Monday, 19 March 2018

समाधान की उपपत्ति

"मतलब मैं ये मान लूँ कि मेडिकल साइंस के पास मेरा कोई इलाज नहीं है..सिवाय..इन नींद की गोलियों के" उसने मेडिकल रिपोर्ट्स को फाइल में लगभग ठूँसते हुए डॉक्टर से झुंझलाके कहा

सीनियर डॉक्टर विकल्प वर्मा व्यावसायिक मुस्कान चेहरे पे लाते हुए उससे बोले "वेल..मिस्टर समाधान मेडिकल साइंस किसी डिसीज का क्योर करती है..वहम का..अरर..अ..आपकी तो सारी रिपोर्ट्स नार्मल हैं..कहीं कोई ऐसी बात पकड़ में नहीं आयी जिससे पता चले कि आखिर क्यों आप सही से नींद नहीं ले पाते"

समाधान काफी समय से सही से सो नहीं पा रहा था ऑफिस से थका मांदा होने पर भी रात रात भर करवट बदलता रहता था ,गहरी नींद उसके लिए ऐसे हो गई थी जैसे गूलर का फूल,सुबह उठता था तो उसके पूरे बदन में दर्द रहता था उसकी ऐसी हालत देख के उसकी पत्नी उपपत्ति ने लगभग उसे धकेल के डॉक्टर के पास दिखाने भेजा था और तब से वो डॉक्टरों और उनकी तरह तरह की रिपोर्ट्स में उलझ के अब थक सा चुका था उसे समझ नहीं आ रहा था कि डॉक्टर उसकी इस छोटी सी बीमारी को पकड़ क्यों नहीं पा रहे हैं।

डॉक्टर विकल्प आगे बोले "देखिए एम आर आई तक मे कुछ नहीं आया..मुझे लगता है कि आपकी परेशानी फिजिकली न होकर मेंटली है...आप एक काम करिये किसी अच्छे साइकेट्रिस्ट को कंसल्ट करिये.. आप चाहें तो मैं आपको रेफर कर देता हूँ..यू मस्ट कंसल्ट टू डॉक्टर संकल्प.."

डॉक्टर से मनोचिकित्सक का नाम पता लेकर समाधान घर आता है और पत्नी उपपत्ति को सारी बात बताता है उपपत्ति उसकी बात सुन कहती है "अगर आप बुरा न माने तो एक बात कहूँ..वो कुंजी बुआ कह रहीं थीं..कि..कि..कहीं कोई ऊपरी बात तो नहीं.." उपपत्ति रुक कर पहले समाधान के चेहरे के भाव देखती है और पाती है कि वो ये बात सुनकर शांत है तो आगे की बात जल्दी जल्दी कह डालती है "  मैंने आपको पहले कभी बताया नहीं..कहा भी नहीं..पर आप जैसी परेशानियाँ मुझे भी होती रहीं हैं..शायद कोई बला वला हो..कुंजी बुआ बता रहीं थीं कि वो गुजरात में.. वो.. बाबा जी धाम है न..वहाँ.. वहाँ दर्शन करने से कैसी भी ऊपरी बाधा वगैरह हो..सब दूर हो जाती है..और वैसे भी आप पिछले पंद्रह सोलह साल से कहीं बाहर निकले भी नहीं हैं..इसी बहाने थोड़ी सैर.."

"उधर वो नालायक डॉक्टर कहता है कि मेरा दिमाग खराब है और इधर तुम कुंजी बुआ की अला बला बातें करके और दिमाग खराब कर रही हो..जाओ जरा चाय बना के लाओ..यार..क्या..क्या सुनना पड़ रहा है.." समाधान ने उसकी बात बीच में काटी और जूते मोजे उतार के हाथ मुँह धोने चला गया।

फिर कुछ महीने मनोचिकित्सक डॉक्टर संकल्प की संकल्पनाओं में समाधान फँसा रहा,मनोचिकित्सक ने उसकी नींद की दवा बंद करवा कर उससे तमाम बातें पूछीं कि कोई कर्ज़ की चिन्ता तो नहीं,रुपया पैसा फँसा होना,कोई सदमा, पुरानी बातें,कोई अधूरी इच्छा,अधूरा इश्क, मकान गाड़ी खरीदने या बेचने का या उससे जुड़ा कोई झंझट, बच्चों के भविष्य की चिंता, ऑफिस में कोई प्रेम प्रसंग,प्रोमोशन डिमोशन का खेल, नामर्दी, शीघ्रपतन आदि आदि ऐसी अनेकों बातों का जवाब जब नहीं में आया तो साइकेट्रिस्ट ने उसे अच्छी नींद लेने के कई तरीके सुझाए पर कोई उपाय काम नहीं आया और तब तक कुंजी बुआ का दबाव भी उसपर काफी हो चुका था तो समाधान को ऊपर नीचे की अलाएं बलाएं न मानते हुए भी उपपत्ति के साथ बाबा जी धाम जाना पड़ ही गया।

