Monday, 15 August 2016

दो शब्द

"और अब मैं मंच पर मुख्य अतिथि महोदय को बुलाना चाहूँगी...जो...इसी विद्यालय के छात्र रहे हैं ..और..आज एक बहुत मशहूर गीतकार और बड़े लेखक हैं...जोरदार तालियों के साथ स्वागत कीजिये श्री सत्तार अहमद जी का" काजमैन जूनियर हाईस्कूल के स्वतंत्रता दिवस समारोह में मंच संचालिका जो कि एक नई अध्यापिका ही थीं ने मुझे मंच पे कुछ इस अंदाज में आमंत्रित किया,मैं कम् ऊंचाई के उस छोटे से मंच पे पहुँचा उन्होंने मुझे माइक दिया और आग्रह किया कि मैं विद्यार्थियों से दो शब्द कहूँ मैंने उनका शुक्रिया अदा किया,तथा प्रिंसिपल और सभी अध्यापकों का अभिवादन कर बच्चों से मुखातिब हुआ

"बच्चों...मुझे 15 अगस्त और 26 जनवरी बिलकुल भी पसंद नहीं थे... जब भी..इनमें से कोई त्यौहार आने वाला होता...तो एक अनजाना सा डर मेरे अंदर पैदा होने लगता था.. मैं जब पाँचवी कक्षा में था तब से ही देशप्रेम की कवितायें और छोटे छोटे लेख लिखा करता था...और जैसे आज आप में से कुछ बच्चों ने..अपनी बहुत सुंदर सुंदर कविताएं सुनाई मैं भी उसी तरह मंच पे आकर अपनी लिखी कविताएं पढ़ना चाहता था मगर..." कहकर मैं रुक गया मेरे सामने 30 साल पहले के दृश्य उभरने लगे दिल में वही बचपन वाली धुकधुक होने लगी सब मेरी ओर उत्सुकता से देख रहे थे तो जल्दी से आगे कहना शुरू किया

"मगर मुझे कविता या लेख पढ़ने की परमिशन नहीं दी जाती थी..क्योंकि मेरे पास फुल यूनिफार्म..अ...ड्रेस नहीं हुआ करती थी.. सफेद बुशर्ट तो थी पर खाकी पैंट नहीं थी.. उसकी जगह काली पैंट थी और वो भी कुल जमा एक ही..जिसे दो तीन दिन के गैप पे रात में धोता था और सुबह तक सुखाकर फिर से पहन लेता था...तो...तो आप सब तो जानते ही हैं कि ऐसे मौकों पे जब कई अतिथि भी आते हैं जैसे कि आज मैं आया हूँ..तो बच्चों का फुल यूनिफार्म में आना जरुरी होता है.. नहीं तो स्कूल का नाम खराब होता है तो इसीलिए उस समय के प्रिंसिपल साहब ने मुझे कभी अलाऊ नहीं किया...हालाँकि मैं पढ़ने में तेज था तो उन्होंने काली पैंट में ही मुझे क्लास में बैठने की अनुमति दे रखी थी..तो कहाँ थे हम..हाँ...तो 15 अगस्त और 26 जनवरी को मैं यहीं..इस खंबे के पास..साइड में खड़े होकर दूसरे बच्चों को अपनी ही लिखी कविताएं पढ़ते और लोगों को तालियाँ पीटते मायूस मन से देखा करता था" कहते कहते गला कुछ रुंधा तो मैंने रुककर पानी पिया और जारी हुआ

"फीस तो उस समय बहुत ही कम हुआ करती थी..उसे तो देर सबेर मेरे बेहद गरीब माता पिता जमा करा देते थे पर हम सात भाई बहनों के कपड़े-लत्ते खाने-पीने की....जरूरतें...बस किसी ही तरह पूरी हो पाती थीं.. सातों भाई बहनों में सिर्फ मैं ही स्कूल आता था वो भी अपनी जिद से... खैर...तो ऐसे ही दो साल बीत गए और एक दिन आठवीं कक्षा के मेरे नए कक्षाध्यापक सूबेदार सिंह सर ने मेरी एक दो कविताएं पढ़ीं और मुझे आने वाले 15 अगस्त पर इन्हें पढ़ने को कहा मेरी सकुचाहट देख वो पहले तो चौंके पर बाद में पूरी स्थिति जानकर उन्होंने मुझे एक जोड़ी सफेद शर्ट और खाकी पैंट सिलवा दी और कहा कि अब तुम्हें रुकना नहीं है बेधड़क होके कविता पढ़ना तुम बहुत अच्छा लिखते हो...अगर उन्होंने उस समय वो नहीं कहा होता और आगे तक मेरी पढाई का बोझ न उठाया होता तो आज मैं यहाँ आपके सामने यूँ न खड़ा होता" मेरी आँखें कहते कहते डबडबाने लगीं

खुद को संभाला और आगे कहने लगा "बच्चों..यही है भारत..और यही है इसकी एकता.. देश को लेकर बड़ी बड़ी बातें जो करें उन्हें करने देना तुम बस ऐसी ही छोटी छोटी बातें पकड़ना..और निभाना...कभी भी मजहब के नाम पे बाँटने वाले चंद लोगों की बातों को सच मत मानना.. आपस में प्यार और विश्वास रखना...खुद भी बड़े हो जाओगे और देश भी ....." बच्चों ने जोर की तालियाँ बजाई तो मैं हल्का ठहर गया फिर बोला

"वैसे मुझसे दो शब्द बोलने के लिए कहा गया था..मगर...30 साल से दबी दास्ताँ थी..कुछ लंबी हो गई...आखिर तीस साल बाद इस मंच पे मैं आ ही गया और वो भी बिना यूनिफार्म के" ये सुनकर बच्चे खिलखिला दिए मैंने आगे बस ये कहा और सबको सलाम करते हुए मंच से उतर आया

"बाकी इससे बेहतर दो शब्द और क्या हो सकते हैं....जयSS हिंद"

प्रतिउत्तर में बच्चों ने पूरा विद्यालय परिसर जय हिंद से गुंजायमान कर दिया।

-तुषारापात®™

Saturday, 13 August 2016

व्हाट्सएप्प वात्सल्य

ऑफिस डेस्क पे था कि तभी व्हाट्सएप्प की नोटिफिकेशन रिंग बजी "ट्यूं.. ट्यूं..ट्यूं.." उसने मोबाइल उठा कर नोटिफिकेशन क्लिक किया "खाना सहि टायम पे खा लेना" ये मैसेज पढ़ते ही उसके चेहरे पे आश्चर्य के भाव आये उसने दोबारा से मैसेज चेक किया और बुदबुदाया "खाना सही टाइम पे खा लेना" वो ये मैसेज बार बार बुदबुदा रहा था और उसकी आँखों में पानी भरता जा रहा था

उसने मैसेज का रिप्लाई किया "ये किसने लिखा है...???" उसके मन में संशय उठा कि कहीं उसकी बेटी ने तो ये मैसेज टाइप नहीं किया मैसेज भेज के वो चैट विंडो बड़ी बेसब्री से देख रहा था थोड़ी ही देर में मैसेज सीन होने के दोनो टिक नीले हुए और उसके बाद टाइपिंग शो होने लगा काफी देर तक टाइपिंग दिखाता रहा करीब 15 मिनट के बाद रिप्लाई आया "मेरा फॉन है तो मैं ही टायप करुंगी न..शिल्पा तो कालेज गई हाई"

पढ़कर वो गीली आँखों के साथ मुस्कुराया और खुशी खुशी टाइप करने लगा और जल्दी से भेज दिया "एक पल को तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ...कमाल हो गया...आज सुबह तो मैं भी हार मान चुका था"

"लैंड लाइन की जगह मोबाइल पे बात करना ही किसि तरह सीखा था...पुराने मोबाइल में बटन नहीं समझ आते थे और ये नए टच वाले को चलाना तो बहुत टफ है... उपर से ये गूगल हिंदी इनपोट...पर तुम 20 दिन से सिखा जो रहे थे तो कैसे नहीं आता" दूसरी ओर से इस बार 25 मिनट बाद रिप्लाई आया

वो समझ गया टाइप करने में समय लग रहा है और कुछ शब्द गूगल इनपुट के ऑटो ऑप्शन के कारण थोड़े बहुत गलत भी टाइप हो रहे हैं वो आज सुबह की घटना याद करके दुखी भी था और अभी आये मैसेजों के कारण बहुत खुश भी था उसने टाइप करा "सुबह मैंने बहुत गलत बिहैव किया... कितना झुँझलाया था आप पर..गुस्सा भी किया कि आपके बसका नहीं है...आप वही पुराना फोन चलाओ..." और भेज दिया

"कोई बात नहीं..झल्लहाट तो होती ही है जब एक ही चीज किसी को बार बार समझाओ और वो उस बात को जरा सा भी न पकड़ पाए :) " उधर से इस बार रिप्लाई में एक स्माइली भी आया

उसने तुरंत रिप्लाई किया "बट मुझे इस तरह चीखना नहीं चाहिए था... सॉरी.. सॉरी.. वैसे मैं बता नहीं सकता आपके आये हुए मैसेज देख के इस समय मैं कितना ज्यादा खुश हूँ..बहुत बहुत ज्यादा"

"पर मुझे पक्का यकीन है मैंने तुम्हें उतनी खुशी नहीं दी होगी..जितनी तुमने मुझे उस समय दी थी जब मैं तुमको लिखना सिखा रही थी और तुमने सबसे पहला शब्द लिखा था 'माँ'"

उसने ये मैसेज पढ़ा और टप टप की आवाज के साथ मोबाइल स्क्रीन आँसूओं से भीग गई।

-तुषारापात®™


Tuesday, 9 August 2016

कवितादान

कविता स्त्री है
और पुरुष कवि है
आश्चर्य है
नहीं गया इस ओर ध्यान
नग्न लिपि को पहनाता
कवि अलंकृत परिधान

नश्वर कवि
अपने वरदहस्त से
उकेरता शब्दांगो की वक्रताएँ
भरता षोडशी चंचलताएँ
करता चिरयौवना
कविता का निर्माण

जीविका नहीं
न विपणन
है कविता उसका सृजन
यायावरी पाठक
छोड़ चीरहरण
कर अतीन्द्रिय सुख का संधान

कविता माँ है
कवि शिशु सा है
चक्रीय है ये विधान
कवि पिता है
कविता उसकी कन्या है
कर कवितादान
कवि हो जाता अंतर्ध्यान

-तुषारापात®™

Monday, 8 August 2016

DP में तिरंगा नहीं तो.....

बहुत पहले कहीं पढ़ा था कि सरहद पे जाकर गोली खाना ही देशभक्ति नहीं तुम सड़क पे गुटखा खा के थूकना छोड़ दो देश के लिए वही बहुत है
बात व्यंग्य की है पर इसका अर्थ काफी गहरा है चूँकि अभी पंद्रह अगस्त आने वाला है तो स्वाभाविक है कि हम सबमें देशभक्ति की भावना जागृत होगी और इस भावना का प्रकटीकरण वास्तविक जीवन और सोशल मीडिया के तमाम मंचों पर भी खूब होगा।

मुझे भावनाओं के इस प्रदर्शन में कोई बुराई भी नहीं दिखती क्योंकि हम सब राष्ट्र को लेकर भावुक होते हैं तथा इन मौकों पे भावुकता अधिक हो ही जाती है और अच्छा भी लगता है जब समाज के सभी वर्गों और धर्मों के लोग एकजुट होकर देशभक्ति का और अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हैं।

लेकिन इसी के साथ एक बड़ी समस्या भी उत्पन्न होती है जो पहले से अनेक वर्गों में विभाजित भारतीय समाज को कुछ और नए टुकड़ों में बाँटता है इसको समझने के लिए ज्यादा नहीं कुछ दिन पहले की बात करते हैं।

अभी कुछ दिन पहले पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान ने कश्मीर में मारे गए आतंकवादी और उससे भड़की कश्मीर में हिंसा के विरोध में 'ब्लैक-डे' मनाने की घोषणा की जाहिर है उसकी इस घोषणा से भारतीय जनमानस में उसके प्रति वितृष्णा उठनी ही थी अब उसके विरोध में लोगों ने ब्लैक डे के दिन अपनी प्रोफाइल फोटो की जगह भारतीय सेना के प्रतीक चिन्ह को लगाने का निश्चय किया और ये ट्रेंड जंगल की आग की तरह फैलता गया अब समस्या वहाँ आई जो लोग या तो इससे अंजान थे या उनकी इस तरह की भावना के प्रदर्शन में कोई खास रुचि नहीं थी तो उन लोगों ने भारतीय सेना की तस्वीर नहीं लगाई बस इतनी सी बात से पूरा सोशल मीडिया दो पक्षों में बँट गया जिन्होंने तस्वीर लगाई और जिन्होंने नहीं लगाई वे दोनों पक्ष एक दूसरे के विरोधी बन गए और फिर सिलसिला शुरू हुआ आरोप प्रत्यारोप का कोई किसी को देशद्रोही कह रहा था तो कोई किसी को ढोंगी न जाने कितने लोगों की मित्रता इस बात पर टूट गई पूरा माहौल वैमनस्य से भर गया अब सोचिये तो ये कितना अजीब लगता है कि शत्रु राष्ट्र की एक बेवकूफी भरी बात से यहाँ भारत के देशवासी आपस में ही लड़ने लगे।

भावनाओं के इस तरह के अनुचित और उग्र प्रदर्शन से कुछ प्राप्त नहीं होने वाला इस तरह तो ये मात्र एक स्वांग ही लगेगा क्योंकि अगर दोनों पक्षों को राष्ट्र की चिंता होती तो यूँ सार्वजनिक रूप से लड़ते नहीं दिखाई देते और संसार के सामने जगहंसाई के पात्र न खुद बनते और न ही देश को बनाते।

आप लोग ये मत सोचियेगा कि ये महज सोशल मीडिया का मुद्दा है क्योंकि सोशल मीडिया भी वास्तविक लोगों उनकी भावनाओं और उनकी प्रवृत्तियों से ही संचालित होता है तो ये समाज के स्वरुप को ही दर्शाता है हाँ कभी कभी थोड़ा ज्यादा मुखर दिखाई देता है।

हम सबको ये बात स्पष्ट रूप से समझना चाहिए कि स्वतंत्रता दिवस ये भी याद दिलाता है कि हम कभी पराधीन थे हम पराधीन क्यों हुए उन कारणों को जानना समझना और उन्हें फिर कभी न दोहराना ही सच्चा स्वंतत्रता दिवस मनाना है सिर्फ कोरी एक दिनी भावनाओं के वो भी देखा देखी में किये प्रदर्शन से आपकी आजादी तो दिखती है पर हमारी आजादी टिकती कितनी है ये नहीं कहा जा सकता।

अतः सिर्फ राष्ट्रगान के लिए ही नहीं राष्ट्र के लिए भी खड़े होइए वो भी सबको साथ लेकर और अगर खड़े नहीं हो सकते तो चुप बैठिये कम से कम वैमनस्य को बढ़ावा मत दीजिये।

और हाँ अपने DP में तिरंगा लगाइये न लगाइये पर ऊपर जो चित्र छपा है उसे अपने दिल में उतार लीजिये जिसमें एक सैनिक जो देश के लिए शहीद हो गया उसका बुत बना है और उस जवान के दोनों बच्चे अपने पापा के पुतले से पूछ रहे हैं पापा आप कुछ बोलते क्यों नहीं।

-तुषारापात®™

Thursday, 4 August 2016

दायरा तोड़ती है जब दरिया तो समन्दर बनता है

दायरा तोड़ती है जब दरिया
तो समन्दर बनता है
पनाह लेता है दिल में जब तू
तो मोहब्बत का रिश्ता बनता है

प्यासा सुलगता चाँद
समन्दर खींच के दरिया पीता है
दहकती दरिया की भाप से
तब कहीं तुझसा फरिश्ता बनता है
पनाह लेता है दिल में जब फरिश्ता
तो मोहब्बत का पाक रिश्ता बनता है

दायरा तोड़ती है जब दरिया
तो समन्दर बनता है.................

ख़ुदा की आँख की नमी लेकर
जब कोई बादल निकलता है
छलकता रूहानी बादल
किसी कोह पे जमता है
बर्फीली कोह पे सूरज की आमद से
तब कहीं तुझसा दरिया पिघलता है

दायरा तोड़ती है जब दरिया
तो समन्दर बनता है..................

-तुषारापात®™

Monday, 1 August 2016

ताजमहल

"आह..इट्स ब्यूटीफुल..चाँदनी में नहाया हुआ ताज कितना सुन्दर लगता है..है न वेद" यमुना की तरफ वाली एक मीनार के नीचे खड़े थे हम वहीं से ताज को निहारते हुए उसने मुझसे कहा

"हम्म..बहुत..." मैंने धीरे से कहा और एक नजर ताज पे डाल पहले की तरह फिर उसे देखने लगा काली साड़ी में लिपटी वो खुद ताजमहल लग रही थी,गोरा चेहरा रात के अंधेरे और पूर्णमासी की चाँदनी की मिलावट से स्लेटी लग रहा था,हलकी सर्द हवा उसकी खुली जुल्फों को बार बार उड़ा रही थी ऐसा लग रहा था कि इस काले ताजमहल की कई मीनारें उसके चारों ओर झूल रही हैं शाहजहाँ अगर तुम जिन्दा होते तो आज फिर मर जाते तुम्हारा काले ताजमहल का अधूरा सपना जीता जागता यहाँ खड़ा है

सर्द हवा से बचने को उसने साड़ी के पल्लू को अपने चारों ओर लपेट लिया और बोली "पूरनमासी को...चाँद के लोग ताजमहल का दीदार कर कहते होंगे..वो देखो..आज चाँद निकला है...आज तो दो दो चाँद हैं एक आसमान में और एक यहाँ आगरे में..."

