Tuesday, 5 January 2016

विक्रम और बेताल: लोकतंत्र

"विक्रम..फिर आ गया तू छप्पन इंच की छाती लेकर....अपनी हठ छोड़ दे..तू मुझे नहीं ले जा पायेगा..."पेड़ पे उलटे लटके लटके ही बेताल बोला

विक्रमादित्य ने जरा सी देर में ही ही उसे पकड़ लिया और सीधा करके अपने कंधे पे बिठा लिया और अपने राज्य की तरफ चल दिए,आदतानुसार बेताल एक नई कथा सुनाने लगा:

"एक विशाल राज्य जिसके अधीन बहुत सारे छोटे छोटे राज्य हुआ करते थे वहाँ बहुत सारे लोग रहते थे...वे दो वर्गों में विभाजित थे एक वर्ग था बहुसंख्यक और दूसरा था अल्पसंख्यक..और सुन विक्रम उस विशाल राज्य के राजा का चुनाव जनता के बहुमत द्वारा किया जाता था जिसे वो लोकतंत्र कहते थे" बेताल ने ऐसे कहा जैसे कोई बहुत अनोखी बात कही हो

"एक बार उन्हीं छोटे राज्यों में से एक 'उत्तर' राज्य में कुछ बहुसंख्यकों ने अपने पवित्र पशु की हत्या के आरोप में एक अल्पसंख्यक की हत्या कर दी.... राज्य में हाहाकार मच गया..नगर नगर ढिंढोरा पीटा गया...लोग राजा के शाषन पे उँगलियाँ उठाने लगे.. राज्य के विद्वानों ने विरोध स्वरुप राज्य से प्राप्त पुरुस्कार राजा को वापस कर दिए..छोटे राज्य के अधिपति ने मारे गए व्यक्ति के परिवार को एक बड़ी धनराशि प्रदान की..कई दिनों तक सम्पूर्ण राज्य में उथल पुथल रही..कुछ लोग ये भी कहते पाये गए कि आगामी चुनाव के कारण ये सब किया गया"कहते कहते बेताल ने विक्रमादित्य की तरफ देखा पर वो शांत भाव से उसे लादे लिए जा रहे थे

"फिर एक दिन उसी राज्य के अधीन 'वाम' राज्य में बहुत सारे अल्पसंख्यकों ने अपने धर्म के अपमान के विरोध लूटपाट, हत्या आदि कीं..पर इस बार कहीं कोई कोलाहल सुनाई नहीं दिया..किसी ने ढिंढोरा तो क्या मंजीरा तक न बजाया ....इस बार भी कुछ समय उपरान्त चुनाव थे..पर इस बार उस राज्य के किसी विद्वान ने कुछ भी वापस नहीं किया"

"बता..विक्रम ऐसा क्यों हुआ..राज्य में एक ही कानून था पर इस बार वहाँ कोई कोलाहल नहीं हुआ..कोई पुरुस्कार वापस क्यों नहीं हुआ....?
बता विक्रम..बता..जानते हुए भी अगर तूने मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं दिया तेरे सर के सौ टुकड़े हो जायेंगे"

"बेताल...क्योंकि..लोकतंत्र में लाखों अल्पसंख्यक जब मुठ्ठी भर बहुसंख्यकों को जान से मारते हैं..तब भी वो अल्पसंख्यक ही कहलाते हैं और राज्य अल्पसंख्यकों के हित के लिए बाध्य है"

"हा हा हा हा..विक्रम तू बहुत असहिष्णु है..तुझसे चुप न रहा गया..ले मैं फिर चला...उल्टा लटकने को उसी विशाल राज्य के लोकतंत्र की तरह" अट्टहास करता बेताल उड़ चला।

-तुषारापात®™
© tusharapaat.blogspot.com

No comments:

Post a Comment