Thursday, 3 September 2015

बदचलन रूह


किसे आज़ाद करवाना चाहते हो ?
जिस्म को ? 
वो तो हमेशा से आज़ाद है
जानता है न
एक दिन तो तबाह हो जाना है

इसलिए कुछ भी कर लेता है ये बेख़ौफ़ जिस्म
कैद तो है रूह इसमें सालों से
चाहती कुछ है,करना पड़ता है कुछ और ही,
रूह है तो मनमौजी बिजली की तरह

जिस्म कभी बांधता है
उसे पंखा बनके कभी टीवी में

कभी जगमगाती रौशनी की रंगीन झालर से
तो कभी परखच्चे कर देने वाली मिक्सी में
तुम्हारे धमाकों से कटे फटे जिस्मों से
रूह रिस रिस कर आज़ाद हो रही है
गर जिस्म से आज़ाद हो कर ये सफ़ेदपोश
रूह बदचलन हो गयी तो क्या करोगे?


-तुषारापात®™

Wednesday, 2 September 2015

चार आने वाले याराने

नोटों से भरी जेब ने खोटों से खूब करवायी दोस्ती
जिंदगी फिर से मेरे वो चार आने वाले याराने ला दे

-तुषारापात®™


Monday, 31 August 2015

आरक्षण

स्वर्ण में पीतल और ताँबे का शुद्ध मिश्रण हो गया
'सोने की चिड़िया' का 'हार्दिक' आरक्षण हो गया

-तुषारापात®™

Sunday, 30 August 2015

कब्ज

उड़द की कचौड़ियाँ खाये जाने के बाद भी आपका साथ दो दिन तक नहीं छोड़तीं, ऐसा साथ और कहाँ

-तुषारापात®™

Friday, 28 August 2015

अनुवाद: रक्षा बंधन

"हाँ..कब आ रहा है तू...पता है तेरे लिए मैंने बहुत बढ़िया राखी ली है..और..और.तेरी मनपसंद बादाम गिरी वाली खीर....क्क्या...अरे..मगर कब..क्या यार..अब राखी पे भी तुझे तेरी कंपनी..चल फिर...रखती हूँ..." जितनी खुशी से चहकते हुए व्याख्या ने अनुवाद का नंबर देख कर अपना मोबाइल उठाया था उससे कहीं ज्यादा ही बुझे मन से उसने अपना मोबाइल पलंग पे पटक दिया

"क्या हुआ..मेरा प्यारा प्यारा लेक्चर..सुबह सुबह उदास क्यूँ है" सन्दर्भ ने व्याख्या के पीछे से आकर उसे अपनी बाहों में भर लिया और उसकी एक लहराती लट को उसके कान के पीछे कर अपना गाल उसके गाल से सटा कर बोला

व्याख्या ने अपना सर उसके कंधे पे टिका दिया और अपना पूरा भार सन्दर्भ पे छोड़ते हुए बोली "अनुवाद कल राखी पे नहीं आ पायेगा..... उसकी कंपनी किसी अर्जेंट काम से उसे..ऑस्ट्रेलिया भेज रही है"

"हाँ भई..अब ऑस्ट्रेलिया की ट्रिप के आगे..कहाँ दीदी की याद रहेगी उस साSSS..ले..को" सन्दर्भ ने उसकी कमर पे एक छोटी सी चिकोटी काटी

"आह..आउच..अच्छा ये लो फिर.." व्याख्या ने उसके पेट पे अपनी कोहनी मारी सन्दर्भ की पकड़ ढीली हो गई दोनों पलंग पे गिर गए

"ऐसा नहीं है..अनुवाद को वाकई जरुरी काम होगा..और राईटर बाबू तुम भूल सकते हो मैं नहीं..कि हमारी शादी होने में अनुवाद और समीक्षा की कितनी हेल्प थी..खास तौर पे अनुवाद की..उसने ही पापा मम्मी को मनाया...जो बातें मैं तुम्हारे बारे में जानती थीं..मतलब तुम्हारे पॉजिटिव पॉइंट्स..पर उनसे नहीं कह पा रही थी अनुवाद ने वो सारे पॉइंट्स बहुत अच्छे तरीके से उन्हें समझाए..उसी ने पापा से कहा था कि पैसा बहुत जरुरी है..और वो दोनों मतलब भर का कमा भी लेंगे..पर अगर पैसा होते हुए भी..दीदी खुश नहीं रही तो किसी और से उसकी शादी कराने से क्या आपलोग खुश होंगे?" व्याख्या ने सन्दर्भ का हाथ अपनी हथेली में भरते हुए कहा

"हाँ भाई जानता हूँ..साला मेरा बहुत ही खुरापाती है..वैसे अगर ये आई टी इंडस्ट्री में नहीं जाता तो पक्का नेता होता..वैसे मजाक अपनी जगह..वो एक बहुत अच्छा भाई है और तुम्हें बहुत मानता है...हाँ.. थोड़ा बहुत मुझे भी...अच्छा अब ये बताओ ये जो...चाँदी की राखी लाइ हो इसका क्या करोगी" सन्दर्भ ने उसके दोनों हाथ जकड़ते हुए कहा

"वापस तो हो नहीं सकती...तुम्हें बाँध दूँगी..मेरी रक्षा करना...अपनी दुष्ट हरकतों से..ही ही ही ही.."व्याख्या ने थोड़ी मादकता शब्दों में घोली

"अच्छा बेटा...कल की तो कल देखेंगे...आज तुम्हारी मुझसे कौन रक्षा करेगा.." कहकर सन्दर्भ व्याख्या में विस्तार लेने लगा।

'एक भाषा से दूसरी भाषा के बीच का 'बंधन' है अनुवाद और एक अच्छा अनुवाद एक भाषा में उत्पन्न विचारों की दूसरी कई भाषाओं में 'रक्षा' करता है'

-तुषारापात®™

Thursday, 27 August 2015

टूटी चारपाई

टूटी चारपाई सी वो टिकी रहती है दीवार से
बूढ़ी अम्मा अब सहम जाती है नमस्कार से

-तुषारापात®™

Wednesday, 26 August 2015

कम्पट



"अचानक क्यूँ मैं धार्मिक हो गया
तुम सोचते तो होगे
तुम्हे लगता है कि तुमने परेशानियां दे कर
भौतिक जीवन मेरा भंग कर
मुझे अपने पाले में कर लिया है तो ये सही नहीं
न ही तुमने कोई रामकृष्ण दिया
जो इस नरेन्द्र को 'स्वामी' बना देता, तो फिर ?
चलो बता देता हूँ कि क्यूँ मैं तुम्हारा कार्य कर रहा हूँ
एक गोल पत्थर के ऊपर एक मटकी बंधी रहती थी
और उससे गिरती जल की बूंदे अजब लगती थी
लोग वहां आते,न जाने क्या क्या चढ़ाते, क्या क्या बहाते
माँ से पूछा तो उसने बता दिया कि वहाँ तुम रहते हो
सोमवार को महिलाएं तुम पर दस,बीस पैसे के सिक्के फेंक जाती थी
बस उन्ही उठाये गए एलुमिनियम के सिक्को से
खाए गए कम्पटों का कर्जा उतार रहा हूँ"
-तुषारापात®™
Bottom of Form
*कम्पट= टॉफी

Tuesday, 25 August 2015

स्क्रैच

लड़कपन के मेरे प्यार,क्या बतायें कि तुम कितने नेक हो
बस यूँ समझ लो नई नवेली गाड़ी का पहला पहला स्क्रैच हो

-तुषारापात®™

Monday, 24 August 2015

बेशरम सूरज

यूँ रात के काले शीशे न उतारा करो मेरे खुदा
बेशरम सूरज सारे जहाँ को आवारा बना देता है

-तुषारापात®™

Sunday, 23 August 2015

माँझी

पहाड़ों पे देवता रहते हैं अक्सर सुनता आया हूँ ये बात पर जब कोई पहाड़ों को काट के रास्ता बना दे तो खुद देवता हो जाता है आज फ़िल्म मांझी देखकर अभिभूत हो गया कहानी तो सच्ची है पर रजत पटल पे उसके प्रस्तुतिकरण के लिए केतन मेहता की जितनी तारीफ करूँ कम है साथ ही नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी की अपने चरित्र में रच बस जाने की कला का लोहा मानना ही पड़ेगा उन्हें इस वर्ष का राष्ट्रिय पुरूस्कार मिले तो मुझे कतई अचरज न होगा।
दशरथ माँझी मुझे पता है तुम इतिहास में अमर नहीं हो सकोगे क्यूँकि तुम्हारा खून शाही नहीं है यहाँ तो जनता के पैसे से संगमरमर के सफ़ेद पत्थरों का ताजमहल बनाने वाले ही इतिहास में जगह बनाते हैं पर यकीन मानो तुमने इतिहास नहीं भविष्य का रास्ता बनाया है मैं अब जीवन में जब भी कभी हताश या निराश होऊँगा तुम्हें ही याद करूँगा सच में तुमने इस कहावत को बौना  साबित कर दिया कि पहाड़ तोड़ने से भी मुश्किल कोई काम है कोई नहीं
फ़िल्म देखते देखते स्वामी विवेकानंद जी की बात याद आ गई कि किसी नए कार्य को पहले जगहंसाई फिर विरोध और उसके बाद समर्थन मिलता है यहाँ भी यही हुआ कल्पना कीजिये आज से 50 60 साल पहले के भारत की तस्वीर की देश आजाद हुए अभी कुछ ही वर्ष हुए थे और छुआछूत,भेदभाव गरीबों का शोषण जैसी कुरीतियाँ समाज में अपने पैर जमाये बैठी थीं अजीब दोहरी मानसिकता थी एक तरफ तो कुछ लोगों को अछूत कहकर उन्हें छुआ भी नहीं जाता था दूसरी तरफ उन्हीं की बहु बेटियों से बलात्कार करने से कोई परहेज नहीं था मांझी जो काट रहा था वो ऐसी ही कुरीतियों का पहाड़ था चालीस किलोमीटर से चार किलोमीटर का रास्ता निकालने में सरकार को 50 साल से ज्यादा लग गए वो भी जब एक व्यक्ति 22 साल पहाड़ काटता रहा सरकार और भगवान् के सहारे बैठने से अच्छा है खुद ही तस्वीर बदलने की कोशिश की जाय..चलिए उठाइये अपने अपने छेनी हथौड़े और कीजिये एक जोरदार प्रहार भ्रस्टाचार के पहाड़ पे हाँ समय लगेगा पहले कुछ लोग हँसेंगे भी लेकिन एक दिन ये पहाड़ भरभराकर गिर जरूर जायेगा
किसी ने मुझसे पूछा था आखिर ये प्रेम है क्या जो शाहजहाँ ने ताजमहल बनवा दिया और माँझी ने पहाड़ काट दिया उनसे मैं कहना चाहता हूँ प्रेम एक शक्ति है ताकत है जो जिगर वालों के पास होती है और प्रेम करना उसे निभाना सनकियों का काम है एक सनकी ने अभी अभी आपको अपनी कलम से कोंचा है अगर आप में भी सनक है तो आप भी दूसरों को अपनी तरह से कोंचिये शायद पहाड़ खोदने से एक चूहा ही निकले पर कम से कम इतिहास में आप तो चूहे की तरह जीवन जीने वाले नहीं कहलायेंगे ।

-तुषारपात®™
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Saturday, 22 August 2015

सेल्फ सर्विस

समाजसेवा: एक ऐसा स्टॉल जहाँ 'सेल्फ सर्विस' का बोर्ड स्टॉल लगाने वालों के लिए होता है।

-तुषारपात®™

Friday, 21 August 2015

सामूहिक ?

