Friday, 10 June 2016

तुम्हारे अधरों की कमनीय बाँसुरी पे  प्रेम का स्वर फूँकू मैं पंचमा 

आकाश है ओढ़े सुरमई कालिमा
धरती पर छाई यौवन की हरीतिमा
श्रावण की चंचल बरखा में
मिलन को तरसे मन प्रियतमा

छा जाए जब मेघों की कालिमा
देखूँ मैं तुम्हारे मुख का चंद्रमा
साथ तुम्हारे है देखनी मुझे
उगते सूर्य की भी लालिमा

नयन कटारी तीक्ष्ण करता सुरमा
कपोलों पे लाज की लालिमा
आलिंगन में जब भर लूँ तुम्हें
कहो बड़े चंचल हो बालमा

बाँहों में भर लूँ तुम्हें सुमध्यमा
लांघ जाऊँ समस्त बंधन सीमा
तुम्हारे अधरों की कमनीय बाँसुरी पे
प्रेम का स्वर फूँकू मैं पंचमा

-जब तुषारापात सिर्फ तुषार था (किशोरावस्था की कविता)

Sunday, 5 June 2016

गर हर यादव सपाई नहीं होता तो........

बात जनेऊ की नहीं लखनऊ की है जनाब
हर बाजपेई यहाँ कट्टर भाजपाई नहीं होता

-तुषारापात®™

Wednesday, 1 June 2016

दो जून

मई के खेत में फसल नहीं लहराई
'दो जून' की रोटी को तरसेगा जुलाई

-तुषारापात®™

Saturday, 28 May 2016

विराटजातक अनुष्कछेद श्लोक ६३ एवं ३६

चुम्बन एक आश्चर्य: किसी अभिनेत्री द्वारा अपनी किसी फिल्म में किसी अभिनेता को देय अथवा प्राप्त किया हुआ सार्वजनिक चुंबन अभिनेत्री के प्रेमी के लिए सामान्य होता है परन्तु यदि उस चुम्बन का आदान प्रदान एकांत में हुआ हो तो अभिनेत्री के प्रेमी के लिए वह चुम्बन अत्यंत कष्टकारी होता है।

-तुषारापात™

Thursday, 26 May 2016

तनिष्किया‬

"नहीं नहीं...रहने दीजिये...मेरे बजट से ओवर है..रोज पहनने के हिसाब से काफी महंगी हैं" उसने अपने मन को मारते हुए तनिष्क की सेल्स गर्ल से कहा
उसकी आँखों में उन चूड़ियों के लिए चमक थी पर बटुए में उतनी खनक नहीं थी,एक फोन कॉल निपटा के कॉउंटर की तरफ वापस आते हुए मैंने ये सुना,देखा और सब समझ गया
"अरे क्या हुआ..तुम्हें तो इतनी ज्यादा पसंद आई थीं..ये चूड़ियाँ..कितने की हैं ? मैंने आधी बात उससे की और आधी सेल्स गर्ल से दोनों चूड़ियाँ लगभग छीनते हुए कही, सेल्स गर्ल कुछ कहती इससे पहले ही वो बोल उठी
"रहने दो..न..अपने बजट से और 36 हजार महंगी है..इतना महंगा लेकर क्या करना" उसकी बात में यथार्थ सपनों को दबा रहा था, मैंने कुछ नहीं कहा बस वो चूड़ियाँ उसकी कलाइयों में पहना दी
"अरे मगर..सुनो तो...हमारे पास चूड़ियों पे खर्च करने के लिए बस 50 हजार का ही बजट है..हमने तय किया था न.." दुविधा में पड़ी वो सकुचाहट से बोली
"कोई नहीं... नया टैबलेट लेने के आईडिया को थोड़ा आगे शिफ्ट कर देते हैं..उसका बजट इसमें मिला देते हैं" मैंने उससे कहा और सेल्स गर्ल को चूड़ियों पे लगा टैग देते हुये बिलिंग के लिए कह दिया
"पर..तुम पिछले तीन साल से वही पुराना टैबलेट चला रहे हो..हैंग भी तो कितना होता है..." उसने मेरा पुराना टैबलेट मेरे हाथ से लेकर दिखाते हुए कहा
"पिछले दो साल से..तुम्हारी कलाइयाँ भी..बगैर सोने के सूनी देखी हैं मैंने...बेंटेक्स की चूड़ियों पे तुम्हें सहेलियों के सामने झिझकते देखा है" थोड़ी भावुकता आ गई थी मेरी आवाज में
"तो अब तुम्हारे ऑफिस के काम..इम्पॉर्टेंड इमेल्स..और फेसबुक व्हाट्सऐप कैसे चलेंगे..." ऐसा लगा अगर तनिष्क का शोरूम न होता तो वो ख़ुशी से चूम लेती मुझे
"ईमेल और फेसबुक के...हजारो नोटिफिकेशन्स की टिंग से...कहीं ज्यादा ख़ुशी...तुम्हारी कलाइयों में पड़ी इन दो चूड़ियों की खनक देगी मुझे"


-तुषारापात®™ 

Friday, 20 May 2016

फिर तेरी कहानी याद आई

"वाह क़तील शिफ़ाई...क़त्ल कर दिया तुमने..." म्यूजिक प्लेयर पे रिपीट मोड पे चल रहे गाने 'तेरे दर पे सनम चले आये..तू न आया तो हम चले आये..'को सुनते सुनते मेरे मुंह से अपने आप ये शब्द निकल गए ,किसी राइटर के लिखे की तारीफ वही खुल के करता है जिसके दिल की छुपी बात को राइटर अपने कलाम में बयां कर दे और ये गाना...ये गाना..तो मेरे दिल जिगर की पुकार है..मेरा सपना है...मेरी तमन्ना...काश कभी आयत कहीं से आ जाये..और..और ये गाना बज उठे

तकरीबन रोज की तरह ही अवध की शाम मनाता मैं आज भी लाउड वॉल्यूम पे ये गाना सुनता हाथ में जाम लिए उसके ख्यालों में खोया हुआ था...हाँ आयत..'फिर तेरी कहानी याद आई'...न जाने कितनी बार बजने के बाद कुमार शानू ने अभी मुखड़े को पूरा ही किया था कि मुझे डोरबेल सुनाई दी कोई दरवाजा भी पीट रहा था,मैंने म्यूजिक प्लेयर पॉज किया और उठकर दरवाजे को खोला और मुझे अपनी आँखों पे भरोसा नहीं हुआ मेरे हाथ से ग्लास छूट गया

"वापस जाने वाली थी...बहुत देर हो गई घंटी बजाते.." उसने मुझसे आँख चुराते चुराते कहा, मैंने देखा उसकी आँखें आषाढ़ से पहले भटक आई बदली लिए हुयें थीं जो जेठ में बरसना भी नहीं चाहती थी और टिकना भी नहीं चाहती थीं मैंने उसे अंदर बुलाया और सोफे पे बैठने को कहा वो इधर उधर देख रही थी सकुचाहट भी थी...और कुछ सुकून की तलाश भी थी उसे शायद.. और यहाँ आने का..लोगों को पता लगने का डर भी साफ़ दिख रहा था उसके चेहरे से

"दिल को धड़का लगा था पल पल का..शोर सुन ले न कोई पायल का" मैंने उसकी ओर देखते हुए मन में गुनगुनाया और उसे पानी का ग्लास दिया उसने एक साँस में पानी खत्म किया और ग्लास टेबल पे रख के चुप बैठी रही मैं समझ रहा था कुछ बात है लेकिन क्या इसके लिए पूछना तो पड़ेगा
"क्या हुआ...अचानक ..यूँ...फोन कर दिया होता..सब ठीक तो है..बहुत परेशान दिख रही हो..क्या बात है"

"कुछ नहीं" उसने कहा,अच्छी तरह उसकी आदत जानता हूँ एक बार में तो कभी बता ही नहीं सकती कि क्या हुआ मैंने कई बार अलग अलग तरीके से पुछा तो कुछ देर बाद हमेशा की तरह पहले उसकी आँखों ने बोला फिर उसके लब हिले

"वो..वो..हदीस..हदीस चाहता है कि मैं उसके साथ सीनियर्स की पार्टी में जाया करूँ..कुछ ओपन ड्रेसेज एंड ओपन फ्रेंडली एट्टीट्यूड में.." उसने बहुत धीमे से कहा मैं अंदर ही अंदर सुलग के रह गया पर चुप रहा उसने आगे कहा "इसी बात पे आज फिर बहुत झगड़ा हुआ ..और मैं थोड़ी देर के लिए बाहर निकल आई..फिर...पता नहीं कैसे तुम्हारे घर तक आ गई"

