Sunday, 6 September 2015

मन

कुछ बरस पहले मनगढ़ंत ये बात हुयी
बड़े जोर से मन की नाव डूब गयी
मन भर पानी आँखों से रिसता गया
एक तपता रेगिस्तान मन बनता गया
पागल मन मुसाफिर बन चलता रहा
पानी पानी पानी मन ही मन रटता रहा
चलते चलते मन को अपनी नदी मिली
अब तो मन की बरसों की प्यास बुझी
सचमुच की नदी से जब सबकुछ मन का मिलता था
बहलने को मन चाहता क्यूँ फिर एक जादूगरनी मरीचिका ?

-तुषारापात®™

मसले


नाजुक है जरा ध्यान से :-

"
यूँ बातों की एक फूँक में उड़ जाते थे
ठन्डे गरम,अपने सारे मसले
अब लफ़्ज़ों की हवा से ख़ामोशी की आग बढ़ जाती है "

-तुषारापात®™

बुरी नजर


लग गई मेरी मोहब्बत को नजर उस दिन 'ट्विंकल'
माथे पे मेरे तेरी आँख का सुरमा जब ज़माने ने देखा
-तुषारापात®™