Friday, 28 April 2017

अक्षय तृतीया

"क्या पूरा पैसा?..रखवाया हुआ सारा रुपया ले जा रही हो..मालती.. क्या हुआ कुछ अनहोनी हो गई क्या?" भिखारन मालती ने जब अपने रखवाए हुए साढ़े आठ सौ रुपये मुन्ना बाबू से माँगें तो उसने आश्चर्य से यह पूछा

"सब ठीक है मुन्ना भाई...आज आखा तीज है न..बस इसीलिए रुपया चाहिए" मालती ने रुपये गिनते हुए जवाब दिया

मुन्ना हँसा और बोला "तो तुम क्या इन साढ़े आठ सौ से सोना खरीदने जा रही हो"

"नहीं...सोना दान देने" उसकी हँसी की परवाह न करते हुए उसने दृढ़ता से कहा और सामने वाले पंसारी की दुकान की ओर चल पड़ी, वहाँ उसने सारे पैसों में काफी सारा चावल और उसी अनुपात में दाल खरीदी

रात के दस बजे हैं महानगर के गोल चौराहे के पास की सड़क के दोनों ओर गाड़ियों का जमघट लगा है,दस बजने के बावजूद,अभी भी लोग आज अक्षय तृतीया होने के कारण लाला बद्री सर्राफ के यहाँ से सोना या उससे बने आभूषण खरीद रहे हैं,वहीं उसी सड़क से एक ओर जाती पतली सड़क के किनारे मालती अपने हाथों से पकाया दाल चावल अपने जैसे भिखारियों के बच्चों को परोस परोस के खिला रही है और कह रही है "आधे पेट नींद अच्छी नहीं आती न..तो लल्ला लोग आज खूब पेट भर भर के खाओ..और खूब अच्छी तरह से सोना."

चाँदी का चम्मच मुँह में लिए पैदा होने वाले 'सोना' खरीद रहे थे और ऐलुमिनियम के कटोरे वाली 'सोना' दान दे रही थी।

-तुषारापात®