बाबा जी धाम वो लोग रात आठ बजे के आसपास पहुँचे थे तब तक दर्शनों का समय समाप्त हो चुका था समाधान ने पहले से ही धाम के पास के एक होटल में कमरा बुक करवा लिया था प्लान ये था कि रात भर आराम करके सुबह सुबह दर्शन आदि कर लिए जाएंगे।

होटल के कमरे में समाधान और उपपत्ति फ्रेश हुए और रूम सर्विस को फोन कर खाना आर्डर किया और लेट के खाना आने का इंतजार करने लगे बीस पच्चीस मिनट के बाद खाना आया सर्विस बॉय ने बेल बजाई तो उपपत्ति ने समाधान से कहा " देखिए शायद खाना आ गया है.. दरवाजे पे कोई है.." उपपत्ति की बात पर समाधान की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई तो उसे आश्चर्य हुआ उसने एक बार और कहा पर इस बार भी कोई प्रतिक्रिया नहीं,बेड के दूसरी ओर आकर उसने जब देखा तो पाया कि समाधान गहरी नींद में सो रहा है और हल्के हल्के खर्राटे भी ले रहा है  उसने पहले तो सर्विस बॉय से खाना लेकर उसे चलता किया और फिर से समाधान को सोते हुए देखने लगी, उपपत्ति की खुशी का तो ठिकाना ही नहीं था, उसने मन मे सोचा कि कुंजी बुआ ने क्या खूब जगह बताई कि धाम से एक डेढ़ किलोमीटर दूर ही इनपे इतना असर हुआ है, उसने समाधान को सोने दिया और थोड़ा बहुत खाना खाकर वो भी लेट गई।

सुबह के दस बजे नहा धोकर तैयार हुई उपपत्ति समाधान को खुशी खुशी जगा रही थी "उठो भी कितना सोएंगे..दर्शनों को भी तो चलना है..चाय भी आ गई है.. उठ जाइये.."

समाधान अँगड़ाई लेते हुए उठता है और चौंक के कहता है "अरे ये कैसे..मैं इतनी देर तक..सोता..कैसे सोता रहा..खाना..खाया..अरे आज तो बदन दर्द भी न के बराबर है.."

उपपत्ति उसे चाय की प्याली देते हुए कहती है "सब धाम का चमत्कार है..चलिए अब जल्दी से नहा लीजिये"

समाधान उसके हाथ से चाय की प्याली लेकर एक ओर रख थोड़ी देर कुछ सोचता है और फिर अचानक से बेड से उतर के पलंग पे बिछी चादर हटा के कुछ ढूँढने लगता है उपपत्ति उसे ऐसा करते देख कहती है "अरे..अरे..अब ये क्या करने लगे..चलो भी..चाय पीकर..तैयार हो जाओ..देर हो रही है दर्शन के लिए चलना है"

"अब यहाँ तक आए हैं तो चल भी लेंगे ..पर..अब दर्शन करने की जरूरत नहीं रही..वैसे अगर तुम पहले मुझे बता देतीं कि तुम्हें भी सही से नींद नहीं आती थी तो यहाँ तक भी आना नहीं पड़ता" समाधान रहस्मयी ढंग से मुस्कुरा के उससे कहता है और पलंग पे बिछे गद्दे की कंपनी का नाम अपने मोबाइल में नोट करने लगता है।

यदि समाधान के साथ उपपत्ति का भी ज्ञान हो तो किसी कुंजी की आवश्यकता नहीं पड़ती।

~तुषार सिंह #तुषारापात®

Sunday, 18 March 2018

नव संवत्सर

ज्यूँ चैत अमावस बीत गई
हाड़ माँस कंपित शीत गई
धरती ने ओढ़ा अम्बर नया
सृष्टि घोषित नव संवत्सर भया
अब भय कैसा कैसी विपदा
ये चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा
हे भारतवर्ष! अब हर्ष कर!
नववर्ष कर ! नव वर्ष कर!

