Friday, 8 April 2016

पाकिस्तानी ऊँट

हर भारतीय बच्चे की तरह बचपन में मुझे भी क्रिकेट खेलने का बहुत शौक हुआ करता था पर मेरे पास न खुद का बल्ला होता था और न ही वो पीली हरी कॉस्को वाली टेनिस बॉल,जो उन दिनों एक ऊँचे स्टैण्डर्ड की तरह देखी जाती थी तो खेलने के लिए हम मित्रों के रहमोकरम पे रहते थे और आप मेंसे जिन्होंने गली क्रिकेट खेला होगा वो बहुत अच्छी तरह जानते होंगे कि गली क्रिकेट में जिस लड़के का बैट होता है उसकी कुछ न कुछ दादागिरी पूरे खेल के दौरान बनी ही रहती है

फिर भी मेरे जैसे लोग तो चाहिए ही होते हैं इस खेल में जो फील्डिंग के और इधर उधर गई गेंद को उठा लाने के बड़े काम आते हैं और हमारे जैसों की बैटिंग भी सबसे अंत में आती है फिर भी हम वसुधैव कुटुंबकम की नीति के तहत खेला करते थे इसके अतिरिक्त और चारा भी नहीं हुआ करता था

ऐसे ही मुझे याद आता है मेरा एक मित्र हुआ करता था जिसके साथ अपने घर की गैलरी में मैं क्रिकेट खेला करता था सिर्फ वो और मैं हुआ करते थे खेल में ,गैलरी से बाहर गेंद जाने की संभावना न के बराबर और पीछे तो दीवार ही हुआ करती थी जिसपे कोयले या किसी पत्थर के टुकड़े से तीन स्टम्प का वो ऐतिहासिक निशान हुआ करता था जो परमानेंट बना रहता था आखिर रोज ही खेलते जो थे

अब चूँकि बैट भी मेरे मित्र का और बॉल भी उसकी तो एक सर्वमान्य नियम ये था ही कि वो पहले बैटिंग करेगा कभी हम कुछ ओवर्स की सीमा बना के खेलते तो कभी अनलिमिटेड ओवर्स (टेस्ट क्रिकेट की तरह) का खेल हुआ करता था इसमें लिमिटेड ओवर्स के खेल में तो मेरी बैटिंग जैसे तैसे आ जाती थी हालाँकि उसमें भी मेरा मित्र तीन चार बार से पहले खुद को आउट नहीं घोषित करता था कभी गेंद स्टंप के ऊपर लगी कभी बाएं से बाहर लगी आदि आदि लेकिन असली समस्या आती थी जब हम अनलिमिटेड यानी जब तक मित्र या मैं आउट नहीं होऊँगा तब तक दूसरे को बैटिंग नहीं मिलेगी अब मेरा मित्र पहले बैटिंग करता और चूँकि वो ही अंपायर होता तो मैं घंटों बॉलिंग करते रहता और वो खेलता रहता आउट होने पर भी आउट नहीं मानता फलतः मेरी बैटिंग आने के कोई आसार नहीं बनते थे और जब वो खेलते खेलते ऊब जाता था या थक जाता था तो बगैर मेरी बैटिंग दिए अपना बैट बॉल लेकर चला जाता था कि मम्मी बुला रही है या पापा गुस्सा रहे होंगे और मैं ठगा सा रह जाता था

ऐसा मेरे साथ कई बार होता था फिर भी मैं उसके साथ खेला करता था अब आप सोच रहे होंगे कि भाई तुषार सिंह तुम तो बहुत बड़े बेवकूफ थे जब जानते हो कि वो हर बार तुम्हारे साथ ऐसा ही करता है तो तुम उसके साथ खेलते ही क्यों थे ?

इसका उत्तर मेरे पास नहीं है...पर जरा रुकिए...मैं आपका ये प्रश्न भारत सरकार की ओर भेजता हूँ...

"हाँ तो भाई भारत सरकार..पठानकोट आतंकी हमले की जाँच के लिए पाकिस्तान के कुछ 'विशेषज्ञ' यहाँ आये..खाये पिए और जाँच के नाम पे कुछ स्वांग कर वापस चले गए..और जब तुम्हें बुलाने की बारी आई तो हमेशा की तरह ठेंगा दिखा दिया...और तुम मेरी तरह ठगे रह गए तो साहब मेरे पास तो बैट बॉल खुद का नहीं हुआ करता था...पर ये बताओ तुम्हें किस चीज की कमी है..जो तुम बारबार खुद को ठगवाते रहते है?"

#पाकिस्तान_का_ऊँट_हमेशा_एक_ही_करवट_बैठता_है
-तुषारापात®™