"तीन.." मैंने कहा और उसने ताजमहल को देखना छोड़ के मेरी ओर देखा और मुझे खुद को देखते हुए पाया उसने अपने निचले होंठ को हल्का सा चुभलाया और चेहरे पे उड़ आई ज़ुल्फ को कान के पीछे करते हुए बात बदलती हुई बोली "ये हदीस भी न..कितना घुमायेगा उन लोगों को...तुम्हारी कंपनी को भी..तुम दोनों ही मिले थे..फॉरेन डेलीगेट्स को ताज की सैर कराने को...और कितना टाइम लगेगा"

"आयत...खुर्रम को मुमताज महल मिली थी और वो बादशाह हो गया..या ...वो शाहे जहाँ था इसलिए मुमताज उसकी थी.." मैंने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया बल्कि अपना वही पुराना सवाल उससे कर दिया

"वेद...पता नहीं...मुमताज को जीते जी तो बहुत सौत रहीं थीं..हाँ मरने के बाद उसे ये हसीं ताजमहल मिला... बादशाहों के प्यार की कीमत मुमताजों की मौत होती है" मुझसे नजरें हटा वो फिर से ताज देखने लगी उसकी आँखों में उतर आयी यमुना में दो ताजमहल साफ चमकते मुझे दिखे

"किसी मुमताज को आजतक ताज बनवाते देखा नहीं...ये तो हम ही पागल होते हैं जो ताज बनवाते हैं..." मैंने एक मीनार सी उसके सीने में चुभो दी

"हाँ शायद इसीलिए तुम दूसरा ताज नहीं बनवा पाए...क्योंकि ये मुमताज तुम्हारे लिए मरी जो नहीं..."उसने जैसे कोई पुरानी कब्र खोल दी

"मैं तो नहीं बनवा सका..पर तुमने खुद को ताजमहल जरूर बना दिया... अपने सीने में मेरा प्यार दफना के...मेरा मकबरा हो तुम..आयत..मैं दफ्न हूँ तुममें... और मेरी भटकती रूह रोज देखती है अपने इस ताज को किसी और चाँद की रौशनी में नहाते हुए" कहकर मैं उसके पति और अपने कुलीग हदीस की ओर बढ़ चला,विदेशी मेहमान ताज देख चुके थे।

-तुषारापात®™

Tuesday, 26 July 2016

लव ऐट फर्स्ट साइट

वो अपने दोस्त को बी4 में बिठा के अपने कोच बी1 में आया है,डिब्बे में हल्का सा उजाला है ज्यादातर लोग सो रहे हैं जो लोग अभी कुछ देर पहले कानपूर से चढ़े हैं वो भी लेट चुके हैं और क्यों न लेटें रात के साढ़े बारह से ऊपर का टाइम जो हो चूका है,ट्रेन भी अपनी रफ़्तार में है।

वो अपना सीट नम्बर ढूँढता धीरे धीरे आगे बढ़ता है हाँ ये रही 16 नम्बर अरे पर ये क्या इसपर तो कोई और सो रहा है वो थोड़ा तैश में आकर उसे जगाने वाला होता ही है कि सोने वाले का एक पैर कम्बल से बाहर आता है डिब्बे में जल रही एक मात्र लाइट के रिफ्लेक्शन से उस पैर में पड़ी पायल चमकने लगती है हल्के अँधेरे में भी वो पंजे की गुलाबी रंगत देख लेता है फिर कुछ हिचकते हुए कहता है "एक्सक्यूज़ मी... मिस.. अ..मैडम.. सुनिये ये मेरी बर्थ है.."

कम्बल हटता है वो हलकी नींद से जागी चेहरे पे बिखरे बाल लिए उठती है और एक सिस्का एल ई डी सा चमकता चेहरा देखके वो ठगा सा खड़ा रह जाता है कुछ बोल नहीं पाता वो कुछ देर तक उसे देखती है फिर पूछती है "ओ हेल्लो...इतनी रात को क्या मुझे ताकने के लिए उठाया है?"

वो हड़बड़ाते हुए जल्दी से कहता है "अ.. आप मेरी बर्थ पे हैं...ये बी1 16 ही है न.. ये मेरी सीट है"

"व्हाट रबिश...ऐसा कैसे हो सकता है...अपना टिकेट चेक करो.."उसने अपने बालों को बाँधते हुए थोड़ा जोर से कहा आसपास के लोग भी अब इंटरेस्ट से उनकी बात सुनने लगे

उसने 15 नम्बर की सीट पे लगा स्विच ऑन कर कूपे में लाइट जलाई और अपना टिकेट निकाल कर उसे पढ़के सुनाने लगा "अबोध श्रीवास्तव मेल 28 कोच बी1 सीट नम्बर 16 कानपूर सेंट्रल टू न्यू डेल्ही प्रयागराज एक्सप्रेस...ये देखिये" कहकर अबोध ने उसके हाथ में टिकेट दे दिया उसने उलट पुलट कर टिकेट देखा फिर अपने पर्स से अपना टिकेट निकाल कर उसे सुनाया "प्रयागराज एक्सप्रेस...बी1..16..कानपूर सेंट्रल टू न्यू देहली.. चैतन्या मिश्रा..24" कहकर चैतन्या ने अबोध को अपना टिकेट दिखाया और वापस रख लिया

अबोध हल्का सा परेशान हुआ पर उसके हिलते गुलाबी होंठ और चमकते दाँतों में खुद को गुम होता भी महसूस कर रहा था खुद को संभाल के वो कहता है "पर ऐसा कैसे हो सकता है...मैं तो प्लेटफॉर्म पे लगे चार्ट में भी अपना नाम देख के चढ़ा हूँ..मेरा एक फ़्रेंड भी बी5 में सफर कर रहा है... उसका सामान चढ़वाने में मुझे जरा सी देर हो गई..और इतनी देर में आप मेरी सीट.."

"भई.. आप लोग टी टी से बात करिये..ये साला रेलवे डिपार्टमेंट का सर्वर कुछ भी कर सकता है..एक ही सीट पे दो दो लोगों को टिकेट वाह" 15 नम्बर की सीट पे लेटे इलाहाबादी अंकल आखिर कब तक बीच में न बोलते,इतने में टी टी आ जाता है अबोध उसे सारी बात बताता है टीटी चार्ट में नाम चेक करता है और वो चैतन्या से टिकेट माँगता है वो अपना टिकेट दिखाती है टिकेट देख कर टीटी मुस्कुराते हुए कहता है "मैडम आपका टिकेट इसी ट्रेन..इसी कोच..इसी सीट का है..पर..बस एक छोटी सी समस्या है..आपको कल इस ट्रेन से सफर करना था"

"क्या मतलब...टिकेट आज का ही तो है..26 जुलाई..देखिये डेट भी पड़ी है इसपर.."चैतन्या ने हड़बड़ाते हुए कहा

"मैडम...प्रयागराज कानपूर सेंट्रल 12 बजकर पाँच मिनट पर पहुँचती है.. और रात 12 बजे के बाद डेट बदल जाती है..टेक्निकली..आज 27 है.. आपकी ट्रेन कल जा चुकी है..अब आप इन्हीं के साथ सीट शेयर करिये ट्रेन पूरी फुल है..सीट नहीं है...मैं अभी लौट के आता हूँ आपके पास" टीटी ने कहा और आगे टिकेट चेक करने चला गया

स्थिति बदल चुकी थी अभी जो मास्टर था वो अब बेग्गर हो चुका था "सॉरी.. आई एम सो स्टुपिड..बट मेरा दिल्ली पहुँचना बहुत जरूरी है.. कैन आई शेयर विद यू......" चैतन्या ने अपनी बड़ी बड़ी आँखें नचाते हुए अबोध से कहा,अबोध के मन में कैडबरी वाले न जाने कितने लड्डू फूटे उसने कहा "श्योर..बट वेट अ मिनट...अंकल आप ऊपर वाली सीट पे चले जायेंगे प्लीज हमें थोड़ी सुविधा हो जायेगी" उसने 15 नम्बर की साइड लोवर वाले अंकल से कहा और वो मान गए चैतन्या ऊपर से उतर के नीचे आई गुलाबी सूट में उसकी सुंदरता और निखर रही थी अबोध उसे देखता ही रह गया दोनों आधी आधी सीट पे बैठ गए और आपस में बातें करने लगे,अबोध तो उसपर दिल ही हार बैठा था उनके बीच मोबाइल नम्बर एक्सचेंज हुए और बात करते करते दोनों दिल्ली आने से थोड़ा पहले सो गए।

ट्रिंग ट्रिंग...ट्रिंग...मोबाइल की घंटी बजती है..चैतन्या मोबाइल पर अबोध का नम्बर देखती है और म्यूट करके एक तरफ रख देती है उसकी रूममेट उससे पूछती है "किसका फोन है जो उठा नहीं रही..?"

"आज ही ट्रेन में साथ आया है...थोड़ा भाव दिखाना जरूरी है..वही अपनी पुरानी कानपूर सेंट्रल से प्रयागराज वाली ट्रिक में फँसा नया मुर्गा है... पिछली बार फँसा अंकल तो बस चार महीने टिका था...पर ये यंग है और रिच भी...आठ दस महीने तो ऐश कराएगा ही" चैतन्या ने आँख मारते हुए कहा और फिर अबोध को फोन कर कहा "हाई.. वो मैं न..मैं..नहा रही थी.........."

लव ऐट फर्स्ट साइट जैसी घटना लाखों में किसी एक की सच्चाई बनती है और मेरे लाल तुम बाकी के 99999 में हो जिन्हें लड़कियाँ__________ बनाती हैं (रिक्त स्थान की पूर्ति अपने मन में करें,कमेंट में नहीं)

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-तुषारापात®™

Friday, 22 July 2016

विश्वास...आस्था का

"याद है पिछले साल जब हम लोग शिमला घूमने गए थे तो कुफरी में मौसम अचानक खराब होने से..कितनी बुरी तरह...घंटों..वहाँ फँसे रहे थे..गॉड कितना भयानक तूफान था..."आस्था बिस्कुट को चाय में डुबोती हुई बोली

"हाँ..याद है...पर मैडम..सुबह सुबह वो सब कहाँ से याद आ गया...अरे देखो...ये लो..गया तुम्हारा बिस्कुट चाय में" विश्वास उसके कप की ओर इशारा करते हुए तेजी से बोला

आस्था ने उस ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया वो उँगलियों में फँसे बचे हुए बिस्कुट के टुकड़े को फिर से चाय में डुबोने लगी और बोली "विश्वास कल रात मैंने न...एक बहुत ही अजीब सपना देखा.."

"सपना...कैसा सपना" विश्वास चाय का एक सिप लगाता है और प्लेट से एक बिस्कुट उठाते हुए उससे पूछता है

"मैंने देखा कि हम लोग वैसी ही किसी बहुत ठंडी जगह में फँस गए हैं... चारों ओर सिर्फ बर्फ ही बर्फ हैं...और हम..दो तीन दिनों से वहाँ भटक रहे हैं...खाने पीने का सारा सामान खत्म हो चुका है..भूख से बेहाल हम दोनों थक के एक जगह निढाल होकर पड़ गए हैं...और अब दोनों में से किसी एक से एक कदम भी उठाया नहीं जा रहा" आस्था ऐसे बोलती गई जैसे अभी भी वो वहाँ फँसी हो,डर उसकी आवाज से साफ महसूस किया जा सकता था

विश्वास सुनता गया और शरारती अंदाज में बोला "वैसे जान बड़ा रोमैंटिक सीन होगा न...दूर दूर तक..सिर्फ सफेद उजली बर्फ..और हम दोनो बिल्कुल अकेले...वो भी 'भूखे'...."कहकर उसने हलकी सी आँख मारी और मुस्कुराया

आस्था भी हल्के से मुस्कुरा दी और आगे कहने लगी "आगे तो सुनो....हम लोगों का बेस कैंप वहाँ से लगभग दस ग्यारह किलोमीटर दूर है..ये बात मैं तुम्हें बताती हूँ..पता नहीं सपने में अचानक से तुम इतने स्मार्ट कहाँ से हो गए..जो कहते हो कि अगर कुछ खाने को मिल जाए तो.. हममें ताकत आ जायेगी और हम अपने बेस कैंप तक पहुँच सकते हैं...और मजे की बात मुझे तुरंत ही..अचानक से..एक पैकेट में दो रोटियाँ घी से चुपड़ी हुई मिल भी जाती हैं..मगर..."कहते कहते वो चुप हो जाती है और चाय में बिस्कुट का वो बचा टुकड़ा भी छोड़ देती है

"मगर..मगर क्या...आगे तो बोलो.." विश्वास उतावला हो उससे पूछता है

"मगर वो दोनों रोटियाँ...तुम मुझसे छीन के खा जाते हो...मुझे एक टुकड़ा भी नहीं देते..और तभी मेरी आँख खुल जाती है" आस्था ने मायूस आवाज में कहा

"हा हा हा हा..तुम औरतें सपनो में भी अपने पति को ऐसे ही देखती रहती हो..कमाल है...वैसे सपना है सपने में तो हम कुछ भी देखते हैं.."विश्वास हँसते हँसते ही बोला

"हँसों नहीं...मैं सीरियस हूँ...भूख तो हम दोनों से ही नहीं सधती है...ऊपर से तुमने उस समय जब मैं तीन दिन से भूखी थी..अकेले ही वो दोनों रोटियाँ खा लीं...एक तो मुझे दे सकते थे न...कभी अगर ऐसा कुछ रियल वर्ल्ड में हो तब भी क्या तुम ऐसा ही करोगे? बताओ न..क्यों किया तुमने ऐसा ?" आस्था मोस्ट कॉमन स्त्री चिंता मोड में आ चुकी थी

"तुमने सपना अधूरा ही छोड़ दिया...पूरा देखती तो पता चलता न...अच्छा सुनो...मैंने क्यों किया ऐसा..हमें बेस कैंप तक पहुँचने की ताकत चाहिये थी..एक एक रोटी खाने से हमारी ताकत बँट जाती...इसलिए वो दोनों रोटी मैंने खाईं...और..तुम्हें..अपनी बाहों में उठाकर..ग्यारह किलोमीटर चलकर ...बेस कैंप में ले आता हूँ और इस तरह हम दोनों सेफ हो जाते हैं और हमारी जान बच जाती है" कहकर वो आस्था को झट से अपनी बाहों में उठा लेता है और दोनों की खिलखिलाहट कमरे में गूँजने लगती है।

आस्था की चाय में पड़े बिस्कुट के दोनों टुकड़े घुल चुके थे।

-तुषारापात®™ 

Monday, 18 July 2016

गिरहबान

उसने अपना टॉप उतारा और दरवाजे पे लगी खूँटी पे टाँग दिया बालों में लगा क्लच निकालकर बेसिन पे रखा और नल खोल दिया पानी बाल्टी में भरने लगा अपना लोवर उतारने ही वाली थी कि उसे दरवाजे और बाथरूम की जमीन के बीच की दराज से एक रुकी हुई परछाई नजर आई उसने झट से अपना लोवर ऊपर किया और टॉप वापस पहनकर तुरंत दरवाजा खोला परछाई जा चुकी थी उसने बाहर निकल कर भी देखा कोई नहीं था मम्मी किचेन में थी पापा पूजा कर रहे थे और भाई लॉबी में बैठा मोबाइल पे लगा हुआ था
अजीब से एक डर के साथ वो धड़कते दिल से वापस बाथरूम में आई और जल्दी जल्दी नहाने की रस्म सी पूरी की

कई दिनों से उसे लग रहा था कि कोई उसे नहाते हुए देखने की कोशिश करता है उसके अंतः वस्त्रों के साथ भी खिलवाड़ हो रहा था एक बार तो कुछ चिपचिपा सा...उफ़्फ़ सोच के ही उसे उबकाई आई

कॉलेज जाने की पब्लिक बस की कई गन्दी छुहन उसके लिए अब आम हैं राह चलते उसके यौवन का मापन करती नजरें उसे पहले चुभती थीं अब नहीं ,अपने टीचरों और साथ पढ़ने वाले लड़कों के 'सहयोगी' रवैये को भी खूब समझती है उनके इस अति सहयोगात्मक रवैये से वो अपने कई काम निकलवाने की खूबी भी ईजाद कर चुकी थी अपने बॉयफ्रेंड के साथ वो ओपन थी ये सब तो उसे आम लगता था पर अपने घर में हो रहीं हरकतें उसे बहुत परेशान करती थीं

रात में खाना पीना निपटा के हर युवा की तरह अपने कमरे का दरवाजा बंद कर वो भी इंटरनेट पे आ जाती कुछ देर फेसबुक पे रहती उसके लिए लार टपकाते लोगों के मैसेज देखती कुछ के साथ थोड़ी बहुत चुहलबाजी करती और फिर अपने बॉयफ्रेंड के साथ रात भर वीडियो चैट पे बतियाती रहती

आज की रात भी वो अपने बॉयफ्रेंड के साथ मूड में आगे बढ़ रही थी कि उसके कमरे के दरवाजे पे दस्तक होती है वो जल्दी से अपने कपड़े ठीक करती है और मोबाइल तकिये के नीचे छुपाकर दरवाजा खोलती है उसका भाई कमरे में घुस आता है दरवाजा बंद करता है और उसे पकड़ के कहने लगता है कि उसे सब पता है कि वो अपने बॉयफ्रेंड के साथ क्या क्या गुल खिलाती है और मोबाइल पे क्या क्या दिखाती रहती है वो भी उससे सब कुछ दिखाने की डिमांड करने लगता है धक्का मुक्की होने लगती है और अचानक भाई के धक्के से उसका सर टेबल से टकराता है और वो सिसक सिसक के मरने लगती है

