे दो" सेठ जी ने पास खड़े उनके सहयोगी को नोटों की गड्डी दे दी बाबा ने आशीर्वाद की मुद्रा में अपना दायाँ हाथ ऊपर उठाते हुए कहा "अगली बार अपनी बहू को भी आशीर्वाद हेतु अवश्य लाना"

"जी बाबा जी" डॉक्टर की 'कांइयांगिरी' पकड़ने वाले चतुर सेठ ने यहाँ कोई प्रश्न न किया और बाबा के चरणों में अपना और अपने पुत्र का मत्था टेक दिया।

आस्था और विश्वास जब विवेक का साथ छोड़ते हैं तो सूरदास हो जाते हैं।

-तुषारापात®

Wednesday, 23 August 2017

हिसाब

चाँद पे चाकू चला के/बाँटता हूँ रोज/कुछ इस तरह
तेरे आसमाँ में आए/जलता हुआ/मेरे में आए पूरा बुझा हुआ

#तुषारापात®