Tuesday, 20 June 2017

चश्मों के बाँध

देखकर गैर के काले मनकों में उसकी नथ का सफेद मोती
आँखों की उमड़ती नदी पे हमने चश्मों के काले बाँध रख लिए

-तुषारापात®

परिक्रमा

युक्ति भक्ति और शक्ति में
नहीं रहा द्वंद्व
कलियुग में कृतयुग की
कथा का संबंध?
शक्ति से भक्ति का
रच सकता जो प्रपंच
चाटुकारिता की युक्ति से
तोड़े वो सब बन्ध
आदर्शों के वचनों को
कहने वाला तू
एकाकी कर दिया जाएगा
आकाश की ओर
क्या ताकता?
वह पहले ही से
कथा वाचता
कर रमा-रमापति की परिक्रमा
उमा-नंदन प्रथम पूजन पाते हैं
पूरी पृथ्वी मापित करने वाले
कार्तिकेय श्रापित से रह जाते हैं।

-तुषारापात®

Monday, 12 June 2017

ऑफिसियल मेल


"कुछ कहना होता तो व्हाट्सएप्प नहीं एक मेल आता...कंपनी जॉब इंटरव्यू के रिजल्ट्स व्हाट्सएप्प पे नहीं बताती" उसका रूखा सा रिप्लाई आया

"सुमैरा..मुझे पता नहीं था कि तुम वहाँ की बॉस.." मैं अधूरा ही मैसेज भेज सका

"अब व्हाट्सएप्प मत करना.." उसने रिप्लाई किया और मुझे ब्लॉक कर दिया

अगले दिन अजीब सा ऑफिसियल मेल आया...रिजेक्टेड!.. रिजेक्टेड!... रिजेक्टेड!

मुझे सुमैरा को सात साल पहले कहे अपने शब्द याद आ गए "तलाक!..तलाक!..तलाक!..।"

-तुषारापात®

Monday, 5 June 2017

खुले खत का लिफाफा

नज़र की धार से
खुले ख़त का लिफाफा
गलत ही सही
काट तो दो कभी
सही के दो निशान
कब से यहाँ
नीले होने को तरसते हैं

#√√#तुषारापात®

Sunday, 21 May 2017

एयर कंडिशन्ड लड़का

चलते चलते कार का ए सी अचानक खराब हो गया,दोपहर का टाइम था तो धूप भी बहुत तेज थी,थोड़ी ही देर में विमल के सर से पसीना बहने लगा,वो बड़बड़ाने लगा "ये साले सर्विसिंग वाले भी...अच्छा खासा तैयार होके निकला था..पसीने ने सारे कपड़े खराब कर दिए"

सीतापुर में उसकी बिजिनेस मीटिंग है,अभी वो हाइवे पे पचीस तीस ही किलोमीटर चला था कि ए सी ने काम करना बंद कर दिया था वो पसीने से लथपथ था पर फिर भी कार के शीशे नीचे नहीं कर रहा था हाइवे पे उड़ती धूल और गाड़ियों के शोर से उसे बहुत कोफ्त होती थी।

"धत्त तेरे की..." अचानक लहराती कार को उसने किसी तरह संभाला  कार थोड़ी दूर जाकर ही सड़क के किनारे लग पाई,वो दरवाजा खोल के टायर पे लात मारता है कार का अगला टायर पंचर था गुस्से से तमतमाया वो इधर उधर देखता है कि पता करे पंचर वाले कि दुकान कहाँ है हालांकि उसकी कार में स्टेपनी है पर उसे टायर बदलने का काम बहुत ही खराब लगता है और इस समय तो वो अपने साफ कपड़े बिल्कुल ही खराब नहीं करना चाहता था,वो देखता है जिधर वो जा रहा था उसी ओर थोड़ी दूर पे खप्पर पड़ी कोई चाय वाय की दुकान है,वो उस ओर भारी कदमों से चल देता है तेज धूप में चलते हुए जब वो दुकान पे पहुँचता है तो पसीने से पूरा भीगा होता है प्यास से उसका गला सूखने लगा था वो दुकान के पास पड़े सायकिल के एक टायर को देखते हुए उस चायवाले से पूछता है "क्यों..यहाँ आसपास कोई पंचर बनाने वाला है क्या..कार का पंचर..."

"इहाँ तो नाई..पर 'सर' इहाँ सेरे तकरीबन पन्द्रा किलोमीटर आगे पेटोल पंप परिहां  हई" चाय वाले का जवाब सुनकर विमल का दिमाग और खराब हो गया उसने कहा "अच्छा पानी है?" उसके कहते ही चायवाले के यहाँ खड़ा एक 10-11 साल का लड़का झट से दौड़ के पास लगे हैण्डपम्प से पानी भरके के प्लास्टिक का मग उसके सामने रख देता है

"अरे बोतल वाला है?" विमल मग को दूर खिसकाते हुए चाय वाले से खीजते हुए पूछता है चायवाला उस लड़के को डाँटता है "तुम ससुरे के एक तउ इहाँ बेफालतू महियां खड़े राहत हो अऊर ग्राहकी कहियां अलग परेशान करत हउ" कहकर वो प्लास्टिक के नीले बक्से से बर्फ में दबी पानी की ब्रांडेड बोतल विमल के हाथ मे देता है विमल जल्दी से गटागट करके आधी बोतल खींच के पी जाता है और उस लड़के से कहता है "जरा चलके मेरे साथ टायर बदलवा देगा..पैसे दूँगा" लड़का तुरंत तैयार हो जाता है और दुकान पे अपने साथ लुढ़का के लाये उस सायकिल के टायर को उठा के कहता है "चलऊ"

विमल एक और पानी की बोतल खरीदता है और दोनों बोतल पकड़े हुए विमल और वो लड़का सायकिल का टायर पकड़े पकड़े कार की ओर चलने लगते हैं,कार के पास पहुँच के विमल हाथ मे पकड़ी पानी की बोतलें कार की सीट पे रख,डिग्गी खोल के स्टेपनी और जैक वगैरह निकाल के बाहर रखता है और अनमने मन से पंचर टायर के नट खोलना शुरू कर देता है बीच बीच में वो अपनी पैंट भी बचाने की कोशिश करता जाता है पास खड़ा लड़का उसे देखता है तो एक झटके में अपनी बुशर्ट उतार के सायकिल के टायर पे डालता है और नट खोलने वाले पाने की रॉड पे खड़े हो होकर नट खोलने लगता है किसी तरह दोनों मिलके टायर बदल लेते हैं,जैक वगैरह कार की पिछली सीट पे फेंकने के बाद पसीने से लथपथ विमल पानी की बोतल उठाता है और लड़के की तरफ देखता है लड़का भी पसीने से भीगा हुआ था वो बड़े मजे से अपनी बुशर्ट से अपना बदन पोछ रहा होता है विमल उससे पूछता है "पानी लोगे" और उसकी ओर पूरी भरी वाली बोतल और बीस का नोट बढ़ाता है