उसका भाई मम्मी पापा को बताता है कि वो किस तरह परिवार की इज्जत खराब कर रही थी उसका मोबाइल उठाकर चैट की पहले से ऑन विंडो पर उसकी सारी करतूतें उन्हें दिखाता है

केस मीडिया में भी उछलता है लोग चटकारे लगा लगा के खबर देखते हैं कुछ उसकी फेसबुक प्रोफाइल ढूंढते हैं कुछ नए जोक्स भी बनते हैं कई इंसेस्ट पॉर्न वीडियो देखने वाले ,लड़कियों के इनबॉक्स में नंगी फोटो भेजने वाले और आपसी रिश्तों में सम्बन्ध वाली मस्तराम की कहानियाँ पढ़ने वाले भी यही कहते हैं "उसके भाई ने जो किया सही किया ऐसी गन्दी लड़कियों के साथ ऐसा ही होना चाहिए।"

पुरुष अपने गिरहबान में नहीं झाँकते क्योंकि उन्हें स्त्रियों के गिरहबानो में झाँकना पसंद है।

-तुषारापात®™

Friday, 15 July 2016

छोटू

"जिज्जी...मुकुंद को सुबह दस..साढ़े दस बजे के बीच तुम्हारे घर इसीलिए भेज देती हूँ... यहाँ तो एक टाइम (रात) का खाना ही बन जाए तो बहुत है...मोहल्ले की औरतों से सिलाई कढ़ाई का काम कभी कभी ही मिलता है" रजनी ने घर आई अपनी बड़ी ननद कुसुम के एक सवाल के जवाब में ये कहा और उससे अपनी आँखें चुराते हुए थोड़ी दूर बैठे अपने सबसे छोटे बेटे मुकुंद को देखने लगी

"भाभी...भईया ने तो शराब में अपने को बर्बाद कर डाला है.. समझती हूँ तभी तो तुमको अपनी गली के बगल वाली गली में मकान दिलवाया..... किराये वगैरह की चिंता मत करना...वो मैं देख लूँगी" कुसुम ने उसका हाथ दबाते हुए कहा

रजनी अपने एक कमरे के मकान में चारो ओर नजर दौड़ाती हुई,ग्लानि और कृतज्ञता से दबी भर्राई आवाज में बोली "जिज्जी तुम्हारा ही सहारा है ...बस मुकुंद जब सुबह आया करे...तो तुम खुद ही उससे खाने का पूछ लिया करो.....और अपने से उसे खाना दे दिया करो....वो माँगने में शरमाता है...कई बार भूखा ही लौट आता है...सात साल का ये लड़का अपना स्वाभिमान अच्छी तरह समझने लगा है"

"हाँ..मुझे ही ध्यान रखना था...पर नहीं पता था...भाभी...हालात इतने..." कुसुम के रुंधे गले से आगे आवाज न निकल पाई ,अपने को सँभालते हुए उसने आगे कहा "अच्छा भाभी चलती हूँ...हिम्मत रखना..भगवान दिन फेरेगा जरूर" रजनी उठी कुसुम के पैर छूकर उसने उसको विदा किया और घर के कामकाज में लग गई

कम पढ़ी लिखी रजनी के पति ने अपना सबकुछ शराब में भस्म कर डाला था,वो मोहल्ले में तुरपाई और फाल आदि लगाने का काम कर किसी तरह अपने तीनो बच्चों को पाल रही थी

इसी तरह दिन बीत रहे थे कि गर्मी की छुट्टियों में उसकी छोटी बहन किरण अपने पति के साथ उससे मिलने आई और उसकी स्थिति जानकर दुखी हुई किरण के पति जो पैसे से मजबूत माने जाते थे (उनकी दवा की दुकान थी) सबकुछ सुनकर एकदम से निर्णायक स्वर में बोले "दीदी..एक काम करो ये मुकुंद को हम अपने साथ लिए जाते हैं...यहाँ तो ये कुछ पढ़ लिख भी नहीं पायेगा...वहाँ आगरा में हम इसका एक स्कूल में एडमिशन करा देंगे आराम से पढ़ेगा और खा पीकर मस्त भी रहा करेगा" किरण को भी अपने पति का ये सुझाव बहुत पसंद आया उसने भी अपनी दीदी को इसके लिए राजी हो जाने को कहा

"पर ऐसे कैसे भेज दूँ...मेरे बगैर तो ये कभी एक दिन भी...कहीं नहीं रहा" रजनी ने सशंकित मन से कहा ,एक माँ चाहे जितनी मजबूर हो अपने बच्चे अपने कलेजे के टुकड़े को अपने से अलग करना उसके लिए आसान नहीं होता लेकिन मुकुंद के सुनहरे भविष्य के लिए वो किसी तरह हाँ कह देती है रजनी के पति को इसपे क्या ऐतराज होता उसकी तो एक बला ही छूटी थी

"नहीं माँ...माँ..माँ..मैं कहीं नहीं जाऊँगा... माँ मुझे खुद से दूर मत करो...मैं वादा करता हूँ...कभी खाने के लिए..तुम्हें..तंग नहीं करूँगा.."मुकुंद चिल्ला रहा था पर किरण और उसके पति ने उसे जबरदस्ती कार में बिठा लिया और रजनी से विदा ली,रजनी चौराहे पे खड़ी सुबक रही थी और जाती हुई कार को तब तक देखती रही जब तक वो आँख से ओझल न हो गई

आगरा में किरण का ससुराल एक संयुक्त परिवार था उसके पति और उनके भाइयों के भरे पूरे परिवार थे सास ससुर आदि सब एक साथ ही एक विशाल भवन में रहते थे मुकुंद का एक सस्ते मद्दे सरकारी स्कूल में पहली कक्षा में नाम लिखवा दिया गया और उसे नए कपड़े और भर पेट भोजन भी मिलने लगा पर वो अपनी माँ की याद में दुखी रहता था,धीरे धीरे वो नए माहौल में ढलने लगा

"छोटू... छोटू...ये ले जरा ये गर्म पानी की बाल्टी ऊपर छत पे नरेश चाचा को दे आ.." छोटी चाची की आवाज आई

"अरे..छोssटूss...कहाँ मर गया...स्कूल से आया और गायब हो गया...बहू ओ किरण...जरा छोटू को भेज बाजार...मेरी तंबाखू तो मँगवा दे..."किरण के ससुर चिल्ला रहे थे

स्कूल से वापस आकर वो अपना बस्ता भी नहीं रख पाता था कि उसके कानों में रोज ऐसी ही आवाजें...नहीं नहीं..चीखें सुनाई देने लगती थीं, वो उसे पढ़ा रहे थे,खिला पिला रहे थे,पर वे सब उसे उसके नाम से क्यों नहीं बुलाते हैं,साढ़े सात साल का लड़का अब ये अच्छी तरह समझ चुका था

माँ का लाडला 'मुकुंद' माँ-सी के यहाँ 'छोटू' हो चुका था।

-तुषारापात®™

Saturday, 9 July 2016

मलाई की गिलौरी

"देख बहु...तू नई नई आई है...इन नौकरों को ज्यादा सर पे मत चढ़ाना...सुवरिया का बाल होता है इनकी आँखों में"सासू माँ ने अंतरा को गृहस्थी की बागडोर सौंपते हुए नसीहत दी

"जी मम्मी जी" अंतरा ने हामी भरी

"और सुन ये लक्ष्मी से एक टाइम खाने की बात हुई है...जो भी बचा-खुचा हुआ करे दे दिया करना उसको...हाँ पहले बर्तन और पूरा झाड़ू पोछा करवा लिया करना...बहुत नालायक है एक काम ढंग से नहीं करती कम्बख्त" सासू माँ ने काम निकलवाने की तकनीक समझाई,अंतरा ने हाँ के अंदाज में सर हिलाया और उनके पैर छूकर उन्हें तीर्थ यात्रा पे विदा किया

अब आज से खाना बनाना और नौकरों से काम करवाने के सारे काम-धाम उसके जिम्मे हो चुके थे पंद्रह दिन में ही उसने पूरे घर का काया कल्प कर दिया,सबके पसंद का खाना घर में बनने लगा वो भी बिना खाना बर्बाद हुए और लक्ष्मी भी अपना काम अब अच्छे से करने लगी

"अरे अंतरा...ये क्या लक्ष्मी के आते ही तू उसे खाना दे देती है...वो भी आज का बना ताजा खाना.." सासू माँ तीर्थ से लौट चुकी थीं और आज पहली बार बदली हुई व्यवस्था और चमकते हुए घर को देख रहीं थीं

"हाँ मम्मी जी...बेचारी धूप में..थकी हुई और भूखी प्यासी आती है...खाना खिला दो तो.. फ्रेश मूड से खुशी खुशी मन लगाकर सारे काम अच्छे से करती है.."अंतरा ने मुस्कुराते हुए कहा

"पर उसे ताजा खाना देने की क्या जरूरत है...बासी बचा खाना बेकार जाएगा...मेरे बेटे की कमाई बर्बाद कर रही है तू तो"सासू माँ ने नकली चिंता में अपना पक्ष लपेट कर पेश किया

"मम्मी जी...खाना उसी हिसाब से बनाती हूँ कि ज्यादा खाना बेकार न् जाए...और...जब खाना सबके मन का बनता है तो बचता भी बहुत कम है ..अगर.थोड़ा बहुत बचता है तो हम सब मिलके उसे खत्म कर लेते हैं..लक्ष्मी को भी दे देते हैं...अब जब लक्ष्मी को रोज खाना खिलाना ही है...तो.. जबरदस्ती खाना ज्यादा बना के उसे एक दिन का बासी खिलाने से अच्छा है.. घरवालों की तरह उसका भी खाना ताजा ही बना लिया जाए" अंतरा ने उनके हाथ में एक प्लेट देते हुए कहा जिसमे मलाई की गिलौरी (लखनऊ की मशहूर मिठाई) के दो पीस थे

"अच्छा सुन...ये गिलौरी बहुत जल्दी खराब हो जाती है...सबको आज ही खिला देना...फ्रिज में रखने पर भी कल तक इनका मजा मर जायेगा"

"मम्मी जी...पर ये तो बहुत सारी हैं...सबके खाने के बाद भी बचेंगी" फिर उसने प्रश्नवाचक मगर मुस्कुराती नजरों से उनसे पूछा "नौकरों को आज ही दूँ...या......"

सासू माँ के चेहरे पे एक जोर की मुस्कान आ गई "तू तो मेरी सास हो गई है" कहकर खिलखिलाते हुए उन्होंने एक गिलौरी अंतरा के मुँह में भर दी।

-तुषारापात®™

Wednesday, 6 July 2016

आवास विकास योजना

"अमाँ आवास..बताये दे रहें हैं..बात बहुत अच्छी तरह दिमाग में बिठा लो...इस बार बीच में ना आना... मामला बहुत सीरियस है इस बार..कसम इमामबाड़े की..तुम्हारे यार को सच्चा वाला प्यार हो गया है" विकास ने अपनी दोनों आँखें पूरी गोल बनाते हुए कहा

आवास भी तैश में आ गया पान को चुभलाते हुए उसने जवाब दिया "वो तुमने घंटाघर वाला तिराहा देखा है न...तो ये समझ लो विकास मियाँ... मामला उसी तिराहे जैसा है..अब ये तो वही बताएंगी कि वो छोटे इमामबाड़े की तरफ (अपनी ओर इशारा करता है) मुड़ेंगी या बड़े इमामबाड़े (उसकी ओर इशारा किया) की तरफ जाएंगी"

"मतलब तुम अपनी भौजी को हमारी भाभी बनाने पे लगे हो...बस यही है तुम्हारी दोस्ती...अमाँ भाई मान जाओ...रास्ते से हट जाओ.....पहली बार जब उसका बस नाम ही सुने थे तभी से मोहब्बत हो गई थी उससे... हाय...योजना पांडे... और तुम तो जानते हो यार...ये 'पांडे' लड़कियाँ तुम्हारे इस भाई पे मर मिटती हैं... तुम्हारी कसम अगर ई पांडे नहीं होती तो हम बीच में न आते..." विकास गले पे चुटकी काटके कसम खाते हुए उससे बोला

"हाँ हाँ पता है ...तुम और तुम्हारा पांडे प्रेम...पिछली वाली पंडाइन के बच्चों के प्रिय मामा तुम्हीं हो.."आवास ने चटकारा मारा तभी सामने से योजना को अपने कुत्ते के साथ आते देख वो उसकी तरफ बढ़ा,विकास ने भी योजना को आते देखा वो भी उसके साथ हो लिया

"कैसी हो योजना...पांडे.."विकास ने पांडे पे जोर देते हुए मीठे स्वर में कहा

"जी माई सेल्फ वेरी मच फाइन..."उसने नए लखनऊ की अंग्रेजी में जवाब दिया और आवास से कुछ कहने ही जा रही थी कि विकास उसे थोड़ा किनारे ले जाकर कहने लगा "अरे कहाँ लफंगों के मुँह लगती हैं आप...कोई भी काम हो इस शरीफ बन्दे से कहिये...ये सब तो छिछोरे लड़के हैं.. लड़की को बस एक ही.. समझीं न.. एक ही नजर से देखते हैं"

"हाँ हाँ और ये भाई तो इतने शरीफ हैं कि 'टिप टिप बरसा पानी..पानी ने आग लगाई' वाले गाने में भी रवीना टंडन को नहीं..बस अक्षय कुमार को ही एकटक देखते हैं" आवास ने थोड़ा जोर से मजा लेते हुए कहा आसपास ठहाके गूँज गए

योजना उसे अनसुना करते हुए अपनी आँखें चमका के मीठी आवाज में विकास से बोली "मुझे न..अम्मा ने..मतलब मम्मी ने..इसे टहलाने भेज दिया है...मुझे बहुत 'इंसल्टी' फील होती है... वो...क्या...आप हमारे टॉमी को जरा पॉटी करवा देंगे..हम यहीं आपका इंतजार करते हैं"विकास का मुँह उतर गया पर जनाब कहते क्या खुद ही आगे बढ़कर बोले थे तो बस उसके हाथ से पट्टा लेकर कुत्ते को लेकर जाने लगा

आवास जोर से हँसा और बड़ी अदब (बनावटी) दिखाते हुए उसके पास आकर बोला "जाइये बड़े नवाब साहब ...जरा कुत्ते को पाखाने खास घुमा लाइए हुजूर..तब तक आपकी बेगम साहिबा का ध्यान हम रखते हैं" कहकर वो योजना के पास आया और उससे पूछा "ठंडा पियेंगी आप...अभी उसे टाइम लगेगा...आइये उधर दुकान पे चलते हैं"

"हाँ पर आप अपने दोस्त का इतना 'जोक' क्यों उड़ाते हैं" कहकर वो आवास के साथ ठन्डे की दुकान की तरफ चलने लगती है

"वो क्या है मियाँ भूल गए हैं...ये यू पी है यहाँ योजनाबद्ध विकास कभी नहीं होता..(फिर मुस्कुराते हुए कहता है)..हाँ आवासीय योजनाएं खूब घोषित होती रहती हैं" कहकर वो दुकान वाले चचा से दो स्प्राइट माँगता है।

-तुषारापात®™

Monday, 27 June 2016

Sin२θ + Cos२θ =1

"पति महोदय...ये तो मानते हो न...मुझसे बेहतर पत्नी तुम्हें किसी जनम में नहीं मिलेगी" Sin(साइन) पीछे से अपनी बाहों का 'चाप' उसके गले में डालके उससे सटते हुए बोली

कुर्सी पे बैठा वो डूबी आवाज में बोला "हाँ ये तो है...मैं तो ये भी मानता हूँ.. मुझसे बेहतर पति तो...तुमको हर जनम में मिल जाएगा"

"Cos (कॉज)...ये क्या...इतना डिप्रेसिव आन्सर...जब वाइफ मूड हल्का करने की बात यूँ गले लग के करे तो...हसबैंड को उसे...उसे चूमके अपनी सारी परेशानी दूर कर लेनी चाहिए" कहकर Sin ने Cos के माथे को चूम लिया,उसके माथे पे Sin के लिपस्टिक लगे होठों से एक लाल 'थीटा'(θ) सा निशान बन गया
Cos ने अपने माथे पे हाथ फेरा,हाथ में लग आई लिपस्टिक को उसकी साड़ी में पोछा और उसे कमर से थाम कर बोला "क्या करूँ...हर महीने कार और मकान की EMI निकालने के बाद कुछ हाथ में रह ही नहीं पाता... सारी सेलरी तो लगता है बस बैंक वालों के लिए ही कमाता हूँ...बार बार तुमसे पैसे लेना अच्छा नहीं लगता मुझको"
"तो क्या हो गया..ये गृहस्थी हम दोनों की है..इसे निभाने की जिम्मेदारी भी हम दोनों की है...किसी एक की तो नहीं..डिअर हब्बी ये मत भूलो.. Sin२θ + Cos२θ =1... यानी अपने अपने दायित्वों के वर्ग में हम दोनों साथ हैं तो 'एक' हैं...अब अगर कभी कभी कोई एक कुछ कम पड़ेगा.. तो..दूसरे को उतना बढ़ना ही पड़ेगा तभी तो गृहस्थी का 'एका' बना रहेगा..हम दो नहीं एक यूनिट हैं" Sin ने बातों बातों में जीवन का गूढ़ सत्य बता दिया