और उसके बाद जितनी देर तक वो हदीस की बातें कर सकती थी करती गई..साथ साथ रोती गई...बिलखती गई..गुस्सा दिखाती गई...अपने दिल का पूरा गुबार निकाल के शान्त हुई..और आखिर में बोली.."वेद..तुम चुप क्यों हो..क्या मैंने यहाँ आके गलती की"

"नहीं..मैं चुप इसलिए हूँ.. अ..हदीस की बात गलत है..पर ये तुम मियां बीवी का मामला है..मैं बोल भी क्या सकता हूँ..और किस हक़ से...मैं उसकी आँखों में गहरे देखते हुए बोला उसने मेरी बात समझते हुए कहा "हाँ तुम तो उलटे खुश ही होंगे..जिसके लिए मैंने तुम्हें छोड़ा..आज उसके साथ मेरी न बनते देख..लेकिन एक बात बताओ क्या एक दोस्त के काँधे पे दूसरा दोस्त रो नहीं सकता"

"पता है आयत... इस दिन की मैंने बरसों से तमन्ना की है..मगर तुम्हारे इस तरह आने की..नहीं..जहाँ तुम आओ अपना गम हल्का करो..और चली जाओ..जिस काँधे की तुम बात कर रही हो..उस काँधे के एक बालिश्त नीचे एक दिल भी है..उसे कभी महसूस किया तुमने..आयत मैं सिर्फ एक काँधा नहीं हूँ...तुम्हें पता है मैं तुम्हारे ही ख्यालों में खोया हुआ था..लेकिन वो मेरी आयत थी..और यहाँ जो आई है...हदीस की आयत है..उसकी पत्नी है..और तुम्हीं ने कहा था "आयतें कभी वेद की नहीं हुआ करतीं"

मैं नशे में था और मेरा पूरा दर्द उभर आया था पता नहीं वो दर्द किस बात का था...अपनी परेशानी का..या उसे परेशान देख के..या शायद हाँ हदीस की ये हरकत मुझे गहरे तक चुभी है..और मैं अपना गुस्सा उसपर नहीं निकाल सकता..काश तुम मेरी होतीं आयत तो मैं ऐसा कहने वाले का मुँह तोड़ देता...ओह्ह आयत मैं तुमको भी दुःख नहीं पहुँचाना चाहता पर..मैं सिर्फ काँधा बन के भी नहीं रहना चाहता

"रात ज्यादा हो रही है..मुझे लगता है अब तुम्हें जाना चाहिए.." मेरी शुष्कता देख वो उठी और एक झटके में निकल गई मैंने दरवाजा बंद किया एक पैग बनाया सोफे पे वहीं बैठ गया जहाँ वो बैठी हुई थी उसकी खुश्बू से लिपट के रोने लगा और अपनी आवाज छुपाने को म्यूजिक प्लेयर का प्ले बटन पुश कर दिया गाना आगे बजने लगा....

"बिन तेरे कोई आस भी न रही...इतने तरसे की प्यास ही न रही"

-तुषारापात®™

Wednesday, 18 May 2016

परिधि बराबर व्यास गुणे बाइस बटा सात

"तुम्हारे पास अब टाइम ही कहाँ है मेरे लिए... या तो तुम घर के काम में उलझी रहोगी.. या फिर काम से होने वाली अपनी थकावट का रोना रोती रहोगी.. ऐसे में अगर मैं अपने दोस्तों के साथ समय न बिताऊँ तो क्या करूँ... रोज बारह बारह घंटे मर खप के काम करने के बाद...क्या मुझे हक नहीं है जरा सा खुश होने का.." व्यास ने चिल्लाते हुए कहा

"तुम तो बारह घंटे काम के बाद फ्री हो जाते हो...पर मेरा क्या...बोलो.. मुझे तो हफ्ते के 'सातों रोज बाइस घंटे' गृहस्थी में खटना पड़ता है... 'पाई' 'पाई' बचाने में मेरी मति लगी रहती है...मेरी खुशी के लिए कौन सोचता है यहाँ... मैं क्या कोई बंधुवा मजदूर हूँ.." परिधि ने गुस्से में अपना पल्लू खोंसा और बिलखते हुए तेज आवाज में आगे बोली

"इतना सब करने के बाद..प्यार के दो मीठे बोल तक को तरसती हूँ मैं ...बाकी तो जाने ही दो..केंद्र के होने के बाद तो फिर भी कभी कभार.. बिस्तर पे ही सही तुम्हें मेरी याद आ जाती थी...मगर त्रिज्या के होने के बाद..तो तुम भूल ही गए हो कि तुम्हारी एक बीवी भी है.... उसे भी तुम्हारे साथ प्यार के दो पल चाहिए हो सकते हैं.. मैं क्या समझती नहीं आजकल उस निगोड़ी बिंदु के घर के चक्कर क्यों लगाये जाते हैं..दोस्तों के घर जाने के नाम पे.."

व्यास इस हमले से थोड़ा घबड़ाया पर सम्भलते हुए कॉउंटर अटैक पर आया "तो क्या करूँ.. कैसे प्यार करूँ तुमको.. जब देखो बिखरे बाल लिए.. मुड़ी तुड़ी साड़ी पहने एक गृहस्थन ऑन्टी बनी दिखती हो... कभी केंद्र को लेकर सो जाती हो तो कभी त्रिज्या को पढ़ाती रहती हो...घर का माहौल साला इतना नीरस है.. कि दो पैग के बाद भी रोमांस नहीं जगता.. तुम्हारी इस शकल के आगे शिलाजीत भी फेल है"

"हाँ हाँ..मैं तो हूँ ही गृहस्थन.. तुम तो बड़े यंग हैंडसम दिखते हो इस मोटे तोंद और अपने 30 सेकंड के पुरुषत्व के साथ...और...और किसने कहा था दो दो बच्चे पैदा करने को.." वो गुस्से में तमतमाई आगे और कुछ बोलने जा रही थी कि अपने कमरे से उनकी आवाजें सुनकर बच्चे आ जाते हैं वो चुप हो जाती है और बच्चों से कहती है

"केंद्र..त्रिज्या.. फटाफट हैंडवाश कर लो..मैं खाना लगा देती हूँ खा कर चुपचाप सो जाओ..नो टीवी शीवी टुडे" बच्चे हैडवाश करके आते हैं वो उन्हें खाना खिला के उनके कमरे में सुला आती है और बिना खाना खाये सुबकते हुए अपने बिस्तर पे लेट जाती है और उधर व्यास पहले ही गुस्से में पैर पटकते हुए घर से बाहर निकल चुका होता है और अपनी उम्र से कुछ ही बड़े लेकिन रिश्ते के अंकल के पास जाकर सारा किस्सा सुनाता है अंकल बाहर बरामदे में उसके साथ बोतल लेकर बैठते हैं और कहते हैं

"देखो..ये सिर्फ तुम्हारी ही नहीं..आज गृहस्थी के बोझ से दबे हर मध्य वर्गीय परिवार की यही कहानी है... सबसे पहले एक लड़का छुट्टा होता है व्यास के जैसे जिसकी कोई सीमा नहीं कोई बंधन नहीं.. वो कहीं भी आ जा सकता है..पर शादी के बाद एक परिधि आकर उसको एक निश्चित दायरे में बंद कर देती है..जिसे गृहस्थी का वृत्त कहते हैं..अब वो जहाँ जहाँ जाता है उसकी परिधि भी साथ जाती है.." कहते कहते अंकल ने एक पैग बना के उसकी ओर ग्लास बढ़ाया और आगे कहा

उसके बाद जब बच्चा होता है तो..इस वृत्त में एक नया केंद्र बनता है... परिधि इस नए केंद्र की हो के रह जाती है...और इस प्रकार गृहस्थी का वृत्त..वृत्त न रहकर..एक दो केंद्र वाला दीर्घवृत्त बन जाता है और व्यास का वजूद लगभग खत्म सा हो जाता..उधर दीर्घवृत्त के दो केंद्र होने के कारण परिधि भी अब अपना सुंदर सा गोल आकार..कायम नहीं रख पाती.. जिससे आकर्षण का अभाव उत्पन्न होता है" अंकल ने कहकर एक साँस में ग्लास खत्म किया और नमकीन चखने लगे

"ओह्ह आपने तो बहुत गूढ़ बात बता दी..आप और आंटी में के बीच तो कभी ऐसी कोई समस्या आई ही नहीं होगी आखिर आप इतने समझदार जो हैं..अब इसका उपाय भी बता दीजिये" व्यास ने अचंभित होते हुए उनकी प्रशंसा की और उनसे यह पुछा ही था कि अंदर से आंटी की आवाज आई

"अरे और कितनी देर तक पीते रहोगे...वाइफ के लिए तो तुम्हारे पास जरा सा टाइम नहीं है..बस जब देखो तब..यार बाजी करते रहते हो..आओ जल्दी नहीं तो दरवाजा बंद कर लूंगी.. रात भर बाहर रहना फिर.."

