Monday, 27 June 2016

Sin२θ + Cos२θ =1

"पति महोदय...ये तो मानते हो न...मुझसे बेहतर पत्नी तुम्हें किसी जनम में नहीं मिलेगी" Sin(साइन) पीछे से अपनी बाहों का 'चाप' उसके गले में डालके उससे सटते हुए बोली

कुर्सी पे बैठा वो डूबी आवाज में बोला "हाँ ये तो है...मैं तो ये भी मानता हूँ.. मुझसे बेहतर पति तो...तुमको हर जनम में मिल जाएगा"

"Cos (कॉज)...ये क्या...इतना डिप्रेसिव आन्सर...जब वाइफ मूड हल्का करने की बात यूँ गले लग के करे तो...हसबैंड को उसे...उसे चूमके अपनी सारी परेशानी दूर कर लेनी चाहिए" कहकर Sin ने Cos के माथे को चूम लिया,उसके माथे पे Sin के लिपस्टिक लगे होठों से एक लाल 'थीटा'(θ) सा निशान बन गया
Cos ने अपने माथे पे हाथ फेरा,हाथ में लग आई लिपस्टिक को उसकी साड़ी में पोछा और उसे कमर से थाम कर बोला "क्या करूँ...हर महीने कार और मकान की EMI निकालने के बाद कुछ हाथ में रह ही नहीं पाता... सारी सेलरी तो लगता है बस बैंक वालों के लिए ही कमाता हूँ...बार बार तुमसे पैसे लेना अच्छा नहीं लगता मुझको"
"तो क्या हो गया..ये गृहस्थी हम दोनों की है..इसे निभाने की जिम्मेदारी भी हम दोनों की है...किसी एक की तो नहीं..डिअर हब्बी ये मत भूलो.. Sin२θ + Cos२θ =1... यानी अपने अपने दायित्वों के वर्ग में हम दोनों साथ हैं तो 'एक' हैं...अब अगर कभी कभी कोई एक कुछ कम पड़ेगा.. तो..दूसरे को उतना बढ़ना ही पड़ेगा तभी तो गृहस्थी का 'एका' बना रहेगा..हम दो नहीं एक यूनिट हैं" Sin ने बातों बातों में जीवन का गूढ़ सत्य बता दिया

Cos का मन अभी भी अशांत था "पर मुझे लगता है पति होने के नाते.. सारे खर्चे मुझे ही उठाने चाहिए...तुम हमारी इस गृहस्थी के और भी तो कितने काम करती हो"

"अब अगर Cos ही सब कर देगा..तो फिर Sin का मान शून्य नहीं हो जायेगा..वो पुराना जमाना अब नहीं रहा...अब पति पत्नी दोनों को घर और बाहर दोनों तरह के काम करने होते हैं और खर्चे भी साथ उठाने होते हैं... और मेरे पति परमेश्वर....गणित में Sin45° और Cos45° का मान बराबर(1/√2) यूँ ही नहीं दिया गया...दोनों के 1/√2 के होल स्कवायर करने से 1/2..1/2 मिलता है....ये आधा मेरा और आधा तुम्हारा जोड़ के  बनी 'एक' गृहस्थी ही राईट एंगल(90°) वाली गृहस्थी कहलाती है"Sin ने काँधे पे पड़ी साड़ी को यूँ उचकाया जैसे कॉलर उचकाया जाता है
"वाह...मैथ्स टीचर..वाकई में तुमसे अच्छी पत्नी मुझे नहीं मिलेगी" कहकर Cos, Sin के गाल पे एक गहरा नीला 'थीटा' बनाने में मशगूल हो गया।
-तुषारापात®™

Wednesday, 15 June 2016

अर्धवृत्त

"कहाँ थीं तुम....2 घण्टे से बार बार कॉल कर रहा हूँ...मायके पहुँच के बौरा जाती हो" बड़ी देर के बाद जब परिधि ने कॉल रिसीव की तो व्यास बरस पड़ा

"अरे..वो..मोबाइल..इधर उधर रहता है...तो रिंग सुनाई ही नहीं पड़ी..और सुबह ही तो बात हुई थी तुमसे...अच्छा क्या हुआ किस लिए कॉल किया.. कोई खास बात?" परिधि ने उसकी झल्लाहट पे कोई विशेष ध्यान न देते हुए कहा

