Monday, 16 May 2016

मासनामा

'जेठ' की दुपहरी
की सूनी सड़क सी मेरी जिंदगी
और 'आषाढ़' की बारिश सी तुम्हारी यादें
जब मुझपर बरसती हैं तो
'सावन' में शिवलिंग पे चढ़े
दूध सा पवित्र हो जाता हूँ
'भादों' तक बरसती
तुम्हारी यादों को सोख लेता हूँ खुदमें
इनमें से कुछ 'आश्विन' में
मेरे दुखों का श्राद्ध कर जाती हैं
तो 'कार्तिक' में
कुछ के साथ दिवाली मन जाती है
'मार्गशीर्ष' में उनमें से कुछ को
गुल्लक में रखकर बचाता हूँ
और 'पौष' के चाँद के साथ
ख़ुशी ख़ुशी ठुरठुराता हूँ
फिर वो गुल्लक फोड़ता हूँ 'माघ' में और
तुम्हारी यादों की डुबकियों से
संगम का पुण्य कमाता हूँ
'फाल्गुन' भर तुम्हारे ही
रंगों में ही रंगा नजर आता हूँ मगर
रंग के साथ साथ
उतर जाती हैं तुम्हारी यादें सारी
तो 'चैत्र' में चित्त अपना
फिर से अशांत पाता हूँ
आते आते 'बैशाख'
पूरी तरह कंगाल होकर
जेठ की दुपहरी के
सूने रस्ते पे फिर से आ जाता हूँ

-तुषारापात®™