हम इतने 'अकेले' हो चुके हैं कि अब 'सामूहिक' शब्द भी बलात्कार के साथ ही सुनाई देता है ।

-तुषारापात®™
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चार आदमी

चार आदमी मिलकर सिर्फ लूडो खेल सकते हैं -नेताजी

-तुषारापात®™

Thursday, 20 August 2015

चलन

एक हिन्दू- मेरे धर्म में कई अन्धविश्वास हैं जो दूर होने चाहियें
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(साले, धर्मद्रोही नपुंसक कहीं के धर्म को बदनाम करता है etc etc)

एक मुस्लिम- मेरे धर्म में कई अन्धविश्वास हैं जो दूर होने चाहियें
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( वाह भाई क्या बात कही है तुम्ही सच्चे मुसलमान हो और देशभक्त भी etc etc )
फेसबुक पे ये चलन खूब देखने को मिलता है पर सोचने वाली बात ये है कि कहीं ये भी एक प्रकार का मुस्लिम तुष्टिकरण तो नहीं? मुझे पता है इसमें अभी कई तरीके की दलीलें आ जाएँगी कि मुस्लिमों में कट्टरता बहुत अधिक है वो अपनी कमियाँ स्वीकार नहीं करते इसलिए जब कोई ऐसा करता है तो हम उसे सर आँखों पे उठा लेते हैं, उठाइये जरूर उठाइये मैं कब मना करता हूँ पर कम से कम अपनी कमियों पे भी उतनी तत्परता से कदम उठाइये।
वैसे मेरा ये मुद्दा उठाने का मकसद कुछ अलग है मेरी चिंता उन लेखकों के लिए है जो मुस्लिम हैं और लेखन क्षेत्र में अपनी पहचान बनाना चाहते हैं उनके लिए ये रास्ता सस्ती लोकप्रियता प्राप्त करने का हो सकता है (वैसे ये बात सब पर लागू होती है )पर इससे उनकी मौलिकता समाप्त होने का खतरा बढ़ जाता है ये likes और comments आपको बस एक ही तरफ सोचने और एक ही जैसा लिखने को बाध्य करने लगते हैं आप जाने अनजाने खुद को एक जाल में फंसा लेते हैं और आपको जब पता लगता है तब तक आप कुछ लोगों के हाथ की कठपुतली बन चुके होते हैं हर कोई इतना समझदार नहीं होता जो इससे बच सके हाँ एक दो हैं जिन्हें मैं जानता हूँ जो इस बहाव में भी अपनी सोच के साथ जमे रहे ,इसलिए अगर खुद को एक अच्छा लेखक और विचारक बनाना है तो हर प्रकार के लेख कवितायें कहानियाँ लिखिए जिससे आपके अंदर का लिखने वाला भी सांस ले सके और हम जैसा पढ़ने वाला भी ।
-तुषारापात®™

Tuesday, 18 August 2015

भीष्म कहाँ से लाऊँ

प्रयत्न करूँ मैं
जो सत्य की स्थापना का
तो कहते हैं वो
ये कार्य 'तुम्हारा' है
मुझको किसने दिया
धर्म का ध्वज
ये तो 'तुम्हारे' दसवें अवतार को फहराना है
गीता वाणी 'तुम्हारी'
मानते सभी पर कहते
अधर्म के विरुद्ध रण का शंख तो 'तुम्हे' ही बजाना है
देर न करो उत्तर दो शीघ्र
इस कुरुक्षेत्र-धर्मक्षेत्र में क्या
'तुम्हे' युधिष्ठिर को धृतराष्ट्र की ओर से लड़ाना है
नहीं अगर तो धर्म स्थापना कैसे हो
अब 'तुम्हारी' आज्ञा मानने वाला अर्जुन किसे बनाऊँ
हे कृष्ण!'तुमसे' शस्त्र उठवाने को भीष्म कहाँ से लाऊँ

-तुषारापात®™

हरा पत्ता

कुछ पीले पत्तों के
कहने में आकर
दरख्त ने अपने ही
एक हरे पत्ते को शाख से गिरा दिया
हरा पत्ता उसके पैरों में पड़ा
रोता रहा गिड़गिड़ाता रहा
पर शाख जिसकी न हो उसकी सुनता कौन है
हरे पत्ते ने भी ठान लिया
तपस्या की
खुद को गला कर
खाद बनकर मिट्टी के रस्ते दरख्त में जा मिला
और
फूल बनकर उस दरख्त की कारगुजारी को महका दिया
-तुषारापात®™

Sunday, 16 August 2015

हिन्दी की सहायिकाएं

"सिक्योरिटी.... सिक्योरिटी" प्रेक्षागृह के मुख्य द्वार पे एक अत्याधुनिक महिला अपने जाते यौवन को किसी तरह अपनी साड़ी से कसकर बाँधे हुए बड़े गुस्से से सिक्योरिटी गॉर्ड को आवाज लगा रहीं थीं, अंग्रेजसिंह दौड़ते हुए जल्दी से आया

"जी मैडम..यस मैडम जी" इससे ज्यादा अंग्रेजसिंह कुछ बोल नहीं पाया वो महिला उसपे दहाड़ना शुरू कर चुकी थीं

"तुम ये गेट छोड़ के कहाँ गायब हो..कैसे कैसे लोग अंदर घुसे जा रहे हैं... चलो इन्हें बाहर का रास्ता दिखाओ..बाकी तुम्हें तो मैं..बाद में बताती हूँ" महिला दाँत पीसती हुईं विदा हुई, अंग्रेज सिंह ग्रामीण परिवेश के एक दम्पति और उनके दो बच्चों को बाहर की तरफ हटाने लगा

"भइया अंग्रेज सिंह...ई मैडम कहियां तो समझाई समझाई केरे हार गेन....पर पता नाइ अंग्रेजी महियां का गिटर पिटर करत रही.. पर भइया तुम तो सुन लेव हमरी बात.. हम हैं दोहा और ई हैं हमरी पत्नी चौपाई"अपने साथ वाली महिला की तरफ इशारा करते हुए दोहा ने अंग्रेजसिंह से कहा और अपने दोनों बच्चों के सर पे हाथ रखते हुए आगे कहा

"अउर ई दुइनो हैं हमरे लरका..छन्द और सोरठा.." दोहा अभी ये कह ही पाया था की वहाँ से गुजरते कुछ एलीट क्लास के लोग उन्हें देखकर आपस में बात कर रहेे
"ओह गॉड..हू आर दे..लुक एट दीज जोकर्स..व्हाट ही इज वेअरिंग.. लुंगी ..लोल्ज..मस्ट बी बिहारी ऑर ब्लडी भोजपूरीज...दोहा की धोती को देखते और उसपे हँसते वो लोग प्रेक्षागृह के अंदर चले गए

दोहा अंग्रेजी नहीं समझता था पर अपमान की भाषा बहुत अच्छे से समझता था फिर भी शांत हो कर उसने अंग्रेजसिंह से कहा "भइया बस एक विनती राहय तुमसे कि......."

प्रेक्षागृह के ग्रीन रूम में बैठा सन्दर्भ आज बहुत खुश था पर साथ ही थोड़ा मायूस भी था आज पंद्रह अगस्त को उसे हिन्दी का 'ज्वलंत दीपक' पुरस्कार मिलने जा रहा था पर व्याख्या आज उसके साथ नहीं थी उसके कॉलेज में स्वतंत्रता दिवसोत्सव था,वो उससे बात करना चाह रहा था पर यहाँ प्रेक्षागृह में मोबाइल में नेटवर्क नहीं आता था और अपने ही सम्मान के कार्यक्रम से उठकर वो बाहर जा नहीं सकता था, तभी अंग्रेज सिंह ने उसके कान में आकर कुछ कहा सुनते ही वो बाहर की तरफ लगभग दौड़ते हुए मुख्य द्वार पे आया

"अरे चाचा जी...चाची जी प्रणाम" बड़ा बढ़िया नजारा था हिंदी का उभरता साहित्यकार दोहा और चौपाई के पैर छु रहा था "मुझे अंग्रेजसिंह ने सब बता दिया है...आप मेरे साथ अंदर चलिए ...अभी अभी मैंने अपने फ़ोन पे व्याख्या का मैसेज भी पढ़ लिया...उसने आप लोगों के आने के बारे में बताने को कई बार मेरा फ़ोन मिलाया..पर नेटवर्क....खैर वो सब छोड़िये आप सब अंदर चलिए"

"अच्छो हुवो संदू..जो तुम मिल गेव..नाइ इहाँ तो सब....लुल्ल बक्सियां हई" दोहा ने राहत की सांस ली, सन्दर्भ ने उन्हें सबसे आगे सोफे पे अपने पास बिठा लिया उसका मूड काफी खराब हो चूका था,उदघोषिका ने उसका नाम लेकर उसे सम्मान के लिए मंच पे आमंत्रित किया समारोह के रस्मो रिवाज के अनुसार सबका अभिवादन कर उसने कहना आरम्भ किया
"एक प्रश्न है मेरा आप सबसे...क्या आप अपनी मौसी का अपमान करके...अपनी माँ का सम्मान करते हैं ? हिन्दी हमारी मातृभाषा है पर क्या आंचलिक या...क्षेत्रीय भाषाओं के बिना इसका प्रसार संभव है?....यहाँ वातानुकूलित प्रेक्षागृहों में बैठकर..अंग्रेजी भाषा के गुलाम होकर और अपने ही देश के हमसे रहन सहन में भिन्न लोगों का अपमान कर ...और...कॉटन की कलफ़ लगी करारी साड़ी पहनकर....माथे पे अठन्नी से बड़ी बिंदी लगाकर..क्या.हिन्दी की रक्षा हो सकेगी..मुझे इसमें संदेह है..मैं पूरी विनम्रता के साथ...ये पुरस्कार...अस्वीकार करता हूँ" कहकर सन्दर्भ,दोहा चौपाई,छन्द और सोरठा को लेकर प्रेक्षागृह से बाहर निकल आया।

'अगर सहायक नदियाँ न हो तो जीवनदायनी गंगा भी एक छोटे से भूभाग तक ही सीमित रह जाती'

-तुषारापात®™

Saturday, 15 August 2015

स्वतंत्रता दिवस

स्वतंत्रता दिवस ये भी याद दिलाता है कि हम कभी पराधीन थे हम पराधीन क्यों हुए उन कारणों को जानना समझना और उन्हें फिर कभी न दोहराना ही सच्चा स्वंतत्रता दिवस मनाना है सिर्फ राष्ट्रगान के लिए ही नहीं राष्ट्र के लिए भी खड़े होइए ।
वो राष्ट्र कितना भाग्यशाली है जो कभी किसी के अधीन ही नहीं हुआ और उसे स्वंतत्रता दिवस मनाने की आवश्यक्ता ही नहीं पड़ती मैं तो जानता हूँ वो राष्ट्र कौन सा है क्या आप जानते हैं ? पता लगाइये
इसी के साथ स्वतंत्रता दिवस की अनेको शुभकामनाएं ।
जय हिन्द !जय भारती !
-तुषारापात®™

Thursday, 13 August 2015

इश्क की घड़ी

घड़ी देखनी आती हो तो ही पढियेगा :-

इश्क का अलार्म बज उठा था तब
दिसंबर की एक सुबह देखा था जब
दस बजके दस मिनट की तरह तुम्हें
अलसाई सी अंगड़ाई लेते हुए

खड़े रहते थे एक झलक को
छह बजे की तरह सीधे साधे से
दिन बिताये सेकंड की सुई की तरह
पीछे पीछे चक्कर लगाते हुए

गर्म दिल का लहू सर्द पड़ गया
अचानक रुककर जब पूछा था
कितना बजा है तुम्हारी घडी में
तुमने आँख मिलाकर मुस्कुराते हुए