Cos का मन अभी भी अशांत था "पर मुझे लगता है पति होने के नाते.. सारे खर्चे मुझे ही उठाने चाहिए...तुम हमारी इस गृहस्थी के और भी तो कितने काम करती हो"

"अब अगर Cos ही सब कर देगा..तो फिर Sin का मान शून्य नहीं हो जायेगा..वो पुराना जमाना अब नहीं रहा...अब पति पत्नी दोनों को घर और बाहर दोनों तरह के काम करने होते हैं और खर्चे भी साथ उठाने होते हैं... और मेरे पति परमेश्वर....गणित में Sin45° और Cos45° का मान बराबर(1/√2) यूँ ही नहीं दिया गया...दोनों के 1/√2 के होल स्कवायर करने से 1/2..1/2 मिलता है....ये आधा मेरा और आधा तुम्हारा जोड़ के  बनी 'एक' गृहस्थी ही राईट एंगल(90°) वाली गृहस्थी कहलाती है"Sin ने काँधे पे पड़ी साड़ी को यूँ उचकाया जैसे कॉलर उचकाया जाता है
"वाह...मैथ्स टीचर..वाकई में तुमसे अच्छी पत्नी मुझे नहीं मिलेगी" कहकर Cos, Sin के गाल पे एक गहरा नीला 'थीटा' बनाने में मशगूल हो गया।
-तुषारापात®™

Wednesday, 15 June 2016

अर्धवृत्त

"कहाँ थीं तुम....2 घण्टे से बार बार कॉल कर रहा हूँ...मायके पहुँच के बौरा जाती हो" बड़ी देर के बाद जब परिधि ने कॉल रिसीव की तो व्यास बरस पड़ा

"अरे..वो..मोबाइल..इधर उधर रहता है...तो रिंग सुनाई ही नहीं पड़ी..और सुबह ही तो बात हुई थी तुमसे...अच्छा क्या हुआ किस लिए कॉल किया.. कोई खास बात?" परिधि ने उसकी झल्लाहट पे कोई विशेष ध्यान न देते हुए कहा

"मतलब अब तुमसे बात करने के लिए...कोई खास बात ही होनी चाहिए मेरे पास..क्यों ऐसे मैं बात नहीं कर सकता...तुम्हारा और बच्चों का हाल जानने का हक नहीं है क्या मुझे.... हाँ अब नाना मामा का ज्यादा हक हो गया होगा" व्यास उसके सपाट उत्तर से और चिढ़ गया उसे उम्मीद थी कि वो अपनी गलती मानते हुए विनम्रता से बात करेगी

उधर परिधि का भी सब्र तुरन्त टूट गया "तुमने लड़ने के लिए फोन किया है ..तो..मुझे फालतू की कोई बात करनी ही नहीं है..एक तो वैसे ही यहाँ कितनी भीड़भाड़ है और ऊपर से त्रिज्या की तबियत.." कहते कहते उसने अपनी जीभ काट ली

"क्या हुआ त्रिज्या को...बच्चे तुमसे संभलते नहीं तो ले क्यों जाती हो.. अपने भाई बहनो के साथ मगन हो गई होगी.. ऐसा है कल का ही तत्काल का टिकेट करा रहा हूँ तुम्हारा..वापस आओ तुम...मायके जाकर बहुत पर निकल आते हैं तुम्हारे..मेरी बेटी की तबियत खराब है और तुम वहाँ सैर सपाटा कर रही हो... नालायकी की हद है...लापरवाह हो तुम......." हालचाल लेने को किया गया फोन अब गृहयुद्ध में बदल रहा था व्यास अपना आपा खो बैठा था

"जरा सा बुखार हुआ है उसे..अब वो ठीक है..और सुनो..मुझे धमकी मत दो मैं दस दिन के लिए आईं हूँ..पूरा रहकर ही आऊँगी.. अच्छी तरह जानती हूँ मेरे मायके आने से साँप लोटने लगा है तुम्हारे सीने पे...अभी तुम्हारे गाँव जाती..जहाँ बारह बारह घंटे लाइट तक नहीं आती..बच्चे गर्मी से बीमार भी होते तो तुम्हें कुछ नहीं होता..पूरे साल तुम्हारी चाकरी करने के बाद जरा दस दिन को मायके क्या आ जाओ तुम्हारी यही नौटँकी हर बार शुरू हो जाती है" परिधि भी बिफर गई उसकी आवाज भर्रा गई पर वो अपने 'मोर्चे' पे डटी रही

"अच्छा मैं नौटंकी कर रहा हूँ...बहुत शह मिल रही है तुम्हें वहाँ से..अब तुम वहीं रहो..कोई जरूरत नहीं वापस आने की... दस दिन नहीं अब पूरा साल रहो..ख़बरदार जो वापस आईं..." गुस्से से चीखते हुए व्यास ने उसकी बात आगे सुने बिना ही फोन काट दिया

परिधि ने भी मोबाइल पटक दिया और सोफे पे बैठ के रोने लगी उसकी माँ पास ही बैठी सब सुन रही थी वो बोलीं "बेटी.. वो हालचाल पूछने के लिए फोन कर रहा था..देर से फोन उठाने पे अगर नाराज हो रहा था तो तुम्हे प्यार से उसे 'हैंडल' कर लेना था..खैर चलो अब रो नहीं..कल सुबह तक उसका भी गुस्सा उतर जायेगा"

परिधि अपना मुंह छुपाये रोते रोते बोली "मम्मी.. सिर्फ दस दिन के लिए आईं हूँ.. जरा सी मेरी खुशी देखी नहीं जाती इनसे..."

"बेटी...ये पुरुष होते ही ऐसे हैं...ये बीवी से प्यार तो करते हैं पर उससे भी ज्यादा अधिकार जमाते हैं..और बीवी के मायके जाने पे इनको लगता है इनका अधिकार कुछ कम हो रहा है तो अपने आप ही अंदर ही अंदर परेशान होते हैं..ऐसी झल्लाहट में जब बीवी जरा सा कुछ उल्टा बोल दे तो इनके अहम पे चोट लग जाती है..और बेबात का झगड़ा होने लगता है..परु(परिधि)..तेरे पापा का भी यही हाल रहता था..ये इन पुरुषों का स्वाभाविक रवैया होता है" माँ ने उसके सर पे हाथ फेरते हुए उसे चुप कराया

"पर मम्मी..औरत को दो भागों में आखिर बाँटते ही क्यों हैं ये पुरुष?...मैं पूरी ससुराल की भी हूँ और मायके की भी....मायके में आते ही ससुराल की उपेक्षा का आरोप क्यों लगता है हम पर?...ये दो जगह का होने का भार हमें ही क्यों ढोना पड़ता है..? उसने मानो ये प्रश्न माँ से नहीं बल्कि सबसे किये हों

माँ ने उसे चुप कराया और अपने सीने से लगाकर बोलीं "इनके अहम् और ससुराल में छत्तीस का आंकड़ा रहता ही है....जब...स्वयं..भोले शंकर इससे अछूते नहीं रहे तो..और किसकी बात करूँ....परु..मैंने पहले ही कहा... पुरुष होते ही ऐसे हैं ये इनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति है...ये खुद नहीं जानते..
और बेटी...व्यास का काम ही है परिधि को दो बाँटो में बाँट देना..जिससे एक अर्धवृत्त मायके का और दूसरा ससुराल का अर्धवृत्त बनता है।"

#परिधि_बराबर_व्यास_गुणा_बाइस_बटे सात
-तुषारापात®™

Tuesday, 14 June 2016

मिलावट की बनावट

मुझे ये समझ नहीं आता कि ये खाने में मिलावट को लेकर भाई लोग इतना हो हल्ला क्यों करते हैं जबकि हमारे देश की संस्कृति ही मिलीजुली संस्कृति है भौगोलिक स्थिति सत्तर तरीके की है कहीं पहाड़ कहीं समुद्र कहीं रेगिस्तान साथ ही धर्म बोली भाषा रहन सहन पहनावा तक सबकुछ मिला जुला है और तो और अभी कुछ समय पहले तक मिलीजुली सरकार ही देश भी चलाती थी वो भी मिश्रित अर्थव्यवस्था के दम पे,तो पूरे देश में ऐसी कोई चीज बताओ जिसमे मिलावट न हो ?

लगता है ये आम लोगों के दिमाग ख़राब कर दिए हैं इन दो चार पूर्ण बहुमतों वाली सरकारों ने,तभी ये खाने में मिलावट जैसी 'महान उपकारी योजना' को समझ नहीं पा रहे हैं इसका एक कारण मिलावट वाली शिक्षा पद्धति भी हो सकती है पढ़ पढ़ के सब अपने को बहुत काबिल समझने लगे हैं जो खाने में मिलावट के महत्व को नकार के उसका विरोध कर रहे हैं
अरे जरा सी मिलावट क्या कर दी लगे बवाल मचाने ,विरोध करने के पहले
कभी सोचा है खाने में मिलावट कितनी बड़ी धार्मिक आर्थिक राजनैतिक और सामाजिक 'क्रांति' है'मूर्खो! तुम्हें तो ऐसे लोगों के पैर धो धो कर पीने चाहियें जो खाने पीने में मिलावट करते हैं लेकिन नहीं तुम ठहरे लकीर के फ़कीर और लकीर भी गेंहू के पेट पे बनी वाली ही तुम्हें दिखाई देती है

खाने में मिलावट करने वाला अगर खाने में मिलावट नहीं करेगा तो ये जो तुमने इतनी जनसंख्या बढ़ा रखी है इसको खाना पूरा पड़ेगा बोलो? नहीं न तो खाने पीने की चीजों में मिलावट करने से उनकी मात्रा में बढोत्तरी होती है जिससे सभी देशवासियों को भोजन मिलता है और तो और कभी कभी वो जहर मिला कर जनसंख्या कम करने जैसा महान कार्य भी करते हैं जिससे देश पर आश्रित लोगों का बोझ कम होता है और अंतिम संस्कार कराने वालों को रोजगार प्राप्त होता है वो अलग ,मतलब ये तो वो बात हो गई कि आम के आम गुठलियों के दाम हाँ अब ये न पूछना कि आम डाल का या पाल का पका था वरना मिलावट का एक और पहलु सामने आ जायेगा।

मिलावट से मरने वाले लोगों का मुद्दा उछाल उछाल के सरकारें बदल जाती हैं जिससे हमें नई सरकारों के द्वारा पिछली सरकारों के किये घोटाले काले कारनामो का पता चलता है और हम जागरूक होते हैं कि हम और कितना पीछे चले गए ,तुम क्या जानो ये मिलावट से कितने बड़े रहस्य छुपते और खुलते हैं।

खाने में मिलावटी सामान मिलाने से सबको आर्थिक फायदा होता है और जब सबका कमीशन इससे जुड़ा होता है तो सेवा भी त्वरित होती जिसके फलस्वरूप खाने पीने का सामान बहुत जल्दी हम तक पहुँच जाता है नहीं तो बैठे रहते तुम खाली झोला लेके इंतज़ार में,और एक और विशेष प्रकार का रोजगार पैदा होता है मिलावट की इस पुण्य प्रदान करने वाली क्रिया से वो है तमाम तरह की मिलावट करने वाली चीजों का जुगाड़ करना जैसे दाल में कौन से पत्थर मिलाये जाएँ अब इस तरह के न जाने कितने पत्थर पाउडर चूरन चटनी केमिकल आदि आदि बनाये और बेचे जाते हैं कितने पढ़े लिखे लोगों को रोजगार मिलता है लेकिन तुम बुद्धू ये बातें क्या जानो।

मिलावट नए नए आविष्कारों की जन्मदाता है इससे देश में वैज्ञानिक सोच का विकास होता है मिलावटी नित नए प्रयोग किया करते हैं कि दूध में क्या मिलाया जाय जो लगे दूध जैसा और पकड़ में न आये और तेल घी में ऐसा क्या मिलाएं जो तेल घी जैसी चिकनाहट लिए हुए हो पर तेल या घी न हो ये एक बहुत मेहनत का काम है फिर भी परोपकारी लोग इसमें लगे हुए हैं मिलावट में अपार संभावनाएं हैं न जाने कितने ऐसे पदार्थों का निर्माण इसी मिलावट के धंधे से सम्भव हो सका है जिससे पढ़ने वालों को नए नए सब्जेक्ट पढ़ने पड़ रहे हैं जिससे अलग अलग एक्सपर्ट तैयार हो रहे हैं कितने ही नर्सिंग होम इसी मिलावट के शिकार लोगों का शिकार करके अपनी जीविका चला रहे हैं बड़ी बड़ी कम्पनियाँ 'शुद्ध' 'शुद्धतम' का लोगो लगा के आम चीजों को महंगा करके अलग से एक बाजार का निर्माण कर रही हैं और देश का चहूँमुखी विकास कर रहीं हैं।

खबरदार अगर आगे से तुमने मिलावट का रोना रोया आम इंसान तू खुद दो लोगों के मेल से पैदा हुआ है तुझे मिलावट जैसी अत्यंत शुद्ध चीज पे ऊँगली उठाने की इजाजत नहीं है शुद्ध खाना तेरे और भगवान के मिलन में बहुत बड़ी बाधा है इसलिए चुपचाप मिलवाटी खाना खाता जा और जल्दी से भगवान से जाकर मिल और इस मिलावटी संसार से विदा ले।

-तुषारापात®™

Friday, 10 June 2016

तुम्हारे अधरों की कमनीय बाँसुरी पे  प्रेम का स्वर फूँकू मैं पंचमा 

आकाश है ओढ़े सुरमई कालिमा
धरती पर छाई यौवन की हरीतिमा
श्रावण की चंचल बरखा में
मिलन को तरसे मन प्रियतमा

छा जाए जब मेघों की कालिमा
देखूँ मैं तुम्हारे मुख का चंद्रमा
साथ तुम्हारे है देखनी मुझे
उगते सूर्य की भी लालिमा

नयन कटारी तीक्ष्ण करता सुरमा
कपोलों पे लाज की लालिमा
आलिंगन में जब भर लूँ तुम्हें
कहो बड़े चंचल हो बालमा

बाँहों में भर लूँ तुम्हें सुमध्यमा
लांघ जाऊँ समस्त बंधन सीमा
तुम्हारे अधरों की कमनीय बाँसुरी पे
प्रेम का स्वर फूँकू मैं पंचमा

-जब तुषारापात सिर्फ तुषार था (किशोरावस्था की कविता)

Sunday, 5 June 2016

गर हर यादव सपाई नहीं होता तो........

बात जनेऊ की नहीं लखनऊ की है जनाब
हर बाजपेई यहाँ कट्टर भाजपाई नहीं होता

-तुषारापात®™

Wednesday, 1 June 2016

दो जून

मई के खेत में फसल नहीं लहराई
'दो जून' की रोटी को तरसेगा जुलाई

-तुषारापात®™

Saturday, 28 May 2016

विराटजातक अनुष्कछेद श्लोक ६३ एवं ३६

चुम्बन एक आश्चर्य: किसी अभिनेत्री द्वारा अपनी किसी फिल्म में किसी अभिनेता को देय अथवा प्राप्त किया हुआ सार्वजनिक चुंबन अभिनेत्री के प्रेमी के लिए सामान्य होता है परन्तु यदि उस चुम्बन का आदान प्रदान एकांत में हुआ हो तो अभिनेत्री के प्रेमी के लिए वह चुम्बन अत्यंत कष्टकारी होता है।

-तुषारापात™

Thursday, 26 May 2016

तनिष्किया‬

"नहीं नहीं...रहने दीजिये...मेरे बजट से ओवर है..रोज पहनने के हिसाब से काफी महंगी हैं" उसने अपने मन को मारते हुए तनिष्क की सेल्स गर्ल से कहा
उसकी आँखों में उन चूड़ियों के लिए चमक थी पर बटुए में उतनी खनक नहीं थी,एक फोन कॉल निपटा के कॉउंटर की तरफ वापस आते हुए मैंने ये सुना,देखा और सब समझ गया
"अरे क्या हुआ..तुम्हें तो इतनी ज्यादा पसंद आई थीं..ये चूड़ियाँ..कितने की हैं ? मैंने आधी बात उससे की और आधी सेल्स गर्ल से दोनों चूड़ियाँ लगभग छीनते हुए कही, सेल्स गर्ल कुछ कहती इससे पहले ही वो बोल उठी
"रहने दो..न..अपने बजट से और 36 हजार महंगी है..इतना महंगा लेकर क्या करना" उसकी बात में यथार्थ सपनों को दबा रहा था, मैंने कुछ नहीं कहा बस वो चूड़ियाँ उसकी कलाइयों में पहना दी
"अरे मगर..सुनो तो...हमारे पास चूड़ियों पे खर्च करने के लिए बस 50 हजार का ही बजट है..हमने तय किया था न.." दुविधा में पड़ी वो सकुचाहट से बोली
"कोई नहीं... नया टैबलेट लेने के आईडिया को थोड़ा आगे शिफ्ट कर देते हैं..उसका बजट इसमें मिला देते हैं" मैंने उससे कहा और सेल्स गर्ल को चूड़ियों पे लगा टैग देते हुये बिलिंग के लिए कह दिया
"पर..तुम पिछले तीन साल से वही पुराना टैबलेट चला रहे हो..हैंग भी तो कितना होता है..." उसने मेरा पुराना टैबलेट मेरे हाथ से लेकर दिखाते हुए कहा
"पिछले दो साल से..तुम्हारी कलाइयाँ भी..बगैर सोने के सूनी देखी हैं मैंने...बेंटेक्स की चूड़ियों पे तुम्हें सहेलियों के सामने झिझकते देखा है" थोड़ी भावुकता आ गई थी मेरी आवाज में
"तो अब तुम्हारे ऑफिस के काम..इम्पॉर्टेंड इमेल्स..और फेसबुक व्हाट्सऐप कैसे चलेंगे..." ऐसा लगा अगर तनिष्क का शोरूम न होता तो वो ख़ुशी से चूम लेती मुझे
"ईमेल और फेसबुक के...हजारो नोटिफिकेशन्स की टिंग से...कहीं ज्यादा ख़ुशी...तुम्हारी कलाइयों में पड़ी इन दो चूड़ियों की खनक देगी मुझे"


