Wednesday, 18 November 2015

लाजवाब

उनके इस जवाब कि "लाजवाब हो तुम" का कोई जवाब नहीं
ख्वाब देखूँ जो कहीं उनका तो  सोंचू ये तो कोई ख्वाब नहीं

गिनने चलती हैं मेरी धड़कनें सीने पे रख के हाथ अपना
बढ़ जाएं जो धड़कनें तो कहती हैं इनका कोई हिसाब नहीं

लफ्ज़ लफ्ज़ पढता हूँ तो हर्फ़ हर्फ़ वो खुलती हैं
उसपे ये कहना के जल्दी में पढ़ी जाने वाली मैं किताब नहीं

सुलगती आँखों की छुअन से भाप उठती है शबनमी बदन से
गिरा के आँचल वो कहना उनका के एक तुम ही बेताब नहीं

लाल होंठों के लफ़्ज़ों पे है नुक्ते सा एक काला तिल
एक ग़ज़ल जैसा वो चेहरा जिसपे आज नकाब नहीं

कोरे कागज़ को आहिस्ता से रंगीन किया जाता है
बेसबर होके ग़ज़ल पढ़ना महफ़िल का आदाब नहीं

मीर ने भी कहा और खूब असद भी कह गए उर्दू फ़ारसी में
'तुषार' से कहना उनका मगर हिंदी में तुम्हारा कोई जवाब नहीं

उनके इस जवाब कि "लाजवाब हो तुम" का कोई जवाब नहीं.....
-तुषारापात®™
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