घड़ियाँ मिल चुकी थी अपनी अब
वक्त बन रहा था देखा तुम्हें जब
सवा नौ बजे की तरह बाहें फैला के
अपने आगोश में मुझे बुलाते हुए

तीन परों की उड़नतश्तरी सी
बनायीं थी इश्क की घड़ी भी
बारह बजे की तरह तुमने
मुझको अपने गले लगाते हुए

फिर अचानक कुछ हुआ बेशक
सर्दी में जम गया दौड़ता इशक
जनवरी की एक शाम देखा तुम्हे
एक नयी घड़ी में चाबी भरते हुए

किसी और को नया वक्त बताके
मुझे सात बजके बीस मिनट बनाके
कहाँ चले गए तुम ?आओ जरा देखो तो,
अपाहिज वक्त को मेरे
घड़ी की सुइयों की बैसाखियों पे लंगड़ाते हुए।

-तुषारपात®™
© tusharapaat.blogspot.com

Wednesday, 12 August 2015

लोकतंत्र

लोकतंत्र: जहाँ 'अंगूठे के निशान' के नीचे कई 'हस्ताक्षर' दबे रहते है

-तुषारापात®™

Tuesday, 11 August 2015

कुल्टा रात

रात
जब बुढ़ा जाती है
शिशु सवेरे को
जन्म देकर मर जाती है/
जवाँ सवेरा
नन्ही दोपहरी के
इधर उधर
मुंह मारता फिरता है/
अधेड़ दिन
कच्ची शाम के साथ
मौका मिलते ही सो जाता है
और रात जवाँ हो जाती है /
रात
इस प्रश्न का
उत्तर देते देते थक जाती है
कुल्टा बता तू
कहाँ अपना मुँह काला करवाती है/

-तुषारपात®™

हिन्दू प्याज

ऐ मोमिनो! देखो! तुम प्याज बिलकुल मत खाना, ये हिन्दू है ये शंख के जैसा है

-तुषारापाती®™फतवा 

Sunday, 9 August 2015

अक्स

अक्स जिनका नजर आता था मुझमें
उन्हीं के लिए हम 'आइना' हो गए

-तुषारपात®™


प्रेम साधना

आप दिल्ली मेट्रो में सफ़र कर रहें हों
अपनी सीट पे बैठे बैठे कुछ गुनगुनाते हुए
आते जाते लोगों को देखते हुए अपने में गुम हों कि तभी आपके डिब्बे में आती हुई भीड़ में एक बहुत ही आकर्षक युवा महिला मेट्रो में दाखिल होती है सबकी लोहे सी निगाहें उनके चुम्बकत्व के दायरे में सिमट के रह जाती हैं पर ये क्या अचानक आपका चोर दिल बड़ी तेज़ी से धड़कने लगता है जब आप उसे देखते हैं की वो आपकी ओर ही देखे जा रही है और तेज़ी से आपकी तरफ आ रही है और डब्बे के सारे लोग उसे और आपको देखने लगते हैं एक रहस्मयी मुस्कान सबके चेहरे पे देख के आप थोड़ा आश्चर्य में होते हैं और थोड़े क्या बहुत ज्यादा गर्व में होते हैं और वो आपके बिलकुल नजदीक आकर बड़े प्यार से अपनी ज़ुल्फ़ें झटक के,मुस्कुरा के अपने गुलाबी होठों को थिरका के थोड़ा कड़क अंदाज़ में आपसे कहती है "excuse me you are on ladies seat"
और यूँ आपकी छोटी सी प्रेम साधना पे हो जाता है 'तुषारापात'!

-तुषारापात®™

Saturday, 8 August 2015

वर्णमाला

"अरे सन्दर्भ बेटा...एक छोटा सा काम था तुमसे..अगर हो सके तो..इस बार भी...हमारी कुछ मदद कर दो..बेटा" शब्दकोष ने सकुचाते हुए कहा

"अंकल..मैं जरा जल्दी में हूँ..ऑफिस के लिए निकल रहा हूँ...ऐसा करिये आप ...व्याख्या से बात कर लीजिये" सन्दर्भ समझ गया कि हमेशा की तरह ये रुपैये मांगने आये होंगे इसलिए वो उन्हें टाल कर चलता बना

"ओह्ह..अब बहु से मैं क्या बात करूँ..ऐसा है..मैं...मैं तुम्हारी आंटी को भेज देता हूँ" हताश होकर उन्होंने कहा और भारी क़दमों से वापस हो लिए
टिंग..टॉन्ग..टिन्न्न टॉन्ग.ग...ग
थोड़ी देर में सन्दर्भ के फ्लैट की घंटी बजती है व्याख्या दरवाजा खोलती है
"अरे वर्णमाला ऑन्टी आप...आइये...अंदर आइये..."

वर्णमाला अंदर आ जाती है व्याख्या दरवाजा बंद करके कहती है "बैठिये आंटी..बताइये कैसे आना हुआ.."

"अब क्या बताऊँ बेटी..तुम तो जानती ही हो..तुम्हारे अंकल की तनख्वाह कितनी है....और ऊपर से इतना बड़ा हमारा परिवार..कुछ न कुछ लगा ही रहता है..अभी तेरे अंकल नीचे सन्दर्भ से मिले थे..पर शायद वो जल्दी में था..तो तुमसे बात करने को बोल गया....बड़ी बेटी मात्रा की गोद में व्यंजन को बिठा के बड़ी आस से तेरे पास आई हूँ" वर्णमाला किसी तरह भूमिका बाँधते हुए बोली
"अ..बेटी..कुछ पैसों की जरुरत थी..स्वर और व्यंजन दोनों को कई दिनों से बहुत तेज बुखार है..डॉक्टर ने कई टेस्ट कराने को लिखा है..पर घर में एक पाई भी नहीं है..उनके इलाज के लिए तुम्हारे आगे हाथ फैला रही हूँ" वर्णमाला शर्मिन्दिगी से रुआँसी आवाज में आँख झुका के बोली

"आंटी..एक बात कहूँ..प्लीज.बुरा मत मानियेगा...इस महंगाई के दौर मे..ं सत्रह सत्रह बच्चे पैदा करना...कहाँ की समझदारी है..यहाँ तो..दो बच्चों को पालना मुश्किल है" व्याख्या ने तीखी बात थोड़ी मीठे लहजे में कही

"अ..बेटी..स्वर और व्यंजन से पहले सारी लड़कियां ही हुई..उनके बाद स्वर फिर व्यंजन हुआ...अब वंश चलाने के लिए लड़का तो चाहिए था..इसीलिए इतने बच्चे होते गए..और बेटी..ये तो सब भगवान के हाथ में है"वर्णमाला जमीन में गड़ी जा रही थी

" आंटी..वंश फांके करके तो नहीं चलता न..और क्या एक लड़की अपने पिता..अपने वंश का नाम नहीं रौशन करती..आप जैसी सोच के लोग ही..लड़के की चाहत में या तो बच्चे पैदा किये जाते हैं..या फिर लड़कियों को कोख ही में मार देते हैं" व्याख्या ने महसूस किया कि उसकी आवाज में अजीब सी घृणा भरती जा रही है
"खैर..इस बार तो मैं आपकी मदद करे दे रही हूँ..पर आगे से आंटी..आप भी समझती ही हैं..कि आजकल घर चलाना कितना मुश्किल है..और वैसे भी शब्दकोष अंकल को सन्दर्भ ने पहले भी कितनी बार पैसे दिए हैं" कहकर उसने 2000 रुपैये वर्णमाला को दिए,वर्णमाला लज्जित थी पर मजबूर थी पैसे ली और आर्शीवाद देते हुए चली गई
शाम को जब सन्दर्भ आया तो व्याख्या ने उसे पूरी बात बताई

"यार कितनी बार पैसे देंगे हम..अब शब्दकोष अंकल और वर्णमाला आंटी तो लगता है पूरे अड़तालिस करके ही मानेंगे... अक्षरों(लड़कों) के चक्कर में मात्राओं(लड़कियों) को पैदा करते गए....अब उनके बच्चे क्या हम पालेंगे....... सन्दर्भ झुंझला के बोला

" क्या बताऊँ..ये पढ़े लिखे लोग भी इतनी बेवकूफियाँ करते हैं..चाहे जितना भी हम तरक्की कर जाएँ..पर सन्दर्भ...ये लड़के लड़की का भेद कभी मिट पायेगा क्या?" व्याख्या का सवाल पता नहीं किससे था ।

'ब्रिटिश साम्राज्य की उत्तराधिकारी क्वीन भी होती है जिसके नाम से पूरा शाषन चलता है'

-तुषारपात®™
बेशक तुम कलम का सर कलम कर दो
स्याही बिखर के फिर भी तेरा जुर्म लिखेगी
गला काटकर चाकुओं से गोद गोदकर मारे गए कई धर्म निरपेक्ष ब्लॉगर
क्या धर्म निरपेक्षता या सेकलुरिस्म की वजह से मारे गए ? या धार्मिक कट्टरता के विरोध के लिए ? या शायद कट्टरों को उनका मानव धर्म याद दिलाने की सजा है ये? मानवता इंसानियत मर चुकी है धर्म विलुप्त हो चूका है बाकी रह गए हैं सिर्फ धर्मान्ध और अंधों को कुछ नहीं दिखता । तलवार और कलम की ये जंग जारी है आप किस तरफ हैं ? :(

-तुषारपात®™

Friday, 7 August 2015

तुम इश्क और तुम्हारा शहर

तुम्हारे साथ साथ
तुम्हारे शहर से भी इश्क किया है मैंने
वो फाफामऊ पुल की तरह
मेरे दिल की थरथराहट
प्रयाग स्टेशन पे रुकी
ट्रेन पे घंटों की झुंझलाहट
आउटर से देखना
काली प्रसाद इंटर कॉलेज का मैदान
वो पंद्रह मिनट की
स्टेशन की दूरी में गिनना सारे मकान
प्लेटफार्म नंबर दस से
एक तक की वो लंबवत दूरी
लम्बे लम्बे कदमों से भी
कमबख्त होती नहीं थी पूरी
वो भारद्वाज आश्रम की मखमली घास
सरस्वती घाट पे तुमसे मिलने की आस
आनंद भवन की
चटकीली धूप और नक्षत्रशाला की छाँव
संगम में दूर तक
नैनी पुल तक जाती हंस वाली हमारी नाँव
वो लोकनाथ का डोसा
कटरे पे नेतराम की कचौड़ी
मयोहाल से
यूनिवर्सिटी तक की भागा दौड़ी
मेडिकल पे
टमाटर की वो चाट चटोरी
सिविल लाइन्स की
सोफ़िया लॉरेंस की गिलौरी
झूंसी और सोराँव की
तुम्हारी सारी सखी सहेलियाँ
खुल्दाबाद से मुड़ती
लूकरगंज की सारी गलियाँ
गंगा ने
गोमती से मिला लिया था हाथ
इन सबसे
इश्क है मुझे प्रिये तुम्हारे साथ ।

-तुषारापात®™

Thursday, 6 August 2015

आयत

उतरती तो मुझपे भी हैं खूब आसमानी इबारतें
सब उन्हें शेर कहते हैं आयत कोई नहीं कहता