लड़का पसीने से भीगी शर्ट पहन चुका होता है उसे प्यास लगी थी वो बोतल और नोट झट से पकड़ता है नोट अपनी निक्कर में डाल वो बोतल झुका कर अपने हाथ से चुल्लु बना पानी पीना शुरू करता है और तुरंत ही रुक जाता है "उरे...यउ पानी तो बिल्कुलई बेस्वाद हई..यउ तउ अब अपने कहियां ए सी बनहिए" यह कहकर वो बोतल में बचा पानी अपने सर के ऊपर डाल लेता है और खाली बोतल से साइकिल के टायर को लुढ़काते हुए पानी से भीगी शर्ट और भीगे बाल उड़ाता चाय की दुकान की ओर दौड़ जाता है

विमल कुछ देर केलिए उसे बस देखता ही रह जाता है,पानी पीता है और अपनी शर्ट का ऊपरवाला एक बटन खोलता है,दोनों आस्तीनों के बटन खोल के ऊपर मोड़कर,कार में बैठता है और कार स्टार्ट कर, आगे बढ़ा देता है,थोड़ा सा चलने पर वो लड़के के पास पहुँच जाता है,लड़का लुढ़कते टायर पर बोतल मार के चहकते हुए हॉर्न की आवाज की नकल करता है "पों..पो.."

विमल उसे देख के मुस्कुराता है उसकी कार उस एयर कंडिशन्ड लड़के के एक चक्रीय वाहन को  क्रॉस करके आगे बढ़ने लगती है इस बार उसकी कार के शीशे उतरे हुए हैं और पसीने से भीगे होने के कारण बाहर की गरम हवा उसे ठंडक पहुँचा रही है।

-तुषारापात®

Friday, 19 May 2017

गुलाबी

वो इतने हैं गुलाबी
के कैलेंडर ज़रा छू लें
तो हर तारीख़ इतवार हो जाए

और जिस कागज़ पे
वो अपने कर दें दस्तख़त
वही नोट -ए- दोहज़ार हो जाए

-तुषारापात®

Tuesday, 16 May 2017

तू मुझमें

कई बार
ये होता है
तू मुझमें
छुपा होता है
आईने में होती है
जो सूरत
उसकी आँखों में
तू दिखाई देता है

लबों के
हिलने से
अपना
लेने से
एक कान को तेरा
एक को मेरा
नाम
सुनाई देता है

कई बार
चौंक चौंक जाता हूँ
जब अपने चेहरे पे
हाथ फिराता हूँ
समझ में नहीं आता
तू मुझको
या मैं तुझे
छुआई देता हूँ

होता है
यूँ अपने भी साथ
कई बार
होता हूँ खाली हाथ
लहू बेच के
मगर तेरी तस्वीर पे
चढ़ा फूलों की
कमाई देता हूँ।

-तुषारापात®

Thursday, 11 May 2017

सिद्ध साधना

"ऑटोग्राफ प्लीज" बुक फेयर में मेरी लिखी एक पुरानी नावेल लिए एक हाथ मेरी ओर बढ़ता है...नावेल पकड़ी उन उंगलियों को मैं तुरंत पहचान लेती हूँ...मेरी जुल्फों में इन पोरों के प्रिंट आज तक मौजूद हैं.. "त.तुम..." अपने आसपास मौजूद प्रशंसकों को अपनी नई नावेल पे ऑटोग्राफ देते हुए मैं बस इतना ही बोल पाई उसे बैठने का इशारा किया और कुछ फैन्स को फटाफट नावेल साइन करके थोड़ा सा वक्त माँग एक ब्रेक लिया

"आज न्यूज़ में पता चला कि अपनी नई नावेल के लिए तुम दिल्ली आई हो तो चला आया...तुम्हारी सबसे पहली नावेल का ये पहला पहला प्रिंट आज तक तुम्हारे हस्ताक्षर को तरस रहा है..सोचा शायद आज बत्तीस साल के बाद..."पूरी बात कह उसने आखिरी सेन्टेन्स अधूरा छोड़ दिया

मैंने उसके हाथ से नॉवेल अपने हाथ मे ली और उसपे हाथ फिराया "अधूरी साधना..ये जब लिखी थी तो नहीं जानती थी कि कभी मैं ही पूरी नहीं हो पाऊँगी.. क्या करोगे मेरे हस्ताक्षर लेकर..'दी साधना मजूमदार फ्रॉम लंदन' मैं लिखना नहीं चाहती और वक्त ने तुम्हारी साधना लिखने नहीं दिया" मैंने आंखों में आई नमी को मुस्कुराहट की मिट्टी से सुखाते हुए कहा

"एक टाइम रुकी हुई घड़ी..दोबारा से भी चल सकती है..वक्त सुइयों की बाहें फैलाएं फिर से खड़ा है..साधना..कुछ भी तो नहीं बदला..तुम भी वही हो और मैं भी..हाँ..तुम्हारी कमर थामने वाले ये हाथ अब कमजोर हो चुके हैं पर इतने नहीं कि...तुम्हारे हाथ न थाम सके" उसने अपने हाथों को आगे बढ़ाते हुए कहा

"सिद्ध..जानते हो पिछले बत्तीस सालों में अपने अड़तालीस नावेल मैं कैसे लिख सकी..शायद मेरी बेरंग जिंदगी ही कागजों को रंगीन करती गई...आज इस मुकाम पे हूँ..तो तुम्हारी वजह से.. तुमने मुझे न ठुकराया होता..." मैंने जैसे ही ये कहा तो वो दर्द से कराह उठा "दर दर की ठोकर खाने वाला किसी को क्या ठुकरा सकता है..सधी..कितने बरस मैं स्ट्रगल करता रहा..खुद को बनाने में..और उसके बाद न जाने कितने साल तुम्हें खोजने में..पर तुम तो अपनी मम्मी के साथ लंदन....पर क्या आज दो अधूरे टुकड़े उन बीते लम्हों के गोंद से नहीं जुड़ सकते..कितने खुश थे हम उन लम्हों में..."