ये सुनना था कि बाहर बैठे दोनो चाचा भतीजे ठहाका मार के हँस पड़े।

-तुषारापात®™

Tuesday, 17 May 2016

जागो

आसमान की माँग में सूरज का सिन्दूर भर दिया
नए सवेरे ने बदचलन रात को सुहागन कर दिया

#सुप्रभात
-तुषारापात®™

Monday, 16 May 2016

मासनामा

'जेठ' की दुपहरी
की सूनी सड़क सी मेरी जिंदगी
और 'आषाढ़' की बारिश सी तुम्हारी यादें
जब मुझपर बरसती हैं तो
'सावन' में शिवलिंग पे चढ़े
दूध सा पवित्र हो जाता हूँ
'भादों' तक बरसती
तुम्हारी यादों को सोख लेता हूँ खुदमें
इनमें से कुछ 'आश्विन' में
मेरे दुखों का श्राद्ध कर जाती हैं
तो 'कार्तिक' में
कुछ के साथ दिवाली मन जाती है
'मार्गशीर्ष' में उनमें से कुछ को
गुल्लक में रखकर बचाता हूँ
और 'पौष' के चाँद के साथ
ख़ुशी ख़ुशी ठुरठुराता हूँ
फिर वो गुल्लक फोड़ता हूँ 'माघ' में और
तुम्हारी यादों की डुबकियों से
संगम का पुण्य कमाता हूँ
'फाल्गुन' भर तुम्हारे ही
रंगों में ही रंगा नजर आता हूँ मगर
रंग के साथ साथ
उतर जाती हैं तुम्हारी यादें सारी
तो 'चैत्र' में चित्त अपना
फिर से अशांत पाता हूँ
आते आते 'बैशाख'
पूरी तरह कंगाल होकर
जेठ की दुपहरी के
सूने रस्ते पे फिर से आ जाता हूँ

-तुषारापात®™

Saturday, 14 May 2016

लड़की की शादी

"उस शिल्पी का तो चक्कर चल रहा होगा किसी से...कुछ ठहर गया होगा पेट में...इसीलिए उसकी इतनी गुपचुप और फटाफट शादी कर दी शर्मा लोगों ने... न किसी को बताया...न किसी को बुलाया...ऐसा कहीं होता है क्या" मिसेज दत्ता अपनी काम वाली मालती से अपने मोहल्ले के शर्मा जी के घर की टोह ले रहीं थीं
"मेम साब 'वन्डर' तो हमें भी लगा...पर शर्माइन कहिन कि आर्यसमाजी लोग हैं वो...तो शिल्पी बिटिया की शादी बड़ी सादगी से करिन..सिर्फ उनके घर के लोग और लड़के के घर के लोग इकठ्ठा हुए और चट मँगनी ते पट व्याह" मालती ने बात कुछ यूँ कही जैसे उसे खुद इस बात पे विश्वास न हो फिर आगे अपने मतलब की बात पे आते हुई बोली "मेमसाब लड़की की शादी तो हमको भी करनी है...आपसे कुछ पैसों की मदद हो जाती तो..एक दस हजार रुपैये"
"दस हजाSSSर...बड़ी महंगी शादी कर रही है क्या?" मिसेज दत्ता ने आँखें गोल करते हुए कहा
"अरे मेमसाब लड़के को हीरो हौंडा देना है और कुछ नगद भी...और फिर नाते रिश्तेदारों का न्यौता वगैरह....आप ही नहीं सबसे थोड़ा थोड़ा माँग रहे हैं" मालती ने ऐसे कहा जैसे इतना दहेज़ देना तो ईश्वरीय विधान के तहत आता है
"ठीक है...देखूँगी... देखूँगी..इनसे बात करुँगी" मिसेज दत्ता ने अपना पीछा उससे छुड़ाया और मोहल्ले की अन्य और औरतों से शिल्पी की शादी की 'सत्संगी' चर्चा करने को फोन उठा लिया
उधर शर्मा जी के यहाँ उनकी बेटी शिल्पी की शादी के बाद बड़ी बुआ आई हुई हैं शर्मा जी उनकी पत्नी और उनका बेटा संजय बड़ी बुआ की जली कटी बातें सुन रहे हैं "कुछ लोक लाज बाकी है तुममें शंभुनाथ..कि नहीं... पूरे खानदान में थू थू मची है.. ऐसे कहीं शादी ब्याह होता है..और तुम विमला तुम्हारे मायके की तरफ भी सब लोग हँस रहे हैं..और..ऐ संजय...ए तुम्हारे फूफा ने तो सुनाई सुनाई के जीनो हराम कर दियो" बुआ जी खड़ी बोली से अपने आंचलिक टोन में आते हुए बोलीं
और जैसे प्रेशर कूकर में कड़े आलू उबल के नरम पड़ जाते हैं वैसे ही बुआ जी की साढ़े तीन घंटे की अनवरत 'वंश और खानदान की वीरगाथा' सुनने के बाद शंभुनाथ शर्मा और विमला भी विचलित हो जाते हैं और निर्णय लेते हैं कि एक दिन निश्चित करके शिल्पी और शैलेन्द्र (दामाद) को बुलाकर एक 'आफ्टर मैरिज पार्टी' कर देते हैं वरना लोग क्या कहेंगे हालाँकि संजय को ये प्रस्ताव पसंद नहीं था पर उसकी किसी ने नहीं सुनी हाँ पापा को कुछ समझाते हुए उसने पूरे आयोजन की जिम्मेदारी चतुराई से अपने हाथ में ले ली और एक निश्चित दिन का सभी 'असंतुष्ट' रिश्तेदारों और कॉलोनी वालों को फोन से शाम के 8 बजे का न्यौता दे दिया गया
कार्यक्रम स्थल संजय के एक जिगरी दोस्त के घर की विशाल छत है संजय ने अपना म्यूजिक सिस्टम वहाँ लगा रखा है संगीत तेज है दिवाली पे घर पे लगने वाली झालर से दोस्त के घर को थोड़ा सजा दिया है साढ़े आठ बज रहा है लोग आना शुरू हो जाते हैं और साढ़े नौ तक अधिकतर लोग आ जाते हैं उनकी चाय नमकीन से सेवा करने के बाद संजय माइक लेकर बोलता है
"यहाँ पार्टी में आये वो लोग हैं जो शिल्पी की सादी शादी से बड़ी तकलीफ में हैं...जैसे हमारे प्रिय जीजाजी को तकलीफ है कि वो महँगी शराब पीकर अपनी सालियों के साथ 'कृष्णा नाच' नहीं कर पाये पाये...हमारे आदरणीय बड़े फूफा जी...जो बेचारे अपने और छोटे फूफा के टीके के बराबर पैसे को लेकर उत्पात नहीं कर सके..और हमारी जयपुर वाली पिंकी आंटी जो अपनी ढाई लाख की साड़ी किसी को नहीं दिखा पाईं और हमारे कॉलोनी की प्यारी सारी आंटीयाँ जिनको ये बताने का मौका नहीं मिला कि शिल्पी का रंग दूल्हे से थोड़ा दबा हुआ है" वो सबके बने हुए मुँह देखता है और आगे कहता है
"हमने शादी को दिखावा बना रखा है...अपने स्टेट्स को दिखाने का एक माध्यम...दहेज़ की रकम से पता करते हैं कि दुल्हन और दूल्हे के परिवार का क्या क्लास है..क्या रुतबा है...समाज की इसी मानसिकता के कारण लड़की का पिता...चाहे वो मालती के पति जैसा एक गरीब हो..या दत्ता अंकल जैसा अमीर...अपनी अपनी लड़की की शादी को लेकर इतना दबाव में रहता है कि उसे अपनी लड़की एक बोझ लगने लगती है...कोई मोटरसाइकिल देने के लिए परेशान है तो कोई मर्सिडीज देने के लिए... दहेज़ देना भी आज एक फैशन हो गया है नहीं दिया और कम दिया तो लोग हमें कमजोर न समझ लें..लो स्टैण्डर्ड का न समझ लें वाह हैं न कमाल की बात....और जो आदमी इस वाहियात परम्परा को तोड़ रहा है..उसकी बेटी चरित्रहीन है...या वो कंजूस है...या गरीब है...या उसकी लड़की ने भाग के शादी की है .." कहकर संजय ने अपनी उत्तेजना को गहरी साँस लेकर दबाया और आगे बहुत शांत और मीठे स्वर में बोला
"अभी वेबकैम पे शिल्पी और शैलेन्द्र वीडियो चैट पे होंगे आप लोग अपना अपना आशीर्वाद उन्हें दें...और जाते समय बूँदी के लड्डू का एक एक पैकेट जरूर से लेते जाइयेगा...और हाँ खाना अपने अपने घर जाके खाइयेगा"
इतना सुनते ही शंभुनाथ खिलखिला के हँस दिए..आश्चर्यजनक हैं न लड़की का पिता खुल के हँस रहा था।
-तुषारापात®™