-तुषारापात®™ 

Friday, 20 May 2016

फिर तेरी कहानी याद आई

"वाह क़तील शिफ़ाई...क़त्ल कर दिया तुमने..." म्यूजिक प्लेयर पे रिपीट मोड पे चल रहे गाने 'तेरे दर पे सनम चले आये..तू न आया तो हम चले आये..'को सुनते सुनते मेरे मुंह से अपने आप ये शब्द निकल गए ,किसी राइटर के लिखे की तारीफ वही खुल के करता है जिसके दिल की छुपी बात को राइटर अपने कलाम में बयां कर दे और ये गाना...ये गाना..तो मेरे दिल जिगर की पुकार है..मेरा सपना है...मेरी तमन्ना...काश कभी आयत कहीं से आ जाये..और..और ये गाना बज उठे

तकरीबन रोज की तरह ही अवध की शाम मनाता मैं आज भी लाउड वॉल्यूम पे ये गाना सुनता हाथ में जाम लिए उसके ख्यालों में खोया हुआ था...हाँ आयत..'फिर तेरी कहानी याद आई'...न जाने कितनी बार बजने के बाद कुमार शानू ने अभी मुखड़े को पूरा ही किया था कि मुझे डोरबेल सुनाई दी कोई दरवाजा भी पीट रहा था,मैंने म्यूजिक प्लेयर पॉज किया और उठकर दरवाजे को खोला और मुझे अपनी आँखों पे भरोसा नहीं हुआ मेरे हाथ से ग्लास छूट गया

"वापस जाने वाली थी...बहुत देर हो गई घंटी बजाते.." उसने मुझसे आँख चुराते चुराते कहा, मैंने देखा उसकी आँखें आषाढ़ से पहले भटक आई बदली लिए हुयें थीं जो जेठ में बरसना भी नहीं चाहती थी और टिकना भी नहीं चाहती थीं मैंने उसे अंदर बुलाया और सोफे पे बैठने को कहा वो इधर उधर देख रही थी सकुचाहट भी थी...और कुछ सुकून की तलाश भी थी उसे शायद.. और यहाँ आने का..लोगों को पता लगने का डर भी साफ़ दिख रहा था उसके चेहरे से

"दिल को धड़का लगा था पल पल का..शोर सुन ले न कोई पायल का" मैंने उसकी ओर देखते हुए मन में गुनगुनाया और उसे पानी का ग्लास दिया उसने एक साँस में पानी खत्म किया और ग्लास टेबल पे रख के चुप बैठी रही मैं समझ रहा था कुछ बात है लेकिन क्या इसके लिए पूछना तो पड़ेगा
"क्या हुआ...अचानक ..यूँ...फोन कर दिया होता..सब ठीक तो है..बहुत परेशान दिख रही हो..क्या बात है"

"कुछ नहीं" उसने कहा,अच्छी तरह उसकी आदत जानता हूँ एक बार में तो कभी बता ही नहीं सकती कि क्या हुआ मैंने कई बार अलग अलग तरीके से पुछा तो कुछ देर बाद हमेशा की तरह पहले उसकी आँखों ने बोला फिर उसके लब हिले

"वो..वो..हदीस..हदीस चाहता है कि मैं उसके साथ सीनियर्स की पार्टी में जाया करूँ..कुछ ओपन ड्रेसेज एंड ओपन फ्रेंडली एट्टीट्यूड में.." उसने बहुत धीमे से कहा मैं अंदर ही अंदर सुलग के रह गया पर चुप रहा उसने आगे कहा "इसी बात पे आज फिर बहुत झगड़ा हुआ ..और मैं थोड़ी देर के लिए बाहर निकल आई..फिर...पता नहीं कैसे तुम्हारे घर तक आ गई"

और उसके बाद जितनी देर तक वो हदीस की बातें कर सकती थी करती गई..साथ साथ रोती गई...बिलखती गई..गुस्सा दिखाती गई...अपने दिल का पूरा गुबार निकाल के शान्त हुई..और आखिर में बोली.."वेद..तुम चुप क्यों हो..क्या मैंने यहाँ आके गलती की"

"नहीं..मैं चुप इसलिए हूँ.. अ..हदीस की बात गलत है..पर ये तुम मियां बीवी का मामला है..मैं बोल भी क्या सकता हूँ..और किस हक़ से...मैं उसकी आँखों में गहरे देखते हुए बोला उसने मेरी बात समझते हुए कहा "हाँ तुम तो उलटे खुश ही होंगे..जिसके लिए मैंने तुम्हें छोड़ा..आज उसके साथ मेरी न बनते देख..लेकिन एक बात बताओ क्या एक दोस्त के काँधे पे दूसरा दोस्त रो नहीं सकता"

"पता है आयत... इस दिन की मैंने बरसों से तमन्ना की है..मगर तुम्हारे इस तरह आने की..नहीं..जहाँ तुम आओ अपना गम हल्का करो..और चली जाओ..जिस काँधे की तुम बात कर रही हो..उस काँधे के एक बालिश्त नीचे एक दिल भी है..उसे कभी महसूस किया तुमने..आयत मैं सिर्फ एक काँधा नहीं हूँ...तुम्हें पता है मैं तुम्हारे ही ख्यालों में खोया हुआ था..लेकिन वो मेरी आयत थी..और यहाँ जो आई है...हदीस की आयत है..उसकी पत्नी है..और तुम्हीं ने कहा था "आयतें कभी वेद की नहीं हुआ करतीं"

मैं नशे में था और मेरा पूरा दर्द उभर आया था पता नहीं वो दर्द किस बात का था...अपनी परेशानी का..या उसे परेशान देख के..या शायद हाँ हदीस की ये हरकत मुझे गहरे तक चुभी है..और मैं अपना गुस्सा उसपर नहीं निकाल सकता..काश तुम मेरी होतीं आयत तो मैं ऐसा कहने वाले का मुँह तोड़ देता...ओह्ह आयत मैं तुमको भी दुःख नहीं पहुँचाना चाहता पर..मैं सिर्फ काँधा बन के भी नहीं रहना चाहता

"रात ज्यादा हो रही है..मुझे लगता है अब तुम्हें जाना चाहिए.." मेरी शुष्कता देख वो उठी और एक झटके में निकल गई मैंने दरवाजा बंद किया एक पैग बनाया सोफे पे वहीं बैठ गया जहाँ वो बैठी हुई थी उसकी खुश्बू से लिपट के रोने लगा और अपनी आवाज छुपाने को म्यूजिक प्लेयर का प्ले बटन पुश कर दिया गाना आगे बजने लगा....

"बिन तेरे कोई आस भी न रही...इतने तरसे की प्यास ही न रही"

-तुषारापात®™

Wednesday, 18 May 2016

परिधि बराबर व्यास गुणे बाइस बटा सात

"तुम्हारे पास अब टाइम ही कहाँ है मेरे लिए... या तो तुम घर के काम में उलझी रहोगी.. या फिर काम से होने वाली अपनी थकावट का रोना रोती रहोगी.. ऐसे में अगर मैं अपने दोस्तों के साथ समय न बिताऊँ तो क्या करूँ... रोज बारह बारह घंटे मर खप के काम करने के बाद...क्या मुझे हक नहीं है जरा सा खुश होने का.." व्यास ने चिल्लाते हुए कहा

"तुम तो बारह घंटे काम के बाद फ्री हो जाते हो...पर मेरा क्या...बोलो.. मुझे तो हफ्ते के 'सातों रोज बाइस घंटे' गृहस्थी में खटना पड़ता है... 'पाई' 'पाई' बचाने में मेरी मति लगी रहती है...मेरी खुशी के लिए कौन सोचता है यहाँ... मैं क्या कोई बंधुवा मजदूर हूँ.." परिधि ने गुस्से में अपना पल्लू खोंसा और बिलखते हुए तेज आवाज में आगे बोली

"इतना सब करने के बाद..प्यार के दो मीठे बोल तक को तरसती हूँ मैं ...बाकी तो जाने ही दो..केंद्र के होने के बाद तो फिर भी कभी कभार.. बिस्तर पे ही सही तुम्हें मेरी याद आ जाती थी...मगर त्रिज्या के होने के बाद..तो तुम भूल ही गए हो कि तुम्हारी एक बीवी भी है.... उसे भी तुम्हारे साथ प्यार के दो पल चाहिए हो सकते हैं.. मैं क्या समझती नहीं आजकल उस निगोड़ी बिंदु के घर के चक्कर क्यों लगाये जाते हैं..दोस्तों के घर जाने के नाम पे.."

व्यास इस हमले से थोड़ा घबड़ाया पर सम्भलते हुए कॉउंटर अटैक पर आया "तो क्या करूँ.. कैसे प्यार करूँ तुमको.. जब देखो बिखरे बाल लिए.. मुड़ी तुड़ी साड़ी पहने एक गृहस्थन ऑन्टी बनी दिखती हो... कभी केंद्र को लेकर सो जाती हो तो कभी त्रिज्या को पढ़ाती रहती हो...घर का माहौल साला इतना नीरस है.. कि दो पैग के बाद भी रोमांस नहीं जगता.. तुम्हारी इस शकल के आगे शिलाजीत भी फेल है"

"हाँ हाँ..मैं तो हूँ ही गृहस्थन.. तुम तो बड़े यंग हैंडसम दिखते हो इस मोटे तोंद और अपने 30 सेकंड के पुरुषत्व के साथ...और...और किसने कहा था दो दो बच्चे पैदा करने को.." वो गुस्से में तमतमाई आगे और कुछ बोलने जा रही थी कि अपने कमरे से उनकी आवाजें सुनकर बच्चे आ जाते हैं वो चुप हो जाती है और बच्चों से कहती है

"केंद्र..त्रिज्या.. फटाफट हैंडवाश कर लो..मैं खाना लगा देती हूँ खा कर चुपचाप सो जाओ..नो टीवी शीवी टुडे" बच्चे हैडवाश करके आते हैं वो उन्हें खाना खिला के उनके कमरे में सुला आती है और बिना खाना खाये सुबकते हुए अपने बिस्तर पे लेट जाती है और उधर व्यास पहले ही गुस्से में पैर पटकते हुए घर से बाहर निकल चुका होता है और अपनी उम्र से कुछ ही बड़े लेकिन रिश्ते के अंकल के पास जाकर सारा किस्सा सुनाता है अंकल बाहर बरामदे में उसके साथ बोतल लेकर बैठते हैं और कहते हैं

"देखो..ये सिर्फ तुम्हारी ही नहीं..आज गृहस्थी के बोझ से दबे हर मध्य वर्गीय परिवार की यही कहानी है... सबसे पहले एक लड़का छुट्टा होता है व्यास के जैसे जिसकी कोई सीमा नहीं कोई बंधन नहीं.. वो कहीं भी आ जा सकता है..पर शादी के बाद एक परिधि आकर उसको एक निश्चित दायरे में बंद कर देती है..जिसे गृहस्थी का वृत्त कहते हैं..अब वो जहाँ जहाँ जाता है उसकी परिधि भी साथ जाती है.." कहते कहते अंकल ने एक पैग बना के उसकी ओर ग्लास बढ़ाया और आगे कहा

उसके बाद जब बच्चा होता है तो..इस वृत्त में एक नया केंद्र बनता है... परिधि इस नए केंद्र की हो के रह जाती है...और इस प्रकार गृहस्थी का वृत्त..वृत्त न रहकर..एक दो केंद्र वाला दीर्घवृत्त बन जाता है और व्यास का वजूद लगभग खत्म सा हो जाता..उधर दीर्घवृत्त के दो केंद्र होने के कारण परिधि भी अब अपना सुंदर सा गोल आकार..कायम नहीं रख पाती.. जिससे आकर्षण का अभाव उत्पन्न होता है" अंकल ने कहकर एक साँस में ग्लास खत्म किया और नमकीन चखने लगे

"ओह्ह आपने तो बहुत गूढ़ बात बता दी..आप और आंटी में के बीच तो कभी ऐसी कोई समस्या आई ही नहीं होगी आखिर आप इतने समझदार जो हैं..अब इसका उपाय भी बता दीजिये" व्यास ने अचंभित होते हुए उनकी प्रशंसा की और उनसे यह पुछा ही था कि अंदर से आंटी की आवाज आई

"अरे और कितनी देर तक पीते रहोगे...वाइफ के लिए तो तुम्हारे पास जरा सा टाइम नहीं है..बस जब देखो तब..यार बाजी करते रहते हो..आओ जल्दी नहीं तो दरवाजा बंद कर लूंगी.. रात भर बाहर रहना फिर.."

ये सुनना था कि बाहर बैठे दोनो चाचा भतीजे ठहाका मार के हँस पड़े।

-तुषारापात®™

Tuesday, 17 May 2016

जागो

आसमान की माँग में सूरज का सिन्दूर भर दिया
नए सवेरे ने बदचलन रात को सुहागन कर दिया

#सुप्रभात
-तुषारापात®™

Monday, 16 May 2016

मासनामा

'जेठ' की दुपहरी
की सूनी सड़क सी मेरी जिंदगी
और 'आषाढ़' की बारिश सी तुम्हारी यादें
जब मुझपर बरसती हैं तो
'सावन' में शिवलिंग पे चढ़े
दूध सा पवित्र हो जाता हूँ
'भादों' तक बरसती
तुम्हारी यादों को सोख लेता हूँ खुदमें
इनमें से कुछ 'आश्विन' में
मेरे दुखों का श्राद्ध कर जाती हैं
तो 'कार्तिक' में
कुछ के साथ दिवाली मन जाती है
'मार्गशीर्ष' में उनमें से कुछ को
गुल्लक में रखकर बचाता हूँ
और 'पौष' के चाँद के साथ
ख़ुशी ख़ुशी ठुरठुराता हूँ
फिर वो गुल्लक फोड़ता हूँ 'माघ' में और
तुम्हारी यादों की डुबकियों से
संगम का पुण्य कमाता हूँ
'फाल्गुन' भर तुम्हारे ही
रंगों में ही रंगा नजर आता हूँ मगर
रंग के साथ साथ
उतर जाती हैं तुम्हारी यादें सारी
तो 'चैत्र' में चित्त अपना
फिर से अशांत पाता हूँ
आते आते 'बैशाख'
पूरी तरह कंगाल होकर
जेठ की दुपहरी के
सूने रस्ते पे फिर से आ जाता हूँ

