Friday, 9 September 2016

नाना जी

"नूतन दीदी..नानाजी की हालत बहुत नासाज है...आप तुरंत आ जाओ" सुबह सुबह मोबाइल पे शन्नो की रुआंसी आवाज सुनाई दी

नब्बे साल के वृद्ध की तबियत खराब होना कोई नयी बात नहीं होती पर शन्नो की आवाज की अजीब सी बेचैनी ने मेरे अंदर कुछ घबराहट सी भर दी मैंने उससे पूछा "क्..क्या हुआ...अभी परसों ही तो मेरी बात हुई थी उनसे..बिलकुल भले चंगे थे...अचानक तबियत बिगड़ी क्या"

"नहीं दीदी...तबियत नहीं...नानाजी पर हमला हुआ है...आप बस जल्दी से आ जाओ...शायद दोबारा न देख.." बात अधूरी छोड़ उसने रोते रोते फोन काट दिया मैं सोचती ही रह गई कि एक नब्बे साल के देवता तुल्य बूढ़े से किसी की क्या दुश्मनी हो सकती है

मैंने जल्दी से अपने पति राज को उठाया,उन्हें सारी बात बताई और अपने सात साल के बेटे राहुल का माथा चूम,उसे सोता छोड़ ड्राइवर के साथ कार लेकर निकल पड़ी मैं उड़कर उनके पास पहुँच जाना चाहती थी पर दिल्ली से हरदोई तक की दूरी कुछ कम नहीं थी, ड्राइवर कार चला रहा था और मैं पिछली सीट पे बैठी दिल्ली पीछे छूटते देख रही थी और साथ ही पिछली यादों में खोती जा रही थी

शादी के आठ साल के बाद भी मुझे बच्चे का सुख नहीं था एक दिन मेरी एक सहेली ने हरदोई के पास एक जगह बिलग्राम के एक बहुत पहुँचे हुए पीर नानाजी के बारे में मुझे बताया और एक हफ्ते के भीतर ही मेरे लाख मना करने पर भी मुझे अपने साथ उनके पास ले आई थी

बिलग्राम की उबड़ खाबड़ सड़कों से दोचार होते हुए दिल्ली से बिलकुल ही बदले परिवेश में बिलग्राम के भी और अंदर आकर हम नानाजी के सामने बैठे थे वहाँ भीड़ लगी थी मैंने देखा मटमैले सफेद कुर्ते और मुड़े तुड़े नीले तहमद में एक वृद्ध चारपाई पे बैठा कागज पे कुछ लिख रहा था उसका चेहरा झुर्रियों से भरा हुआ था सर पर काला सफेद चौखाने वाला मुसलमानी कपड़ा बाँधा हुआ था माथे पे पाँच लकीरें थीं जिन्हें देख कर मेरा ज्योतिषीय दिमाग उनके प्रति कुछ श्रद्धा से जरूर भर गया था पर पूरे माहौल में मुसलमानी महक से मुझे उबकाई सी भी आ रही थी

"तो क्या जाना क्या लिखा है हमारे भाग्य में" एकदम से वो मुझे देखते हुए मीठी सी आवाज में बोले उन्होंने मुझे अपने माथे की लकीरें पढ़ते देख लिया था शायद

"क्..कुछ नहीं...ये आप कागज पे क्या लिखते हैं..अरबी में लिखा है न..आयतें?" मैं हड़बड़ाहट में उनके प्रश्न का उत्तर न देकर उनसे ही प्रश्न कर बैठी उन्होंने सुना और हलके से मुस्कुराये इसी बीच मेरी सहेली प्रिया ने उन्हें मेरी समस्या बता दी उन्होंने एक धागा उठा के कुछ बुदबुदाया और मुझे उसी धागे से सर से पैर तक नापा और फिर अपनी चारपाई पे बैठ कागज पे लिखने लगे वो कलम भी अलग सा था सुनहरे रंग की स्याही थी जैसे फूलों के रस से बनी हो कागज की जरा सी पुर्ची पे बहुत घना और बारीक मगर बहुत ही सुंदर अक्षरों से उनका लिखा मानो लिखा न छपा हो

"आप इतना महीन लिख कैसे लेते हैं...इतनी उम्र होने पर भी चश्मा नहीं लगाते..."मैंने आश्चर्य से उनसे पूछा

"बिटिया..तिरासी साल की उम्र भी क्या कोई ऐनक लगाने की होती है ..नजर दुरुस्त रखने को सूरज को रोज सुबेरे पानी पिलाता हूँ...वो क्या कहते हैं तुम्हारे यहाँ सूर्य नमस्कार.."वो मुस्कुराते हुए बोले और अपने लिखे हुए कागज को एक गिलास जिसमें आधा पानी था उसमें घोलने लगे

मैं उनके मुँह से सूर्य नमस्कार का नाम सुनकर चौंक गई फिर खुद को लगा चश्मा ठीक करने में कुछ शर्म भी आई मुझे,मैंने उनसे एक सवाल और किया "आपको सब नानाजी क्यों कहते हैं"

