Sunday, 16 August 2015

हिन्दी की सहायिकाएं

"सिक्योरिटी.... सिक्योरिटी" प्रेक्षागृह के मुख्य द्वार पे एक अत्याधुनिक महिला अपने जाते यौवन को किसी तरह अपनी साड़ी से कसकर बाँधे हुए बड़े गुस्से से सिक्योरिटी गॉर्ड को आवाज लगा रहीं थीं, अंग्रेजसिंह दौड़ते हुए जल्दी से आया

"जी मैडम..यस मैडम जी" इससे ज्यादा अंग्रेजसिंह कुछ बोल नहीं पाया वो महिला उसपे दहाड़ना शुरू कर चुकी थीं

"तुम ये गेट छोड़ के कहाँ गायब हो..कैसे कैसे लोग अंदर घुसे जा रहे हैं... चलो इन्हें बाहर का रास्ता दिखाओ..बाकी तुम्हें तो मैं..बाद में बताती हूँ" महिला दाँत पीसती हुईं विदा हुई, अंग्रेज सिंह ग्रामीण परिवेश के एक दम्पति और उनके दो बच्चों को बाहर की तरफ हटाने लगा

"भइया अंग्रेज सिंह...ई मैडम कहियां तो समझाई समझाई केरे हार गेन....पर पता नाइ अंग्रेजी महियां का गिटर पिटर करत रही.. पर भइया तुम तो सुन लेव हमरी बात.. हम हैं दोहा और ई हैं हमरी पत्नी चौपाई"अपने साथ वाली महिला की तरफ इशारा करते हुए दोहा ने अंग्रेजसिंह से कहा और अपने दोनों बच्चों के सर पे हाथ रखते हुए आगे कहा

"अउर ई दुइनो हैं हमरे लरका..छन्द और सोरठा.." दोहा अभी ये कह ही पाया था की वहाँ से गुजरते कुछ एलीट क्लास के लोग उन्हें देखकर आपस में बात कर रहेे
"ओह गॉड..हू आर दे..लुक एट दीज जोकर्स..व्हाट ही इज वेअरिंग.. लुंगी ..लोल्ज..मस्ट बी बिहारी ऑर ब्लडी भोजपूरीज...दोहा की धोती को देखते और उसपे हँसते वो लोग प्रेक्षागृह के अंदर चले गए

दोहा अंग्रेजी नहीं समझता था पर अपमान की भाषा बहुत अच्छे से समझता था फिर भी शांत हो कर उसने अंग्रेजसिंह से कहा "भइया बस एक विनती राहय तुमसे कि......."

प्रेक्षागृह के ग्रीन रूम में बैठा सन्दर्भ आज बहुत खुश था पर साथ ही थोड़ा मायूस भी था आज पंद्रह अगस्त को उसे हिन्दी का 'ज्वलंत दीपक' पुरस्कार मिलने जा रहा था पर व्याख्या आज उसके साथ नहीं थी उसके कॉलेज में स्वतंत्रता दिवसोत्सव था,वो उससे बात करना चाह रहा था पर यहाँ प्रेक्षागृह में मोबाइल में नेटवर्क नहीं आता था और अपने ही सम्मान के कार्यक्रम से उठकर वो बाहर जा नहीं सकता था, तभी अंग्रेज सिंह ने उसके कान में आकर कुछ कहा सुनते ही वो बाहर की तरफ लगभग दौड़ते हुए मुख्य द्वार पे आया

"अरे चाचा जी...चाची जी प्रणाम" बड़ा बढ़िया नजारा था हिंदी का उभरता साहित्यकार दोहा और चौपाई के पैर छु रहा था "मुझे अंग्रेजसिंह ने सब बता दिया है...आप मेरे साथ अंदर चलिए ...अभी अभी मैंने अपने फ़ोन पे व्याख्या का मैसेज भी पढ़ लिया...उसने आप लोगों के आने के बारे में बताने को कई बार मेरा फ़ोन मिलाया..पर नेटवर्क....खैर वो सब छोड़िये आप सब अंदर चलिए"

"अच्छो हुवो संदू..जो तुम मिल गेव..नाइ इहाँ तो सब....लुल्ल बक्सियां हई" दोहा ने राहत की सांस ली, सन्दर्भ ने उन्हें सबसे आगे सोफे पे अपने पास बिठा लिया उसका मूड काफी खराब हो चूका था,उदघोषिका ने उसका नाम लेकर उसे सम्मान के लिए मंच पे आमंत्रित किया समारोह के रस्मो रिवाज के अनुसार सबका अभिवादन कर उसने कहना आरम्भ किया
"एक प्रश्न है मेरा आप सबसे...क्या आप अपनी मौसी का अपमान करके...अपनी माँ का सम्मान करते हैं ? हिन्दी हमारी मातृभाषा है पर क्या आंचलिक या...क्षेत्रीय भाषाओं के बिना इसका प्रसार संभव है?....यहाँ वातानुकूलित प्रेक्षागृहों में बैठकर..अंग्रेजी भाषा के गुलाम होकर और अपने ही देश के हमसे रहन सहन में भिन्न लोगों का अपमान कर ...और...कॉटन की कलफ़ लगी करारी साड़ी पहनकर....माथे पे अठन्नी से बड़ी बिंदी लगाकर..क्या.हिन्दी की रक्षा हो सकेगी..मुझे इसमें संदेह है..मैं पूरी विनम्रता के साथ...ये पुरस्कार...अस्वीकार करता हूँ" कहकर सन्दर्भ,दोहा चौपाई,छन्द और सोरठा को लेकर प्रेक्षागृह से बाहर निकल आया।

'अगर सहायक नदियाँ न हो तो जीवनदायनी गंगा भी एक छोटे से भूभाग तक ही सीमित रह जाती'

-तुषारापात®™