फैन्स की भीड़ बढ़ने से मेरी टीम मुझे आने का इशारा करती है देखकर भी उन्हें अनदेखा करते हुए उससे कहती हूँ "वही लम्हें मेरी साँसे हैं.. सिद्ध..मैं उन्हें अब तुम्हारे साथ भी शेयर नहीं कर सकती..कम से कम उनका भरम तो बना हुआ है..और वैसे भी अब इस चेहरे पे झुर्रियाँ आ रहीं हैं..मेरे हर एक उपन्यास के साथ एक नई सलवट चेहरे पे बढ़ जाती है..यही मेरा ईनाम है..और इस ईनाम पे मैं लाल बिंदी का फुलस्टॉप नहीं लगाना चाहती" कहकर मैं जल्दी जल्दी उसकी लाई हुई नॉवेल के पहले पन्ने पे कुछ लिख के उसे वापस देती हूँ और यह कहकर वापस अपनी टीम के पास आ जाती हूँ "लम्हों की स्त्री उल्टी चलाने से वक्त की सलवटें नहीं मिटा करतीं।"

मेरी नजरें उसपे ही थीं नॉवेल पे मेरा लिखा पढ़ते हुए वो वापस जा रहा था "कुछ साधनाएं अधूरी ही रह जाती हैं उन्हें कोई सिद्ध नहीं कर सकता"

#तुषारापात®

Thursday, 4 May 2017

गुलाबी

जाने क्यों उस दिन आसमान गुलाबी था?...हवा-ए-इश्क जिस्म की पाँचों खिड़कियों से गुज़र के तुम्हें हवामहल बनाये थी...लाज के पत्ते अपनी शाख छोड़ रहे थे...नारंगी सूरज आँखों में डूब सुरूर के लाल डोरे तैरा रहा था..आदमी जब इश्क में  जयपुर बना हो तो...कानपुर का काला आसमान भी उसे गुलाबी दिखाई देता है।

-तुषारापात®

Wednesday, 3 May 2017

आँख

आँख में सबके है कुछ न कुछ जुरूर
आँसू,जादू,नींद,सपने,माशूक,गुरूर,सुरूर

#तुषारापात®

सिक्सटी वर्ड्स स्टोरी

वो स्लम एरिया में जाता है पूरी बस्ती में घूम घूम कर ,वहाँ रहने वालों की जिंदगी की रेसिपी नोट करता है और रात को वापस लौट के अगले दिन का मेन्यू बनाने में लग जाता है,भूखे पेटों के किस्सों को चटपटा मसाला लगा के,भरे पेट वालों के सामने परोसने वाला वो कोई रसोइया नहीं,एक कहानीकार है।

-तुषारापात®

Monday, 1 May 2017

नींव के पत्थर

"सर...कुछ फिनिशिंग वर्क बाकी है..पर आप निश्चिन्त रहें 28 अप्रैल तक हमारा मल्टीप्लेक्स पब्लिक के लिए बिल्कुल तैयार हो चुका होगा..और सर..29 को फ्राइडे है तो नई फिल्म्स के शो भी हमें मिल जाएंगे...एवरीथिंग इज अंडर कंट्रोल..सर ..वी विल लॉन्च इट विथ अ ब्लास्ट" प्रोजेक्ट हेड माथुर ने चहकते हुए कहा

सिंघानिया साहब ने पूरी बात सुनी और धीरे से बस इतना ही बोले "हम्म" उनके हम्म से भी माथुर का उत्साह कम नहीं हुआ और वो बॉस को इंप्रेस करने के लिए आगे बोला "सर..पाँच स्क्रीन वाला अपना ये मल्टीप्लेक्स शहर का इकलौता और अनोखा मल्टीप्लेक्स होगा...ओपेनिंग डे के शो के लिए शहर के सभी बड़े हॉट शॉट्स को जल्द ही इनविटेशन भेज दिया जायेगा और सर मुंबई से कुछ स्टार भी....."

"माथुर...छोटे लेवल के सभी लेबर्स के आखिरी दो दिनों की पेमेंट रोक लेना..कहना कि पेमेंट ओपनिंग के दिन मिलेगी"सिंघानिया ने माथुर की चहकती बात को काटते हुए गंभीर स्वर में कहा और पाइप से धुआँ उगलते हुए आगे कहा "और हाँ..माथुर ओपनिंग 29 को नहीं 1 को होगी"

"ओह्ह लगता है महाराज जी ने 1 तारीख का मुहूर्त दिया है.. नो..नो प्रॉब्लम सर..एक को कर लेते हैं..लेकिन सर इन छोटे लोगों की पेमेंट अगर रोक दी तो परेशानी..ओके..ओके.. सर..आई गॉट इट सर...उस दिन अगर कोई छोटा मोटा काम निकल आया तो इन्हें फिर से बुलाना आसान नहीं होता..बट जब..पेमेंट फँसी होगी तो बुलाने से झट से आ जायेंगे..ब्रिलियंट सर.. इन नालायकों को ऐसे ही कंट्रोल में रखना चाहिए..सुपर्ब आईडिया" माथुर ने हाँ के अंदाज में बार बार सर हिलाते हुए कहा

1 मई को बड़ी धूमधाम से सिंघानिया मल्टीप्लेक्स की ओपनिंग होती है शहर के राजनीतिज्ञ,माननीय सांसद महोदय,मंत्री,बड़े व्यापारी,अफसर, मीडिया,बुद्धिजीवियों आदि के साथ शहर के उच्च तथा उच्च मध्य वर्ग के निमंत्रित लोग मुंबई से आए अभिनेता-अभिनेत्रियों के साथ जश्न का आनंद ले रहे हैं अलग अलग स्क्रीन जिन्हें ऑडी एक,ऑडी दो का नाम दिया गया है उनमें नई रिलीज हुई फिल्मों का शो 15-15 मिनट के अंतर पे रखा गया है