#तुषारापात®

Friday, 16 March 2018

आधुनिक हिचकी

मिस्ड कॉल आधुनिक हिचकी है।

~तुषारापात®

Wednesday, 14 March 2018

जिंदगी


नई कहानी,न नए किरदार बनाने देती है
जिंदगी भारी है बहुत कहाँ कलम उठाने देती है

#तुषारापात®

Monday, 12 March 2018

ख़ुदा खानाबदोश है


"उसके लिए..उसके लिए..ये गुम्बदौ-मीनारें बनाने से क्या फायदा.. उसको अगर यहाँ रहना ही होता..या कभी कभार आना भी होता..तो वो ये सब कुछ बनाने से पहले..अपना घर ऑफिस वगैरह..अपनी मर्जी का अपने हिसाब का..यहाँ न बनाता?...साफ मतलब है..वो यहाँ रहना ही नहीं चाहता था...सोचो जरा..पूरी दुनिया बनाने वाला अपना घर बनाने का ज़िम्मा हमें..मतलब..हम नौसिखियों को सौंपेगा? ..जनाब ख़ुदा खानाबदोश है..ठिया ठिकाना नहीं रखता..वो तो बस हमारे जैसे न जाने कितनों के ठिकाने बनाता जाता है..आगे बढ़ता जाता है...वो अब जब वापस आएगा तो अपनी ज़मीन वापस खींचने आएगा...तब तक हम सब ख़ाक होके अपनी खाल इस जमीं में मिला चुके होंगे.. न न भाई..मेरी तौबा..उसका घर बनाने में अगर कुछ ऊँच नीच हो गई..तो वो हमें फिर से ज़िन्दा करके..हमारी  ज़िन्दा खालें खींचेगा..।"

नाटक 'ख़ुदा खानाबदोश है' से एक अंश।
~तुषारापात®

खानाबदोश

तुम बनाते रहो उसके लिए खूब गुम्बदो-मीनारें
ख़ुदा खानाबदोश है ठिया ठिकाना नहीं रखता

#तुषारापात®

Sunday, 11 March 2018

प्रोफाइल

तुम्हारी प्रोफाइल देखी
और देखीं कई ब्लैक एंड वाइट तस्वीरें वहाँ
तुम्हारे भीतर का सुनहरा अँधेरा दीप्त था

तुम्हारी प्रोफाइल देखी
और देखीं कई सारी रचनाएँ तुम्हारी
कलम किसी पशोपेश में शायद लिप्त था

तुम्हारी प्रोफाइल देखी
और देखीं कई कवियों की कविताएं वहाँ
न जाने क्यों कलाकारों का वो डेरा सुप्त था

तुम्हारी प्रोफाइल देखी
और जागी तुम्हारी वाल पे आने की प्यास
मैं अपने प्रशंसकों से अब तक तो तृप्त था

~तुषारापात®

गुलाबी इतवार

दिले नादां,बचपने वाला ढूँढता है क्यूँ,अब तो तेरी जवानी है
इतवार की लाली उड़ गई तो क्या,रंगत अब इसकी गुलाबी है

वक्त की धूप,जिंदगी के रंग फीके कर गई,ये आम कहानी है

~तुषारापात®

Saturday, 10 March 2018

नजर के तीर, आँखों के धनुष और लटों की डोरी

ये तो
तुम जानते ही होगे
कि
धनुष की डोरी
खींचने और छोड़ने से
तीर
निशाने पे जा लगते हैं
और ये भी
सब जानते ही हैं
कि
आँख के धनुष से
छोड़े गए
नजर के टेढ़े तीर भी
दिलों पे सीधे सीधे लगते हैं
मगर
क्या तुम ये जानते हो
कि
नजर के तीर भला
किस डोरी से चलते हैं
अभी अभी
दिल मेरा
ताजा ताजा
निशाना बना है
मेरे सामने बैठी उसने
बार बार
चेहरे पे आतीं
अपनी लटें
कानों पे चढ़ा के
हर बार मुझे देखा है।

~तुषारापात®

जायदाद

मेरी जायदाद बढ़ने के मशहूर किस्से हुए
मेरे तीन बेटे थे मेरे घर के चार हिस्से हुए

~तुषारापात®

मुक़द्दर की जलेबियाँ-हथेलियाँ

जब भी चूमा है हथेली को ये कसैली लगी है
मौला तूने कैसी ये मुक़द्दर की जलेबी लिखी है

~तुषारापात®

जिंदगी का जूता

नंगे पैर आते हैं हम नंगे पैर जाते हैं
पर ज़िंदगी तेरे जूते बहुत काटते हैं

~तुषारापात®

चाय की प्याली

मेरे
बाएं कान में
अपने दाएं हाथ की
उंगलियाँ फँसा के
वो
हौले हौले
छू रहा है मुझे
चाय की प्याली की तरह

~तुषारापात®

Friday, 9 March 2018

चुंगी

आँखों की चुंगियाँ बंद करके
आओ ख़्वाबों की तस्करी करें

~तुषारापात®

Monday, 5 March 2018

काली सफेद

उड़ गए हैं सारे रंग इस बरस भी होली में
जिंदगी फिर काली सफेद है फिर वही शतरंज की बिसात है।