-तुषारापात®™

राधे माँ भी कभी बहु थी

हिन्दुओं क्या हो गया है तुम्हें ? अपनी 5000 साल परम्परा और महान संस्कृति की बागडौर किसे सौंप रहे हो तुम? कभी राधे माँ जैसी (जो माँ शब्द का बलात्कार कर रही है) तो कभी कोई शराब व्यवसायी जो आध्यात्म और धर्म से कोसों दूर हैं महामंडलेश्वर बनते जा रहे हैं
क्या अब ऐसे लोग हिंदुत्व को आगे लेकर जाएंगे ?
धर्म की पताका धन से खरीदी जा रही है और बड़े बड़े शंकराचार्य इसपे मौन हैं उनकी चुप्पी मैं समझ सकता हूँ क्योंकि उन्हें अपनी सत्ता और प्रभाव के लिए ऐसे लोगों की आवश्यकता है वो क्यों कर इसका विरोध करेंगे कहीं न कहीं ढके छुपे इनका समर्थन ही हैं उनके लिए पर तुम्हें क्या हो गया है तुम इतने सोये हुए कैसे हो सकते हो?
कभी किसी कथा वाचने वाले ढोंगी को तुम संत बना देते हो तो कभी किसी संसारी माया के लोभी को बड़े बड़े आश्रम बनवा देते हो क्या तुम्हारे वेद पुराण पिछले 5000 सालों में तुममें इतनी भी बुद्धि नहीं दे सके कि तुम ढोंगियों और संत में अंतर कर पाओ नहीं इसका कारण है कि तुमने खुद अपने धर्म को अपने भीतर सुप्त कर दिया है तुम खुद माया के लोभी होकर अपनी छोटी छोटी संसारी इच्छाओं की पूर्ती के लिए इन सबका समर्थन करते आ रहे हो और तुम्हारी यही क्षुद्र कामनाएं तुम्हारा पतन कर रहीं हैं धर्म के नाम पे बस तुम्हारे पास धर्मग्रंथो की घिसी पिटी पंक्तियाँ हैं जो तुम एक दूसरे को सुना सुना कर खुश हो रहे हो पर अपने आचरण से धर्म को विलुप्त करते जा रहे हो
सनातन धर्म को खतरा किसी बाहरी कारक से नहीं बल्कि ऐसे ही अधार्मिक और कलंकित रंगे सियारों से है जो तुम्हारे अघोषित नेता बनते जा रहे हैं संसार में चारों ओर जग हंसाई हो रही है हमारे महान धर्म को ढोंग और पाखण्ड कहा जा रहा है और हमारे छवि एक लोभी अंधविश्वासी की बनती जा रही है अगर समय रहते नहीं चेते तो ये धर्म की गंगा बहुत जल्दी एक बदबूदार नाले में बदल जायेगी और इसके उत्तरदायी तुम्हारी ये चुप्पी होगी।
जितने कट्टर हिन्दू शेर/लोमड़ी/चीते हैं अक्सर देखता हूँ कि दूसरे मजहब को आतंक से बहुत जोर शोर से जोड़ते हैं और उनकी कड़ी निंदा करते हैं पर हिंदुत्व में घुस आये इन आतंकवादियों को लेकर चुप्पी क्यों है हाँ ये राधे माँ आशाराम जैसे लोग हिंदुत्व के आतंकवादी हैं इन्हें कुचल दो वरना बहुत देर हो जायेगी और इन्हें कुचलने के लिए कोई हथियार उठाने की जरूरत नहीं है बस अपने आचरण में धर्म को स्थापित करो और इन जैसे पाखण्डियों से धर्म का झंडा लेकर स्वयं फहराओ।
जाग जाओ इससे पहले की ये तुम्हारा धर्म भी बेच दें और तुम किसी और मजहब के शरणार्थी बन के रह जाओ।

-तुषारापात®™

Wednesday, 5 August 2015

उपाय

प्रमुख सिंह बड़े परेशान थे अपने जीवन के छत्तीस बसन्त देख चुकने के बाद भी अभी तक विवाह रूपी सावन की बौछारें उनपे नहीं पड़ी थीं, किसी मित्र ने सलाह दी कि किसी अच्छे ज्योतिषी को अपनी कुंडली दिखाओ आखिर दिक्कत कहाँ है ये तो पता चले तो वो एक बहुत ही प्रसिद्द ज्योतिषी के पास पहुँच गए और उसके चरणों में दंडवत प्रणाम कर बोले

" महाराज! मेरे यौवन का मानसून जाने को है....क्या कोई..एक भी हरी भरी डाली नहीं..जिसपे...मेरा मन अपना झूला डाल सके? कुछ कीजिये .....कुछ उपाय बताइये....महाराज किसी तरह ....बस मेरा विवाह करा दो"

ज्योतिषी ने उनकी कुंडली को तीन सौ साठ अंश से जांच परख के देखने के बाद कहा" बेटा, तुम्हारी कुंडली के सातवें भाव में...केतु विराजमान है और राहु मंगल की सीधी दृष्टि....तुम्हारे घर ये मंगल कार्य होने से रोक रही है... ऐसा करो ये सवा सात रत्ती का मूँगा धारण करो, सब अच्छा होगा"

प्रमुख सिंह ख़ुशी ख़ुशी मूँगा लेकर घर आये और इंतज़ार करने लगे कि किसी नवयौवना के पिता अपनी सुपुत्री का हाथ इन्हें सौंपने बस आते ही होंगे पर दो महीने बीत जाने पर जब कुछ नहीं हुआ तो फिर से ज्योतिषी के पास पहुंचे
" महाराज आपने कहा था...कि विवाह हो जायेगा ..पर कुछ नहीं हुआ"

" तुम्हें मैंने मूँगा दिया था उसका क्या किया" ज्योतिषी ने प्रमुख सिंह की सारी उँगलियाँ खाली देख कर आश्चर्य से पूछा

"अरे वो..वो तो मैंने उसी शाम खा लिया था...जिस दिन आपने दिया था...हाँ थोडा पेट में दर्द हुआ था..फिर ठीक हो गया था" प्रमुख सिंह के मुखमंडल पे पूरे जहान की मासूमियत चमक रही थी

" अरे मूर्ख !.. वो तुझे पहनने को दिया था..खाने को नहीं...खैर ऐसा कर ...अब तुझे एक बहुत ही सरल पर बिलकुल अचूक उपाय बता रहा हूँ ..ध्यान से करना..तेरी मनोकामना पूरी हो जायेगी..ऐसा कर 43 दिनों तक तीन कुत्तों को तीन रोटी प्रतिदिन खिलाना है तुझे..बस अब ये उपाय सही से करना.."

प्रमुख सिंह इस बार बहुत ही प्रसन्न हुए कि अब तो शहनाई बज ही जायेगी वापस आते समय राह में जब भी कोई कुत्ता दिखता तो उन्हें उसमे अपनी बारात में बैंड बजाने वाला दिखने लगता, खैर साहब तैंतालीस दिन उपाय के बीत गए,उसके भी एक महीने बाद कुछ नहीं हुआ श्री हरी भगवान भी सोने चले गए शादी विवाह के मुहर्त भी नहीं रह गए वो फिर से पहुंचे महाराज जी के पास

" क्या हुआ प्रमुख सिंह..अब भी कुछ नहीं हुआ क्या?" प्रमुख सिंह की चाल ढाल से इस बार ज्योतिषी ने पहले ही समझ लिया

" हाँ महाराज कुछ नहीं हुआ...मुझे लगता है आप बस हमको लॉलीपॉप थमा रहे हो..ऐसा करो महाराज...हमारा पैसा वापस कर दो..नहीं तो ..अच्छा नहीं होगा...हाँ नहीं तो" प्रमुख सिंह का क्षत्रिय जाग रहा था

" उपाय किया था...पूरा?" ज्योतिषी ने शांत भाव से पूछा

" हाँ.. पूरा किया..तैंतालीस दिन तक..जैसा आप बताये थे..पर कुछ नहीं हुआ..साले कुत्तों को...पुचकार पुचकार के खुद...कुत्ते बन गए हम"

"अच्छा क्या किया ये बता" ज्योतिषी ने पूछा

" अरे अब क्या बताएं..आपको...एक तो ऐसा कठिन उपाय बताया आपने
..साले लखनऊ के कुत्ते भी कम रंगबाज नहीं हैं.....सूखी रोटी देखे के ऐसे मुंह बनाते हैं...जैसे किसी नवाब को....कबाब की जगह घास फूंस परोस दी हो..तीन तो छोड़ो..एक कुत्ता हमारी रोटी नहीं खाता था..लेकिन फिर हमने भी दिमाग लगाया और सालों को सुधार दिया"

"अच्छा क्या किया तुमने" ज्योतिषी अब अपनी उत्सुकता रोक नहीं सका

"अरे करना क्या था..साले तीन कुत्तों को..रोज बाँध के ....डंडा मार मार के रोटी खिलाता था..जब तक रोटी खत्म न करें..तब तक...दे दनादन डंडा मारता रहता था...रोज नए कुत्ते लाने पड़ते थे..कम से कम..अ..चालीस पच्चास कुत्तों को... ऐसे ही रोटी खिलाई"

ज्योतिषी ने अपना माथा पीट लिया और प्रमुख सिंह के पैसे वापस कर दिए।

'उपाय तभी कर पाओगे जब ग्रह सही होंगे तभी उपाय अपना फल देगा..जब समय सही होने वाला होगा तो उपाय किसी न किसी रूप में खुद तुम्हारे सामने पहुँच जायेगा'

-तुषारापात®™

Tuesday, 4 August 2015

porn ban

पॉर्न बैन से हाथ देख कर भविष्य बताने वाले ज्योतिषियों को बहुत आराम हुआ है वरना नौजवानों के हाथों की रेखाएं मिटती जा रहीं थीं और देश का भविष्य खतरे में था।

-बाबा तुषारपात®™

पिन बोर्ड

जो रूह नहीं तो क्या है आदमी
पिन बोर्ड पे टांक दो
दिल जिगर और एक जोड़ी गुर्दा
लो बन गया आदमी

-तुषारापात®™

Monday, 3 August 2015

मानसिक हलन्त

" तेरी हिम्मत कैसे हुई...मेरे बेटे को गलत कहने की...खेल खेल में चोट वोट तो लग ही जाती है...इसमें क्या बड़ी बात है...बड़ी आईं हैं मेरे बेटे की शिकायत लेकर." विभक्ति चिल्ला चिल्ला कर बोल रही थी

" अरे विभक्ति जी..कैसे बात कर रहीं हैं आप...मैंने खुद अपनी आँखों से देखा है..कारक ने जानबूझकर हलन्त को धक्का दिया है...वो झूले से गिरते गिरते बचा है..उसे काफी चोट आ सकती थी...आप अपने बेटे कारक को समझा के रखिये...वो कुछ ज्यादा ही शैतानी करने लगा है" संधि ने भी ऊँची लेकिन मर्यादित भाषा में अपनी बात रखी

" हुँ..मेरे बेटे को शैतान कहती है तू...तेरा बेटा तो बड़ा दूध का धुला है...अगर इतनी ही फिकर है..तुझे अपने बेटे की....तो....तो..उस लंगड़े को इन बच्चों के साथ खेलने भेजती क्यूँ है तू...अब स्वस्थ बच्चों के साथ लंगड़ा खेलेगा तो गिरेगा पड़ेगा ही" विभक्ति ने कारक का हाथ पकड़ते हुए हलन्त की तरफ बुरा सा मुंह बनाते हुए कहा

संधि का दिल अंदर तक छिल गया..अपमान से उसकी आँखे भीग गई कांपती आवाज में वो बोली
"आप अपनी हद में रहिये..मेरे बच्चे को..बच्चे को..उसके सामने ही ..ऐसा कहने में शर्म नहीं आती..अपना घटियापन दिखा दिया आपने.."

