Wednesday, 26 August 2015

कम्पट



"अचानक क्यूँ मैं धार्मिक हो गया
तुम सोचते तो होगे
तुम्हे लगता है कि तुमने परेशानियां दे कर
भौतिक जीवन मेरा भंग कर
मुझे अपने पाले में कर लिया है तो ये सही नहीं
ही तुमने कोई रामकृष्ण दिया
जो इस नरेन्द्र को 'स्वामी' बना देता, तो फिर ?
चलो बता देता हूँ कि क्यूँ मैं तुम्हारा कार्य कर रहा हूँ
एक गोल पत्थर के ऊपर एक मटकी बंधी रहती थी
और उससे गिरती जल की बूंदे अजब लगती थी
लोग वहां आते, जाने क्या क्या चढ़ाते, क्या क्या बहाते
माँ से पूछा तो उसने बता दिया कि वहाँ तुम रहते हो
सोमवार को महिलाएं तुम पर दस,बीस पैसे के सिक्के फेंक जाती थी
बस उन्ही उठाये गए एलुमिनियम के सिक्को से
खाए गए कम्पटों का कर्जा उतार रहा हूँ"
-तुषारापात®™
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*कम्पट= टॉफी

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