-तुषारापात®

Tuesday, 27 February 2018

शाम

किसी भी लिबास में उतरे ये शाम
उदासी के बुर्के में लिपट जाती है

उम्मीद का अपना सूरज डूब गया
रात किस्मत के सितारों से चिढ़ाती है

#तुषारापात®

Wednesday, 21 February 2018

तरकीबें

साइंसदानों ने बताई दुनियादारी
ऊपर उठने की तरकीबें सारी
हल्के कागज़ों ने पा लीं मंज़िलें
भारी कलमों के हैं दिल भारी

#तुषारापात®

Saturday, 17 February 2018

मुक़द्दर

वो हथेली से अपनी,हथेली मेरी रगड़ रहा था
मेरी खाली लकीरों में अपना मुक़द्दर भर रहा था

#तुषारापात®

Thursday, 15 February 2018

ग़ालिब

तुझे याद करने से अश्क नहीं हैं छलके ग़ालिब
बल्लीमारां की उड़ती ख़ाक आँख में चुभ रही है

-तुषारापात®

Friday, 26 January 2018

मोबाइल देशभक्ति

बीच दरिया की बातें बतलाता साहिल पे है
देखना है कितनी देशभक्ति तेरे मोबाइल में है

-तुषारापात®

Sunday, 14 January 2018

उत्तरायण

कब फेरोगे मेरे सजन जी हमारी ओर नयन
उत्तर की ओर चले सूर्य सुन भारतभूमि का ये प्रशन

#तुषारापात®

Saturday, 13 January 2018

चाँद का वादा

महीने में एक पूरा बाकी दिन अधूरे...उसके वादे बड़े हसीन थे...चाँद जैसे थे

Thursday, 11 January 2018

वो

बात कायदे की थी सबके फायदे की
तो क्यूँ वो एक के कानों में कहता
जो बेहतर बनी होती उससे दुनिया
तो क्यों कर वो आसमानों में रहता

-तुषारापात®

Monday, 1 January 2018

दो शून्य

नया तो तब होगा कुछ,जब दहाई से सैकड़ा होगा
नहीं तो दो शून्य एक साथ थे,दो शून्य एक हाथ हैं

-तुषारापात®

Sunday, 31 December 2017

नाबालिग सदी

नाबालिग है अभी भी चाहे उन्नीस बीस से ही हो
अठारहवाँ लगा है साल अभी इक्कीसवीं सदी को

-तुषार सिंह #तुषारापात®

Thursday, 28 December 2017

किस्मत की चवन्नी

जिन्हें किस्मत की चवन्नी नहीं मिलती,जीवन की दौड़ में उनकी मेहनत के सोलह आने,बारह आने बन लंगड़ाते हैं।

-तुषारापात®

Sunday, 24 December 2017

बड़ा दिन

कैलेंडर रंगभेद करता है,लाल और काले में यहाँ
दिन भी होता है बड़ा और छोटा,आदमी की तरह

-तुषारापात®

बड़ा दिन

मकर संक्रांति तो हम पिछड़े लोगों की बातें हैं
दिन बड़ा होने का जश्न वो लंबी रातों में मनाते हैं

-तुषारापात®

Tuesday, 19 December 2017

जीवन

इस वन में बसन्त कभी,कभी पतझड़ा होता है
पर सावन में गिरे पत्तों का दर्द पौष में हरा होता है

-तुषारापात®

दिसम्बर की चोट

सर्द मौसम में उभर आते हैं जून के हल्के दर्द भी
और ये चोट तो दिसम्बर की है न जाने कितना पिराएगी

-तुषारापात®

Monday, 18 December 2017

ख़तों की राख से इश्क़ दफ़ना दिया है मैंने

मैं था बेवफा सबसे ये कहला दिया है मैंने
तुम्हारे हक़ में काम ये पहला किया है मैंने

नाम अब भी आता है तुम्हारा लबों पे मगर
दीवार के कानों को अब समझा दिया है मैंने

कि तुम्हारा कोई भी नामोनिशां न बाकी रहे
ख़तों की राख से इश्क़ दफ़ना दिया है मैंने

जाने तुम मनाओ न मनाओ मौत के बाद की रस्में
जीते जी अपना तेरहवीं दसवाँ करवा दिया है मैंने

ऐसा भी नहीं कि हाथ अपना सीने तक न पहुँचे
जरा सी बात थी दिल को बहला दिया है मैंने

धड़कने जब जब तेरे नाम पे तेज हुईं हैं 'तुषार'
काँधे के एक बालिश्त नीचे सहला दिया है मैंने

-तुषारापात®

Friday, 15 December 2017

टूटन

कुछ टूटा हुआ जब भी मुझमें खनकता है
कलम कागज़ पे हर्फ़ हर्फ़ जोड़ने लगता है

-तुषारापात®

Thursday, 14 December 2017

कॉपी पेस्ट

"हा.ई..लो मैं भी हॉफ डे लीव लेकर आ गया.."राहुल कमरे में घुसते ही चहकते हुए बोला पर टिया को रजाई लपेटे सोते देख उसके पास जाकर पूछता है "क्या हुआ..ऑफिस से अभी आई हो क्या...ऐसे क्यों लेटी हो.."