"द सिंघानियां ग्रुप आए हुए सभी गेस्ट्स का वेलकम करता है और शुक्रिया अदा करता है..फ्रेंड्स थोड़ी ही देर में फिल्म के शो शुरू होने वाले हैं आप सब इन फिल्मस का लुत्फ़ जरूर उठाइयेगा..
सबसे पहले ऑडी वन में शो शुरू होगा..आप सब ऑडी टू और ऑडीज थ्री..फोर..एंड फाइव में रेस्पेक्ट फुल्ली इनवाइट किए जाएंगे... पर सबसे पहले मैं ऑडी-वन के शो के लिए बहुत ही खास लोगों को आमंत्रित करना चाहता हूँ..आप सब उनका तालियों के साथ स्वागत कीजिये" कहकर सिंघानिया ने हॉल के दरवाजे की ओर इशारा किया सबने उधर देखा इस मल्टीप्लेक्स को बनाने वाले सभी मजदूर हाथों में चार दिनों की पेमेंट के लिफाफे पकड़े ऑडी एक में प्रवेश कर रहे थे।

नींव के पत्थरों पर न प्लास्टर होता है और न हीं रंग रोगन पर पूरी इमारत का बोझा ढोने वाले नींव के पत्थरों का पूजन अवश्य होना चाहिए।

-तुषारापात®

Sunday, 30 April 2017

लव स्टोरी

"हेलो..एक्सक्यूज़ मी...ये तुम्हारा रुमाल..वहाँ..शायद तुमसे गिर गया था" राजीव चौक मेट्रो पे लड़के ने दौड़के आगे जाती लड़की के पास जाकर कहा

लड़की रुमाल लेती है और कहती है "हम्म..'शायद'..नहीं नहीं...जानबूझकर..ताकि इतनी भीड़ में मैं देख सकूँ कि कौन कौन मेरा रुमाल गिरता हुआ देखता है.."

लड़की के इस अटपटे से उत्तर से लड़का बौखला जाता है "अरे.. मतलब..मैंने देखा तो..."

"देखा तो क्या..इसका मतलब तुम पहले से मुझे देख रहे थे..तभी तुम्हें मेरा रुमाल गिरता दिखा..." लड़की ने उसकी बात काटते हुए कहा "

"यार कमाल है...एक तो भलाई करो..और ऊपर से बातें सुनो..हद है.." लड़का भी गुस्से में आ गया

"भलाई..भलाई क्या..तुम लड़के..पहली ही मुलाकात में रुमाल देकर ये बता देते हो..कि देखो मैं तुम्हें आगे जाकर खूब रुलाने वाला हूँ..तो अभी से ये रुमाल रख लो" लड़की ने गुस्से से उसके मुँह पर रुमाल फेंका और वहाँ से चल दी

लड़के ने गुस्से से चीख के कहा "गो टू हेल" और रुमाल फेंकने जा ही रहा था कि रुमाल पे उसे कुछ लिखा हुआ दिखता है वो पढ़ता है " जहाँ पे मैं खड़ी थी..मेरे बाजू में एक बूढ़े अंकल ने भी रुमाल गिराया था..पर तुम्हें मेरा ही रुमाल गिरते दिखा...भीड़भाड़ वाली जगहों पे बुजुर्गों की मदद किया करो..सबसे अच्छी भलाई यही होगी...और हाँ ये रुमाल वो नहीं है जो तुमने उठा के दिया था..रुमाल मैंने बदल दिया है...स्माइल यू आर ऑन कैमेरा"

आजकल के जमाने में रुमाल गिरने और उठाने से लव स्टोरी नहीं बल्कि बकरा या बकरी बनते हैं।

-तुषारापात®

Friday, 28 April 2017

अक्षय तृतीया

"क्या पूरा पैसा?..रखवाया हुआ सारा रुपया ले जा रही हो..मालती.. क्या हुआ कुछ अनहोनी हो गई क्या?" भिखारन मालती ने जब अपने रखवाए हुए साढ़े आठ सौ रुपये मुन्ना बाबू से माँगें तो उसने आश्चर्य से यह पूछा

"सब ठीक है मुन्ना भाई...आज आखा तीज है न..बस इसीलिए रुपया चाहिए" मालती ने रुपये गिनते हुए जवाब दिया

मुन्ना हँसा और बोला "तो तुम क्या इन साढ़े आठ सौ से सोना खरीदने जा रही हो"

"नहीं...सोना दान देने" उसकी हँसी की परवाह न करते हुए उसने दृढ़ता से कहा और सामने वाले पंसारी की दुकान की ओर चल पड़ी, वहाँ उसने सारे पैसों में काफी सारा चावल और उसी अनुपात में दाल खरीदी

रात के दस बजे हैं महानगर के गोल चौराहे के पास की सड़क के दोनों ओर गाड़ियों का जमघट लगा है,दस बजने के बावजूद,अभी भी लोग आज अक्षय तृतीया होने के कारण लाला बद्री सर्राफ के यहाँ से सोना या उससे बने आभूषण खरीद रहे हैं,वहीं उसी सड़क से एक ओर जाती पतली सड़क के किनारे मालती अपने हाथों से पकाया दाल चावल अपने जैसे भिखारियों के बच्चों को परोस परोस के खिला रही है और कह रही है "आधे पेट नींद अच्छी नहीं आती न..तो लल्ला लोग आज खूब पेट भर भर के खाओ..और खूब अच्छी तरह से सोना."

चाँदी का चम्मच मुँह में लिए पैदा होने वाले 'सोना' खरीद रहे थे और ऐलुमिनियम के कटोरे वाली 'सोना' दान दे रही थी।

-तुषारापात®

Tuesday, 25 April 2017

कार और बैसाखी

"सिगरेट महंगी हो जावे...सिगरेट महंगी हो जावे.."मंदिर के बाहर बैठा एक विकलांग बूढ़ा ये बड़बड़ाए जा रहा था

अनुराग अपनी कार से उतरा और मंदिर के गेट पे बैठे उसी बूढ़े को 28 रुपए देकर वापस आया और अपनी कार स्टार्ट कर रहा था कि उसके साथ आया उसके ऑफिस का दोस्त राजीव बोला "यार अनुराग कई दिनों से पूछना चाहता था..ये तू...रोज आफिस से लौटते वक्त इस बूढ़े को 28 रुपए क्यों देता है..ये चक्कर क्या है यार..?"