"मतलब अब तुमसे बात करने के लिए...कोई खास बात ही होनी चाहिए मेरे पास..क्यों ऐसे मैं बात नहीं कर सकता...तुम्हारा और बच्चों का हाल जानने का हक नहीं है क्या मुझे.... हाँ अब नाना मामा का ज्यादा हक हो गया होगा" व्यास उसके सपाट उत्तर से और चिढ़ गया उसे उम्मीद थी कि वो अपनी गलती मानते हुए विनम्रता से बात करेगी

उधर परिधि का भी सब्र तुरन्त टूट गया "तुमने लड़ने के लिए फोन किया है ..तो..मुझे फालतू की कोई बात करनी ही नहीं है..एक तो वैसे ही यहाँ कितनी भीड़भाड़ है और ऊपर से त्रिज्या की तबियत.." कहते कहते उसने अपनी जीभ काट ली

"क्या हुआ त्रिज्या को...बच्चे तुमसे संभलते नहीं तो ले क्यों जाती हो.. अपने भाई बहनो के साथ मगन हो गई होगी.. ऐसा है कल का ही तत्काल का टिकेट करा रहा हूँ तुम्हारा..वापस आओ तुम...मायके जाकर बहुत पर निकल आते हैं तुम्हारे..मेरी बेटी की तबियत खराब है और तुम वहाँ सैर सपाटा कर रही हो... नालायकी की हद है...लापरवाह हो तुम......." हालचाल लेने को किया गया फोन अब गृहयुद्ध में बदल रहा था व्यास अपना आपा खो बैठा था

"जरा सा बुखार हुआ है उसे..अब वो ठीक है..और सुनो..मुझे धमकी मत दो मैं दस दिन के लिए आईं हूँ..पूरा रहकर ही आऊँगी.. अच्छी तरह जानती हूँ मेरे मायके आने से साँप लोटने लगा है तुम्हारे सीने पे...अभी तुम्हारे गाँव जाती..जहाँ बारह बारह घंटे लाइट तक नहीं आती..बच्चे गर्मी से बीमार भी होते तो तुम्हें कुछ नहीं होता..पूरे साल तुम्हारी चाकरी करने के बाद जरा दस दिन को मायके क्या आ जाओ तुम्हारी यही नौटँकी हर बार शुरू हो जाती है" परिधि भी बिफर गई उसकी आवाज भर्रा गई पर वो अपने 'मोर्चे' पे डटी रही

"अच्छा मैं नौटंकी कर रहा हूँ...बहुत शह मिल रही है तुम्हें वहाँ से..अब तुम वहीं रहो..कोई जरूरत नहीं वापस आने की... दस दिन नहीं अब पूरा साल रहो..ख़बरदार जो वापस आईं..." गुस्से से चीखते हुए व्यास ने उसकी बात आगे सुने बिना ही फोन काट दिया

परिधि ने भी मोबाइल पटक दिया और सोफे पे बैठ के रोने लगी उसकी माँ पास ही बैठी सब सुन रही थी वो बोलीं "बेटी.. वो हालचाल पूछने के लिए फोन कर रहा था..देर से फोन उठाने पे अगर नाराज हो रहा था तो तुम्हे प्यार से उसे 'हैंडल' कर लेना था..खैर चलो अब रो नहीं..कल सुबह तक उसका भी गुस्सा उतर जायेगा"

परिधि अपना मुंह छुपाये रोते रोते बोली "मम्मी.. सिर्फ दस दिन के लिए आईं हूँ.. जरा सी मेरी खुशी देखी नहीं जाती इनसे..."

"बेटी...ये पुरुष होते ही ऐसे हैं...ये बीवी से प्यार तो करते हैं पर उससे भी ज्यादा अधिकार जमाते हैं..और बीवी के मायके जाने पे इनको लगता है इनका अधिकार कुछ कम हो रहा है तो अपने आप ही अंदर ही अंदर परेशान होते हैं..ऐसी झल्लाहट में जब बीवी जरा सा कुछ उल्टा बोल दे तो इनके अहम पे चोट लग जाती है..और बेबात का झगड़ा होने लगता है..परु(परिधि)..तेरे पापा का भी यही हाल रहता था..ये इन पुरुषों का स्वाभाविक रवैया होता है" माँ ने उसके सर पे हाथ फेरते हुए उसे चुप कराया