Sunday, 8 May 2016

"हैप्पी मदर्स डे.....ऑन्टी" 

"अ..जी...वो खाना..मिलेगा क्या" मैंने सकुचाते हुए उनसे पूछा

"नए आये हो न?...ढाबे में खाना नहीं मिलेगा तो और क्या मिलेगा" उनकी अनुभवी आँखों ने मेरी सकुचाहट को पढ़ लिया "क्या लगाऊँ ?" उन्होंने मुझसे पूछा

"जी..अ..बस ये लोग जो खा रहे हैं..मतलब दाल रोटी..अ कितने की होगी ये ?" एक दो लोग और थे जो वहाँ खाना खा रहे थे उनकी थाली में दाल रोटी सब्जी चावल देख के मैंने वही खाने को उनसे कह दिया

"20 रुपैये की थाली है...चार रोटी दाल सब्जी और चावल..आराम से बैठो बेटा...लगाती हूँ" उन्होंने बड़ी ममता से कहा और रसोई में चली गईं

"ओह्ह..जी पर एक बात है...मेरे पास सिर्फ...सिर्फ..उन्नीस रूपैये हैं.." मैं बड़ी शर्मिन्दिगी से बोल पाया

"कोई नहीं..बाद में दे देना..अब खाना खाने तो रोज ही आओगे न यहाँ" उन्होंने जाते जाते मुड़के मुस्कुराते हुए वात्सल्य प्रेम में डूबी आवाज में मुझसे कहा

"जी..जी..ठीक है" मैं चैन की साँस लेते हुए बोला उसके बाद मैंने खाना खाया और पैसे देकर अपने कमरे पे आ गया

बिसवाँ के एक गरीब माँ बाप का होनहार मगर बहुत शर्मीला बेटा मैं यहाँ लखनऊ में आगे पढ़ने आया हूँ सेक्टर क्यू के पास बेलिगारद में एक सस्ता कमरा लेकर रह रहा हूँ आज मेरा पहला दिन है, बेलिगारद चौराहे ,वैसे ये है तो तिराहा पर इसे चौराहा क्यों कहते हैं मुझे नहीं पता,पे ही ये आंटी का ढाबा है ढाबा क्या सड़क पे बने एक छोटे से मकान के निचले हिस्से में एक महिला जिन्हें सब ऑन्टी कहते हैं मीनू में सिर्फ दो आइटम वाला ये ढाबा चलाती हैं ढाबे में मेरे जैसे मजबूर लोग ही खाना खाने आते हैं जो सस्ता खाना ढूँढते हैं इसलिए ढाबे की हालत और उसकी कमाई में से कौन ज्यादा खस्ताहाल है ये कहना जरा मुश्किल है

अगले दिन मैं फिर जाता हूँ ढाबे में आंटी मुझे देखकर मुस्कुराती हैं मैं भी हल्का मुस्कुराता हूँ कल के बाद से थोड़ा सा आत्मविश्वास मुझमे आया है "आंटी..खाना लगा दीजिये...पर आपसे एक विनती है..आप थाली से एक रोटी..कम कर दीजिये..क्योंकि मेरे पास उन्नीस रुपैये से ज्यादा खाने पे खर्च करने को नहीं हैं"मैंने सोचा खाने से पहले ही साफ़ साफ़ बता दूँ

हालाँकि मेरा बजट बीस रुपैये का था पर एक रुपैया रोज बचा के जब छुट्टियों में घर जाऊँगा तो अपनी माँ के लिए कुछ उपहार ले जाऊँगा ये सोच के मैंने ये नीति बनाई है

"ठीक है..बैठ जाओ..अभी लगाती हूँ..." कहकर वो रसोई में चली गईं
एक तरफ की दीवार से लगीं मेज कुर्सियां पड़ी थीं और दूसरी ओर एक दीवार पे जमीन से करीबन ढाई फुट ऊँचा एक प्लेटफॉर्म बना था जिसपे चूल्हा बर्तन इत्यादि रखे थे बस वही रसोई थी
मैंने देखा कि आंटी का कद बहुत छोटा है जिसकी वजह से रसोई का प्लेटफॉर्म उनसे थोड़ी ज्यादा ऊँचाई पे पड़ता है और उन्हें खाना बनाने के काम में काफी कठिनाई आ रही है पर मैं चुप रहा थोड़ी देर बाद वो खाने की थाली ले आईं

"अरे...आपतो इसमें चार रोटी ले आईं.. मैंने आपसे कहा..." मैं आगे कुछ कहता कि वो बोल पड़ीं " देखो बेटा.. मैं एक बूढ़ी अकेली औरत बस इसलिए ढाबा चलाती हूँ..कि तुम लोगों के साथ... मेरी भी दो रोटी का इंतजाम हो जाए... अब एक रुपैये के लिए क्या तेरा पेट काटूँगी" कहकर मेरे सर पे हाथ फेरकर वो चली गईं

ऐसे ही रोज ये क्रम चलता रहा रोज मैं ऑन्टी को ऊँचे प्लेटफॉर्म पे बड़ी मुश्किल से काम करते देखता,घुटनो में तकलीफ के कारण बैठ के कोई काम उनसे हो नहीं पाता था,खाना खाता ,उन्नीस रुपये देता कुछ हल्की फुल्की बातें उनसे होती बस ऐसे ही कुछ महीने बीत गए और फिर आज के दिन मैं फिर ढाबे पे आया हूँ

"अरे..आज बड़ी देर कर दी तूने...सब ठीक तो है..बैठ मैं खाना लगाती हूँ" ऑन्टी की आँखों में चिंता थी, मैंने कहा "सब ठीक है और हाँ खाना तो खाऊंगा ही..पर पहले आप रसोई में आओ मेरे साथ..."

उनका हाथ पकड़ के मैं रसोई वाले हिस्से में उन्हें ले आया और उन्हें रसोई के प्लेटफॉर्म की ओर खड़ा किया और फिर उनके पैरों के नीचे पूजापाठ वाली दुकान से खरीदी लकड़ी की एक मजबूत चौकी रखने लगा तो वो आश्चर्य से भर गईं,उसपे खड़ी हुईं और उनकी आँखों ने न जाने कितने वर्षों के बंधे बाँध खोल दिए..