टिया ने आँखें मलते हुए कहा "ऑफिस से तो लीव लेकर जल्दी ही आ गई थी..पर..तबियत कुछ ठीक नहीं लग रही.."

राहुल ने उसका माथा छुआ और लॉबी में जाकर मेडिसिन बॉक्स से थर्मोमीटर निकाल के लाया और उसे लगाने को बोला,एक मिनट के बाद थर्मोमीटर चेक करके वो कहता है "हम्म..थोड़ा सा फीवर है..ठंड लग गई शायद तुम्हें.."

"कितना है" टिया ने राहुल के हाथ से थर्मोमीटर छीनने की नाकाम कोशिश करते हुए पूछा

"अरे..अरे..ज्यादा नहीं है..कोई मेडिसिन ली..नहीं न..रुको मैं क्रोसिन देता हूँ.." राहुल उसके हाथ से थर्मोमीटर बचाता है और झटक के थर्मोमीटर के केस में रख देता है

टिया ने उदास सी शक्ल बनाते हुए कहा "यार आज तुम्हारा बर्थडे है..और मैं अपनी तबियत खराब करके बैठ गई..सोचा था तुम्हारी पसंद की डिशेस बनाऊँगी और एक छोटी से पार्टी थ्रो करूँगी..सब गुड़ गोबर हो गया" तभी डोरबेल बजती है तो वो आगे कहती है "शिट यार..देखो कोई तुम्हें विश करने न आया हो..ओह..गॉड.कहीं भैया-भाभी तो नहीं आ गए..यार मैने तो कुछ भी नहीं बनाया..नमकीन भी थोड़ी सी है..तुमसे कहा था कि नाश्ता लाना है..पर तुम सुनते ही नहीं..."

"रिलैक्स..रिलैक्स..मैं देखता हूँ..अगर भैया भाभी भी होंगे तो क्या हुआ..मैं मार्केट से कुछ ले आऊँगा न..बर्थ डे के दिन तो मत डाँटो.." राहुल हँसते हुए ये कहता है और जाकर दरवाजा खोलता है सामने पड़ोस की पम्मी आँटी थीं उसके कुछ कहने से पहले ही वो बोल पड़ीं
"ओये शेर पुत्तर..बर्थडे बॉय..हैप्पी बर्थडे..टिया कहाँ है..ये देख तुम दोनों के लिए इडली सांभर बना के लाईं हूँ"

"थैंक्स आँटी..आइये अंदर आइये" राहुल उन्हें टिया की तबियत के बारे में बताता है और अंदर बुलाता है पम्मी आँटी टिया का हाल चाल पूछतीं हैं और थोड़ी देर में ढेर सारी इडलीयाँ देकर चलीं जाती हैं

"ये लो बर्थडे मेरा और तुम्हारे पसन्द की चीज लोग दे जा रहे हैं..इंडिया भी कमाल है..यहाँ एक पंजाबी आँटी साउथ इंडियन डिश बनाती हैं और पड़ोस में दे भी जातीं हैं" राहुल टिया के मुँह में इडली का एक टुकड़ा डालते हुए कहता है

"कुछ भी कहो..पम्मी आँटी हैं तो पंजाबन पर साउथ इंडियन कमाल का बनातीं हैं..उनके हाथ की इडली तो पूरी कॉलोनी में फेमस है..पर यार मुझे कोई टेस्ट नहीं लग रहा..बुखार कितनी देर में ठीक होगा..मैं बोर हो गईं हूँ.." टिया ने इडली के टुकड़े को किसी तरह निगलते हुए कहा

राहुल कुछ कहता कि तभी डोरबेल फिर से बजती है वो जाकर दरवाजा खोलता है तो पाता है उसके भैया-भाभी आए हुए हैं वो दोनों के पैर छूता है और ड्राइंग रूम में उन्हें बिठा टिया को आवाज देता है कि भैया भाभी आए हैं टिया भी जेठ जेठानी के सम्मान में उठकर बैठक में आ जाती है