"अब तुम्हारी जैसी तमाम बिटियों की सूनी कोख भर जाती है तो सबके लल्ला लल्ली के नाना हुए न हम..बाकी सबका नाना तो वो ऊपरवाला है सब उसी का करम है" कहकर उन्होंने गिलास का पानी मुझे पीने को दिया

थोड़ी हिचक के साथ मैं वो पानी पी गई और बोली "ऊपरवाले से आपका मतलब अल्लाह से है या भगवान से"

उनके होठों पे छाई मुस्कान गायब हुई और दुःख से भरी आवाज में बोले "हम अपने बाप को उनके नाम से बुलाते हैं क्या..इंसान बिलकुल पागल है बिटिया..उसकी बिसात है क्या ऊपरवाले का नाम रखने की..." कहकर उन्होंने एक ताबीज मुझे पहनने को दिया

मैंने वो ताबीज पहन लिया और बोली "आपने बताया नहीं आप अरबी में आयतें लिख रहे थे न कागज पे"

"सब कुछ आज ही जान लेगी..या जब लल्ला लेकर आएगी तबके लिए भी कुछ छोड़ेगी" उनके होठों पे मुस्कान फिर से आ चुकी थी
उन्होंने कुर्ते की जेब से माचिस निकाली हाथ में कुछ देर घुमाते रहे फिर कुछ सोच कर जेब में वापस रख दी और दूसरे कमरे में बैठी अपनी सबसे छोटी बेटी शन्नो को आवाज दी और हमें खाना खिलाने को कहा मैंने बहुत मना किया पर शन्नो के प्यार और प्रिया के हाँ कहने पर मैंने खाना खाया,खाना बहुत ही स्वादिष्ट था और शन्नो का व्यवहार इतना मीठा कि दिल हिन्दू मुस्लिम सब भूल गया
खाना खाकर जब हाथ धोने उठी तो देखा नानाजी एक बच्चे की तरह छुपकर बीड़ी पी रहे थे मेरे चेहरे पे मुस्कान फैल गई

ड्राइवर ने एक जगह चाय पानी के लिए कार रोकी तो मैं पुरानी यादों से वर्तमान में वही मुस्कराहट लिए आई,चाय फटाफट निपटा हम फिर से निकल पड़े शाहजहाँपुर क्रॉस हो रहा था

मैं नानाजी को याद कर बेचैन हो रही थी राहुल के होने के बाद से आजतक उनके यहाँ लगातार आना जाना बना रहा एक परिवार की तरह हो गए थे हम,अब तो मोबाइल पे भी तीसरे चौथे दिन नानाजी से बात करती रहती हूँ यही सब सोचते न जाने कब बिलग्राम पहुँच गई

उनके घर पहुँचते ही कार से उतरकर दौड़ते हुए नानाजी के कमरे में पहुँची घर के बाहर भीड़ जमा थी नानाजी अपनी चारपाई पे पट्टियों से बंधे पड़े थे मुझे देखकर शन्नो मेरे गले लग रोने लगी और कहने लगी "दीदी गाँव में जेहादियों का जोर है..इनसे कहते हैं कि सिर्फ बेऔलाद मुसलमानों के लिए उपाय करें..हिंदुओं के लिए किया तो जान से हाथ धोना होगा" मैं ये सुनकर सन्न रह गई बेऔलाद होने का दुःख भी क्या हिन्दू का अलग मुसलमान का अलग होता है

"अरे..तुझे भी बुला लिया इस निगोड़ी ने.." नानाजी मुझे देखते हुए बोले "सौ साल का होकर ही मरूँगा..इतनी जल्दी नहीं जाऊँगा इस घर से." मैं उनकी बात सुनकर उनके पैरों से लिपट गई मेरे आँसूओं से उनके पैर भीग गए

"दीदी..इनपे हमला उस जमील ने किया है अभी सत्रह बरस का ही होगा पर जेहादी हो गया है..जानती हो ब्याह के बारह बरस बाद भी उसकी अम्मी के कोई बच्चा न था..इन्हीं के बताये उपाय से ये जमील हुआ था..और आज वो ही इन्हें मारने आया था..जबकि ये उस समय जानते भी थे कि ऐसा ही होगा"

मैं ये जानकर हैरत से उनकी ओर देखने लगी और गुस्से में आ गई कि जब जानते थे उसका पैदा हुआ बच्चा उनकी जान लेगा तो उसे उपाय क्यों बताया

उन्होंने जैसे मेरा मन पढ़ लिया और बोले "आस में आई किसी बेऔलाद बिटिया को रोता छोड़ना इस्लाम नहीं सिखाता.. जब जमील हुआ था तब उस बिटिया को मिली खुशी इस बूढ़े की जिंदगी से ज्यादा कीमती थी"

-तुषारापात®™