मैंने उनके पैर छुए और कहा "हैप्पी मदर्स डे.....ऑन्टी"

-तुषारापात®™

Saturday, 7 May 2016

चोर

लेखक वो चोर है जो आपके रोज के क्रियाकलापों में से कुछ चुराता है,उसे अपने शब्दों की थैली में बांधकर वापस आपके पास ही बेच जाता है,यही व्यापार उसकी कला है।

-तुषारापात®™

Thursday, 5 May 2016

क्योंकि हर चैनल कुछ कहता है

Aaj Tak की HISTORY को ZOOM करके देखने से यह DISCOVERY निकली है कि किसी BINDAAS SONY कुड़ी की MASTII का प्रतिदिन DOORDARSHAN करने वाला कोई PUNJABI etc मुंडा उस लड़की की MAHUA सी महक के BIG MAGIC में फँसके जब एक दिन हिम्मत करके HOME SHOP 18 से खरीदे चश्में को अपनी नाक पे चढ़ा के 9x JALWA मारता हुआ अपने ZEE की बात उससे बड़ी NAAPTOL से कहता है कि मेरी सूनी ZINDAGI को अगर तुम्हारा SAHARA मिल जाए तो मेरी LIFE OK हो जायेगी और इसमें COLORS भर जाएंगे तो लड़की पहले तो अचानक आये इस RISHTEY को लेकर अपनी AASTHA और SANSKAR का नाटक दिखाते हुए HUNGAMA करती है पर बाद में उस लड़के का प्यार LIVING FOODS ,FAMILY और MONEY आदि SAB कुछ देखकर अकेले से V बनने को राजी होकर अपने साथ उसके STAR PLUS करके,कई EPIC पे SANGEET BHOJPURI बजाती है & DEN ENJOY करके उससे शादी करके अपना CARTOON NETWORK बनाती है ।

-तुषारापात®™

Tuesday, 3 May 2016

बिंगो और प्रकृति दर्शन

आज एक बहुत अनोखी चीज देखी,जितनी चमत्कारिक उतनी ही आसान ,एक ऐसी दैनिक घटना,जो रोज होती है पर जिसे मैं बहुत कम ही देख पाता हूँ,बहुत दिनों के बाद आज मैंने सूर्य को उगते देखा और ये अनोखी घटना तब हुई जब रात भर लिखते रहने के कारण मैं सुबह तक जाग रहा था कि तभी साढ़े पाँच के बजे के आसपास मेरा कुत्ता बिंगो,कमरे में दरवाजे को धकेलते हुए दाखिल हुआ और खुदको लघुशंका दीर्घशंका निपटारे के लिए बाहर ले चलने का मुझे आदेश देने लगा वैसे ये काम रोज पत्नी जी का रहता है पर आज वो थोड़ा देर से जागीं तो बिंगो साहब ने स्त्री पुरुष का भेद न करते हुए मुझे अपने इस काम के लिए चुना।

बिंगो को पट्टा पहना कर चेन लगाई और गेट खोलकर बाहर सड़क पे जैसे ही आया तो मंद मंद बहती शीतल पवन फूलों की कमर को सहलाती हुई कस्तूरी सी महक लिए मेरे रोम रोम में समा गई ऐसा लगा कि जैसे वायु ने मुझमे व्याप्त प्राण को बढ़ा दिया, सड़क पे दूर बाएं हाथ पे बने मकानों के बीच सृष्टि के साक्षात देवता भगवान भास्कर मुझ रात्रिचर को भैरव जी की सवारी लिए विचित्र नजरो से देखते हुए अपना आकार बढ़ा रहे थे पेड़ पौधे झूम रहे थे चिड़ियाँ मानो उनके स्वागत में मंगल गान कर रहीं थीं पूरी प्रकृति प्रसन्नता की मंद धूप में नहा रही थी और पृथ्वी का दैनिक जीवन गति लेने लग गया था।

तभी से सोच रहा हूँ कि विकास के नाम पे हम प्रकृति से कितना कट गए हैं हमने रात्रि को तो जीत लिया बिजली का आविष्कार करके मगर अपने लिए रोग और उलटी दिनचर्या का शत्रु भी प्रबल कर दिया और एक तरफ ये बिंगो है जो अपनी दिनचर्या नियमित रखता है फेसबुक टीवी विडियोगेम इत्यादि का कोई चस्का नहीं और उठने के लिए कोई अलार्म भी नहीं लगाता फिर भी रोज चार बजे उठ जाता है एक पशु होकर वो कितना अनुशाषित है और मैं एक बुद्धिजीवी मनुष्य होकर भी प्राकृतिक अनुशाषन का रत्ती भर पालन नहीं करता । शायद यही कारण है कि श्वान शास्त्रों में वर्णित अपनी पूर्ण औसत आयु 12 वर्ष से दो चार वर्ष अधिक ही जीता है और हम मनुष्य अपनी 120 वर्ष की आयु का 80 वाँ वर्ष भी मुश्किल से देख पाते हैं।

इस विषय पे बहुत अधिक लिख सकता हूँ पर मुझे पूरी उम्मीद है कि मेरे शब्दों से आप मूल भाव को समझ लेंगे और ये सिर्फ मेरी नहीं हममें से बहुतों की कहानी है अभी गर्मी की छुटियों में हममें से बहुत लोग किसी हिल स्टेशन पे जाकर पहाड़ बर्फ नदी का लुत्फ़ ऐसे उठाएंगे जैसे ये सारी चीजें धरती पे अभी अभी प्रकट हुईं हों और किसी अन्य दुनिया की हों जबकि सच ये है कि इनके बीच हम उत्पन्न और विकसित हुए और बाद में इनसे ही दूर हो गए दूर होने का मतलब इनसे विमुख होने से है।

हमने नदी को पानी की बोतल में तो कैद कर लिया पर नदी के बहते जल की कल कल ध्वनि जिससे हमारी आत्मा की प्यास मिटती है उससे खुद को वंचित कर लिया। पता नहीं कैसे हम सब इस विकास की अनिवार्य सी प्रक्रिया में फंस गए हैं शायद ईश्वर का ये ही तरीका है हमें वापस अपने पास बुलाने का ।

और हाँ बिंगो को अपनी नियमित दिनचर्या और प्रकृति से जुड़ाव का एक फायदा और भी है वो ये कि उसे खाने में अगर कोई चीज पसंद नहीं आती तो वो पूरे आत्मविश्वास से न करके छोड़ सकता है पर ये कारनामा डाइनिंग टेबल पे बैठककर शायद ही कभी मैं कर पाऊँ ।

-तुषारापात®™

Tuesday, 26 April 2016

लाल चूड़ियाँ

"बापू अबकी जो फसल हुइहए..तो हमका लाल चूड़ी दिलाय देहउ..के बापू..दखिन देविन के मेला महियां..अब कित्ते दिन बाकी हईं...हमऊ मेला सेरे अम्मा जइसि लालह चूड़ीयाँ लीबो" कुन्नो ने अपनी मासूमियत से भरी आवाज में खिलावन से कहा

"बिटिया..अबहिं ढेर दिन हईं..मेला महियां..बस भोलेनाथ सेरे या प्रार्थना करउ...अबकी पानी टाइम सेरे गिर गिर जावइ..तो तुम्हरे लिए चूड़ी का..लाल फिराकउ आई जहिहई" खिलावन हाथ धोते हुए बोला और अपनी 11 साल की बेटी कुन्नो के पास आकर खाने की पोटली खोलने लगा

जितने दिन वो खेत में काम करता था कुन्नो आज ही की तरह रोज दोपहर में उसके लिए खाना लाती थी खिलावन की बीवी सुरमई घर से रोटी साग इत्यादि की एक पोटली बना के कुन्नो के हाथ भेज देती थी और कुन्नो पूरे गाँव का चक्कर लगाती उछलती खेलती खेत पहुँच जाया करती थी

खिलावन ने खाना खाकर दूर खेलती कुन्नो को बुलाया "बिटिया...ओ.. बिटिया.. लेव..बर्तन लइके घर चली जाव.." कुन्नो दौड़ के उसके पास आ जाती है और अपने दोनों हाथों में जमा किये हुए पत्थर फेंकती है और खिलावन से पोटली ले लेती है खिलावन उसके सर पे प्यार से हाथ फेरता है और बनावटी गुस्से में कहता है "अपनी अम्मा से कहेउ...थोड़ो नमक कम झोंकईं साग महिया.."