हँसते हुए उसने जवाब दिया "वो क्या है कि पहले मुझे सिगरेट पीने की बहुत बुरी लत थी...फिर एक दिन किसी ने बताया कि एक सिगरेट आपकी जिंदगी के 10 मिनट कम कर देती है..सोचा अगर मुझे कुछ हो गया तो मेरे परिवार का क्या होगा..तो मैने पीनी छोड़ दी...काफी मुश्किल हुई..मगर किसी तरह छोड़ ही दी मैंने..रोज चार सिगरेट पीता था..तो अब उन्हीं चार सिगरेट का पैसा इस बेचारे बूढ़े को दे देता हूँ..शायद इन पैसों से उसकी जिंदगी में चालीस मिनट खुशी के आ जाते होंगे..और मेरी जिंदगी के चालीस मिनट तो बच ही जाते हैं "

"ओह्ह..समझा..मगर मुझे याद है..अभी कुछ दिन पहले तक तो तू इसे 20 रुपए ही दिया करता था फिर अब 28..." राजीव ने बूढ़े को देखते हुए कहा

अनुराग ने पहला गेयर डालते हुए कहा "अरे इस बजट में सिगरेट महंगी जो हो गई है" और हँसते हुए कार बढ़ा देता है उधर वो बूढ़ा जिसे रुपए मिले थे कार जाते देख उठता है और किसी तरह बैसाखी के सहारे घिसटते हुए पान की दुकान पे पहुँच के बीड़ी का बंडल माँगता है पान वाला उससे कहता है "बाबा बहुत बीड़ी पीते हो तुम..रोज चार पांच बंडल यूँ ही पीते रहे तो जल्दी ही मर जाओगे.."

बूढ़ा हँसता है और उससे पूछता है "ये चार बंडल से मौत चालीस मिन्ट और नजदीक आ जाती है...ई बात तो पक्की है न?"

अजीब नजारा था कार से चलने वाला जिंदगी का सफर धीरे धीरे काटना चाहता था और बैसाखी पे चलने वाला बहुत जल्दी में था।

#तुषारापात®

Wednesday, 22 February 2017

एकतरफा इश्क है एकतरफा सफर

एकतरफा इश्क है एकतरफा सफर
तेरा दिल मंजिल मेरा दिल मुसाफिर

लटों के छल्ले हैं ये फौलाद से
लगी है फाँसी इन जल्लाद से
खुली जुल्फ तेरी बाँध लेती नजर
एकतरफा इश्क है एकतरफा सफर

तेरा ख्याल है छोटा क्या बड़ा
साज हूँ सजावट का मैं तेरे बिना
तेरी साँसों पे बिछी है मेरी बहर
एकतरफा इश्क है एकतरफा सफर

बिना मांगे हाथ माँग भरूँ कैसे
सजा जाऊँगा एक दिन अपने लहू से
तेरी जुल्फों के बीच की ये डगर
एकतरफा इश्क है एकतरफा सफर

#तुषारापात®™

Friday, 10 February 2017

काम आरोपित हो रहा है रति पर

काम आरोपित हो रहा है रति पर
चाँद आमंत्रित है पूर्वा फाल्गुनी पर

नृत्य कर रहीं हैं यों तुम्हारी नाभि पर
उंगलियाँ सुर ढूँढ रहीं हों मानो बाँसुरी पर
काम का संदेश अधरों के भीतर फूँक मैं
स्पन्दित हो रहा हूँ तुम्हारी प्रतिध्वनि पर

केश-मेघ आच्छादित हैं गर्वीले नगों पर
एक पथ के दो पथिक हैं लचीले पगों पर
सहस्त्रों कल्पनाओं से दिग्भ्रमित पुरुषार्थी मैं
अच्युत हो रहा हूँ नारीत्व की तुम्हारी पगडंडी पर

तुम तुम्बधारिणी यों मानो कोई वीणा मादक
संग-गीत को आतुर आलिंगनबद्ध मैं वीणा वादक
तान का आरोह-अवरोह कर सुरों की छेड़छाड़ मैं
लयबद्ध हो रहा हूँ स्वांसों की तुम्हारी रागिनी पर

वाष्प मोती बढ़ रहे ऊपर भीतर दोनों के उष्ण रण
मद की ऊष्मा में ढूँढ रहे शीतलता का दुर्गम क्षण
प्रेम की घटी शीघ्र न घटित हो कहीं सोचता यह मैं
समय सा विस्तारित हो रहा हूँ तुम्हारी सारिणी पर

पुष्प बाण से भंग की थी इसने तपस्या त्रिनेत्री की
शिव पार्वती के विवाह में भूमिका थी रति पति की
अपनी समस्त वासनाओं की होलिका जलाकर मैं
घृत अर्पित कर रहा हूँ यज्ञ की तुम्हारी अग्नि पर

#तुषारापात®™

Friday, 20 January 2017

वो रात कुछ अजीब थी

वो रात कुछ अजीब थी ये रात भी अजीब है
वो कल भी पास पास था वो आज भी करीब है

मेरा नाम बुलाए वो या मैं उसे पुकार लूँ
नजर में उठा लूँ या नजर मैं उतार दूँ
मैं सोचती थी मुझसे निगाह चुरा रहा है वो
न जाने क्यों लगा मुझे दिल बहला रहा है वो

वो रात कुछ अजीब थी.......................

कई जवाब हैं मेरे न उसका इक सवाल था
मेरी आँखों में था पर बाँहों को मलाल था
मैं जानती हूँ अपनी निगाह जमा रहा है वो
धीरे धीरे खामोशी से दिल मिला रहा है वो

वो रात कुछ अजीब थी.......................

धधकती आग है कहीं मिली हुई सी साँस से
गीली भाप भी है मुंदी मुंदी सी आँख में
मैं मानती हूँ कि सुहागा सुलगा रहा है वो
यही ख्याल है मुझे कि माँग सजा रहा है वो

वो रात कुछ अजीब थी ये रात भी अजीब है
वो कल भी पास पास था वो आज भी करीब है.......