जन्मदिन की शुभकामनाओं,आशीर्वाद और चाय के एक दौर के बाद टिया उन्हें इडली सांभर ऑफर करती है जिसे थोड़ी न नुकुर के बाद वो स्वीकार कर लेते हैं

एक एक इडली और थोड़ा थोड़ा सांभर सबके लेने के बाद राहुल के भैया भाभी अबकी दो दो इडलियाँ और ढेर सारा सांभर लेते हैं और उसकी भाभी टिया से पूछतीं हैं "वाओ..टिया..इडली तो बहुत ही बढ़िया बनी है..और सांभर भी प्योर साउथ इंडियन मसाले से बना लग रहा है..बहुत ही यमी..सो टेस्टी..रेसिपी तो बता..कैसे बनाया..."

टिया राहुल को देख के मुस्कुराती है मानो पूछ रही हो क्या कहूँ "अरे भाभी ये तो बस ऐसे ही..वही चावल और सूजी मिक्स..और..अरे आप और लीजिये न..भैया आप भी लीजिये न.." कहकर वो एक एक इडली और उनकी प्लेट में रख देती है

"टू टेस्टी..." भैया इडली खाते खाते कहते हैं और भाभी भी सांभर का सिप लेकर इडली के टुकड़े को जुबान पे चुभलाते हुए कहती हैं "इडली का कोई पेस्ट लिया है क्या..किस कम्पनी का है..कहीं वो मदर्स वाला ब्रांड तो नहीं..नहीं..नहीं..वो इतना बढ़िया नहीं होता..कौन सा है?"

टिया झेंपते हुए कहती है "भाभी कोई ब्रांडेड नहीं था..अबकी लाऊँगी तो आपके लिए भी एक ले आऊँगी" कहकर उसने किसी तरह पीछा छुड़ाया थोड़ी देर में वो लोग राहुल को फिर से बर्थडे विश करते हैं और चले जाते हैं

"अच्छा बेटा..पम्मी आँटी की इडलियों पे मेला लूटा जा रहा था" भैया भाभी के जाने के बाद राहुल टिया को चिढ़ाते हुए कहता है "आने दो अबकी भाभी को..बताऊँगा उन्हें..ये पेस्ट नहीं..कॉपी पेस्ट था"

"जब तबियत ठीक न हो तो इतना कॉपी पेस्ट तो चलता है और ये कोई चोरी थोड़ी है जानू..पम्मी आँटी भगवान का अवतार हैं..उनके चरण छुआ करूँगी अब" टिया पैर छूने की नौटंकी करते हुए कहती है और दोनों हँसते हँसते सोफे पे गिर जाते हैं।

-तुषारापात®

Friday, 8 December 2017

कनक का अनमोल रजत

"तुम्हें लिखना नहीं छोड़ना चाहिए था...कॉलेज के दिनों की तुम्हारी कविताएं.. आज तक जहन में घूमती हैं... खास तौर पे वो तुम्हारी गोल्डन कश वाली कविताएं... रजत.. आज भी जब पढ़ती हूँ तो ऐसा लगता है मानो सुलगते हुए लफ़्ज़ों पे... एहसासों की ओस का छींटा पड़ रहा हो और छुन्न की आवाज पूरा गुजरा वक्त भीतर खनखना जाती हो... अगर तुम लिखते रहते तो इलाहाबाद तुम्हारे नाम से जाना जाता" आनंद भवन के लॉन में बैठी घास के एक तिनके को उखाड़ते हुए कनक ने कहा

रजत ने उसके हाथ से उखड़ा हुआ तिनका लिया और उसे मिट्टी में फिर लगाने की कोशिश करते हुए बोला "अब वो छुन्न की आवाज मैं रोज सुनता हूँ होटल के किचेन में..जब डिश बनाने के बाद..बेसिन में पॉट डुबो देता हूँ..कनक पेट की आग..कलम की क्रांति की मशाल से बड़ी होती है..बहुत बड़ी..शौहरत से दिमाग की भूख शांत होती है पेट की नहीं..और लिखता रहता तो क्या..बस दो चार सम्मान की शॉल मिल गईं होतीं..फटा कुर्ता छुपाने को"

कनक ने तिनके के चारों ओर मिट्टी को दबाते हुए कहा "और दिल की भूख?...अब तो सब ठीक है अब फिर से राइटिंग स्टार्ट कर दो..शेफ रजत केसरवानी साहब"

"एक बार उखड़ा हुआ पौधा तो फिर से मिट्टी में जम सकता है पर पेड़ नहीं" रजत ने तिनके को जमाते हुए कहा

"आह..क्या पंच लाइन मारी है..टाइमिंग है अभी भी तुममें..राइटर जिंदा है कहीं" कनक उसकी कही पंक्ति पे निहाल होने की ओवर एक्टिंग करते हुए आगे बोली "शादी के पहले तो बहुत लिखते थे.. शादी के बाद क्या हो गया..या मुझसे शादी नहीं होती तो लिखते.. कोई गम कोई दर्दे दिल का बहाना नहीं रहा...क्यों रॉकस्टार?"