व्याख्या निष्कर्ष और टिप्पणी को लेकर सोसायटी के प्लेइंग ग्राउंड में आई हुई थी अपनी सोसाइटी की इन दोनों पड़ोसनों को वहाँ यूँ लड़ते देख वो संधि के पास गई और उसे अपने साथ ले आई

" व्याख्या ....पता नहीं भगवान् ने मेरे साथ ही ऐसा क्यूँ किया.. हलन्त हैंडीकैप है इसमें उस बेचारे की क्या गलती..ये कारक अक्सर उससे मारपीट करता रहता है..और ये विभक्ति से कहने जाओ तो..कैसे बिहैव करती है..वो तो तुमने देखा ही है..जरा सा भी रहम तो आना दूर...ऊपर से मेरे बच्चे का मजाक बनाती है....मैं हैंडीकैप्ड कैंप जा जा कर दूसरे लोगों की कितनी सेवा करती हूँ...फिर भी भगवान् मुझे ही दुःख देते हैं " संधि रुआँसी हो गई

" देखो संधि ...इस दुनिया में दो तरीके के लोग होते हैं...एक जो लोगों को जोड़ते हैं ....उनके दुखों को समझते हैं ...उनको हौसला देते हैं जैसे कि तुम हो ...और ...दूसरी तरफ विभक्ति जैसे हैं ...जो किसी को अपने आगे कुछ नहीं समझते...दूसरों का मजाक उड़ाते हैं ...और लोगों में अपने को बड़ा बना के ...दिखावा करते हैं...ऐसे लोग समाज को बांटते है.." व्याख्या ने उसे समझाया और आगे कहा

" और ये कहाँ अच्छा लगता है कि..बच्चों की लड़ाई में बड़े इस तरह तू तू मैं मैं करें..अच्छा ये बता ..अगर हलन्त ऐसा नहीं होता तो क्या... तुम्हे हलन्त जैसे और बच्चों से इतनी हमदर्दी होती?..नहीं न..शायद भगवान ने तुम्हारे साथ ऐसा करके..ऐसे और बच्चों के लिए तुम्हारे मन में उनके लिए सम्मान और ममता जगाई है..जिससे उन्हें भी एक सहारा मिल सके..चल अब परेशान मत हो..जाने दे..आगे से हलन्त को निष्कर्ष और टिप्पणी के साथ खेलने भेज दिया करना" व्याख्या ने उसे हिम्मत दी..संधि हलन्त को लेकर चली गई

"मम्मा..हलन्त बैया ने..वो..वो..अमी..ताब..बरतन..के दो बूँड ..जिनडगी वाले पो.लि..यो.. ड्रा..फ नई पिया था...टिप्पणी ने अपनी तुतलाती आवाज में व्याख्या से पूछा

" हाँ बेटा..शायद नहीं पिया.." उसने टिप्पणी को प्यार से चूमते हुए कहा और मन ही मन बुदबुदाई "शायद विभक्ति को ज्यादा जरूरत थी उन ड्रॉप्स की..पर क्या मानसिक विकलाँगता के लिए कोई ड्रॉप्स आता है ?"।

'सक्षम व्यक्ति के जीवन में भगवान् की उत्पत्ति देर से होती है'

-तुषारापात®™

Tuesday, 28 July 2015

सच्ची कहानी: एक और आतंकी हमला

तड़..तड़..तड़ तड़...गोलियों की लगातार आवाज से पूरी चौकी थर्रा गई....दूर कहीं बम का जोरदार धमाका होता है..........धड़ाम............... ..

"अबे...ये आर्मी वाले..हमपे गोलियॉं क्यूँ बरसा रहे हैं..ओये फटाफट..दीवार फांदो ..और पोजीशन लो" इंस्पेक्टर बादल सिंह ने खुद चौकी की दीवार की ओट लेते हुए अपने सभी सिपाहियों से कहा
उधर सेना की वर्दी पहने चार लोग लगातार गोलियाँ चलाते चौकी के अंदर घुसे चले आ रहे थे..उन्होंने चौकी में किसी को न पाकर गुस्से में आकर चौकी को बम से उड़ा दिया और पास के एक मकान की तरफ दौड़ गए

" करमजीत..ये सेना के नहीं लगते..साले चेहरे मोहरे से तो अफगानी लगते हैं..तू फटाफट हेड क्वार्टर फोन कर फोर्स मंगा..इन बहन के टकों को मैं
जरा देखता हूँ " सिपाही से ये कहकर अपनी पिस्तौल निकाल बादल सिंह उन चारों के पीछे जाते हैं, करमजीत हेडक्वार्टर फ़ोन लगाने लगता है उधर उस मकान में छिपे लोग जब इंस्पेक्टर बादल को अपनी तरफ आते देखते हैं तो फिर से फायरिंग शुरू कर देते हैं इंस्पेक्टर किसी तरह खुद को बचा के वापस आता है इतनी देर में एस पी बलजीत सिंह फ़ोर्स लेकर आ जाते हैं और उस मकान को चारों ओर से घेर लेते हैं अब आतंकवादी उस मकान में फंस जाते हैं और गोलियों की बौछार दोनों तरफ से होने लगती है

पूरे देश में आग की तरह ये खबर फ़ैल जाती है कि पंजाब की पुलिस चौकी पे आतंकवादियों का दुस्साहसिक हमला,न्यूज़ चैनल पे ख़बरें दौड़ने लगती हैं फेसबुक ट्विटर व्हाटसएप पे तुषार सिंह जैसे सत्तारी लोग पोस्ट चेपने लगते हैं संसद में प्रश्न उठने लगते हैं प्रधानमन्त्री गृहमंत्री गोपनीय मीटिंग करने लगते हैं सेना भेजने का आदेश दिया जाता है उधर एस पी बलजीत सिंह स्थिति का पूरा जायजा लेकर अपने जवानो से कहते हैं " जवानो ये हमला हमपे हुआ है और इसका जवाब हम ही देंगे ,सेना आती रहेगी तब तक हम इन्हें इनकी बहत्तर हूरों से मिलवा चुके होंगे...सब तैयार ?"
"जी साब जी" सारे जवान अपने अपने हथियार से लैस होकर तेज आवाज में एक सुर से कहते हैं
एस पी बलजीत सिंह दो घंटे की मुठभेड़ के बाद तीन आतंकवादियों को मार गिराते हैं और चौथे को जिन्दा पकड़ लेते हैं और उसे सेना के हवाले कर देते हैं इस मुठभेड़ में न तो कोई पुलिस का जवान घायल हुआ न मरा और न ही किसी नागरिक को एक हलकी सी भी खरोंच आई ।
सेना उस चौथे बचे आतंकवादी से पक्के सबूत पा जाती है कि इसमें पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के हाफिज सईद का हाथ है ये सच जानकर प्रधानमन्त्री तुरंत कैबिनेट की मीटिंग बुलाते हैं जहाँ दस मिनट में ये सामूहिक निर्णय होता है कि जिस तरह अमेरिका ने पाकिस्तान में घुस कर लादेन को मार गिराया था उसी तरह हम भी देश की इज्जत पे हुए इस हमले का बदला लेते हैं
वायुसेना के 11 सर्वश्रेष्ठ फाइटर प्लेन पूरा असलहा और जरुरी सामान लोड कर पाकिस्तान पे वहाँ हमला करते हैं जहाँ हाफ़िज़ सईद छुपा होता है और चार घंटों में हाफिज सईद को मार कर उसका शव लाकर संसद भवन के सामने रख देते हैं और इस तरह देश की अस्मिता... ............. .. ... .............................................
क्या हुआ ?
कहानी सच्ची नहीं लग रही क्या ?
इतने सालों से नेताओं के बयानों से बहलते आ रहे हो.. इस बार मेरी कहानी से बहल जाओ..क्या फर्क पड़ता है.. कल से मन बहुत बेचैन है कलाम सर की खबर के बाद तो रात एक कौर भी नहीं निगला गया , सोचा मैं तो राइटर हूँ मनचाही कहानी लिख के अपना दिल तो बहला ही सकता हूँ तो हैप्पी एंडिंग की ये कहानी लिख ली है..जब खुद को बहलाना ही है तो अपनी मनचाही कहानी से बहलाऊँगा किसी नेता की कड़ी निंदा या ये हमला हम बर्दाश्त नहीं करेंगे से क्यूँ बहलूं ?
वो तो कलाम साब इतनी पुण्य आत्मा थे कि जाते जाते भी सरकार को राहत दे गए आतंकवादी हमले से लोग उनकी तरफ डाइवर्ट हो गए और सरकार ने कुछ चैन की सांस ले ली वरना इस बार जनता में कुछ आक्रोश तो था
चलो एक और तारिख जोड़ लेते हैं या याद कर लो विजय दिवस मनाने को हम भी चलते हैं अपने काम धंदे पे.....जिंदगी चलती रहती है चाहे कोई मरे कोई जिए........................।

-तुषारापात©™

Monday, 27 July 2015

कयामत

बनी थी कायनात जब
सितारे और इंसान बराबर थे
ज़मीं पे फिर कुछ दरिंदे हुए
वो इन्सां मारते गए
फलक पे सितारे बढ़ते गए
कभी कभी टूटता है कोई तारा
कयामत का दिन
ख़ुदा को याद दिलाने को ।

-तुषारापात®™

डियर पड़ोसन !

डियर पड़ोसन !
माना कि तुमने नई नई स्कूटी ली है और पिछले ७ दिनों से मुझे दिखाने को लेकर बहुत परेशान हो,आज जब मैं वापस घर आया हुँ तो देखता हूँ कि अपनी सफ़ेद चमचमाती स्कूटी पर,अपनी ज़ुल्फ़ें उड़ाती,मुझे देखकर मुस्कुराती हुयी तुम फरररररररररररर से मेरे सामने से निकल जाती हो।
भई! ऐसा मत किया करो ! तुम्हारी जागरूक मम्मी को शक़ हो सकता है।
अपने घर के बाहर,स्कूटी का स्टैंड लगाने का वो तुम्हारा अंदाज़!
उफ़! पूरी ताकत लगा देने पर भी मुझे ये दिखाने कि कोशिश करना कि कितनी ease के साथ तुमने ये 'करिश्मा' किया।
तुम्हारी स्कूटी के वो पीले पीले indicators ,उनके जलने बुझने पर buzzer का वो ए. आर. रहमान टाइप का संगीत,मेरे घर के सामने से गुजरने पर तुम्हारा स्कूटी का वो हॉर्न का बार बार बजाना,आखिरकार मेरी मोटरसाइकिल के पेट्रोल को जलाने पर मुझे अमादा कर ही गया !
मेरी मोटरसाइकिल तुम्हारी स्कूटी के पीछे ऐसे चलने लगी जैसे कृष्ण कि बांसुरी के पीछे गोकुल कि गईया!
न जाने कब क्या हुआ कि  मोटरसाइकिल का मेरा right indicator तुम्हारी स्कूटी के left indicator के साथ जलने लगा और तुम्हारे मेरे प्यार का orchestra हॉर्न के साथ साथ पुरे मोहल्ले में बजने लगा।
पर जबसे त्रिपाठी अंकल का लड़का राहुल pcs mains में clear हुआ है तुमने मुझे interview करना ही बंद कर दिया है।
अब तुम्हारी स्कूटी कि main light उसकी कार कि head light से मिलकर जलने लगी और तुम उसकी कार कि front seat पर देखी जाने लगीं।
मेरी मोटरसाइकिल में पेट्रोल तो है पर होती नहीं start है,
मेरी तरह वो भी बहुत उदास है
पर अभी अभी पता चला है कि मेहरोत्रा अंकल के यहाँ नए किरायेदार आये हैं और साथ में लाल लाल स्कूटी भी लाएं हैं;
इस बार मैंने मोटरसाइकिल को गैराज में park कर दिया है और bank में car loan का application पहले ही भर दिया है।