#वो_शाम_कुछ _अजीब_थी(फीमेल वर्जन)
#तुषारापात®™

Sunday, 15 January 2017

चुनाव: धर्म और जाति मतदान का आधार

एक बार फिर से देश पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव देखने जा रहा है इसमें राष्ट्र के सबसे महत्वपूर्ण राज्यों में से एक उत्तर प्रदेश भी है जिसमें स्पष्ट बहुमत वाली सरकार अपने कार्यकाल को पूर्ण कर रही है।

जब भी चुनाव होता है तो इन दो बातों पर बहुत प्रमुखता से विचार किया जाने लगता है कि क्या चुनाव में जाति और धर्म मतदान का आधार हैं क्या समाज की अन्य समस्याएं नहीं हैं जो मतदान का आधार हों या क्या जाति और धर्म से अधिक महत्वपूर्ण मुद्दे जैसे कि विकास,गरीबी बेरोजगारी इत्यादि देश अथवा राज्यों में हैं ही नहीं।

बुद्धिजीवियों के बीच बड़ी बड़ी और बहुत लंबी चलने वाली परिचर्चाएं होती हैं जो कि प्रायः इस आधार की आलोचना करती हैं और सुधार के कई रास्ते भी सुझातीं हैं पर ये सुधार के मार्ग बहुत ही आदर्शवादी होते हैं व्यवहार से प्रायः इनका उतना नाता नहीं होता, इन्हीं परिचर्चाओं के आधार पर साधारण व्यक्ति भी कभी सरकार को तो कभी नेताओं को थोड़ा थोड़ा कोस लेते हैं और लोकतंत्र में अपना अपना पात्र निभाने की औपचारिकता पूरी कर देते हैं।

धर्म और जाति को मतदान के आधार के रूप में समझने के लिए हमें बहुत पीछे जाने की आवश्यकता पड़ेगी जहाँ से हम जान सकेंगे कि राजनीति में इन दोनों तत्वों का समावेश आखिर इतना प्रबल क्यों है राजनीति का उदय कहाँ से हुआ इसी में इसका उत्तर छिपा है। प्राचीन काल में मानव खानाबदोश था वो एक स्थान पे बस्ती बना के नहीं रहता था उस अवस्था में भी मानव अपने जैसे कई साथियों के साथ इधर उधर भ्रमण करता रहता था जिन्हें खानाबदोश कबीलों के नाम से आज हम जानते हैं अब उस कबीले की मूलभूत आवश्यकताओं जैसे भोजन,जीवन रक्षा आदि के लिए एक नेता की आवश्यकता महसूस की गई जिसे कबीले का सरदार कहा जाने लगा वह अपने कबीले के लिए कई सारे नियमों को बनाने वाला और उनका पालन कराने वाला होने लगा और यहीं से मानवीय सभ्यता में राजनीति का उद्भव हुआ,प्रत्येक कबीले का अपना विशिष्ट पहचान चिन्ह अथवा ध्वज भी कुछ समय के उपरांत अस्तित्व में आया और इसी प्रकार अन्य क़बीलों के मध्य संसाधनों इत्यादि के अधिकार के लिए आपसी संघर्ष भी होना आम बात थी, कहने का मतलब ये है कि प्रत्येक कबीला अपनी मान्यताओं,अपनी आवश्यकताओं और अपने हितों की रक्षा करता था और उनका विस्तार चाहता था न कि समूल मानव जाति का।

धीरे धीरे समय के साथ नदियों के किनारे मानव बसता गया और तात्कालिक समाज पहले से कुछ जटिल आकार लेता गया कई कबीले प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता के कारण आपसी संघर्षों को छोड़कर एक साथ एक विशाल भूभाग पर निवास करने लगे वो ऊपर से कई मोटी बातों,मान्यताओं और आर्थिक राजनैतिक रूप में तो एक रहे पर छोटे बड़े प्रत्येक कबीले ने अपने रीति रिवाज और सामाजिक मान्यताओं को भी बनाये रखा यहीं से जाति और धर्म का जन्म हुआ जो कि आज भी भारतीय समाज में महत्वपूर्ण रूप से प्रभावी है। कहने का तात्पर्य ये है कि जाति,धर्म आदि समाज के वर्गीकरण के तत्व थे न कि विभाजन के उस समय आज के जैसे निम्न,मध्यम,उच्च वर्गीय या ग्रामीण शहरी आदि आदि वर्गीकरण उतने स्पष्ट रूप में नहीं थे। आज सामाजिक सरंचना बहुत अधिक जटिल है विशाल जनसँख्या है और संसाधन सीमित हैं।

अब अगर आज कोई दल किसी धर्म विशेष या जाति विशेष पर चुनाव लड़ता है या इन दोनों सामाजिक प्रवृत्तियों को धयान में रखकर अपनी नीतियाँ बनाता है तो इसमें गलत क्या है आखिर ये आदि काल से समाज में व्याप्त प्रवृत्ति ही है जो उसे ऐसा करने का आग्रह करती है यदि आज भी समाज में धर्म और जाति प्रभावी कारक है तो इसका प्रभाव राजनीति में भी दिखेगा ही,जाति या धर्म की राजनीति के पीछे मुख्य उद्देश्य क्या है ये बात सबसे महत्वपूर्ण है यदि कोई दल किसी धर्म विशेष या समाज के ख़ास वर्ग के लिए संघर्ष कर रहा है तो इसे बुरी नजर से कैसे देखा जा सकता है प्रत्येक मानव खुद को फिर अपने लोगों को सत्ता के शिखर पर देखना चाहता है ये उसका मूल स्वभाव है और इसी प्रवृत्ति से समाज भी संचालित होता है। अब अगर आप इसे पश्चिमी देशों से तुलना करके देखेंगे तो ये सही नहीं होगा वहाँ का सामाजिक ढाँचा यहाँ से बहुत भिन्न है और वहाँ विकास कार्य आरम्भ हुए कई शताब्दियाँ बीत चुकी हैं जबकि भारतीय लोकतंत्र अभी 70 बरस का भी नहीं हुआ है अभी भारतीय समाज और भारतीय राजनीति संक्रमण के दौर में है धीरे धीरे ये अपने आदर्श स्वरुप को प्राप्त कर सकेगी अगर ये योजनाबद्ध तरीके से हुआ तो।

