Sunday, 15 November 2015

बुद्ध

कई किस्से सुनाता रहा
वो बूढ़ा मुझे
शायद कई दिनों से तरस रहा था
किसी से दो शब्द बतियाने को/
दवा की दो पुड़ियों से
बीमार का तीमारदार बन गया मैं
शर्मा रहा था भूख और मर्ज में से
किसी एक को पहले बताने को/
और लावारिस मुर्दे को फूँक आया मैं
शायद हिन्दू ही था वो
अब समझा क्यों कहा जाता था
कलाई पे नाम अपना गुदवाने को/
एक बूढ़े
एक बीमार और
एक मुर्दे के साथ
गुरु ने कहा था मुझे एक दिन बिताने को/
लेकिन मैं 'बुद्ध' नहीं बन पाया
चलो अच्छा ही हुआ
बेवजह क्यूँ जाता मैं
एक नया मजहब बनाने को/

-तुषारापात®™