"पर मम्मी..औरत को दो भागों में आखिर बाँटते ही क्यों हैं ये पुरुष?...मैं पूरी ससुराल की भी हूँ और मायके की भी....मायके में आते ही ससुराल की उपेक्षा का आरोप क्यों लगता है हम पर?...ये दो जगह का होने का भार हमें ही क्यों ढोना पड़ता है..? उसने मानो ये प्रश्न माँ से नहीं बल्कि सबसे किये हों

माँ ने उसे चुप कराया और अपने सीने से लगाकर बोलीं "इनके अहम् और ससुराल में छत्तीस का आंकड़ा रहता ही है....जब...स्वयं..भोले शंकर इससे अछूते नहीं रहे तो..और किसकी बात करूँ....परु..मैंने पहले ही कहा... पुरुष होते ही ऐसे हैं ये इनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति है...ये खुद नहीं जानते..
और बेटी...व्यास का काम ही है परिधि को दो बाँटो में बाँट देना..जिससे एक अर्धवृत्त मायके का और दूसरा ससुराल का अर्धवृत्त बनता है।"

#परिधि_बराबर_व्यास_गुणा_बाइस_बटे सात
-तुषारापात®™

Tuesday, 14 June 2016

मिलावट की बनावट

मुझे ये समझ नहीं आता कि ये खाने में मिलावट को लेकर भाई लोग इतना हो हल्ला क्यों करते हैं जबकि हमारे देश की संस्कृति ही मिलीजुली संस्कृति है भौगोलिक स्थिति सत्तर तरीके की है कहीं पहाड़ कहीं समुद्र कहीं रेगिस्तान साथ ही धर्म बोली भाषा रहन सहन पहनावा तक सबकुछ मिला जुला है और तो और अभी कुछ समय पहले तक मिलीजुली सरकार ही देश भी चलाती थी वो भी मिश्रित अर्थव्यवस्था के दम पे,तो पूरे देश में ऐसी कोई चीज बताओ जिसमे मिलावट न हो ?

लगता है ये आम लोगों के दिमाग ख़राब कर दिए हैं इन दो चार पूर्ण बहुमतों वाली सरकारों ने,तभी ये खाने में मिलावट जैसी 'महान उपकारी योजना' को समझ नहीं पा रहे हैं इसका एक कारण मिलावट वाली शिक्षा पद्धति भी हो सकती है पढ़ पढ़ के सब अपने को बहुत काबिल समझने लगे हैं जो खाने में मिलावट के महत्व को नकार के उसका विरोध कर रहे हैं
अरे जरा सी मिलावट क्या कर दी लगे बवाल मचाने ,विरोध करने के पहले
कभी सोचा है खाने में मिलावट कितनी बड़ी धार्मिक आर्थिक राजनैतिक और सामाजिक 'क्रांति' है'मूर्खो! तुम्हें तो ऐसे लोगों के पैर धो धो कर पीने चाहियें जो खाने पीने में मिलावट करते हैं लेकिन नहीं तुम ठहरे लकीर के फ़कीर और लकीर भी गेंहू के पेट पे बनी वाली ही तुम्हें दिखाई देती है

खाने में मिलावट करने वाला अगर खाने में मिलावट नहीं करेगा तो ये जो तुमने इतनी जनसंख्या बढ़ा रखी है इसको खाना पूरा पड़ेगा बोलो? नहीं न तो खाने पीने की चीजों में मिलावट करने से उनकी मात्रा में बढोत्तरी होती है जिससे सभी देशवासियों को भोजन मिलता है और तो और कभी कभी वो जहर मिला कर जनसंख्या कम करने जैसा महान कार्य भी करते हैं जिससे देश पर आश्रित लोगों का बोझ कम होता है और अंतिम संस्कार कराने वालों को रोजगार प्राप्त होता है वो अलग ,मतलब ये तो वो बात हो गई कि आम के आम गुठलियों के दाम हाँ अब ये न पूछना कि आम डाल का या पाल का पका था वरना मिलावट का एक और पहलु सामने आ जायेगा।

मिलावट से मरने वाले लोगों का मुद्दा उछाल उछाल के सरकारें बदल जाती हैं जिससे हमें नई सरकारों के द्वारा पिछली सरकारों के किये घोटाले काले कारनामो का पता चलता है और हम जागरूक होते हैं कि हम और कितना पीछे चले गए ,तुम क्या जानो ये मिलावट से कितने बड़े रहस्य छुपते और खुलते हैं।