शाम होते ही खिलावन घर पहुँचता है सुरमई उसके हाथ पैर धुलवाती है और धुला हुआ साफ गमझा उसे देकर चाय बनाने लगती है
"सुमइ..या सारी चाह चूल्हो पहियां बनन पर बड़ो टाइम लेत हई.. भोलेनाथ केरी क्रिपा हुई गई यइ बार..तो गेस लाइ दिबो.." चारपाई पे बैठ बीड़ी सुलगाते हुए उसने सुरमई से कहा

चाय छानते हुए सुरमई बोली "यउ सब हवाई बात छोड़उ..कल तहसील जाइकेरे बेंक सेरे कुछ पइसा निकाल लाउ...एक पाई नाइ हई.. हमाये पास.."उसने चाय का गिलास खिलावन की ओर बढ़ाया

"बेंक महियां तुम्हरे बाप पइसा भेजत हईं का..कित्ती बार कहो..चाह पियत टाइम..दुखड़ा न रोवउ करइ" खिलावन बैंक में बचे बहुत कम रुपैयों का ध्यान करते हुए झल्लाके बोला और चाय का गिलास लेकर चारपाई के पाये के पास रख देता है और एक और बीड़ी सुलगाता है

ऐसे ही एक के बाद एक दिन गुजरते जाते हैं आषाढ़ सावन भादों सब महीनो में नाम की भी बारिश नहीं होती है पूरे प्रदेश में सूखा पड़ा है मगर खिलावन के बैंक का जमा सारा धन नदी की तरह बहता जाता है ,भुखमरी से बचने के लिए गाय बैल समेत जो भी कुछ बेचा जा सकता था बेच दिया जाता है और कुन्नो भी बीमार पड़ जाती है उसकी दवा-दारू तक भी नहीं हो पाती है

"कहाँ जाइ रहि हउ..इहाँ बिटिया भूखी हई..और तुम उहाँ महाटीला पर दूध बहाये जाइ रहि हउ.. बैठउ..चुपचाप" सुरमई को एक छोटे सी गिलसिया में दूध लेकर शिव मंदिर जाते देख बिलबिलाते हुए खिलावन ने कहा

"पंडित जी कहिन हईं.. अकाल केरो दोष हई.. कोई कुँआरी कन्या केरी बलि लइके ही जहिहई..कहीं कुन्नो.....यहि लिये जाइ रहेन.. हमाओ कलेजो पत्थर केरो नाइ हई..जो बिटिया कहियां भूखो रखके..दूध बहान चलि जइबो" सुरमई कुन्नो के पास आकर बैठ गई और रोते रोते बोली

"अरे..पूरो सावन..गिलास भर भर दूध भोलेनाथ डकार गए..गंगा जी केरी एक बूँद नाइ खोलिन अपने बालन सेरे ..खुद तो पत्थर केरे बने बइठे हईं.. अउर हमइ कलेजा दई दीन माँ बाप केरो" खिलावन ने जैसे अपने सीने की चीत्कार खोल दी, गरीब आदमी अपना गुस्सा या तो अपनी पत्नी पे दिखा पाता है या भगवान को कोस कोस के निकालता है

कुन्नो भूख और बीमारी के कारण पीली पड़ गई है बीच बीच में बेहोश सी हो जाती है जब होश आता है तो कभी कभी बड़बड़ाती है पर वो 11 साल की लड़की समझदारी का स्वांग भी करती दिखती है और अपनी अम्मा बापू को परेशान देखकर इधर उधर की बात करके उन्हें बहलाने की कोशिश करती है "बापू तुमका तो सब अन्नदाता काहत हईं फिर भगवान तो तुमसे छोटो हुओ न"

"बिटिया..यही विडम्बना हई..इहाँ जो अन्न उपजात हई वो किसान हई ..अउर जो भूख उपजात हई वउ भगवान हई" अपनी आँखों में आये पानी को वो रोक न सका और कुन्नो का हाथ पकड़ कर बैठ गया एक बेबस पिता अपने सामने अपनी मासूम बेटी को मरता देख रहा था

अचानक से कुन्नो की तबियत बिगड़ने लगती है वो बड़बड़ाने लगती है.."अम्मा..अम्मा...बापू..पू...लाल चूड़ी...छन छन...छन छन ..लाल..चू.."और उसके प्राण चूड़ी पूरा बोले बगैर ही निकल जाते हैं

"आअह्ह...आआह्ह.. हाय हमरे महादेव...यउ.. का कर दिउ.. हाय हमरी बिटिया...कुन्नोSSSSSS............................................" एक माँ की छाती फट जाती है अपनी बच्ची को मिटटी होते देख उसका रूदन शिव के तांडव से भी विकराल है खिलावन सन्न रह जाता है उसकी लाल आँखें नम हैं पर वो धारा नहीं बहा रहीं हैं

करीबन आधे घंटे बैठा वो एक टक मृत कुन्नो को देखता रहता है और सुरमई का आकाशीय बिजली सा रूदन सुनता रहता है फिर अचानक से उठता है एक फटी पुरानी सी चादर में घर के टेढ़े मेढ़े सारे धातु के बर्तन बांधता है और घर से निकल जाता है सुरमई को होश नहीं था पर इतना समझ रही थी कि शायद वो अंतिम संस्कार की लकड़ी के लिए बर्तन बेचने गया है

काफी देर के बाद हाथ में फावड़ा लिए खिलावन आता है और कुन्नो के मृत शरीर को सुरमई के हाथों से छीन कर अपने काँधे पे रखकर बाहर जाने लगता है सुरमई रोते चीखते हाय दइया हमरी बिटिया कहते कहते उसके पीछे दौड़ती है

खिलावन अपने खेत में पहुँचता है और वहाँ पहले से खोदे हुए एक विशाल गढ्ढे में कुन्नो के मृत शरीर को लिटाता है और अपने कुर्ते की जेब से एक पैकेट निकालता है उसमे बर्तन बेच कर लाइ हुईं....बाजार की सबसे महंगी लाल चूड़ियाँ थीं...वह फफक फफक के रोते रोते अपनी बच्ची कुन्नो के दोनों हाथों में चूड़ियाँ पहना देता है....पास खड़ी सुरमई चीख चीख के विलाप कर रही है अपने हाथ पैर पटक रही है पर खिलावन एक मशीनी व्यक्ति की तरह फावड़े से मिटटी डाल डाल के उस गढ्ढे को भरता जाता है

गड्ढे को भर के वो फावड़ा आसमान की ओर करके जोर जोर से चिल्लाता है "अब तउ तुम्हरे कलेजा महियां ठंडक पड़ गई हुइए...दूध के साथ हमाइ बिटिया कहिहउँ हजम कर गेउ तुम..अबहूँ शिराप पूरो नाइ हुओ का तुम्हारो...हाँ कइसे हुइए..किसान केरे इहाँ कबहुँ सुखो नाइ पड़त..काहे सेरे किसान केरी आँखे हमेशा गीली राहत हईं...."
आसमान भगवान् के इंसाफ की तरह ही पूरा साफ है एक भी बादल का कोई नामोनिशान तक नहीं......दूर कहीं से दखिन देवी के मन्दिर से कुछ स्त्रियों के भजन की आवाज आ रही है "लाली लाली लाल चुनरिया....... कैसे न माँ को भावे...................................................."

-तुषारापात®™

Friday, 22 April 2016

विचारधारा

किसी फोटो में पत्नी के बाएं दायें खड़ी उसकी दो  सुन्दर सहेलियों में से आप जिसे ज्यादा ध्यान से देखते हैं उससे आपकी विचारधारा स्पष्ट होती है कि आप दक्षिणपंथी हैं या वामपंथी
और यदि आप दोनों सहेलियों को छोड़ के पत्नी को ही देखते हैं तो आप कट्टरपंथी हैं
तुषारापात®™


Thursday, 21 April 2016

लिवर ट्रांसप्लांट

पचपन साल की विनीता गुर्दे की एक गंभीर बीमारी से लड़ रही थी और उसके साथ लखनऊ के मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर भी इस लड़ाई में अपनी पूरी ताकत से लगे थे,विनीता का इलाज बहुत लंबा चला जिसके दौरान उसने बहुत कष्ट उठाये पर कल वो जिंदगी और मौत के इस खेल में मौत के पाले में चली गई,डॉक्टरों ने उसे ब्रेन डेड घोषित कर दिया ।

विनीता के भाई जो खुद एक डॉक्टर हैं उन्होंने विनीता के अंगदान का निर्णय लिया उन्होंने सोचा कि उनकी बहन ने तो बहुत कष्ट उठाये पर उसके मृत शरीर के कई अंग अभी जिन्दा हैं जो किसी और तड़पते मरीज की जान बचा सकते हैं पता चला कि दिल्ली में एक मरीज की जान बचाने के लिए लिवर ट्रांसप्लांट की जरूरत है तो डॉक्टर्स ने विनीता का लिवर निकाल कर उसे दिल्ली भिजवाने के लिए लखनऊ एअरपोर्ट भेजा ।

