Tuesday, 3 May 2016

बिंगो और प्रकृति दर्शन

आज एक बहुत अनोखी चीज देखी,जितनी चमत्कारिक उतनी ही आसान ,एक ऐसी दैनिक घटना,जो रोज होती है पर जिसे मैं बहुत कम ही देख पाता हूँ,बहुत दिनों के बाद आज मैंने सूर्य को उगते देखा और ये अनोखी घटना तब हुई जब रात भर लिखते रहने के कारण मैं सुबह तक जाग रहा था कि तभी साढ़े पाँच के बजे के आसपास मेरा कुत्ता बिंगो,कमरे में दरवाजे को धकेलते हुए दाखिल हुआ और खुदको लघुशंका दीर्घशंका निपटारे के लिए बाहर ले चलने का मुझे आदेश देने लगा वैसे ये काम रोज पत्नी जी का रहता है पर आज वो थोड़ा देर से जागीं तो बिंगो साहब ने स्त्री पुरुष का भेद न करते हुए मुझे अपने इस काम के लिए चुना।

बिंगो को पट्टा पहना कर चेन लगाई और गेट खोलकर बाहर सड़क पे जैसे ही आया तो मंद मंद बहती शीतल पवन फूलों की कमर को सहलाती हुई कस्तूरी सी महक लिए मेरे रोम रोम में समा गई ऐसा लगा कि जैसे वायु ने मुझमे व्याप्त प्राण को बढ़ा दिया, सड़क पे दूर बाएं हाथ पे बने मकानों के बीच सृष्टि के साक्षात देवता भगवान भास्कर मुझ रात्रिचर को भैरव जी की सवारी लिए विचित्र नजरो से देखते हुए अपना आकार बढ़ा रहे थे पेड़ पौधे झूम रहे थे चिड़ियाँ मानो उनके स्वागत में मंगल गान कर रहीं थीं पूरी प्रकृति प्रसन्नता की मंद धूप में नहा रही थी और पृथ्वी का दैनिक जीवन गति लेने लग गया था।

तभी से सोच रहा हूँ कि विकास के नाम पे हम प्रकृति से कितना कट गए हैं हमने रात्रि को तो जीत लिया बिजली का आविष्कार करके मगर अपने लिए रोग और उलटी दिनचर्या का शत्रु भी प्रबल कर दिया और एक तरफ ये बिंगो है जो अपनी दिनचर्या नियमित रखता है फेसबुक टीवी विडियोगेम इत्यादि का कोई चस्का नहीं और उठने के लिए कोई अलार्म भी नहीं लगाता फिर भी रोज चार बजे उठ जाता है एक पशु होकर वो कितना अनुशाषित है और मैं एक बुद्धिजीवी मनुष्य होकर भी प्राकृतिक अनुशाषन का रत्ती भर पालन नहीं करता । शायद यही कारण है कि श्वान शास्त्रों में वर्णित अपनी पूर्ण औसत आयु 12 वर्ष से दो चार वर्ष अधिक ही जीता है और हम मनुष्य अपनी 120 वर्ष की आयु का 80 वाँ वर्ष भी मुश्किल से देख पाते हैं।

इस विषय पे बहुत अधिक लिख सकता हूँ पर मुझे पूरी उम्मीद है कि मेरे शब्दों से आप मूल भाव को समझ लेंगे और ये सिर्फ मेरी नहीं हममें से बहुतों की कहानी है अभी गर्मी की छुटियों में हममें से बहुत लोग किसी हिल स्टेशन पे जाकर पहाड़ बर्फ नदी का लुत्फ़ ऐसे उठाएंगे जैसे ये सारी चीजें धरती पे अभी अभी प्रकट हुईं हों और किसी अन्य दुनिया की हों जबकि सच ये है कि इनके बीच हम उत्पन्न और विकसित हुए और बाद में इनसे ही दूर हो गए दूर होने का मतलब इनसे विमुख होने से है।

हमने नदी को पानी की बोतल में तो कैद कर लिया पर नदी के बहते जल की कल कल ध्वनि जिससे हमारी आत्मा की प्यास मिटती है उससे खुद को वंचित कर लिया। पता नहीं कैसे हम सब इस विकास की अनिवार्य सी प्रक्रिया में फंस गए हैं शायद ईश्वर का ये ही तरीका है हमें वापस अपने पास बुलाने का ।

और हाँ बिंगो को अपनी नियमित दिनचर्या और प्रकृति से जुड़ाव का एक फायदा और भी है वो ये कि उसे खाने में अगर कोई चीज पसंद नहीं आती तो वो पूरे आत्मविश्वास से न करके छोड़ सकता है पर ये कारनामा डाइनिंग टेबल पे बैठककर शायद ही कभी मैं कर पाऊँ ।

-तुषारापात®™

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