(कुछ समय पहले radio RJ class के लिखा था )

-तुषारापात®™

Sunday, 26 July 2015

बजरंगी भाईजान

"कहानी वो भी सलमान खान की फ़िल्म में" मुझसे जब किसी ने फ़िल्म देख आने को कहा वो भी बड़ी तारीफ करके तो मेरे मुंह से सबसे पहले ये ही शब्द निकले, फिर सोचा ये सलमान खान को नापसन्द करने वाला मेरा दोस्त अगर फ़िल्म की इतनी तारीफ कर रहा है तो कोई तो बात होगी तो जहाँ कहानी हो वहाँ राइटर को तो पहुँचना ही था तो मैं भी पहुँच गया नॉवेल्टी थियेटर में और देख आया फ़िल्म।
फ़िल्म की शुरुआत में जब बच्ची शाहिदा (असली नाम शायद हर्षिला) एक मेमने को गढ्ढे से निकालने के चक्कर में अपनी माँ से ट्रेन में बिछड़ जाती है और वो गूंगी होने के कारण अपनी माँ को आवाज नहीं लगा पाती है तो उसकी छटपटाहत देख के मन उसी मासूम के साथ बंध जाता है पूरी फ़िल्म में जब जब वो बच्ची स्क्रीन पे आती है तो मेरी आँखों में या तो नमी थी या होंठो पे मुस्कान और कभी कभी दोनों एक साथ एक तरफ मेरी आँखे सीलन पकड़े थीं और दूसरी तरफ मेरे सूखे होंठ मुस्कुराहट, भावनाओं से भरी कहानी आपको पूरी तरह बांधे रखती है और आप मन ही मन बस ये दुआ करने लगते हैं कि काश ये बच्ची पाकिस्तान अपने माँ बाप के पास पहुँच जाए आप भूल जाते हैं की वो पाकिस्तानी है मुस्लिम है या मांसाहारी है जानते हैं मन में ये जो भावना उठती है उसे ही इंसानियत कहते हैं और कबीर खान की ये फ़िल्म बहुत ही बढ़िया तरीके से इसी पे आधारित है।
जिस वक्त बजरंगी शाहिदा को ट्रेवल एजेंट के पास छोड़ के जाने लगता है और वो गूंगी मासूम बच्ची अपनी आँखों में ख़ौफ़ और आंसू लिए जब खिड़की के शीशे पे हाथ पटक पटक के उसे बुला रही होती है तो ऐसा लगा अरे ये ही तो वो इंसानियत है जिसकी आवाज़ दोनों मुल्कों के सियासत दानो ने कभी मुल्क और कभी मजहब के नाम से दबा रखी है वो बजरंगी को न बुलाकर हमें ही तो बुला रही है और आखिर में जब दोनों देशों के लोगों की इंसानियत जागती है तो वो सरहद पे लगे कांटे तोड़ देते हैं और वो प्यारी सी बच्ची बोल उठती है यानी इंसानियत जाग गई और बंटवारे की सारी हदें टूट गई।
सलमान खान चरित्र अभिनेता के रूप में अच्छा काम किया तुमने क्योंकि इस फ़िल्म की हीरो तो वो बच्ची है जो इंसानियत का रूप है।
नहीं देखी अभी तक तो देख आओ ये फ़िल्म फ़िलहाल मैं अपनी बहुत पहले लिखी दो पंक्तियों के साथ अब अल्प विराम लेता हूँ-
'क़ौम के ठेकेदारों ने एक खामोश सरहद खींची थी
  दोनों मुल्कों में आज तक बंटवारा बोल रहा है'

-तुषारापात®™




निराला से निराले तक

"जो बिकता है वो लिखिए
बेवजह कानून मत छौंकिए"

आज अगर महाकवि 'निराला' भी होते तो उन्हें भी अपनी कविता
'वो तोड़ती पत्थर
देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर'
(जिन्होंने पढ़ी होगी वो जानते होंगे इस कविता का मोल, जिसने न पढ़ी हो तो पढ़ लीजिये मातृभाषा हिंदी पे थोडा अहसान तो कर ही सकते हैं न ) लिखते तो उन्हें भी कुछ यूँ लिखना पड़ता :

'वो भेजती sms टाइपकर
 देखा उसे मैंने एंड्राइड मोबाइल पर
 वो भेजती sms टाइपकर
 कई हैं whatsapp यार
 जिनके msg हैं उसे स्वीकार
 white white कलाइयां
 touch screen पे चलती उंगलिया
 नाखुनो से झटाझट प्रहार
 गर्मियों के दिन
 चढ़ रही थी धूप
 Make-up से दिव्य रूप
 प्यास बुझाती pepsi गटगटाकर
 उठी झुलसाती हुई लू
 Cotton के जैसे जलती हुई भू
 हनी सिंह का गाना बजाती
 मंगाने को boyfriend की AC कार
 वो भेजती sms टाइपकर ।

-तुषारापात®™

Saturday, 25 July 2015

लापता पता

दिल के डाकखाने में कुछ लिख के दबा रखा है
बंजारे लापता लोगों को ख़त भेजूँ तो कहाँ भेजूं

-तुषारापात®™

You born as a 'Terrorist' but Now you are a Muslim!

अंग्रेजो का एक महीने का त्योहार चल रहा था जिसमे वो NON VEG नही खाते थे.उनके मोहल्ले मे एक सरदार रहता था,जो हर रोज चिकन बनाकर खाता था.चिकन की खुशबू से परेशान होकर अंग्रेजो ने अपने पादरी से शिकायत की.
पादरी ने सरदार जी को कहा कि तुम भी ईसाई धर्म स्वीकार कर लो,जिससे किसी को आपसे कोई समस्या ना हो.हमारे सरदार जी मान गए.तो पादरी ने सरदार जी पर Holy water छिडकते हुए कहा

"You born as a 'SIKH' but Now you are a 'Christian'

अगले दिन फिर सरदार जी के घर से फिर चिकन की खुशबू आई तो सब अंग्रेजो ने पादरी से उसकी फिर शिकायत की.अब पादरी अंग्रेजो को साथ लेकर सरदार जी के घर मे गए तो देखा,
सरदार जी चिकन पर Holy Water छिडक रहे थे और कह रहे थे,

"You born as 'Chicken' but Now you are 'Potato'

भारत सरकार भी बेकार में फाँसी की सजा दे रही है उसे भी याकूब मेमन पे बकरी का दूध छिड़क के ये कहना चाहिए,

"You born as a 'terrorist' but Now you are a 'Muslim'

और कोई भी मुसलमान तो आतंकवादी होता ही नहीं तो सजा कैसी ? क्यों ओवैसी साहब..आपने कभी देखा क्या कोई मुस्लिम आतंकवादी? नहीं न ? मैंने भी नहीं देखा ।

-तुषारापात®™
© tusharapaat.blogspot.com

सीने में कब्रिस्तान

एक एक कर के मेरे/हर लफ्ज ने/खुदखुशी कर ली
मैं एक शायर/सीने में दबाये फिरता हूँ/न जाने लाशें कितनी

-तुषारापात®™

Thursday, 23 July 2015

सौतन सड़क

पैरों में मेरे लिपट के/खूब रोइ/एक रोज गली मेरी
कि तू कैसे किसी/सौतन सड़क का/हमसफ़र हो गया

-तुषारापात®™

डेटॉल

दिल को डेटॉल में भिगो के रखिये
ये इश्क बड़ी संक्रामक बीमारी है

(मानसूनी मौसम में जनहित में जारी)
-तुषारापात®™

खाली हाथ

तू है शहंशाह/हाथी घोड़े/अपने नाम के महल/छोड़ जायेगा
'तुषार'/एक मामूली शायर/बस/कागज़ कलम/छोड़ जायेगा
उसके घर/झुका सर लेकर/मैं भी पैदल/तू भी/पैदल जायेगा

-तुषारपात®™



Wednesday, 22 July 2015

रात के शहंशाह

दिन के खण्डहर से
शाम,छुड़ा लाइ है रात का महल
नींद के मुजरे पे,ख्वाब लुटाए जायेंगे
कई एक रात के शहंशाह
सुबह तक फिर खाली हाथ
अपने खण्डहर के चौकीदार हो जायँगे

-तुषारापात®™

इलाज़

आज भी खाना खाने के बाद कमल के पेट में जोरों का दर्द होने लगा तो वो अपनी पत्नी सुंदरी से बोला "सुनती हो...वर्मा डॉक्टर बिल्कुलहि बेकार हई .....बस नीली पीली गोली दै के पइसा अइन्ठत है सालो.."

सुंदरी उसका रोज रोज का दुखड़ा सुन सुनकर ऊब चुकी थी और अपने पति की चिंता में परेशान भी थी, खीज के बोली " कित्ती बार तो कहो हई तुमसे....नखलऊ जाइके बड़े डाक्टर कहियां दिखाई लेव....इहाँ मल्लावां महियाँ का धरो हई...लेकिन नाई...पेट पकड़े रहियो...पर जइहउ नाहि"

"कलहि निकल जइबो...राजेश भइयाक साथ उनकी मोट साइकल सेरे" कमल ने आखिरकार मन बना ही लिया था, अगले दिन वो और राजेश लखनऊ के मशहूर और बड़े डॉक्टर मेहरोत्रा के नर्सिंग होम में पहुँचते हैं
" भइया राजेश..इहाँ तो जइसे पंजीरी बट रही होय..इत्ती भीड़ हई" कमल ने वहाँ जमा भीड़ देखते हुए कहा

"अरे बहुत बड़ो डाक्टर हई..चार पाँच घण्टा महियां अपनो नम्बर अईहई" राजेश ने कहा
करीबन पाँच घण्टे के बाद वो लोग डॉक्टर मेहरोत्रा के चेम्बर में बैठे थे

"डाक्टर साहब...पेट बहुत पिरावत राहत हई..खाना खायेक बाद तो बर्दाश्त नाइ होत" जितनी देर में कमल ने अपना कष्ट डॉक्टर को बताया उससे पहले ही डॉक्टर मेहरोत्रा पूरा प्रेस्क्रिबशन लिख चुके थे और बोले " देखिये आपकी समस्या गंभीर लग रही है.. मैंने कुछ खून और पेट की जाँचे लिखी हैं वो आज ही करवा लीजिये...और हाँ ये एक कैप्सूल अभी ही खा लीजिये..कल रिपोर्ट लेकर फिर दिखाइए मुझे"

"पर डाक्टर साहब..हम तो बाहिर केरे हैं...कमल की बात अधूरी रह गई एक डॉक्टर का हेल्पर लड़का उन्हें उठने को बोला की वो सब समझाता है वो लोग अब उसके साथ चलें

" देखिये..आप अपना खून का सैंपल यहाँ दे दीजिये..और पूरे पेट का अल्ट्रासाउंड और सीने का एक्स-रे होना है..उसकी रसीद कटवा लीजिये
आपका टोटल पैसा हुआ 9500 वो पहले जमा करा दीजिये" डॉक्टर के सहायक लड़के ने राजेश से कहा और वापस चला गया

" राजेश भइया..रुपिया पॉंच सई तो फीस महियां लइ लीन और अब 9500 और... का जरुरी है ई जाँचे कराना" कमल ने कहा

" अब डाक्टर कहिन हई तो..जरुरी ही हुईहि." राजेश और कहता भी क्या
खैर साहब डॉक्टर की वाणी ब्रह्म वाणी मान के वो पैसा जमा करा देते हैं डॉक्टर का दिया कैप्सूल खा कर और खून का सैंपल तथा अन्य जाँचे आदि कराकर परसों का अपॉइंटमेंट लेकर वापसी की राह पकड़ते हैं