-तुषारापात®™

Saturday, 14 May 2016

लड़की की शादी

"उस शिल्पी का तो चक्कर चल रहा होगा किसी से...कुछ ठहर गया होगा पेट में...इसीलिए उसकी इतनी गुपचुप और फटाफट शादी कर दी शर्मा लोगों ने... न किसी को बताया...न किसी को बुलाया...ऐसा कहीं होता है क्या" मिसेज दत्ता अपनी काम वाली मालती से अपने मोहल्ले के शर्मा जी के घर की टोह ले रहीं थीं
"मेम साब 'वन्डर' तो हमें भी लगा...पर शर्माइन कहिन कि आर्यसमाजी लोग हैं वो...तो शिल्पी बिटिया की शादी बड़ी सादगी से करिन..सिर्फ उनके घर के लोग और लड़के के घर के लोग इकठ्ठा हुए और चट मँगनी ते पट व्याह" मालती ने बात कुछ यूँ कही जैसे उसे खुद इस बात पे विश्वास न हो फिर आगे अपने मतलब की बात पे आते हुई बोली "मेमसाब लड़की की शादी तो हमको भी करनी है...आपसे कुछ पैसों की मदद हो जाती तो..एक दस हजार रुपैये"
"दस हजाSSSर...बड़ी महंगी शादी कर रही है क्या?" मिसेज दत्ता ने आँखें गोल करते हुए कहा
"अरे मेमसाब लड़के को हीरो हौंडा देना है और कुछ नगद भी...और फिर नाते रिश्तेदारों का न्यौता वगैरह....आप ही नहीं सबसे थोड़ा थोड़ा माँग रहे हैं" मालती ने ऐसे कहा जैसे इतना दहेज़ देना तो ईश्वरीय विधान के तहत आता है
"ठीक है...देखूँगी... देखूँगी..इनसे बात करुँगी" मिसेज दत्ता ने अपना पीछा उससे छुड़ाया और मोहल्ले की अन्य और औरतों से शिल्पी की शादी की 'सत्संगी' चर्चा करने को फोन उठा लिया
उधर शर्मा जी के यहाँ उनकी बेटी शिल्पी की शादी के बाद बड़ी बुआ आई हुई हैं शर्मा जी उनकी पत्नी और उनका बेटा संजय बड़ी बुआ की जली कटी बातें सुन रहे हैं "कुछ लोक लाज बाकी है तुममें शंभुनाथ..कि नहीं... पूरे खानदान में थू थू मची है.. ऐसे कहीं शादी ब्याह होता है..और तुम विमला तुम्हारे मायके की तरफ भी सब लोग हँस रहे हैं..और..ऐ संजय...ए तुम्हारे फूफा ने तो सुनाई सुनाई के जीनो हराम कर दियो" बुआ जी खड़ी बोली से अपने आंचलिक टोन में आते हुए बोलीं
और जैसे प्रेशर कूकर में कड़े आलू उबल के नरम पड़ जाते हैं वैसे ही बुआ जी की साढ़े तीन घंटे की अनवरत 'वंश और खानदान की वीरगाथा' सुनने के बाद शंभुनाथ शर्मा और विमला भी विचलित हो जाते हैं और निर्णय लेते हैं कि एक दिन निश्चित करके शिल्पी और शैलेन्द्र (दामाद) को बुलाकर एक 'आफ्टर मैरिज पार्टी' कर देते हैं वरना लोग क्या कहेंगे हालाँकि संजय को ये प्रस्ताव पसंद नहीं था पर उसकी किसी ने नहीं सुनी हाँ पापा को कुछ समझाते हुए उसने पूरे आयोजन की जिम्मेदारी चतुराई से अपने हाथ में ले ली और एक निश्चित दिन का सभी 'असंतुष्ट' रिश्तेदारों और कॉलोनी वालों को फोन से शाम के 8 बजे का न्यौता दे दिया गया
कार्यक्रम स्थल संजय के एक जिगरी दोस्त के घर की विशाल छत है संजय ने अपना म्यूजिक सिस्टम वहाँ लगा रखा है संगीत तेज है दिवाली पे घर पे लगने वाली झालर से दोस्त के घर को थोड़ा सजा दिया है साढ़े आठ बज रहा है लोग आना शुरू हो जाते हैं और साढ़े नौ तक अधिकतर लोग आ जाते हैं उनकी चाय नमकीन से सेवा करने के बाद संजय माइक लेकर बोलता है
"यहाँ पार्टी में आये वो लोग हैं जो शिल्पी की सादी शादी से बड़ी तकलीफ में हैं...जैसे हमारे प्रिय जीजाजी को तकलीफ है कि वो महँगी शराब पीकर अपनी सालियों के साथ 'कृष्णा नाच' नहीं कर पाये पाये...हमारे आदरणीय बड़े फूफा जी...जो बेचारे अपने और छोटे फूफा के टीके के बराबर पैसे को लेकर उत्पात नहीं कर सके..और हमारी जयपुर वाली पिंकी आंटी जो अपनी ढाई लाख की साड़ी किसी को नहीं दिखा पाईं और हमारे कॉलोनी की प्यारी सारी आंटीयाँ जिनको ये बताने का मौका नहीं मिला कि शिल्पी का रंग दूल्हे से थोड़ा दबा हुआ है" वो सबके बने हुए मुँह देखता है और आगे कहता है
"हमने शादी को दिखावा बना रखा है...अपने स्टेट्स को दिखाने का एक माध्यम...दहेज़ की रकम से पता करते हैं कि दुल्हन और दूल्हे के परिवार का क्या क्लास है..क्या रुतबा है...समाज की इसी मानसिकता के कारण लड़की का पिता...चाहे वो मालती के पति जैसा एक गरीब हो..या दत्ता अंकल जैसा अमीर...अपनी अपनी लड़की की शादी को लेकर इतना दबाव में रहता है कि उसे अपनी लड़की एक बोझ लगने लगती है...कोई मोटरसाइकिल देने के लिए परेशान है तो कोई मर्सिडीज देने के लिए... दहेज़ देना भी आज एक फैशन हो गया है नहीं दिया और कम दिया तो लोग हमें कमजोर न समझ लें..लो स्टैण्डर्ड का न समझ लें वाह हैं न कमाल की बात....और जो आदमी इस वाहियात परम्परा को तोड़ रहा है..उसकी बेटी चरित्रहीन है...या वो कंजूस है...या गरीब है...या उसकी लड़की ने भाग के शादी की है .." कहकर संजय ने अपनी उत्तेजना को गहरी साँस लेकर दबाया और आगे बहुत शांत और मीठे स्वर में बोला
"अभी वेबकैम पे शिल्पी और शैलेन्द्र वीडियो चैट पे होंगे आप लोग अपना अपना आशीर्वाद उन्हें दें...और जाते समय बूँदी के लड्डू का एक एक पैकेट जरूर से लेते जाइयेगा...और हाँ खाना अपने अपने घर जाके खाइयेगा"
इतना सुनते ही शंभुनाथ खिलखिला के हँस दिए..आश्चर्यजनक हैं न लड़की का पिता खुल के हँस रहा था।
-तुषारापात®™

Sunday, 8 May 2016

"हैप्पी मदर्स डे.....ऑन्टी" 

"अ..जी...वो खाना..मिलेगा क्या" मैंने सकुचाते हुए उनसे पूछा

"नए आये हो न?...ढाबे में खाना नहीं मिलेगा तो और क्या मिलेगा" उनकी अनुभवी आँखों ने मेरी सकुचाहट को पढ़ लिया "क्या लगाऊँ ?" उन्होंने मुझसे पूछा

"जी..अ..बस ये लोग जो खा रहे हैं..मतलब दाल रोटी..अ कितने की होगी ये ?" एक दो लोग और थे जो वहाँ खाना खा रहे थे उनकी थाली में दाल रोटी सब्जी चावल देख के मैंने वही खाने को उनसे कह दिया

"20 रुपैये की थाली है...चार रोटी दाल सब्जी और चावल..आराम से बैठो बेटा...लगाती हूँ" उन्होंने बड़ी ममता से कहा और रसोई में चली गईं

"ओह्ह..जी पर एक बात है...मेरे पास सिर्फ...सिर्फ..उन्नीस रूपैये हैं.." मैं बड़ी शर्मिन्दिगी से बोल पाया

"कोई नहीं..बाद में दे देना..अब खाना खाने तो रोज ही आओगे न यहाँ" उन्होंने जाते जाते मुड़के मुस्कुराते हुए वात्सल्य प्रेम में डूबी आवाज में मुझसे कहा

"जी..जी..ठीक है" मैं चैन की साँस लेते हुए बोला उसके बाद मैंने खाना खाया और पैसे देकर अपने कमरे पे आ गया

बिसवाँ के एक गरीब माँ बाप का होनहार मगर बहुत शर्मीला बेटा मैं यहाँ लखनऊ में आगे पढ़ने आया हूँ सेक्टर क्यू के पास बेलिगारद में एक सस्ता कमरा लेकर रह रहा हूँ आज मेरा पहला दिन है, बेलिगारद चौराहे ,वैसे ये है तो तिराहा पर इसे चौराहा क्यों कहते हैं मुझे नहीं पता,पे ही ये आंटी का ढाबा है ढाबा क्या सड़क पे बने एक छोटे से मकान के निचले हिस्से में एक महिला जिन्हें सब ऑन्टी कहते हैं मीनू में सिर्फ दो आइटम वाला ये ढाबा चलाती हैं ढाबे में मेरे जैसे मजबूर लोग ही खाना खाने आते हैं जो सस्ता खाना ढूँढते हैं इसलिए ढाबे की हालत और उसकी कमाई में से कौन ज्यादा खस्ताहाल है ये कहना जरा मुश्किल है

अगले दिन मैं फिर जाता हूँ ढाबे में आंटी मुझे देखकर मुस्कुराती हैं मैं भी हल्का मुस्कुराता हूँ कल के बाद से थोड़ा सा आत्मविश्वास मुझमे आया है "आंटी..खाना लगा दीजिये...पर आपसे एक विनती है..आप थाली से एक रोटी..कम कर दीजिये..क्योंकि मेरे पास उन्नीस रुपैये से ज्यादा खाने पे खर्च करने को नहीं हैं"मैंने सोचा खाने से पहले ही साफ़ साफ़ बता दूँ

हालाँकि मेरा बजट बीस रुपैये का था पर एक रुपैया रोज बचा के जब छुट्टियों में घर जाऊँगा तो अपनी माँ के लिए कुछ उपहार ले जाऊँगा ये सोच के मैंने ये नीति बनाई है

"ठीक है..बैठ जाओ..अभी लगाती हूँ..." कहकर वो रसोई में चली गईं
एक तरफ की दीवार से लगीं मेज कुर्सियां पड़ी थीं और दूसरी ओर एक दीवार पे जमीन से करीबन ढाई फुट ऊँचा एक प्लेटफॉर्म बना था जिसपे चूल्हा बर्तन इत्यादि रखे थे बस वही रसोई थी
मैंने देखा कि आंटी का कद बहुत छोटा है जिसकी वजह से रसोई का प्लेटफॉर्म उनसे थोड़ी ज्यादा ऊँचाई पे पड़ता है और उन्हें खाना बनाने के काम में काफी कठिनाई आ रही है पर मैं चुप रहा थोड़ी देर बाद वो खाने की थाली ले आईं

"अरे...आपतो इसमें चार रोटी ले आईं.. मैंने आपसे कहा..." मैं आगे कुछ कहता कि वो बोल पड़ीं " देखो बेटा.. मैं एक बूढ़ी अकेली औरत बस इसलिए ढाबा चलाती हूँ..कि तुम लोगों के साथ... मेरी भी दो रोटी का इंतजाम हो जाए... अब एक रुपैये के लिए क्या तेरा पेट काटूँगी" कहकर मेरे सर पे हाथ फेरकर वो चली गईं

ऐसे ही रोज ये क्रम चलता रहा रोज मैं ऑन्टी को ऊँचे प्लेटफॉर्म पे बड़ी मुश्किल से काम करते देखता,घुटनो में तकलीफ के कारण बैठ के कोई काम उनसे हो नहीं पाता था,खाना खाता ,उन्नीस रुपये देता कुछ हल्की फुल्की बातें उनसे होती बस ऐसे ही कुछ महीने बीत गए और फिर आज के दिन मैं फिर ढाबे पे आया हूँ

"अरे..आज बड़ी देर कर दी तूने...सब ठीक तो है..बैठ मैं खाना लगाती हूँ" ऑन्टी की आँखों में चिंता थी, मैंने कहा "सब ठीक है और हाँ खाना तो खाऊंगा ही..पर पहले आप रसोई में आओ मेरे साथ..."

उनका हाथ पकड़ के मैं रसोई वाले हिस्से में उन्हें ले आया और उन्हें रसोई के प्लेटफॉर्म की ओर खड़ा किया और फिर उनके पैरों के नीचे पूजापाठ वाली दुकान से खरीदी लकड़ी की एक मजबूत चौकी रखने लगा तो वो आश्चर्य से भर गईं,उसपे खड़ी हुईं और उनकी आँखों ने न जाने कितने वर्षों के बंधे बाँध खोल दिए..

मैंने उनके पैर छुए और कहा "हैप्पी मदर्स डे.....ऑन्टी"

-तुषारापात®™

Saturday, 7 May 2016

चोर

लेखक वो चोर है जो आपके रोज के क्रियाकलापों में से कुछ चुराता है,उसे अपने शब्दों की थैली में बांधकर वापस आपके पास ही बेच जाता है,यही व्यापार उसकी कला है।

-तुषारापात®™

Thursday, 5 May 2016

क्योंकि हर चैनल कुछ कहता है

Aaj Tak की HISTORY को ZOOM करके देखने से यह DISCOVERY निकली है कि किसी BINDAAS SONY कुड़ी की MASTII का प्रतिदिन DOORDARSHAN करने वाला कोई PUNJABI etc मुंडा उस लड़की की MAHUA सी महक के BIG MAGIC में फँसके जब एक दिन हिम्मत करके HOME SHOP 18 से खरीदे चश्में को अपनी नाक पे चढ़ा के 9x JALWA मारता हुआ अपने ZEE की बात उससे बड़ी NAAPTOL से कहता है कि मेरी सूनी ZINDAGI को अगर तुम्हारा SAHARA मिल जाए तो मेरी LIFE OK हो जायेगी और इसमें COLORS भर जाएंगे तो लड़की पहले तो अचानक आये इस RISHTEY को लेकर अपनी AASTHA और SANSKAR का नाटक दिखाते हुए HUNGAMA करती है पर बाद में उस लड़के का प्यार LIVING FOODS ,FAMILY और MONEY आदि SAB कुछ देखकर अकेले से V बनने को राजी होकर अपने साथ उसके STAR PLUS करके,कई EPIC पे SANGEET BHOJPURI बजाती है & DEN ENJOY करके उससे शादी करके अपना CARTOON NETWORK बनाती है ।

-तुषारापात®™

Tuesday, 3 May 2016

बिंगो और प्रकृति दर्शन

आज एक बहुत अनोखी चीज देखी,जितनी चमत्कारिक उतनी ही आसान ,एक ऐसी दैनिक घटना,जो रोज होती है पर जिसे मैं बहुत कम ही देख पाता हूँ,बहुत दिनों के बाद आज मैंने सूर्य को उगते देखा और ये अनोखी घटना तब हुई जब रात भर लिखते रहने के कारण मैं सुबह तक जाग रहा था कि तभी साढ़े पाँच के बजे के आसपास मेरा कुत्ता बिंगो,कमरे में दरवाजे को धकेलते हुए दाखिल हुआ और खुदको लघुशंका दीर्घशंका निपटारे के लिए बाहर ले चलने का मुझे आदेश देने लगा वैसे ये काम रोज पत्नी जी का रहता है पर आज वो थोड़ा देर से जागीं तो बिंगो साहब ने स्त्री पुरुष का भेद न करते हुए मुझे अपने इस काम के लिए चुना।

बिंगो को पट्टा पहना कर चेन लगाई और गेट खोलकर बाहर सड़क पे जैसे ही आया तो मंद मंद बहती शीतल पवन फूलों की कमर को सहलाती हुई कस्तूरी सी महक लिए मेरे रोम रोम में समा गई ऐसा लगा कि जैसे वायु ने मुझमे व्याप्त प्राण को बढ़ा दिया, सड़क पे दूर बाएं हाथ पे बने मकानों के बीच सृष्टि के साक्षात देवता भगवान भास्कर मुझ रात्रिचर को भैरव जी की सवारी लिए विचित्र नजरो से देखते हुए अपना आकार बढ़ा रहे थे पेड़ पौधे झूम रहे थे चिड़ियाँ मानो उनके स्वागत में मंगल गान कर रहीं थीं पूरी प्रकृति प्रसन्नता की मंद धूप में नहा रही थी और पृथ्वी का दैनिक जीवन गति लेने लग गया था।

तभी से सोच रहा हूँ कि विकास के नाम पे हम प्रकृति से कितना कट गए हैं हमने रात्रि को तो जीत लिया बिजली का आविष्कार करके मगर अपने लिए रोग और उलटी दिनचर्या का शत्रु भी प्रबल कर दिया और एक तरफ ये बिंगो है जो अपनी दिनचर्या नियमित रखता है फेसबुक टीवी विडियोगेम इत्यादि का कोई चस्का नहीं और उठने के लिए कोई अलार्म भी नहीं लगाता फिर भी रोज चार बजे उठ जाता है एक पशु होकर वो कितना अनुशाषित है और मैं एक बुद्धिजीवी मनुष्य होकर भी प्राकृतिक अनुशाषन का रत्ती भर पालन नहीं करता । शायद यही कारण है कि श्वान शास्त्रों में वर्णित अपनी पूर्ण औसत आयु 12 वर्ष से दो चार वर्ष अधिक ही जीता है और हम मनुष्य अपनी 120 वर्ष की आयु का 80 वाँ वर्ष भी मुश्किल से देख पाते हैं।

इस विषय पे बहुत अधिक लिख सकता हूँ पर मुझे पूरी उम्मीद है कि मेरे शब्दों से आप मूल भाव को समझ लेंगे और ये सिर्फ मेरी नहीं हममें से बहुतों की कहानी है अभी गर्मी की छुटियों में हममें से बहुत लोग किसी हिल स्टेशन पे जाकर पहाड़ बर्फ नदी का लुत्फ़ ऐसे उठाएंगे जैसे ये सारी चीजें धरती पे अभी अभी प्रकट हुईं हों और किसी अन्य दुनिया की हों जबकि सच ये है कि इनके बीच हम उत्पन्न और विकसित हुए और बाद में इनसे ही दूर हो गए दूर होने का मतलब इनसे विमुख होने से है।

हमने नदी को पानी की बोतल में तो कैद कर लिया पर नदी के बहते जल की कल कल ध्वनि जिससे हमारी आत्मा की प्यास मिटती है उससे खुद को वंचित कर लिया। पता नहीं कैसे हम सब इस विकास की अनिवार्य सी प्रक्रिया में फंस गए हैं शायद ईश्वर का ये ही तरीका है हमें वापस अपने पास बुलाने का ।

और हाँ बिंगो को अपनी नियमित दिनचर्या और प्रकृति से जुड़ाव का एक फायदा और भी है वो ये कि उसे खाने में अगर कोई चीज पसंद नहीं आती तो वो पूरे आत्मविश्वास से न करके छोड़ सकता है पर ये कारनामा डाइनिंग टेबल पे बैठककर शायद ही कभी मैं कर पाऊँ ।

-तुषारापात®™

Tuesday, 26 April 2016

लाल चूड़ियाँ

"बापू अबकी जो फसल हुइहए..तो हमका लाल चूड़ी दिलाय देहउ..के बापू..दखिन देविन के मेला महियां..अब कित्ते दिन बाकी हईं...हमऊ मेला सेरे अम्मा जइसि लालह चूड़ीयाँ लीबो" कुन्नो ने अपनी मासूमियत से भरी आवाज में खिलावन से कहा

"बिटिया..अबहिं ढेर दिन हईं..मेला महियां..बस भोलेनाथ सेरे या प्रार्थना करउ...अबकी पानी टाइम सेरे गिर गिर जावइ..तो तुम्हरे लिए चूड़ी का..लाल फिराकउ आई जहिहई" खिलावन हाथ धोते हुए बोला और अपनी 11 साल की बेटी कुन्नो के पास आकर खाने की पोटली खोलने लगा

जितने दिन वो खेत में काम करता था कुन्नो आज ही की तरह रोज दोपहर में उसके लिए खाना लाती थी खिलावन की बीवी सुरमई घर से रोटी साग इत्यादि की एक पोटली बना के कुन्नो के हाथ भेज देती थी और कुन्नो पूरे गाँव का चक्कर लगाती उछलती खेलती खेत पहुँच जाया करती थी

खिलावन ने खाना खाकर दूर खेलती कुन्नो को बुलाया "बिटिया...ओ.. बिटिया.. लेव..बर्तन लइके घर चली जाव.." कुन्नो दौड़ के उसके पास आ जाती है और अपने दोनों हाथों में जमा किये हुए पत्थर फेंकती है और खिलावन से पोटली ले लेती है खिलावन उसके सर पे प्यार से हाथ फेरता है और बनावटी गुस्से में कहता है "अपनी अम्मा से कहेउ...थोड़ो नमक कम झोंकईं साग महिया.."