खाने में मिलावटी सामान मिलाने से सबको आर्थिक फायदा होता है और जब सबका कमीशन इससे जुड़ा होता है तो सेवा भी त्वरित होती जिसके फलस्वरूप खाने पीने का सामान बहुत जल्दी हम तक पहुँच जाता है नहीं तो बैठे रहते तुम खाली झोला लेके इंतज़ार में,और एक और विशेष प्रकार का रोजगार पैदा होता है मिलावट की इस पुण्य प्रदान करने वाली क्रिया से वो है तमाम तरह की मिलावट करने वाली चीजों का जुगाड़ करना जैसे दाल में कौन से पत्थर मिलाये जाएँ अब इस तरह के न जाने कितने पत्थर पाउडर चूरन चटनी केमिकल आदि आदि बनाये और बेचे जाते हैं कितने पढ़े लिखे लोगों को रोजगार मिलता है लेकिन तुम बुद्धू ये बातें क्या जानो।

मिलावट नए नए आविष्कारों की जन्मदाता है इससे देश में वैज्ञानिक सोच का विकास होता है मिलावटी नित नए प्रयोग किया करते हैं कि दूध में क्या मिलाया जाय जो लगे दूध जैसा और पकड़ में न आये और तेल घी में ऐसा क्या मिलाएं जो तेल घी जैसी चिकनाहट लिए हुए हो पर तेल या घी न हो ये एक बहुत मेहनत का काम है फिर भी परोपकारी लोग इसमें लगे हुए हैं मिलावट में अपार संभावनाएं हैं न जाने कितने ऐसे पदार्थों का निर्माण इसी मिलावट के धंधे से सम्भव हो सका है जिससे पढ़ने वालों को नए नए सब्जेक्ट पढ़ने पड़ रहे हैं जिससे अलग अलग एक्सपर्ट तैयार हो रहे हैं कितने ही नर्सिंग होम इसी मिलावट के शिकार लोगों का शिकार करके अपनी जीविका चला रहे हैं बड़ी बड़ी कम्पनियाँ 'शुद्ध' 'शुद्धतम' का लोगो लगा के आम चीजों को महंगा करके अलग से एक बाजार का निर्माण कर रही हैं और देश का चहूँमुखी विकास कर रहीं हैं।

खबरदार अगर आगे से तुमने मिलावट का रोना रोया आम इंसान तू खुद दो लोगों के मेल से पैदा हुआ है तुझे मिलावट जैसी अत्यंत शुद्ध चीज पे ऊँगली उठाने की इजाजत नहीं है शुद्ध खाना तेरे और भगवान के मिलन में बहुत बड़ी बाधा है इसलिए चुपचाप मिलवाटी खाना खाता जा और जल्दी से भगवान से जाकर मिल और इस मिलावटी संसार से विदा ले।

-तुषारापात®™

Friday, 10 June 2016

तुम्हारे अधरों की कमनीय बाँसुरी पे  प्रेम का स्वर फूँकू मैं पंचमा 

आकाश है ओढ़े सुरमई कालिमा
धरती पर छाई यौवन की हरीतिमा
श्रावण की चंचल बरखा में
मिलन को तरसे मन प्रियतमा

छा जाए जब मेघों की कालिमा
देखूँ मैं तुम्हारे मुख का चंद्रमा
साथ तुम्हारे है देखनी मुझे
उगते सूर्य की भी लालिमा

नयन कटारी तीक्ष्ण करता सुरमा
कपोलों पे लाज की लालिमा
आलिंगन में जब भर लूँ तुम्हें
कहो बड़े चंचल हो बालमा

बाँहों में भर लूँ तुम्हें सुमध्यमा
लांघ जाऊँ समस्त बंधन सीमा
तुम्हारे अधरों की कमनीय बाँसुरी पे
प्रेम का स्वर फूँकू मैं पंचमा

-जब तुषारापात सिर्फ तुषार था (किशोरावस्था की कविता)

Sunday, 5 June 2016

गर हर यादव सपाई नहीं होता तो........

बात जनेऊ की नहीं लखनऊ की है जनाब
हर बाजपेई यहाँ कट्टर भाजपाई नहीं होता

-तुषारापात®™

Wednesday, 1 June 2016

दो जून

मई के खेत में फसल नहीं लहराई
'दो जून' की रोटी को तरसेगा जुलाई

-तुषारापात®™