Monday, 9 January 2017

संडीला के लड्डू

"बालामऊ...हदोई...हदोई...बालामऊ" संडीला चौराहे पे बस जलपान इत्यादि के लिए रुकी थी और ड्राइवर का सहायक चिल्ला चिल्ला कर यात्रियों को बुला रहा था,हाथों में छोटी छोटी मटकियाँ पकड़े कई लड़के हर रुकी और रेंगती हुई बस के आगे पीछे लड्डू लड्डू की आवाजें लगा लगा के घूम रहे थे।

कुछ यात्री पंडित जी के ढाबे पे चाय समोसे में व्यस्त थे और ज्यादातर यात्री बस अड्डे पे बनी तमाम दुकानों में से संडीला के प्रसिद्ध लड्डुओं को पैक कराने की जल्दी में थे लेकिन विशाल, प्राइवेट बस के इन चालकों और कंडक्टरों को बहुत अच्छे से जानता था,जब तक ये ड्राइवर की गर्दन तक सवारियाँ नहीं ठूँस लेंगे तब तक बस हिलेगी भी नहीं,उसकी नई नवेली पत्नी ने उसकी जगह रोक रखी थी इसलिए वो निश्चिन्त था लेकिन लड्डू किस दुकान से पैक कराए इस उधेड़बुन में था।

"असली प्रसिद्ध ननकहु वर्मा के पौत्र की दुकान...प्राचीन व एक मात्र विश्वसनीय ननकहु वर्मा के पौत्र के लड्डू......सबसे पहले वाले ननकहु दद्दू....और यहाँ हैं उनके स्वादिष्ट लड्डू..." वो एक एक दुकान के बोर्ड को पढ़ पढ़ के बुदबुदाए जा रहा था और आगे बढ़ता जा रहा था,चौथी या शायद पाँचवी दुकान पे पहुँच के वो रुक गया देखा वहाँ भीड़ उतनी नहीं थी और बोर्ड पे नाम के नाम पे बस इतना लिखा था 'लड्डू संडीला वाले" वो दुकान पे गया और वहाँ बैठे एक लगभग साठ साल के आदमी से एक लड्डू खरीद के चखा लड्डू अपनी प्रसिद्धि के अनुसार ही स्वादिष्ट था उसने रेट पूछ कर एक किलो लड्डू पैक करने को कहा और उससे पूछा "तुम्हारी दुकान का लड्डू तो बहुत ही स्वादिष्ट है...एक दो बार पहले ये ननकहु वर्मा वाली दुकानों का भी चखा है पर ऐसा स्वाद कहीं नहीं है... इनमें से असली ननकहु प्रसाद की दुकान कौन सी है?"

"ननकहु प्रसाद नहीं...ननकहु वर्मा...और जहाँ स्वाद मिला तुम्हें..शायद वही असली दुकान हो.." दुकानदार ने मुस्कुराते हुए कहा

"मतलब...असली ननकहु वर्मा के पौत्र आप..लेकिन..मगर... सबने अपनी दुकान पे..असली...पुराना...सबसे पुराना...लिखवा रखा है...फिर आपने क्यों नहीं?" विशाल ने आश्चर्य से पूछा

दुकानदार मटकी पर सुतली बाँधते हुए बोला "जो सबसे पहले दुकान खोलता है वो असली..पुरानी..प्रसिद्ध दुकान कैसे लिखा सकता है...क्योंकि उस समय तो वो अकेला होता है न..वो किसे साबित करेगा और क्यों...."

"मगर बाद में जब और दुकाने हो जाएं तब बोर्ड तो नया लिखवाया जा सकता है न.." विशाल उसके उत्तर से लाजवाब हो चुका था पर फिर भी बोला

"दादा जी अपना नहीं अपनी भूमि का नाम चाहते थे...इसलिए बस लड्डू संडीला वाले लिखाया गया...ये सब मेरे ही भाई बंधू हैं..इन्होंने उनका नाम लिया मगर हुनर नहीं..मिलावटी सामान बनाते हैं..ये उनकी इच्छा के विरुद्ध काम कर रहे हैं ये भी मिटेंगे...और मैं भी मिटूंगा...दस के मुकाबले एक आखिर कब तक टिकेगा" कहकर उसने रुपैये काटकर बचे हुए पैसे उसे वापस किये।

उस घटना के बाद विशाल आज अपने सत्रह वर्षीय पुत्र के साथ एक बार फिर लखनऊ से हरदोई जा रहा है संडीला चौराहे से गुजरती उसकी कार की खिड़कियों से लड्डू की एक भी दुकान उसे नहीं दिखाई दी,मटकियों मटकियों बिकने वाले लड्डूओं का घड़ा भर चुका था।

-तुषारापात®™