शाम होते ही खिलावन घर पहुँचता है सुरमई उसके हाथ पैर धुलवाती है और धुला हुआ साफ गमझा उसे देकर चाय बनाने लगती है
"सुमइ..या सारी चाह चूल्हो पहियां बनन पर बड़ो टाइम लेत हई.. भोलेनाथ केरी क्रिपा हुई गई यइ बार..तो गेस लाइ दिबो.." चारपाई पे बैठ बीड़ी सुलगाते हुए उसने सुरमई से कहा

चाय छानते हुए सुरमई बोली "यउ सब हवाई बात छोड़उ..कल तहसील जाइकेरे बेंक सेरे कुछ पइसा निकाल लाउ...एक पाई नाइ हई.. हमाये पास.."उसने चाय का गिलास खिलावन की ओर बढ़ाया

"बेंक महियां तुम्हरे बाप पइसा भेजत हईं का..कित्ती बार कहो..चाह पियत टाइम..दुखड़ा न रोवउ करइ" खिलावन बैंक में बचे बहुत कम रुपैयों का ध्यान करते हुए झल्लाके बोला और चाय का गिलास लेकर चारपाई के पाये के पास रख देता है और एक और बीड़ी सुलगाता है

ऐसे ही एक के बाद एक दिन गुजरते जाते हैं आषाढ़ सावन भादों सब महीनो में नाम की भी बारिश नहीं होती है पूरे प्रदेश में सूखा पड़ा है मगर खिलावन के बैंक का जमा सारा धन नदी की तरह बहता जाता है ,भुखमरी से बचने के लिए गाय बैल समेत जो भी कुछ बेचा जा सकता था बेच दिया जाता है और कुन्नो भी बीमार पड़ जाती है उसकी दवा-दारू तक भी नहीं हो पाती है

"कहाँ जाइ रहि हउ..इहाँ बिटिया भूखी हई..और तुम उहाँ महाटीला पर दूध बहाये जाइ रहि हउ.. बैठउ..चुपचाप" सुरमई को एक छोटे सी गिलसिया में दूध लेकर शिव मंदिर जाते देख बिलबिलाते हुए खिलावन ने कहा

"पंडित जी कहिन हईं.. अकाल केरो दोष हई.. कोई कुँआरी कन्या केरी बलि लइके ही जहिहई..कहीं कुन्नो.....यहि लिये जाइ रहेन.. हमाओ कलेजो पत्थर केरो नाइ हई..जो बिटिया कहियां भूखो रखके..दूध बहान चलि जइबो" सुरमई कुन्नो के पास आकर बैठ गई और रोते रोते बोली

"अरे..पूरो सावन..गिलास भर भर दूध भोलेनाथ डकार गए..गंगा जी केरी एक बूँद नाइ खोलिन अपने बालन सेरे ..खुद तो पत्थर केरे बने बइठे हईं.. अउर हमइ कलेजा दई दीन माँ बाप केरो" खिलावन ने जैसे अपने सीने की चीत्कार खोल दी, गरीब आदमी अपना गुस्सा या तो अपनी पत्नी पे दिखा पाता है या भगवान को कोस कोस के निकालता है

कुन्नो भूख और बीमारी के कारण पीली पड़ गई है बीच बीच में बेहोश सी हो जाती है जब होश आता है तो कभी कभी बड़बड़ाती है पर वो 11 साल की लड़की समझदारी का स्वांग भी करती दिखती है और अपनी अम्मा बापू को परेशान देखकर इधर उधर की बात करके उन्हें बहलाने की कोशिश करती है "बापू तुमका तो सब अन्नदाता काहत हईं फिर भगवान तो तुमसे छोटो हुओ न"

"बिटिया..यही विडम्बना हई..इहाँ जो अन्न उपजात हई वो किसान हई ..अउर जो भूख उपजात हई वउ भगवान हई" अपनी आँखों में आये पानी को वो रोक न सका और कुन्नो का हाथ पकड़ कर बैठ गया एक बेबस पिता अपने सामने अपनी मासूम बेटी को मरता देख रहा था

अचानक से कुन्नो की तबियत बिगड़ने लगती है वो बड़बड़ाने लगती है.."अम्मा..अम्मा...बापू..पू...लाल चूड़ी...छन छन...छन छन ..लाल..चू.."और उसके प्राण चूड़ी पूरा बोले बगैर ही निकल जाते हैं

"आअह्ह...आआह्ह.. हाय हमरे महादेव...यउ.. का कर दिउ.. हाय हमरी बिटिया...कुन्नोSSSSSS............................................" एक माँ की छाती फट जाती है अपनी बच्ची को मिटटी होते देख उसका रूदन शिव के तांडव से भी विकराल है खिलावन सन्न रह जाता है उसकी लाल आँखें नम हैं पर वो धारा नहीं बहा रहीं हैं

करीबन आधे घंटे बैठा वो एक टक मृत कुन्नो को देखता रहता है और सुरमई का आकाशीय बिजली सा रूदन सुनता रहता है फिर अचानक से उठता है एक फटी पुरानी सी चादर में घर के टेढ़े मेढ़े सारे धातु के बर्तन बांधता है और घर से निकल जाता है सुरमई को होश नहीं था पर इतना समझ रही थी कि शायद वो अंतिम संस्कार की लकड़ी के लिए बर्तन बेचने गया है

काफी देर के बाद हाथ में फावड़ा लिए खिलावन आता है और कुन्नो के मृत शरीर को सुरमई के हाथों से छीन कर अपने काँधे पे रखकर बाहर जाने लगता है सुरमई रोते चीखते हाय दइया हमरी बिटिया कहते कहते उसके पीछे दौड़ती है

खिलावन अपने खेत में पहुँचता है और वहाँ पहले से खोदे हुए एक विशाल गढ्ढे में कुन्नो के मृत शरीर को लिटाता है और अपने कुर्ते की जेब से एक पैकेट निकालता है उसमे बर्तन बेच कर लाइ हुईं....बाजार की सबसे महंगी लाल चूड़ियाँ थीं...वह फफक फफक के रोते रोते अपनी बच्ची कुन्नो के दोनों हाथों में चूड़ियाँ पहना देता है....पास खड़ी सुरमई चीख चीख के विलाप कर रही है अपने हाथ पैर पटक रही है पर खिलावन एक मशीनी व्यक्ति की तरह फावड़े से मिटटी डाल डाल के उस गढ्ढे को भरता जाता है

गड्ढे को भर के वो फावड़ा आसमान की ओर करके जोर जोर से चिल्लाता है "अब तउ तुम्हरे कलेजा महियां ठंडक पड़ गई हुइए...दूध के साथ हमाइ बिटिया कहिहउँ हजम कर गेउ तुम..अबहूँ शिराप पूरो नाइ हुओ का तुम्हारो...हाँ कइसे हुइए..किसान केरे इहाँ कबहुँ सुखो नाइ पड़त..काहे सेरे किसान केरी आँखे हमेशा गीली राहत हईं...."
आसमान भगवान् के इंसाफ की तरह ही पूरा साफ है एक भी बादल का कोई नामोनिशान तक नहीं......दूर कहीं से दखिन देवी के मन्दिर से कुछ स्त्रियों के भजन की आवाज आ रही है "लाली लाली लाल चुनरिया....... कैसे न माँ को भावे...................................................."

-तुषारापात®™

Friday, 22 April 2016

विचारधारा

किसी फोटो में पत्नी के बाएं दायें खड़ी उसकी दो  सुन्दर सहेलियों में से आप जिसे ज्यादा ध्यान से देखते हैं उससे आपकी विचारधारा स्पष्ट होती है कि आप दक्षिणपंथी हैं या वामपंथी
और यदि आप दोनों सहेलियों को छोड़ के पत्नी को ही देखते हैं तो आप कट्टरपंथी हैं
तुषारापात®™


Thursday, 21 April 2016

लिवर ट्रांसप्लांट

पचपन साल की विनीता गुर्दे की एक गंभीर बीमारी से लड़ रही थी और उसके साथ लखनऊ के मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर भी इस लड़ाई में अपनी पूरी ताकत से लगे थे,विनीता का इलाज बहुत लंबा चला जिसके दौरान उसने बहुत कष्ट उठाये पर कल वो जिंदगी और मौत के इस खेल में मौत के पाले में चली गई,डॉक्टरों ने उसे ब्रेन डेड घोषित कर दिया ।

विनीता के भाई जो खुद एक डॉक्टर हैं उन्होंने विनीता के अंगदान का निर्णय लिया उन्होंने सोचा कि उनकी बहन ने तो बहुत कष्ट उठाये पर उसके मृत शरीर के कई अंग अभी जिन्दा हैं जो किसी और तड़पते मरीज की जान बचा सकते हैं पता चला कि दिल्ली में एक मरीज की जान बचाने के लिए लिवर ट्रांसप्लांट की जरूरत है तो डॉक्टर्स ने विनीता का लिवर निकाल कर उसे दिल्ली भिजवाने के लिए लखनऊ एअरपोर्ट भेजा ।

चूँकि निकाले गए लिवर को सिर्फ 6 घंटे तक ही सुरक्षित रखा जा सकता है तो इसको जल्दी से जल्दी दिल्ली पहुँचाने के लिए मेडिकल कॉलेज के एक अस्पताल से लखनऊ एयरपोर्ट तक के 28 किलोमीटर के अति व्यस्त ट्रैफिक वाले रूट पर 'ग्रीन कॉरिडोर' बना कर मात्र 24 मिनट में भेजा गया जो अपने आप में बहुत बड़ी बात है

ग्रीन कॉरिडोर मानव अंग को एक निश्चित समय के भीतर एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजने के लिए बनाया जाता है। पुलिस एम्बुलेंस के रूट को खाली करवाती है एम्बुलेंस के आगे आगे पुलिस वाहन चलते हैं जिससे स्पीड में ब्रेक न लगे, इसी प्रक्रिया को 'ग्रीन कॉरिडोर' कहा जाता है ।
यह सुविधा दिल्ली,मुम्बई,चेन्नई,कोच्ची और बेंगलुरु में उपलब्ध है और लखनऊ में यह चौथी बार कल किया गया। आज के पेपर में ये खबर बड़ी हेडिंग के साथ है 'लिविर बचाने को 24 मिनट ठहर गया लखनऊ'।

मैं विनीता की आत्मा की शांति की प्रार्थना करता हूँ उनके डॉक्टर भाई के इस निर्णय से लोगों में अंगदान की जागरूकता बढ़ेगी और कष्ट में डूबे मरीजों को बीमारी से छुटकारा मिल सकेगा उनकी इस सोच के लिए सलाम करता हूँ साथ ही डॉक्टर्स की टीम जिन्होंने अंग प्रत्यारोपण में अपनी महारत बनाई की जितनी तारीफ की जाय उतनी कम है और साथ ही साथ लखनऊ पुलिस और प्रशाशन और यहाँ के नागरिकों को साधुवाद!

पर एक बात मुझे बार बार खटक रही है कि इस पूरी प्रक्रिया में क्या हेलीकॉप्टर का प्रयोग नहीं किया जा सकता था? 24 मिनट तक लगने वाले जाम से शहर की ट्रैफिक व्यवस्था अस्त व्यस्त हुई आखिर सड़क पे भी न जाने कितने लोग अपने कितने ही जरूरी काम से कहीं जा रहे होंगे मान लो उस भीड़ में ही कोई गंभीर बीमार अस्पताल जाने को भाग रहा हो और ये होने से जाम में फंस के रह गया हो और अपने जीवन को खो बैठा हो तो?

नेताओं के फर्जी दौरों उनकी मीटिंग,रैलियों के लिए चुटकियों पे हेलीकॉप्टर उपलब्ध रहते हैं परन्तु आम जनता के ऐसे केस के लिए भी क्या एक हेलिकॉप्टर उपलब्ध नहीं कराया जा सकता था? मेडिकल कॉलेज को ऐसे समय के लिए अपने लिए हेलिकॉप्टर आदि की व्यवस्था की माँग करनी चाहिए
बड़े बड़े मुद्दों के बीच ऐसे ही कितने छोटे पर बहुत अहम मुद्दे हम सा छोड़े रहते हैं जिनका कहीं जिक्र नहीं होता जिनपे कोई प्रश्न नहीं उठाता पर मैं आदत से मजबूर हूँ कुछ उल्टी बात ढूंढ ही लेता हूँ हर सीधी बात में ।

-तुषारापात®™

Friday, 15 April 2016

राम राम बैंक

क्या आप 32 साल पुराने किसी ऐसे बैंक को जानते हैं जिसमें न तो कोई रुपैये पैसे जमा करता है और न ही निकालता है मतलब उस बैंक में आर्थिक लेनदेन जैसा कुछ होता ही नहीं..कोई चेकबुक,विड्राल फॉर्म एटीएम कार्ड जैसा कुछ भी नहीं..फिर भी बैंक है और पिछले 32 वर्षों से चल रहा है...सुनने में अजीब लगता है न...?
आइये आपको साल के 365 दिन खुलने वाले और पूरे चौबीसों घण्टे काम करने वाले इस बैंक की सैर पे ले चलता हूँ

लखनऊ में अलीगंज और जानकीपुरम इलाकों के ठीक बीच में अर्थात अलीगंज और जानकीपुरम की सीमा रेखा पर एक चौराहा है जिसका नाम है 'राम-राम बैंक चौराहा' अब अगर चौराहा किसी बैंक के नाम पे है तो ये प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि चौराहे पे या उसके आसपास कोई इस नाम का बैंक भी होगा..पर इस बैंक के विचित्र नाम से पहले से असमंजस में फँसा व्यक्ति जब चौराहे पे बने शौपिंग काम्प्लेक्स और चारों ओर इस बैंक को ढूँढने का प्रयास करता है तो वो और चक्कर में पड़ जाता है कि ऐसा कोई बैंक कहीं दिख ही नहीँ रहा

दरअसल उस चौराहे से थोड़ा हटकर सीतापुर रोड के पास सेक्टर ए में स्थित है ये अनोखा बैंक जहाँ पैसा नहीं बल्कि उससे भी बहुत कीमती निधि राम नाम लेखन की पुस्तिका जमा होती है।अब तक इस राम राम बैंक में राम नाम के 80 करोड़ शब्द लिखकर श्रद्धालु जमा कर चुके हैं

इसके संस्थापक हैं श्री लवलेश तिवारी जिन्होंने 32 वर्ष पहले इस बैंक की स्थापना की थी उन्होंने बताया कि अपने शहर के हजारों लोग तो यहाँ राम नाम की पुस्तिका भर के जमा करते ही हैं बल्कि बहुत दूर दूर से लोग अपने हाथों से लिखकर राम नाम के हजारों शब्दों से भरी पत्रिकाएं यहाँ डाक द्वारा भेजते हैं जिसमें एक क्रिकेटर गौतम गंभीर के पिता जी भी हैं
साथ ही उन्होंने ये भी बताया कि ये सारी प्रक्रिया निशुल्क है ।

चौराहे का नाम राम राम बैंक कैसे पड़ा इसका भी मजेदार किस्सा है वो बताते हैं कि शुरू शुरू में हमने राम राम बैंक का बोर्ड चौराहे पे लगाया पर नगर निगम उसे हटा देता था इस तरह ये प्रक्रिया कई बार हुई कई बार बोर्ड लगा कई बार हटा,इसी लगने हटने की प्रक्रिया से इसे लोकप्रियता मिल गई और ये चौराहा राम राम बैंक चौराहा के नाम से प्रसिद्ध हो गया और अब नगर निगम खुद इसे अपने रिकॉर्ड में यही लिखता है।

इस बैंक में हिन्दू मुस्लिम सभी धर्म के लोग अपने अपने राम नाम जमा कराते हैं यह अनोखा बैंक सभी धर्मों के लोगों के लिए आदर व श्रद्धा का केंद्र है और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है साथ ही गरीब से गरीब आदमी का भी यहाँ खाता है और उसके खाते में लाखों राम जमा हैं
सोचिये जिसके खाते में हजारों लाखों राम जमा हों क्या उसकी पुण्य की चेक कभी बाउंस हो सकती है नहीं कभी नहीं ,सच है राम से बड़ा राम का नाम।

इसी के साथ सभी बड़े बुजर्गों को प्रणाम करते हुए आप सभी को रामनवमी की अनेकों शुभकामनाएं देता हूँ और प्रार्थना करता हूँ हम सबमें राम के चित्र की बजाय राम के चरित्र का जन्म हो ।

-तुषारापात®™

Monday, 11 April 2016

हाशिये का तिरेसठ

"भुला चुका था तुम्हें..हमेशा के लिए...बहला लिया था खुद को ये यकीन दिलाकर कि कुछ कलम ऐसे ही सूख जाते हैं..उन्हें कागज नहीं मिलता जिंदगी की रंगीन इबारत लिखने को...पर जब दोबारा से तुम्हें देखा...मेरे अंदर की स्याही उबलने लगी..आयत..बिखर जाना चाहता हूँ...तुम्हारे पन्नों पे..." दोनों कन्धों से उसे पकड़ते हुए मैंने कहा

"संभालो खुद को..वेद...वेद..लीव मी" उसने खुद को मुझसे छुड़ाया और सामने वाले सोफे पे जाकर बैठ गई और गहरी साँस लेकर आगे बोली "किसी और की इबारतों से भरे कागज पे जब.... स्याही बिखरती है तो नई इबारत नहीं लिखती....कागज का मुँह काला होता है.."