रजत रॉकस्टार फिल्म याद करते हुए हँसते हुए बोला "हाँ शादी के बाद तुम्हारे माथे की लाल बिंदी ने सारी कल्पनाओं पे फुल स्टॉप जो लगा दिया"

"हाऊ..क्या वाकई में...क्या तुम्हारे राइटिंग छोड़ने की वजह सच में..मैं हूँ.." कनक ने घास पे अपनी मुठ्ठी कसते हुए कहा

रजत ने घास को उससे छुड़ाया और उसका हाथ अपने हाथ मे लेकर मुस्कुराते हुए बोला "लगता है अब मेरे जोक्स में धार नहीं रही.."

"रहने दो..अब मैं तुमसे बात तभी करूँगी जब तुम राइटिंग छोड़ने का कारण बताओगे.." कनक ने हाथ छुड़ाया और दूसरी ओर घूम के बैठ गई

रजत घास पे पसरते हुए बोला "कनक..तुम्हारे पापा से जब मैं तुम्हारा हाथ माँगने गया था तो उन्होंने पूछा था कि मैं करता क्या हूँ और मेरे राइटर कहने पे उन्होंने कहा था कि हाँ हाँ ठीक है लिखते हो..पर काम क्या करते हो.. तो मैं कुछ जवाब नहीं दे पाया था..अपनी सबसे फेमस कविता भी उन्हें सुनाई थी..सुनकर उन्होंने बस ये कहा था कि बच्चन नाम से अमिताभ जाना जाता है हरिवंश नहीं..और उठकर चले गए थे"

"तो क्या हुआ..मैंने तो तुम्हारा साथ दिया..शादी की न..उनकी मर्जी के बगैर...और देखो सबकुछ अच्छा ही रहा..वो भी आज कितने खुश हैं हम दोनों को खुश देख के..ये बात तो मैं जानती ही थी..इसमें नया क्या बताया" कनक ने मुँह फेरे हुए ही कहा

"उन्होंने ये भी कहा था..कनक बहुत ऐशो आराम से पली बढ़ी है.. रजत और कनक के मोल का अंतर तो तुम्हें पता होगा ही" रजत उठकर अपना स्वेटर उतारते हुए बोला

कनक उसकी ओर घूमी और उसके हाथ से स्वेटर ले कर अपने सिर को ढकते हुए बोली "हम्म..तुमने ये बात आजतक क्यों छुपाई..खैर अब तो लिख सकते हो..फिर से शुरू करो..सरस्वती का वरदान सबको नहीं मिलता"

"तुम्हें याद है..शादी के बाद घर में सब एक साल तक गंगा में जाने को मना कर रहे थे..." रजत इतना ही कह पाया था कि कनक उसकी बात काटते हुए बोली "हाँ..तुम फिर भी..मुझे नाव से संगम ले चले थे..कितनी बढ़िया शाम थी..गंगा यमुना की तरह हम भी एक हो गए थे.."

रजत ने उसका हाथ थामते हुए कहा "हाँ..और गंगा जमुना के उस मिलन में..सरस्वती कहीं लुप्त थी..नाव में बैठा मैं..दूसरी ओर तुम्हें देख रहा था..फीका नारंगी सूरज .. तुम्हारी सुर्ख लाल बिंदी को देख सकुचाते हुए पानी में गड़ा जा रहा था..बस मैंने तभी डिसाइड कर लिया था कि..तुम्हारी माँग के सिंदूर को तुम्हारे पापा के आगे फीका नहीं पड़ने दूँगा..सरस्वती से मुख पे तेज आता है पर चेहरे पे चमक लक्ष्मी आती है..और..तब..चुपके से..तुम्हारी नज़र बचा के अपना फेवरिट पेन जिससे लिखना मुझे बहुत पसंद था..वहीं जल में छोड़ आया था...शायद त्रिवेणी पूरी करने को संगम में सरस्वती घोल आया था।"

कनक मुद्राओं की चमक के आगे नाचते संसार को रजत हँस मटमैला दिखता है।

#कनक_का_अनमोल_रजत
#तुषारापात®

Wednesday, 29 November 2017

चाउमीन

"जिंदगी उलझी है चाउमीन सी..तो क्या...चटपटी भी तो है
घड़ी की प्लेट में परोसिए...दोनों काँटो से खाइए..चटकारा लगाइए।"