आप समाज को किसी न किसी रूप में वर्गीकृत तो करेंगे ही चलिए जाति हटा दीजिये धर्म हटा दीजिये इसके अलावा जितने वर्गीकरण आजके समय में संभव हैं उन्हें लागू कीजिये उसके बाद क्या आप कह सकते हैं कि चुनाव बाद बनने वाली सरकारें अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेंगी। सभासद अपने वार्ड तक,विधायक अपने विधानसभा क्षेत्र तक सांसद अपने लोकसभा क्षेत्र तक सीमित है क्या एक विधायक दुसरे विधानसभा के विकास कार्यों के लिए संघर्ष करता दिखता है ठीक इसी तरह ये जाति की राजनीति है वो भी इसी तरह एक सीमित दायरे में है यदि एक जाति विशेष या धर्म विशेष के लोगों का कुछ आर्थिक और सामाजिक विकास हो जाता है तो उनकी कट्टरता का लोप होने लगता है और तब ही ये प्रवृत्ति धुंधली होगी अब कई लोग कहेंगे कि इससे तो एक ही वर्ग विशेष का उद्धार होगा तो मेरा कहना है ऐसा नहीं होता समाज एक चक्रीय व्यवस्था है एक का भला अंततः दूसरे का भी भला करता ही है। और आजके चुनाव में 50 प्रतिशत के आसपास लोग मताधिकार का प्रयोग करते हैं और उसमें भी 10 या 11 प्रतिशत मत प्राप्त करने वाला चुनाव जीतता है तो ये भी कहा जा सकता है कि जीता हुआ व्यक्ति उस क्षेत्र की 90 फ़ीसदी जनता की पसंद ही नहीं होता पर फिर भी वो पूरी जनता के प्रति उत्तरदायी तो होता ही है।

उत्तर प्रदेश में पिछले पाँच सालों से ऐसी पार्टी की सरकार रही जिसे एक धर्म विशेष और जाति विशेष के लोगों की हितों वाली पार्टी के तौर पे देखा जाता है पर क्या उसने सिर्फ सम्बंधित धर्म और जाति के लोगों के लिए ही काम किया और कोई विकास कार्य की ओर देखा ही नहीं तो ऐसा नहीं है प्रत्येक सरकार चाहे वो जिस भी दल की भी हो उसे हर हाल में विकास की ओर आना ही पड़ता है क्योंकि उसके बिना न समाज का भला होगा और न ही समाज के किसी वर्ग विशेष का,हाँ यहाँ उनकी नीयत क्या है इसका उल्लेख आगे किया गया है।

इस तरह की राजनीति में भी मुद्दे मुख्यतः वही रहते हैं जैसे गरीबी, बेरोजगारी,अशिक्षा और संसाधनों का अभाव इत्यादि इत्यादि बस इनका दायरा बहुत व्यापक न होकर सीमित हो जाता है और सम्पूर्ण जनता के लिए तो सरकार के पास न तो मानवीय संसाधन हैं और न ही आर्थिक संसाधन हैं,तो आवश्यकता यही है कि नियोजित विकास किया जाए उसके लिए अगर जाति या धर्म को आधार बनाया जाए तो भी इसमें कोई बुराई नहीं है और जिस देश में आरक्षण जैसी व्यवस्था चुनाव सहित अन्य क्षेत्रों में पहले से ही लागू हो वहाँ इन मुद्दों पे क्रंदन करना उचित नहीं लगता।

मुद्दे चाहे जाति आधारित हों या धर्म आधारित हों या चाहे विकास से जुड़े हों अगर नीयत नहीं होगी तो कोई भी लक्ष्य नहीं प्राप्त किया जा सकेगा बेईमानी भ्रष्टाचार के रहते प्रत्येक मुद्दा मात्र भावनात्मक शब्दों और लफ़्ज़ों का एक जाल होता है जिसमे आम आदमी फँसता है और छला जाता है सत्तारूढ़ दल के सत्ता बचाने के मुद्दे होते हैं और विपक्षी दलों के सत्ता पाने के मुद्दे होते हैं और सामाजिक आर्थिक विकास तो एक सतत प्रक्रिया के तौर पे चलते रहते हैं बस पार्टी विशेष की विचारधारा के अनुसार विकास की गति और दिशा बदलती रहती है।

तो श्मशान में उत्पन्न हुए क्षणिक वैराग्य की तरह के इस आदर्श कि धर्म या जाति आधारित मतदान गलत है,को छोड़कर हमें बस इतना विचार करना चाहिए कि प्रत्येक दल ने जो वादे किए थे उन्हें निभाया या नहीं या कितने प्रतिशत तक उन्हें निभाया यही एक सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है जिन वादों और बातों पे चुनाव लड़ा गया अगर सत्ता में आने के बाद उन वादों और कार्यों को पूर्ण किया गया तो विकास अवश्य ही होगा चाहे चुनाव में मुद्दे जाति आधारित रहें हो या धर्म आधारित हों या इनके आधार पर ही भले मतदान क्यों न हुआ हो तब भी इससे कोई विशेष अंतर नहीं पड़ेगा।

-तुषारापात®™

Wednesday, 11 January 2017

विवेकानन्द

"क्या आपने ईश्वर को देखा है?"....पंचवटी में भीड़ से घिरे परमहंस को इस प्रश्न ने चौंका दिया, उस वाणी में कठोरता तो नहीं परन्तु दृढ़ता बहुत थी और जिसे परमहंस के आसपास बैठे लोगों ने उस नवयुवक की धृष्टता मान उनके बोलने से पहले ही उस नवयुवक से प्रश्न कर दिया "न कोई अभिवादन न नमस्कार..प्रथम प्रश्न वो भी इतना तीक्ष्ण...सीधे ठाकुर से दुस्साहस करने वाला तू है कौन?"

"प्रश्न कल्पित होता है..इसलिए प्रायः उसे दुस्साहस की संज्ञा दी जाती है...प्रश्न के उत्तर में प्रश्न ये बताता है कि उत्तर देने का साहस किसी में नहीं है" नरेंद्र ने सीधे परमहंस की आँखों में देखते हुए कहा।

उसके उत्तर से परमहंस का हृदय अपार आनन्द से भर उठा वो मीठे स्वर में बोले "हाँ मैं ईश्वर से ऐसे ही बात करता हूँ...जैसे कि तुमसे कर रहा हूँ...परन्तु काष्ठ को चुम्बकत्व का अनुभव नहीं होता... उसके लिए या तो भक्त को लौह होना पड़ेगा...या चुंबक..."

इस बार नरेंद्र ने पहले उन्हें प्रणाम किया और फिर बोला "परन्तु अब तक जितने भी गुरु मिले सब कहते हैं वो पारस हैं और मुझ भंगुर लौह को स्वर्ण बनाना चाहते हैं....स्वर्ण सबसे मूल्यवान धातु है और देवताओं को अति प्रिय है.."