एक दिन के बाद वो रिपोर्ट लेकर डॉक्टर मेहरोत्रा से फिर मिलते हैं, डॉक्टर सारी रिपोर्ट देखने के बाद बोलते हैं" स्थिति बहुत गंभीर दिख रही है, आपके पेट में गाँठ जैसी दिख रही है आप तुरंत एडमिट हो जाइये फिर आगे देखते हैं क्या इलाज सही रहेगा"

भगवान् के अवतार ने भगवान् के पास जाने का डर दिखा के उन्हें अपने यहाँ एडमिट करवा लिया,उसके बाद सात दिन तक अपने अस्पताल में रखा सी टी स्कैन, एम आर आई आदि जितनी जाँचे संभव थी करवा ली,हर दिन के रूम,नर्सिंग,डॉक्टर विजिट दूसरे डॉक्टर के विजिट के नाम पे 95000 रुपैये डकारकर जब देखा की कमल अब और नहीं दे पायेगा तब एक दिन राजेश से बोले" देखिये मुझे शक है कि आपके दोस्त को पेट का कैंसर है..जिसका सबसे अच्छा इलाज यहाँ पी जी आई में होता है..मैं कमल को वहाँ रेफर कर रहा हूँ आप आज ही इसे वहाँ ले जाकर दिखाइए"
राजेश ये बात सुनकर घबरा गया उसने कमल को बताया कमल की तकलीफ भी मेहरोत्रा के यहाँ एडमिट होने के बाद से और बढ़ गई थी तो मरता क्या न करता,तीन घंटे बाद पी जी आई के दरबार में वो दोनों हाजिरी लगाये थे नंबर आने पे डॉक्टर ने बोला " हम इन्हें एडमिट कर ले रहे हैं..पेट का ऑपरेशन करना पड़ेगा....गाँठ निकालकर बायप्सी के लिए भेजेंगे..अगर उसमे कैंसर आया तो आगे और इलाज चलेगा..और अगर नहीं ..तो आप पूरी तरह फिट हो जायेंगे"

"डाक्टर साहब..पइसा कित्तो.." कमल ने बहुत धीमी आवाज में पूछा

"आप ये परचा लेकर उस कॉउंटर न 13 पे चले जाइये वो सारा हिसाब बता देंगे" डॉक्टर ने कहा और चिल्लाया" नेक्स्ट"

राजेश और कमल कॉउंटर न. 13 से पैसा पूछ कर बुझे मन से हॉल में आकर बैठ गए

"लगत हई..राजेश भइया..जमीन बेचना पड़िहई..अब और सवा लाख रुपिया कहाँ सेरे अयिहई" कमल ने आँख के आये आंसू पोछते हुए कहा

जमीन बिक गई,ऑपरेशन हो गया पता चलता है की कमल को कैंसर नहीं है खाने में मिर्ची और तेल मसाला खाने से उसे पेट दर्द होता था और यहाँ के डॉक्टर ने जब बायप्सी से वापस आई उस गाँठ को दिखाते हुए उन्हें उसके बारे में बताया तो कमल और राजेश के होश उड़ गए और उन्हें बहुत ज्यादा गुस्सा भी आया

"नमस्का..डाक्टर साहब...आप केरी एक अमानत रहाय हमरे पास..सोचो लौटावत चलीं.." डॉक्टर मेहरोत्रा के चेम्बर में जबरदस्ती घुसते हुए कमल ने डॉक्टर मेहरोत्रा से चिल्ला के कहा

" डाक्टर साहब..ई हमरे पेट केरी गाँठ हई..जो हमका सवा दुइ लाख केरी पड़ी हई..आप कहियाँ हमरी तरफ सेरे गिफ्ट है " कहकर कमल ने बायप्सी की थैली रख दी और वापस चला आया

डॉक्टर मेहरोत्रा बहुत देर तक अपनी मेज पे रखे बायप्सी की थैली में बंद उस कैप्सूल को देखते रहे जो उन्होंने कमल को पहले दिन खाने को दिया था।

'मेडिकल साइंस ने जितनी अधिक उंचाईयाँ पाई है ,कुछ डॉक्टर उतना ही नीचे गिरते गए हैं'

-तुषारापात®™

हर्फ़

दो 'हर्फ़' जरा साथ साथ क्या थे
लोगों ने सैकड़ों 'लफ्ज़' बना दिये

हर्फ़=अक्षर
लफ्ज़= शब्द (यहाँ बातें या अफवाहों के सन्दर्भ में प्रयोग हुआ है)
-तुषारापात®™

Tuesday, 21 July 2015

असमान आसमान

चलो बताता हूँ क्या है हममें तुममें असमान
बादलों के पार
चाँद के रथ पे
मेरा हाथ पकड़ के
उड़ जाएँ कर जाएँ पार सातों आसमान
ऐसे ही बहुत सपने हैं तुम्हारे प्रिया
और मेरे सपने हैं कुछ यूँ
एक बड़े घर में तुम्हारे साथ रहूँ
ई एम आई से बिलकुल न डरूँ
जिस ड्रेस पे तुम हाथ रख दो
उसका प्राइस टैग न देखूं
एक बार तुम्हे टेम्पो के बजाय
अपनी कार से आते जाते देखूँ
तुम्हारे काल्पनिक सपने तुम्हे खुश करते हैं प्रिये
और यथार्थ के वास्तविक सपने मुझे रखते हैं परेशान
चलो बताता हूँ क्या है तुममे मुझमे असमान

-तुषारापात®™


हिंदी का गुमनाम लेखक

"व्याख्या...व्याख्या...कहाँ हो तुम..." ऑफिस से वापस आकर फ्लैट के दरवाजे से ही सन्दर्भ ख़ुशी से उछलता और चिल्लाता चला आ रहा था

" क्या हुआ...राइटर बाबू....बड़े खुश लग रहे हो...लॉटरी लग गई क्या आज" व्याख्या किचेन से निकलते हुई बोली

" ये देखो...पूरे दो लाख का चेक...मुक्ता आर्ट्स से आया है..यू नो..मेरी स्क्रिप्ट सेलेक्ट हो गई...अब अगर उसपे मूवी बनी तो...कम से कम पंद्रह लाख मिलेंगे.." सन्दर्भ चेक के पंख लगा मानो उड़ा जा रहा था

" wow...सच में...ओह गॉड...सन्दर्भ तुमने कर दिखाया...मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा" व्याख्या की आवाज़ ख़ुशी से भर्रा सी गई उसे समझ ही नहीं आया इस इतनी ख़ुशी की बात पे वो अपनी कैसी प्रतिक्रिया दे

"चलो जल्दी तैयार हो जाओ...निष्कर्ष और टिप्पणी को भी तैयार कर लो..आज हम क्लार्क्स अवध में डिनर करेंगे...भई अब फाइव स्टार सेलिब्रेशन तो बनता ही है .....मैं बस फटाफट नहा लेता हूँ.." सन्दर्भ ने बैग एक तरफ फेंका और चेक व्याख्या को थमा अंदर चला गया, व्याख्या चेक को हाथ में पकड़े पकड़े सोफे पे बैठ गई और चेक को देखते देखते कहीं अतीत में खो गई (शायद व्याख्याएं अतीत की ही होती हैं भविष्य की तो बस कल्पनायें होती हैं)

उसे वो समय याद आ रहा था जब सन्दर्भ के बारे में उसने अपने घर में बताया था और कहा था कि वो शादी करना चाहती है हिंदी के इस गुमनाम लेखक से

"वो तो ठीक है...राइटर है...पर काम क्या करता है...कमाता भी है कुछ..या तुम्हारी पॉकेट मनी से ही चाय पीता है " संस्मरण बाबू ने व्यंग्य करते हुए पुछा

" पापा..वो बहुत अच्छा लिखता है..एक दिन बहुत बड़ा राइटर बनेगा..... और सबसे बड़ी बात मुझे बहुत चाहता है..और ये ही उसकी सबसे बड़ी कमाई है" व्याख्या ने आहत होते हुए अपने पापा से कहा

" बेटा..एक तो राइटर और वो भी हिंदी का.. न जाने कितने 'निराला' भूखे बेइज्जत घूमते देखे हैं मैंने...जानती हो तुमसे भी पाँच साल छोटी उम्र में मैंने अपना बिज़नेस जमा लिया था..... जिस उम्र में लोग पैसे पैसे के लिए अपने बाप का मुँह ताकते थे.. उस उम्र से मैं अपना घर शान से चला रहा हूँ और तुम्हारी माँ को सारी दुनिया की खुशियाँ देता आया हूँ....क्या दे पायेगा वो तुम्हें" संस्मरण बाबू ने अपने नाम को चरितार्थ करते हुए पहले अपनी शौर्य गाथा सुनाई और फिर व्याख्या की सपनो की मिठाई में यथार्थ का कड़वा करेला भी रख दिया

" देख व्याख्या..तेरे पापा ठीक कह रहे हैं... अरे जब कुछ कमाता नहीं है.. तो तुझे कैसे रखेगा.....तेरे पापा जैसा तो कोई हो नहीं सकता.. पर कम से कम लड़के में कुछ तो हो..जैसे वो राणा साहब का लड़का ..अरे..वो अर्थ कितना अच्छा लड़का है खूब पैसा कमा रहा है ..जैसा नाम वैसा गुण.." जीवनी ने उसे दुनियादारी समझानी चाही

" माँ.. अब तुम तो रहने ही दो..वैसे भी आपके पास पापा के शब्दों के अलावा कोई नई बात तो होती नहीं....आप तो बस उन्हीं का गुणगान करो और वैसे भी जीवनी का अपना कुछ नहीं होता वो हमेशा किसी और की जिंदगी की कहानी भर होती है" व्याख्या ने आज पहली बार अपनी माँ से इतनी बेबाकी से बात की थी

" मैं आप लोगों को बताये देती हूँ.....शादी मैं सन्दर्भ से ही करुँगी..ये व्याख्या...किसी अर्थ..या...भावार्थ की नहीं होगी....ये व्याख्या सिर्फ सन्दर्भ की है....और उसी की होगी" कहकर वो अपने कमरे में तेजी से दौड़ गई,संस्मरण बाबू और जीवनी एक दूसरे को बस देखते ही रह गए

"अरे...अभी भी चेक पकड़े बैठी हो..उठो यार तैयार हो." सन्दर्भ की आवाज़ से व्याख्या वर्तमान में आई

" हाँ...हाँ बस हो रही हूँ....जरा इस चेक की फ़ोटो क्लिक करके फेसबुक पे एक पोस्ट डाल दूँ..आखिर सबको पता तो चले तुम्हारी इस कामयाबी का....और हाँ डिनर हम क्लार्क्स में नहीं...द 'ताज' में करेंगे... ये सेलिब्रेशन फाइव स्टार नहीं.....सेवन स्टार होना चाहिए।"

'हिंदी और हिंदी लेखक के सम्मान के लिए ये एक छोटा सा प्रयास सन्दर्भ संग व्याख्या, आप सबके प्यार,आशीर्वाद और साथ की अपेक्षा रखता है'

-तुषारापात®™


Monday, 20 July 2015

चाँद का मुंह काला

एक रोज सुबह नहीं हुयी
आसमान खाली था
तारे टिमटिमा टिमटिमा के
थक के घर जा रहे थे
एक तारे ने बड़ी हिम्मत करके
रात के काले लिहाफ को थोड़ा सरकाया
तो जरा सी 'ब्रहम-मुहूर्त' की सुबह फूटी
सारे तारों ने देखा
चाँद और सूरज साथ साथ थे
चाँद के काले धब्बों का राज़ अब राज़ न रहा

