Tuesday, 8 September 2015

रेतघडी


कभी महसूस किया
रेतघड़ी में बंद रेत का दर्द
जाने कितनी बार
कभी उलट के कभी पलट के
उसे वक्त के पोस्टमैन सा दौड़ाते हो
मीलों का सफर छोटी सी इक डिबिया मेँ
ज़र्रा ज़र्रा उसका गर्म होकर प्यासा है
अब तो उसे काल के इस चक्र से आज़ाद कर दो
नम होकर बिखर जाने दो
समंदर की रेत बन जाने को

-तुषारापात®™

दिल की गुल्लक

सिक्कों सी खनखनाती तुम्हारी हँसी
अपने दिल की गुल्लक में संभाल रखता हूँ
तुम किसी और को देखकर मुस्कुराने लगे
मैं आजकल बड़ा कंगाल रहता हूँ

तुषारापात®™