"स्वर्ण की सुरक्षा लौह के विशाल संदूकों और तालों से ही की जाती है..देवताओं के स्वर्ण मुकुटों की रक्षा लौह के तीर करते हैं... गुरु में पारस तत्व नहीं चुम्बक्तव होना चाहिए...परन्तु ऐसा कि वो समीप में आए लौह को चुम्बक बना दे और अपने समान ध्रुव से उसके ध्रुव को छिटक दे..उसे शिष्य को खुद से चिपकाए नहीं रखना चाहिए" परमहंस उस विपरीत ध्रुवी नरेंद्र की ओर आकर्षित हो रहे थे।

नरेंद्र संतुष्ट हो चुका था उसने सादर निवेदन किया "क्या इस लौह को कुछ चुम्बकीय ऊर्जा प्राप्त हो सकेगी?"

"तू पहले से ही चुम्बक है नरेंद्र...बस तेरा ध्रुव मुझे अपने समान करना है...फिर तू मेरी पूरी विकर्षित ऊर्जा से गति पायेगा और इस संसार को उसका 'स्वामी' मिल जाएगा...जो अपने से विपरीत ध्रुव वाले चुंबकों को जोड़ जोड़ कर एक महा चुम्बक बनायेगा... इस पूर्व देश और इसकी मान्यताओं के ठीक विपरीत मान्यताओं वाले पश्चिमी देश तेरे आगे नतमस्तक होंगे" इतना कहकर परमहंस माँ काली के मंदिर की ओर देखकर मंद मंद मुस्कुराने लगे,माँ ने ठाकुर से कहा "गदाधर! तुझे अपना पुत्र दे रही हूँ..तू इसके विवेक जागृत कर और इस संसार को तर्क का आनन्द दे"

माँ के इस वाक्य को रामकृष्ण के अतिरिक्त कोई न सुन सका परन्तु उनके चरणों को पकड़े बैठे नरेंद्र को कुछ फुसफुसाहट सी अवश्य सुनाई दे गई।

#तुषारापात®™(स्वामी के चरणों में लिपटी धूल के रूप में)

Monday, 9 January 2017

संडीला के लड्डू

"बालामऊ...हदोई...हदोई...बालामऊ" संडीला चौराहे पे बस जलपान इत्यादि के लिए रुकी थी और ड्राइवर का सहायक चिल्ला चिल्ला कर यात्रियों को बुला रहा था,हाथों में छोटी छोटी मटकियाँ पकड़े कई लड़के हर रुकी और रेंगती हुई बस के आगे पीछे लड्डू लड्डू की आवाजें लगा लगा के घूम रहे थे।

कुछ यात्री पंडित जी के ढाबे पे चाय समोसे में व्यस्त थे और ज्यादातर यात्री बस अड्डे पे बनी तमाम दुकानों में से संडीला के प्रसिद्ध लड्डुओं को पैक कराने की जल्दी में थे लेकिन विशाल, प्राइवेट बस के इन चालकों और कंडक्टरों को बहुत अच्छे से जानता था,जब तक ये ड्राइवर की गर्दन तक सवारियाँ नहीं ठूँस लेंगे तब तक बस हिलेगी भी नहीं,उसकी नई नवेली पत्नी ने उसकी जगह रोक रखी थी इसलिए वो निश्चिन्त था लेकिन लड्डू किस दुकान से पैक कराए इस उधेड़बुन में था।

"असली प्रसिद्ध ननकहु वर्मा के पौत्र की दुकान...प्राचीन व एक मात्र विश्वसनीय ननकहु वर्मा के पौत्र के लड्डू......सबसे पहले वाले ननकहु दद्दू....और यहाँ हैं उनके स्वादिष्ट लड्डू..." वो एक एक दुकान के बोर्ड को पढ़ पढ़ के बुदबुदाए जा रहा था और आगे बढ़ता जा रहा था,चौथी या शायद पाँचवी दुकान पे पहुँच के वो रुक गया देखा वहाँ भीड़ उतनी नहीं थी और बोर्ड पे नाम के नाम पे बस इतना लिखा था 'लड्डू संडीला वाले" वो दुकान पे गया और वहाँ बैठे एक लगभग साठ साल के आदमी से एक लड्डू खरीद के चखा लड्डू अपनी प्रसिद्धि के अनुसार ही स्वादिष्ट था उसने रेट पूछ कर एक किलो लड्डू पैक करने को कहा और उससे पूछा "तुम्हारी दुकान का लड्डू तो बहुत ही स्वादिष्ट है...एक दो बार पहले ये ननकहु वर्मा वाली दुकानों का भी चखा है पर ऐसा स्वाद कहीं नहीं है... इनमें से असली ननकहु प्रसाद की दुकान कौन सी है?"

"ननकहु प्रसाद नहीं...ननकहु वर्मा...और जहाँ स्वाद मिला तुम्हें..शायद वही असली दुकान हो.." दुकानदार ने मुस्कुराते हुए कहा

"मतलब...असली ननकहु वर्मा के पौत्र आप..लेकिन..मगर... सबने अपनी दुकान पे..असली...पुराना...सबसे पुराना...लिखवा रखा है...फिर आपने क्यों नहीं?" विशाल ने आश्चर्य से पूछा

दुकानदार मटकी पर सुतली बाँधते हुए बोला "जो सबसे पहले दुकान खोलता है वो असली..पुरानी..प्रसिद्ध दुकान कैसे लिखा सकता है...क्योंकि उस समय तो वो अकेला होता है न..वो किसे साबित करेगा और क्यों...."

"मगर बाद में जब और दुकाने हो जाएं तब बोर्ड तो नया लिखवाया जा सकता है न.." विशाल उसके उत्तर से लाजवाब हो चुका था पर फिर भी बोला

"दादा जी अपना नहीं अपनी भूमि का नाम चाहते थे...इसलिए बस लड्डू संडीला वाले लिखाया गया...ये सब मेरे ही भाई बंधू हैं..इन्होंने उनका नाम लिया मगर हुनर नहीं..मिलावटी सामान बनाते हैं..ये उनकी इच्छा के विरुद्ध काम कर रहे हैं ये भी मिटेंगे...और मैं भी मिटूंगा...दस के मुकाबले एक आखिर कब तक टिकेगा" कहकर उसने रुपैये काटकर बचे हुए पैसे उसे वापस किये।

उस घटना के बाद विशाल आज अपने सत्रह वर्षीय पुत्र के साथ एक बार फिर लखनऊ से हरदोई जा रहा है संडीला चौराहे से गुजरती उसकी कार की खिड़कियों से लड्डू की एक भी दुकान उसे नहीं दिखाई दी,मटकियों मटकियों बिकने वाले लड्डूओं का घड़ा भर चुका था।

-तुषारापात®™