Monday, 16 November 2015

चोर

दिन के वक्त जब तुम मिली थीं
तो थोड़ा सा तुमको चुरा लाया था
तुम्हारी खुश्बू तुम्हारा अक्स
चाय की प्याली से टकराती तुम्हारी अँगूठी की खनक
सुरमई आँखों में तुम्हारी डूबते दो सूरजों की चमक
घर आकर चोरी का ये सारा सामान
बंद आँखों से देख रहा था कि
पलकों के पल्लों पे कोई दस्तक देता है
खोलकर देखता हूँ तो
अपनी वर्दी में कई सितारे टाँकें
रात एक इन्स्पेक्टर की तरह
तुम्हारे ख्वाबों की हथकड़ी लिए खड़ी है
चाँद के पुलिस स्टेशन में
चोरी की रपट तुमने तो नहीं लिखवाई ?

-तुषारापात®™