चूँकि निकाले गए लिवर को सिर्फ 6 घंटे तक ही सुरक्षित रखा जा सकता है तो इसको जल्दी से जल्दी दिल्ली पहुँचाने के लिए मेडिकल कॉलेज के एक अस्पताल से लखनऊ एयरपोर्ट तक के 28 किलोमीटर के अति व्यस्त ट्रैफिक वाले रूट पर 'ग्रीन कॉरिडोर' बना कर मात्र 24 मिनट में भेजा गया जो अपने आप में बहुत बड़ी बात है

ग्रीन कॉरिडोर मानव अंग को एक निश्चित समय के भीतर एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजने के लिए बनाया जाता है। पुलिस एम्बुलेंस के रूट को खाली करवाती है एम्बुलेंस के आगे आगे पुलिस वाहन चलते हैं जिससे स्पीड में ब्रेक न लगे, इसी प्रक्रिया को 'ग्रीन कॉरिडोर' कहा जाता है ।
यह सुविधा दिल्ली,मुम्बई,चेन्नई,कोच्ची और बेंगलुरु में उपलब्ध है और लखनऊ में यह चौथी बार कल किया गया। आज के पेपर में ये खबर बड़ी हेडिंग के साथ है 'लिविर बचाने को 24 मिनट ठहर गया लखनऊ'।

मैं विनीता की आत्मा की शांति की प्रार्थना करता हूँ उनके डॉक्टर भाई के इस निर्णय से लोगों में अंगदान की जागरूकता बढ़ेगी और कष्ट में डूबे मरीजों को बीमारी से छुटकारा मिल सकेगा उनकी इस सोच के लिए सलाम करता हूँ साथ ही डॉक्टर्स की टीम जिन्होंने अंग प्रत्यारोपण में अपनी महारत बनाई की जितनी तारीफ की जाय उतनी कम है और साथ ही साथ लखनऊ पुलिस और प्रशाशन और यहाँ के नागरिकों को साधुवाद!

पर एक बात मुझे बार बार खटक रही है कि इस पूरी प्रक्रिया में क्या हेलीकॉप्टर का प्रयोग नहीं किया जा सकता था? 24 मिनट तक लगने वाले जाम से शहर की ट्रैफिक व्यवस्था अस्त व्यस्त हुई आखिर सड़क पे भी न जाने कितने लोग अपने कितने ही जरूरी काम से कहीं जा रहे होंगे मान लो उस भीड़ में ही कोई गंभीर बीमार अस्पताल जाने को भाग रहा हो और ये होने से जाम में फंस के रह गया हो और अपने जीवन को खो बैठा हो तो?

नेताओं के फर्जी दौरों उनकी मीटिंग,रैलियों के लिए चुटकियों पे हेलीकॉप्टर उपलब्ध रहते हैं परन्तु आम जनता के ऐसे केस के लिए भी क्या एक हेलिकॉप्टर उपलब्ध नहीं कराया जा सकता था? मेडिकल कॉलेज को ऐसे समय के लिए अपने लिए हेलिकॉप्टर आदि की व्यवस्था की माँग करनी चाहिए
बड़े बड़े मुद्दों के बीच ऐसे ही कितने छोटे पर बहुत अहम मुद्दे हम सा छोड़े रहते हैं जिनका कहीं जिक्र नहीं होता जिनपे कोई प्रश्न नहीं उठाता पर मैं आदत से मजबूर हूँ कुछ उल्टी बात ढूंढ ही लेता हूँ हर सीधी बात में ।

-तुषारापात®™

Friday, 15 April 2016

राम राम बैंक

क्या आप 32 साल पुराने किसी ऐसे बैंक को जानते हैं जिसमें न तो कोई रुपैये पैसे जमा करता है और न ही निकालता है मतलब उस बैंक में आर्थिक लेनदेन जैसा कुछ होता ही नहीं..कोई चेकबुक,विड्राल फॉर्म एटीएम कार्ड जैसा कुछ भी नहीं..फिर भी बैंक है और पिछले 32 वर्षों से चल रहा है...सुनने में अजीब लगता है न...?
आइये आपको साल के 365 दिन खुलने वाले और पूरे चौबीसों घण्टे काम करने वाले इस बैंक की सैर पे ले चलता हूँ

लखनऊ में अलीगंज और जानकीपुरम इलाकों के ठीक बीच में अर्थात अलीगंज और जानकीपुरम की सीमा रेखा पर एक चौराहा है जिसका नाम है 'राम-राम बैंक चौराहा' अब अगर चौराहा किसी बैंक के नाम पे है तो ये प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि चौराहे पे या उसके आसपास कोई इस नाम का बैंक भी होगा..पर इस बैंक के विचित्र नाम से पहले से असमंजस में फँसा व्यक्ति जब चौराहे पे बने शौपिंग काम्प्लेक्स और चारों ओर इस बैंक को ढूँढने का प्रयास करता है तो वो और चक्कर में पड़ जाता है कि ऐसा कोई बैंक कहीं दिख ही नहीँ रहा

दरअसल उस चौराहे से थोड़ा हटकर सीतापुर रोड के पास सेक्टर ए में स्थित है ये अनोखा बैंक जहाँ पैसा नहीं बल्कि उससे भी बहुत कीमती निधि राम नाम लेखन की पुस्तिका जमा होती है।अब तक इस राम राम बैंक में राम नाम के 80 करोड़ शब्द लिखकर श्रद्धालु जमा कर चुके हैं

इसके संस्थापक हैं श्री लवलेश तिवारी जिन्होंने 32 वर्ष पहले इस बैंक की स्थापना की थी उन्होंने बताया कि अपने शहर के हजारों लोग तो यहाँ राम नाम की पुस्तिका भर के जमा करते ही हैं बल्कि बहुत दूर दूर से लोग अपने हाथों से लिखकर राम नाम के हजारों शब्दों से भरी पत्रिकाएं यहाँ डाक द्वारा भेजते हैं जिसमें एक क्रिकेटर गौतम गंभीर के पिता जी भी हैं
साथ ही उन्होंने ये भी बताया कि ये सारी प्रक्रिया निशुल्क है ।

चौराहे का नाम राम राम बैंक कैसे पड़ा इसका भी मजेदार किस्सा है वो बताते हैं कि शुरू शुरू में हमने राम राम बैंक का बोर्ड चौराहे पे लगाया पर नगर निगम उसे हटा देता था इस तरह ये प्रक्रिया कई बार हुई कई बार बोर्ड लगा कई बार हटा,इसी लगने हटने की प्रक्रिया से इसे लोकप्रियता मिल गई और ये चौराहा राम राम बैंक चौराहा के नाम से प्रसिद्ध हो गया और अब नगर निगम खुद इसे अपने रिकॉर्ड में यही लिखता है।

इस बैंक में हिन्दू मुस्लिम सभी धर्म के लोग अपने अपने राम नाम जमा कराते हैं यह अनोखा बैंक सभी धर्मों के लोगों के लिए आदर व श्रद्धा का केंद्र है और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है साथ ही गरीब से गरीब आदमी का भी यहाँ खाता है और उसके खाते में लाखों राम जमा हैं
सोचिये जिसके खाते में हजारों लाखों राम जमा हों क्या उसकी पुण्य की चेक कभी बाउंस हो सकती है नहीं कभी नहीं ,सच है राम से बड़ा राम का नाम।

इसी के साथ सभी बड़े बुजर्गों को प्रणाम करते हुए आप सभी को रामनवमी की अनेकों शुभकामनाएं देता हूँ और प्रार्थना करता हूँ हम सबमें राम के चित्र की बजाय राम के चरित्र का जन्म हो ।

-तुषारापात®™

Monday, 11 April 2016

हाशिये का तिरेसठ

"भुला चुका था तुम्हें..हमेशा के लिए...बहला लिया था खुद को ये यकीन दिलाकर कि कुछ कलम ऐसे ही सूख जाते हैं..उन्हें कागज नहीं मिलता जिंदगी की रंगीन इबारत लिखने को...पर जब दोबारा से तुम्हें देखा...मेरे अंदर की स्याही उबलने लगी..आयत..बिखर जाना चाहता हूँ...तुम्हारे पन्नों पे..." दोनों कन्धों से उसे पकड़ते हुए मैंने कहा

"संभालो खुद को..वेद...वेद..लीव मी" उसने खुद को मुझसे छुड़ाया और सामने वाले सोफे पे जाकर बैठ गई और गहरी साँस लेकर आगे बोली "किसी और की इबारतों से भरे कागज पे जब.... स्याही बिखरती है तो नई इबारत नहीं लिखती....कागज का मुँह काला होता है.."