-तुषारापात®™


Sunday, 19 July 2015

रफू

उधेड़ देता है जमाना जब जज्बात मेरे
मैं कलम से अपने हालात रफू कर लेता हूँ

-तुषारपात®™

कथा

"राम राम ! सुनीता दीदी कैसी हैं आप?"
"अरे सुदीपा ! राम राम मैं बहुत अच्छी हूँ तुम कैसी हो? ये बता तुम पिछले परिवार मिलन में आई थी क्या ? मैं नहीं आ पाई थी मेरी किटी थी"
"हाँ दीदी आई थी और बहुत मजा आया था खूब् भजन हुआ था हम सब खूब नाचे थे, गुरूजी के साथ कई फोटो भी खिंचाई थी fb पे पोस्ट तो की थी आपने नही देखी?
"हाँ देख नहीं पायी,चलो लगता है गुरूजी ध्यान शुरू कराने वाले हैं जल्दी से अपनी जगह ले लेते हैं"
"अरे दीदी उधर आगे कहाँ जा रही हैं इधर पीछे बैठते हैं न आपसे कुछ बातें भी हो जाएँगी वैसे भी आगे तो सबकी सब जगह घेर लीं हैं पहले से"
"हाँ चल पीछे इधर दीवार के पास बैठते हैं कमर भी टिक जायेगी ,आगे तो सारी की सारी चापलूस पहले ही अपना आसन बिछा के उसपे अपना बैग और पानी की बोतल रख के अपना रिजर्वेशन कर देती है हमेशा का नाटक है ये इनका सब की सब मुई बहुत चालाक हैं"
"अरे दीदी थोड़ा धीरे धीरे फुसफुसा के बात करते हैं हम,सब ध्यान में बैठ गए हैं"
" अरे क्या बताऊँ मेरा तो मूड ऑफ हो जाता है इन सबों की मक्कारी देख के आगे आगे घुस के गुरूजी की बड़ी सगी बनती हैं दिखावा करने में सब बड़ी उस्ताद हैं"
" दिखावे से याद आया अब वो भैया नहीं दिखते परिवार मिलन में पहले तो बड़ा गुरु जी के आसपास रुआब से घूमते फिरते थे"
"हाँ समझ रही हूँ किसकी बात कर रही हो, वही न जो बिलकुल गुरु जी तरह धोती कुरता पहनने लगे थे अपने को बड़ा तीस मार खाँ समझते थे"
"आजकल गायब कहाँ हैं वो fb पे भी गुरूजी या आश्रम की कोई पोस्ट न तो शेयर करते हैं like भी नहीं करते "
"अरे गायब क्या सुनने में आया है की निकाल दिए गए हैं आश्रम की मेंबरशिप से"
"लेकिन वो तो हर कार्यक्रम में बड़े जोर से मेहनत करते दिखते थे वो भी टिंच धोती कुरता पहन के"
" अरे गुरूजी की तरह कपड़े पहनने से क्या उनके जितने ज्ञानी हो जायेंगे सुनने में आया है की वो चाहते थे की यहाँ लखनऊ में गुरु जी की तरह वो अपना प्रवचन किया करें मठाधीशी करना चाहते थे गुरूजी ने निकाल बहार किया"
"लेकिन दीदी गुरु जी को उनसे क्या खतरा हो सकता था वो तो परम ज्ञानी हैं हाँ वैसे उन भैया में भी ज्ञान तो बहुत है मैंने देखा है fb पे लिखते तो बहुत अच्छा हैं और बातें भी बहुत अच्छी अच्छी बताते हैं"
"अरे कहीं से टीपते होंगे आजकल copy paste करके सब ज्ञानी बने हुए हैं फेसबुक पे"
"कुछ दिन पहले कोई फ़िल्म की कहानी लिख रहे हैं ऐसी कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस की फ़ोटो भी डाली थी"
"अरे होगी कोई सी ग्रेड भोजपुरी पिक्चर ऐसी आलतू फालतू फिल्मों के लेखक ऐसे घटिया ही रहते हैं"
"पता नहीं दीदी दिखते तो कई जगह है अच्छा काम करते,कभी महिला दिवस कभी रामकथा कभी कोई किताब लिखते और रेडियो पे भी न जाने क्या क्या किया करते हैं यहाँ अपने आश्रम में भी काम तो बहुत करते थे अब राम जाने अंदर की क्या बात थी"
" अरे छोड़ गुरु जी के साथ पुण्य आत्माएं ही टिक पाती है अभी उनमे उतनी purity नहीं रही होगी जितनी हम सब में हैं"
" पर दीदी गुरूजी तो अंतर्यामी हैं सबको शुद्ध कर देते हैं वो गुरूजी के इतने पास रहे उनकी शुद्धि क्यूँ नहीं हुई फिर"
"अरे सुदीपा तू बहुत भोली है छोड़ ये सब हम क्यों अपना मुंह गन्दा करें ऐसे लोगों के बारे में बात करके"
"दीदी लगता है गुरु जी ध्यान से वापस ला रहे हैं सबको अब एक एक करके सबसे उनका आज के ध्यान का अनुभव पूछेंगे"
"चल जल्दी से अपनी अपनी आँखे बंद करके चुप करके सीधे बैठ जा जब वो पूछेंगे तभी आँखे खोलना और सुन अनुभव बताने के बाद गुरु जी के पास जब आशीर्वाद लेने जाऊँ तो फटाफट मेरी कई सारी फोटो खींच लेना "
"हाँ दीदी समझ गयी "
" राम राम ! माँ अब आप अपनी आँखे खोल लें और अपना अनुभव हमसे बाटें"
" अर..र कौन मैं गुरु जी"
"हाँ दीदी गुरूजी आपही से कह रहे हैं"
"गुरु जी श्री चरणों में मेरा सादर प्रणाम! गुरु जी आज ध्यान के उपरांत मुझे सब कुछ सफ़ेद सफ़ेद दिखा जैसे दूध का रंग होता हैं न वैसे कहीं कोई मैल नहीं बस सब कुछ उजला उजला धुला धुला और ...और..हाँ गुरु जी एक बहुत तेज पीली रौशनी मुझे दिखाई दी...मेरा तो मन ही नहीं कर रहा था वापस आने का ...लग रहा था बस आँखे बंद किये आनंद में और गहरे गहरे खो जाऊँ"
" बहुत अच्छे माँ ! आपने ध्यान के प्रथम स्तर की उच्च अवस्था को प्राप्त कर लिया है, ईश्वर की विशेष कृपा है आप पर,राम राम !"

-तुषारापात®™

Saturday, 18 July 2015

जलनखोर सूरज

दहकता है
सुलगता है
जलता फिरता है
ये सूरज यूँ ही नहीं
देख लिया था
एक अमावस की रात
इसने उस चाँद को
कहीं और चार चाँद लगाते हुए

-तुषारपात®™
© tusharapaat.blogspot.com


कलमकार

मैंने कहा :-
"लहू की सौ बूंदों से
बनता है कहीं जा के
स्याही का एक लफ्ज़/
बड़ी आसानी से
कह दिया तुमने
तेरी मेरी अब खत्म हुई/
तुम तो माहिर हो
जाओ अपने लिए
और एक नयी कहानी बना लो"/
उसने कहा :-
"इस कागज़ पे तो हैं
हर तरफ
तुम्हारी ही इबारतें/
ख़ुद को पढ़ती भी हूँ तो
तुम्हारे दस्तख़त के साथ/
नया कुछ लिखने को
तुम्हे ही नहीं दिखती बाकी
कोई जगह मुझमें/
तो क्यों रोकूँ मैं
एक कलमकार के हाथ"/

-तुषारापात®™

Friday, 17 July 2015

ईद मुबारक

किसी सूरज की रोशनाई रही होगी पुर्ज़े में
पढ़ते ही ईद के चाँद की तरह चमक गए वो

-तुषारापात®™

तुम्हारी बिंदी

बारिश की दूधिया बूंदे यूँ
तुम्हारे चेहरे पे पड़ रही थीं
जैसे शिवजटा से निकली गंगा
अपने चाँद पे छींटे लगा रही हो
छत पे बाहें थामे न जाने हम
कितने पल पानी में बहा के  
एक दूसरे की प्यार बरसाती
तरसती नजरों में खूब नहा के
वापस मेरे कमरे में जब आये
तो एक तौलिया ले तुम अपने
बाल सुखा रहीं थीं और मैं
स्टोव पे नींबू वाली चाय बना रहा था
आदतन तौलिया बिस्तर पे फेंक
चाय पी तुम अपने घर दौड़ गयी
बारिश भी तुम्हे रास्ता दे विदा हुयी
तुम्हारी खुश्बू में पूरा डूबा,पूरा भीगा मैं
तौलिये पे चिपकी रह गयी तुम्हारी
सितारे वाली कुंवारी लाल बिंदी से
खुद को तुम्हारा साजन बना रहा हूँ..

-तुषारापात®™

फेसबुक ज्ञान

'जापानी app' (केवल बालिगों के लिए)
हेलो एंड वेलकम टू टनटनाटन टेलि मार्केटिंग!
क्या आप अपनी फेसबुक वाल पे लिख नहीं पाते हैं? मन में इच्छा बहुत पर विचारों की कमजोरी है ? या लिखते तो हैं पर पढ़ने वाले को पूर्ण संतुष्ट नहीं कर पाते ? कभी कभी ऐसा होता है की आपने बहुत अच्छा लिखा पर उतने like और comments आपको नहीं मिलते जितने आपने सोचे थे तो अब आपको घबराने की कोई जरुरत नहीं है और न ही अपने like और comments बढ़ाने के लिए आपको लोगों के बेकार पोस्ट पे 'वाह बहुत खूब', very nice आदि कहने की कोई जरुरत हैं हम लेकर आये हैं आपके लिए परम संतुष्टि दायक,like और comments की बाढ़ लाने वाली, facebook seduction कंपनी की जर्मन टेक्नोलॉजी से बनी 'जापानी app' ।
इस aap का इस्तेमाल करते ही आप बेहतर से बेहतर लिखने वाले को पीछे छोड़ देंगे और आपके मन में विचारों का जोश ही जोश आ जायेगा उँगलियाँ की-पैड पे अपने आप दौड़ने लंगेगी,फ्रेंड रिक्वेस्ट की लाइन लग जायेगी पुरुष और महिला मित्रों की वाहवाही खूब मिलने लगेगी।
इस app का इस्तेमाल बहुत ही सुविधाजनक और आरामदायक है और नए से नए एंड्राइड विंडोज मोबाइल फ़ोन, टैबलेट, लैपटॉप और पुराने से पुराने 'डेस्क-टॉप' के लिए भी ये उतना ही जोरदार काम करता है इसका कोई भी साइड एफेक्ट बिलकुल भी नहीं है बस आपको इसे अपने सिस्टम में डाउनलोड करना है और facebook/whatsaap के सिकंदर बन जाना है।
पुरुषों के लिए जापानी-app M और महिलाओं के लिए जापानी-app F
अलग अलग आर्डर करें और हाँ एक बात और दोस्तों कुछ लोग जापानी-app से मिलते जुलते नामो से नकली app बेच रहे हैं सावधान रहे और धोखा न खाएं ,श्री 'तुषारापात' जी की फ़ोटो लगी जापानी-app ही पूरी तरह असली है।
जापानी-app की कीमत है सिर्फ 2999 जी हाँ सिर्फ 2999 रुपैये (data network charges extra)
तो सोच क्या रहे हैं फ़ोन उठायें!और तुरंत आर्डर करें ! और बन जाइये facebook के सिकंदर!
नोट- पहले काल करने वाले 50 लोगों को fake id पकड़ने वाली हमारी बहेनजी-app बिलकुल मुफ़्त दी जायेगी ।

-तुषारापात®™