#तुषारापात®

Thursday, 23 November 2017

आशिक vs शायर

इश्क़ को आशिक़ों ने नहीं शायरों ने ज़िन्दा रखा है।

#तुषारापात®

Wednesday, 22 November 2017

खरीदार सर्दियाँ

पलकों के शटर पे है रंगीन विज्ञापन छतरियों का
आँखों की दुकान के भीतर काली बदलियाँ छाईं हैं

कह दो की दुकान बंद हुई,रात के बारह बजे क्यों
पुराने दिनों की गर्मी खरीदने ये सर्दियाँ आईं हैं

#तुषारापात®

Saturday, 18 November 2017

दिल का डॉक्टर, राइटर

दिल को डॉक्टरों ने नहीं राइटरों ने संभाल रखा है
-तुषारापात®

Wednesday, 15 November 2017

चाँद की हसिया से रात नहीं कटती है

चाँद की हसिया से रात नहीं कटती है
काम कल्पना से विरह कहीं मिटती है

एक हाथ के अंतर पे था मुखड़ा
एक हाथ के समांतर था अंतरा
दोनों हाथ बाँधे असहाय रह गया मैं
बेसुरी मर्यादा बड़ा बेसुरा गीत रचती है
चाँद की हसिया से रात नहीं कटती है...

एक फूँक में उड़ाता मैं तुम्हारी लाज
एक फूँक से भर देतीं तुम मुझमें आग
दो फूँकों से संसार की,फुँक गया ये स्वप्न
साँसों की धौंकनी से अब राख उड़ती है
चाँद की हसिया से रात नहीं कटती है...

एक आस बसन्त बनके तुम महकोगी
एक आस सावन बनके तुम बरसोगी
दो आसें ओस सी जेठ में वाष्पित हुईं अब
पूस की हवा इस बरस बहुत चुभती है
चाँद की हसिया से रात नहीं कटती है...

एक चुंबन में मुंदती आँखें चंद्रमा सी
एक चुंबन से काँपती नाभि मध्यमा की
दो चुम्बन नियति के क्रूर,सुखा गये होंठ
बार बार जिह्वा अब इनपे फिरती है
चाँद की हसिया से रात नहीं कटती है...

एक कविता में लिखता तुम्हारा यौवन
एक कविता से पढ़ता तुम्हारा अन्तर्मन
दो कविताओं में था रचा किंतु अपना दुर्भाग्य
तेरी और मेरी हथेली प्रतिदिन कहती है
चाँद की हसिया से रात नहीं कटती है...

-तुषारापात®

चाँद की हसिया से रात नहीं कटती है

चाँद की हसिया से रात नहीं कटती है
काम कल्पना से विरह कहीं मिटती है

एक हाथ के अंतर पे था मुखड़ा
एक हाथ के समांतर था अंतरा
दोनों हाथ बाँधे असहाय रह गया मैं
बेसुरी मर्यादा बड़ा बेसुरा गीत रचती है
चाँद की हसिया से रात नहीं कटती है...

एक फूँक में उड़ाता मैं तुम्हारी लाज
एक फूँक से भर देतीं तुम मुझमें आग
दो फूँकों से संसार की,फुँक गया ये स्वप्न
साँसों की धौंकनी से अब राख उड़ती है
चाँद की हसिया से रात नहीं कटती है...

एक आस बसन्त बनके तुम महकतीं
एक आस सावन बनके तुम बरसतीं
दो आसें ओस सी जेठ में वाष्पित हुईं अब
पूस की हवा इस बरस बहुत चुभती है
चाँद की हसिया से रात नहीं कटती है...

एक चुंबन में मुंदती आँखें चंद्रमा सी
एक चुंबन से काँपती नाभि मध्यमा की
दो चुम्बन नियति के क्रूर,सुखा गये होंठ
बार बार जिह्वा अब इनपे फिरती है
चाँद की हसिया से रात नहीं कटती है...

एक कविता में लिखता तुम्हारा यौवन
एक कविता से पढ़ता तुम्हारा अन्तर्मन
दो कविताओं में था रचा किंतु अपना दुर्भाग्य
तेरी और मेरी हथेली प्रतिदिन पढ़ती है
चाँद की हसिया से रात नहीं कटती है...

-तुषार सिंह #तुषारापात
©tusharapaat.blogspot.com

Monday, 13 November 2017

दो और दो हजार

कहाँ था मालूम कि दो और दो हजार होता है
दो उसने कही थी और दो ही हमने कही थी
फिर तमाम बातों से भरा क्यों अखबार होता है

#तुषारापात®