मैंने देखा उसने ये कहते हुए अपने ऊपर के होंठ को दाँत से दबाया ये उसके कशमकश में होने की निशानी हुआ करती थी वो केटल से चाय कप में निकालने लगी,हदीस आज आउट ऑफ़ स्टेशन था..ऑफिस से मैं आयत के घर ही आ गया था वो भी उससे..पूछे बिना

"और कब तक यूँ अनछपे फ्रस्ट्रेटेड राइटर से घूमते रहोगे..तलाश करो..तुम्हें बहुत से कोरे कागज मिल जाएंगे...किसी एक पे अपनी जिंदगी की गजल लिखो..कविता लिखो....आगे बढ़ो पुरानी बातों से...अब इस कागज पे किसी और की कहानी है"अपने गले पे आये पसीने की बूँदे उसने अपनी साड़ी से पोछी और मुझे चाय का कप पकड़ाते हुए कहा

"कोरे कागज...हा हा हा...आयत.. अधूरी कहानियों को कोरे कागज नहीं ....बासी कागज मिलते हैं... जानती हो...मुझे ये बात बहुत तकलीफ देती है कि इस कागज ने मुझे हाशिये पे डाल दिया" मैंने उसकी ओर ऊँगली का इशारा किया और उसपे नजर जमाये हुए चाय का एक सिप लगाया

अपनी गहरी आँखों में उसने मेरी आँखों को डुबाये रखा और भीगी सी आवाज में बोली "वेद..हाशिये पे लिखा हुआ एक छोटा सा शब्द या नम्बर...अक्सर कागज पे लिखी इबारतों की पहचान होता है..उसी से पता चलता है क्या पहला है क्या दूसरा"

"तो मैं तुम्हारी जिंदगी में..बस एक सीरियल नम्बर हूँ..तुम नहीं समझोगी आयत....इस सीरियल नम्बर को कितनी तकलीफ होती है..जब वो हाशिये से देखता है..किसी और कलम को इस कागज पे चलते हुए.." वो मेरी बात सुनके कुछ नहीं बोली,सोफे से उठकर ड्राइंग रूम के खुले दरवाजे की तरफ खड़ी हो गई दरवाजे की बाईं तरफ की दीवार की ओर सरका हुआ पर्दा पंखे की हवा से उड़ रहा था मैं उसके पास गया और दरवाजे की तरफ जिधर पर्दा था उसे खींच लिया,दरवाजे के पल्ले के पीछे वाली दीवार के सहारे उसे टिकाकर उसके सामने सट के ऐसे खड़ा हो गया जैसे हाशिये में ६३ लिखा हो

"याद करो आयत..ऐसे ही कितने ६३..हम बनाया करते थे.." उसके होंठो के बहुत पास जाकर मैंने कहा ,उसकी साँसे तेज होने लगीं..होंठ सुर्ख होने लगे..कांपती हुई..मेरी आँच से खुद को पिघलने से बचाते हुए उसने मुझे जोर का धक्का दिया..और गुस्से से भरी रूआंसी आवाज में बोली "अक्सर ६३ बनाने वाले ही ३६ बनकर रह जाते हैं" कहकर वो अंदर के कमरे में चली गई

मैंने दरवाजे के बंद होने की तेज आवाज सुनी,उसके घर से बाहर निकल के सड़क पे आया और एक सिगरेट सुलगाई,एक गहरा कश लगाया
धुएं का एक छल्ला छोड़ा और काफी देर तक उस छल्ले को बड़ा होते और ऊपर उठते हुए देखता रहा..बिल्कुल मेरी ही तरह दिख रहा था वो खाली और शून्य..शायद यही मेरा सीरियल नम्बर था..मैं मुस्कुराया और कार में आकर बैठ गया।

-तुषारापात®™

Friday, 8 April 2016

पाकिस्तानी ऊँट

हर भारतीय बच्चे की तरह बचपन में मुझे भी क्रिकेट खेलने का बहुत शौक हुआ करता था पर मेरे पास न खुद का बल्ला होता था और न ही वो पीली हरी कॉस्को वाली टेनिस बॉल,जो उन दिनों एक ऊँचे स्टैण्डर्ड की तरह देखी जाती थी तो खेलने के लिए हम मित्रों के रहमोकरम पे रहते थे और आप मेंसे जिन्होंने गली क्रिकेट खेला होगा वो बहुत अच्छी तरह जानते होंगे कि गली क्रिकेट में जिस लड़के का बैट होता है उसकी कुछ न कुछ दादागिरी पूरे खेल के दौरान बनी ही रहती है

फिर भी मेरे जैसे लोग तो चाहिए ही होते हैं इस खेल में जो फील्डिंग के और इधर उधर गई गेंद को उठा लाने के बड़े काम आते हैं और हमारे जैसों की बैटिंग भी सबसे अंत में आती है फिर भी हम वसुधैव कुटुंबकम की नीति के तहत खेला करते थे इसके अतिरिक्त और चारा भी नहीं हुआ करता था

ऐसे ही मुझे याद आता है मेरा एक मित्र हुआ करता था जिसके साथ अपने घर की गैलरी में मैं क्रिकेट खेला करता था सिर्फ वो और मैं हुआ करते थे खेल में ,गैलरी से बाहर गेंद जाने की संभावना न के बराबर और पीछे तो दीवार ही हुआ करती थी जिसपे कोयले या किसी पत्थर के टुकड़े से तीन स्टम्प का वो ऐतिहासिक निशान हुआ करता था जो परमानेंट बना रहता था आखिर रोज ही खेलते जो थे

अब चूँकि बैट भी मेरे मित्र का और बॉल भी उसकी तो एक सर्वमान्य नियम ये था ही कि वो पहले बैटिंग करेगा कभी हम कुछ ओवर्स की सीमा बना के खेलते तो कभी अनलिमिटेड ओवर्स (टेस्ट क्रिकेट की तरह) का खेल हुआ करता था इसमें लिमिटेड ओवर्स के खेल में तो मेरी बैटिंग जैसे तैसे आ जाती थी हालाँकि उसमें भी मेरा मित्र तीन चार बार से पहले खुद को आउट नहीं घोषित करता था कभी गेंद स्टंप के ऊपर लगी कभी बाएं से बाहर लगी आदि आदि लेकिन असली समस्या आती थी जब हम अनलिमिटेड यानी जब तक मित्र या मैं आउट नहीं होऊँगा तब तक दूसरे को बैटिंग नहीं मिलेगी अब मेरा मित्र पहले बैटिंग करता और चूँकि वो ही अंपायर होता तो मैं घंटों बॉलिंग करते रहता और वो खेलता रहता आउट होने पर भी आउट नहीं मानता फलतः मेरी बैटिंग आने के कोई आसार नहीं बनते थे और जब वो खेलते खेलते ऊब जाता था या थक जाता था तो बगैर मेरी बैटिंग दिए अपना बैट बॉल लेकर चला जाता था कि मम्मी बुला रही है या पापा गुस्सा रहे होंगे और मैं ठगा सा रह जाता था

ऐसा मेरे साथ कई बार होता था फिर भी मैं उसके साथ खेला करता था अब आप सोच रहे होंगे कि भाई तुषार सिंह तुम तो बहुत बड़े बेवकूफ थे जब जानते हो कि वो हर बार तुम्हारे साथ ऐसा ही करता है तो तुम उसके साथ खेलते ही क्यों थे ?

इसका उत्तर मेरे पास नहीं है...पर जरा रुकिए...मैं आपका ये प्रश्न भारत सरकार की ओर भेजता हूँ...

"हाँ तो भाई भारत सरकार..पठानकोट आतंकी हमले की जाँच के लिए पाकिस्तान के कुछ 'विशेषज्ञ' यहाँ आये..खाये पिए और जाँच के नाम पे कुछ स्वांग कर वापस चले गए..और जब तुम्हें बुलाने की बारी आई तो हमेशा की तरह ठेंगा दिखा दिया...और तुम मेरी तरह ठगे रह गए तो साहब मेरे पास तो बैट बॉल खुद का नहीं हुआ करता था...पर ये बताओ तुम्हें किस चीज की कमी है..जो तुम बारबार खुद को ठगवाते रहते है?"

#पाकिस्तान_का_ऊँट_हमेशा_एक_ही_करवट_बैठता_है
-तुषारापात®™