मैंने देखा उसने ये कहते हुए अपने ऊपर के होंठ को दाँत से दबाया ये उसके कशमकश में होने की निशानी हुआ करती थी वो केटल से चाय कप में निकालने लगी,हदीस आज आउट ऑफ़ स्टेशन था..ऑफिस से मैं आयत के घर ही आ गया था वो भी उससे..पूछे बिना

"और कब तक यूँ अनछपे फ्रस्ट्रेटेड राइटर से घूमते रहोगे..तलाश करो..तुम्हें बहुत से कोरे कागज मिल जाएंगे...किसी एक पे अपनी जिंदगी की गजल लिखो..कविता लिखो....आगे बढ़ो पुरानी बातों से...अब इस कागज पे किसी और की कहानी है"अपने गले पे आये पसीने की बूँदे उसने अपनी साड़ी से पोछी और मुझे चाय का कप पकड़ाते हुए कहा

"कोरे कागज...हा हा हा...आयत.. अधूरी कहानियों को कोरे कागज नहीं ....बासी कागज मिलते हैं... जानती हो...मुझे ये बात बहुत तकलीफ देती है कि इस कागज ने मुझे हाशिये पे डाल दिया" मैंने उसकी ओर ऊँगली का इशारा किया और उसपे नजर जमाये हुए चाय का एक सिप लगाया

अपनी गहरी आँखों में उसने मेरी आँखों को डुबाये रखा और भीगी सी आवाज में बोली "वेद..हाशिये पे लिखा हुआ एक छोटा सा शब्द या नम्बर...अक्सर कागज पे लिखी इबारतों की पहचान होता है..उसी से पता चलता है क्या पहला है क्या दूसरा"

"तो मैं तुम्हारी जिंदगी में..बस एक सीरियल नम्बर हूँ..तुम नहीं समझोगी आयत....इस सीरियल नम्बर को कितनी तकलीफ होती है..जब वो हाशिये से देखता है..किसी और कलम को इस कागज पे चलते हुए.." वो मेरी बात सुनके कुछ नहीं बोली,सोफे से उठकर ड्राइंग रूम के खुले दरवाजे की तरफ खड़ी हो गई दरवाजे की बाईं तरफ की दीवार की ओर सरका हुआ पर्दा पंखे की हवा से उड़ रहा था मैं उसके पास गया और दरवाजे की तरफ जिधर पर्दा था उसे खींच लिया,दरवाजे के पल्ले के पीछे वाली दीवार के सहारे उसे टिकाकर उसके सामने सट के ऐसे खड़ा हो गया जैसे हाशिये में ६३ लिखा हो

"याद करो आयत..ऐसे ही कितने ६३..हम बनाया करते थे.." उसके होंठो के बहुत पास जाकर मैंने कहा ,उसकी साँसे तेज होने लगीं..होंठ सुर्ख होने लगे..कांपती हुई..मेरी आँच से खुद को पिघलने से बचाते हुए उसने मुझे जोर का धक्का दिया..और गुस्से से भरी रूआंसी आवाज में बोली "अक्सर ६३ बनाने वाले ही ३६ बनकर रह जाते हैं" कहकर वो अंदर के कमरे में चली गई

मैंने दरवाजे के बंद होने की तेज आवाज सुनी,उसके घर से बाहर निकल के सड़क पे आया और एक सिगरेट सुलगाई,एक गहरा कश लगाया
धुएं का एक छल्ला छोड़ा और काफी देर तक उस छल्ले को बड़ा होते और ऊपर उठते हुए देखता रहा..बिल्कुल मेरी ही तरह दिख रहा था वो खाली और शून्य..शायद यही मेरा सीरियल नम्बर था..मैं मुस्कुराया और कार में आकर बैठ गया।

-तुषारापात®™

Friday, 8 April 2016

पाकिस्तानी ऊँट

हर भारतीय बच्चे की तरह बचपन में मुझे भी क्रिकेट खेलने का बहुत शौक हुआ करता था पर मेरे पास न खुद का बल्ला होता था और न ही वो पीली हरी कॉस्को वाली टेनिस बॉल,जो उन दिनों एक ऊँचे स्टैण्डर्ड की तरह देखी जाती थी तो खेलने के लिए हम मित्रों के रहमोकरम पे रहते थे और आप मेंसे जिन्होंने गली क्रिकेट खेला होगा वो बहुत अच्छी तरह जानते होंगे कि गली क्रिकेट में जिस लड़के का बैट होता है उसकी कुछ न कुछ दादागिरी पूरे खेल के दौरान बनी ही रहती है

फिर भी मेरे जैसे लोग तो चाहिए ही होते हैं इस खेल में जो फील्डिंग के और इधर उधर गई गेंद को उठा लाने के बड़े काम आते हैं और हमारे जैसों की बैटिंग भी सबसे अंत में आती है फिर भी हम वसुधैव कुटुंबकम की नीति के तहत खेला करते थे इसके अतिरिक्त और चारा भी नहीं हुआ करता था

ऐसे ही मुझे याद आता है मेरा एक मित्र हुआ करता था जिसके साथ अपने घर की गैलरी में मैं क्रिकेट खेला करता था सिर्फ वो और मैं हुआ करते थे खेल में ,गैलरी से बाहर गेंद जाने की संभावना न के बराबर और पीछे तो दीवार ही हुआ करती थी जिसपे कोयले या किसी पत्थर के टुकड़े से तीन स्टम्प का वो ऐतिहासिक निशान हुआ करता था जो परमानेंट बना रहता था आखिर रोज ही खेलते जो थे

अब चूँकि बैट भी मेरे मित्र का और बॉल भी उसकी तो एक सर्वमान्य नियम ये था ही कि वो पहले बैटिंग करेगा कभी हम कुछ ओवर्स की सीमा बना के खेलते तो कभी अनलिमिटेड ओवर्स (टेस्ट क्रिकेट की तरह) का खेल हुआ करता था इसमें लिमिटेड ओवर्स के खेल में तो मेरी बैटिंग जैसे तैसे आ जाती थी हालाँकि उसमें भी मेरा मित्र तीन चार बार से पहले खुद को आउट नहीं घोषित करता था कभी गेंद स्टंप के ऊपर लगी कभी बाएं से बाहर लगी आदि आदि लेकिन असली समस्या आती थी जब हम अनलिमिटेड यानी जब तक मित्र या मैं आउट नहीं होऊँगा तब तक दूसरे को बैटिंग नहीं मिलेगी अब मेरा मित्र पहले बैटिंग करता और चूँकि वो ही अंपायर होता तो मैं घंटों बॉलिंग करते रहता और वो खेलता रहता आउट होने पर भी आउट नहीं मानता फलतः मेरी बैटिंग आने के कोई आसार नहीं बनते थे और जब वो खेलते खेलते ऊब जाता था या थक जाता था तो बगैर मेरी बैटिंग दिए अपना बैट बॉल लेकर चला जाता था कि मम्मी बुला रही है या पापा गुस्सा रहे होंगे और मैं ठगा सा रह जाता था

ऐसा मेरे साथ कई बार होता था फिर भी मैं उसके साथ खेला करता था अब आप सोच रहे होंगे कि भाई तुषार सिंह तुम तो बहुत बड़े बेवकूफ थे जब जानते हो कि वो हर बार तुम्हारे साथ ऐसा ही करता है तो तुम उसके साथ खेलते ही क्यों थे ?

इसका उत्तर मेरे पास नहीं है...पर जरा रुकिए...मैं आपका ये प्रश्न भारत सरकार की ओर भेजता हूँ...

"हाँ तो भाई भारत सरकार..पठानकोट आतंकी हमले की जाँच के लिए पाकिस्तान के कुछ 'विशेषज्ञ' यहाँ आये..खाये पिए और जाँच के नाम पे कुछ स्वांग कर वापस चले गए..और जब तुम्हें बुलाने की बारी आई तो हमेशा की तरह ठेंगा दिखा दिया...और तुम मेरी तरह ठगे रह गए तो साहब मेरे पास तो बैट बॉल खुद का नहीं हुआ करता था...पर ये बताओ तुम्हें किस चीज की कमी है..जो तुम बारबार खुद को ठगवाते रहते है?"

#पाकिस्तान_का_ऊँट_हमेशा_एक_ही_करवट_बैठता_है
-तुषारापात®™

Thursday, 7 April 2016

सिंहासन

"पिताश्री...पिताश्री अनर्थ हो गया...काल ने आर्यस्थान पर अपना आघात कर दिया..." राजकुमारी आर्यसेना विक्षिप्तावस्था में इन्हीं शब्दों को बारम्बार कहते हुए दरबार में प्रवेश करती है और आर्याधिराज के सिंहासन के अत्यंत समीप पहुँच जाती है

"आर्यसेना...ये क्या दुःसाहस है...कदाचित राजकुमारी को राजदरबार की मर्यादा का स्मरण नहीं ...आर्यस्थान के राजदरबार में राजकुमारियों का प्रवेश वर्जित है..." आर्याधिराज ने क्रोधित हो कहा

"मर्यादा और अभिवादन के शिष्टाचार का विपत्ति काल में लोप हो जाता है महाराज..युवराज आर्यमन नहीं रहे महाराज...आर्यस्थान का अंतिम उत्तराधिकारी भी काल का ग्रास बन गया.."आर्यसेना ने अश्रु विस्फोट कर रूदन आरम्भ कर दिया

यह सूचना सुनते ही आर्याधिराज मानो मूर्छित से हो गए...सभी राजदरबारी उठ खड़े हुए...महामंत्री ब्रह्मार्य ने सेनापति से कहा "सिंहार्य..आप राजकुमारी के साथ जाइये...और स्थिति की पड़ताल कीजिये मैं महाराज के साथ उपस्थित होता हूँ " और सभा समाप्ति की घोषणा कर ब्रह्मार्य महाराज के समीप गए

राजकुमारी और सेनापति राजदरबार से मृत युवराज के कक्ष की ओर अग्रसर थे तभी आर्यसेना कहती है "सेनापति प्रथम हमें स्वर्गीय ज्येष्ठ युवराज के कक्ष की ओर चलना चाहिए..युवराज आर्यमन की हत्या का सम्बन्ध उस कक्ष से अवश्य है ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है"

"परंतु वह कक्ष तो ज्येष्ठ युवराज की हत्या के पश्चात से आज तक बंद है... क्या आप भी राजपुरोहित की तरह विश्वास करती हैं कि ज्येष्ठ युवराज की आत्मा ने ही उनके अनुज युवराजों की हत्या की है?" सेनापति ने अपने पगों को गति देते हुए कहा

"आर्यस्थान की राजकुमारी..अंधविश्वासी नहीं है सेनापति...राजदरबार में आते हुए..ज्येष्ठ युवराज के कक्ष की ओर से कुछ कोलाहल सुनाई दिया था...आप शीघ्र चलें" कहकर वो और गतिमान हुई

ज्येष्ठ युवराज का कक्ष राजभवन के उत्तरी ओर था..वह पूरा क्षेत्र अछूता अस्वच्छ और अंधकार तथा दुर्गन्ध में डूबा था...आर्यसेना और सिंहार्य कक्ष के मुख्य कपाट पे पहुँचते हैं

"देवी इस बंद कपाट की कुंजी तो महाराज के पास रहती है...इसके भीतर जाना सम्भव कैसे होगा?" विशाल कपाट को धकियाते हुए सेनापति ने राजकुमारी से पुछा

इतना समय नहीं है सेनापति...आप शीघ्र इस कक्ष के एक मात्र दुसरे कपाट पे पहुँचिये..जो इसके ठीक पीछे है..अगर भीतर कोई है तो हम उसे भागने का अवसर न दें" राजकुमारी ने सेनापति को आदेश सा दिया

सेनापति लगभग दौड़ते हुए दूसरे कपाट की ओर भागे और कपाट पे पहुँच के कान लगाकर भीतर कुछ सुनने का प्रयत्न करने लगे उन्होंने सुना भीतर किसी की पदचाप स्पष्ट सुनाई दे रही थी इधर आर्यसेना कक्ष का मुख्य कपाट अपनी पूरी शक्ति से खटखटाए जा रही थी तभी सेनापति ने कपाट के पीछे प्रकाश देखा उसे ऐसा लगा जैसे कक्ष में कोई दीपक प्रज्ज्वलित हुआ है

सेनापति ने तलवार हाथ में निकाल पुकारा "कौन है भीतर...उत्तर दो ...कक्ष का कपाट खोलो..नहीं तो मृत्यु के भागी होगे... मैं सेनापति सिंहार्य तुम्हें आदेश देता हूँ..कपाट शीघ्र खोलो..." कक्ष से कोई उत्तर नहीं मिला किसी के सरपट भागने का पदचाप सुनाई दिया

सेनापति की पुकार सुनकर महल के दक्षिणी सिरे के पहरेदार कई सारे सैनिक सेनापति के समीप आ गए सेनापति ने उनमें से कुछ सैनिकों को राजकुमारी की ओर भेजा और शेष सैनिकों से कपाट को तोड़ने का आदेश दिया

उधर राजकुमारी आर्यसेना सैनिकों को कक्ष के मुख्य कपाट पे स्थिर कर सेनापति की ओर आ गई...सैनिकों ने कुछ ही समय में कपाट धराशाई कर दिया.. सेनापति और आर्यसेना कक्ष के भीतर दौड़े पर उन्हें कोई नहीं मिला...एक दीपक अवश्य प्रकाशित था.. सेनापति ने सैनिकों की सहायता से कक्ष का चप्पा चप्पा छान मारा पर वहाँ किसी मनुष्य क्या मूषक का भी चिन्ह न था

सेनापति और राजकुमारी ने अच्छे से जांचा कि कक्ष में कोई गुप्त रास्ता तो नहीं जिससे कोई पलायन कर गया हो या कोई खिड़की खुली हो पर उन्हें घोर निराशा हुई ये जानकर कि कक्ष में कोई भी गुप्त दरवाजा नहीं था और सारी खिड़कियों की लौह चौखट मजबूती से अपनी जगह स्थिर थीं उससे सिर्फ वायु का प्रवेश ही सम्भव था मनुष्य का नहीं..कक्ष में जलता रहस्यमयी दीपक बुझ चुका था..सैनिकों को दोनों कपाटों में पहरा देने का आदेश देकर दोनों युवराज आर्यमन के कक्ष की ओर बढ़े

युवराज आर्यमन के कक्ष में रूदन और कोलाहल की गूँज अंतरिक्ष तक जा रही थी आर्याधिराज अपने मृत पुत्र युवराज आर्यमन के शव को गोद में लिए संताप कर रहे थे राजमाता आर्यमणिका पुत्र शोक में बारम्बार मूर्छित हो जातीं थीं सेविकाएं उन्हें संभाल रहीं थीं महामंत्री ब्रह्मार्य सेनापति और राजकुमारी को आते देख उनकी ओर हुए।

"मुझे ज्ञात न था आर्यस्थान के सेनापति स्त्रियों की भाँति मध्यम चाल से भ्रमण करते हैं" महामंत्री ब्रह्मार्य ने रोष प्रकट किया

"महामंत्री...स्त्रियाँ कोमल अवश्य हैं पर शक्तिहीन नहीं...सेनापति मेरे आदेश पे राजभवन के उत्तरी छोर पे थे" आर्यसेना ने उसी भाव से उत्तर दिया

" सेनापति क्या आर्यस्थान का महामंत्री जान सकता है कि राजभवन में क्या घटित हो रहा है?" ब्रह्मार्य ने आर्यसेना को अनसुना करते हुए सिंहार्य से प्रश्न किया, सेनापति ने ज्येष्ठ राजकुमार के कक्ष का सम्पूर्ण वृतांत विस्तार से कहा सुनकर ब्रह्मार्य बोले "असम्भव! यह नहीं हो सकता, उस कक्ष से कोई अदृश्य कैसे हो सकता है...क्या राजपुरोहित का कथन ही सत्य है " वो जैसे स्वयं से ही प्रश्न कर रहे हों फिर संभल के उन्होंने सिंहार्य को संबोधित कर कहा "सेनापति राज्य की समस्त सीमाओं पे सक्रियता का स्तर उच्च कर दो....नगर से बाहर कोई बगैर अपनी पहचान दिए जाने न पाये...जाओ....मेरे आदेश का पालन शीघ्र हो" सेनापति तत्काल कूच कर गए

"महामंत्री मुझे इन सभी हत्याओं के भेद की कुंजी ज्येष्ठ राजकुमार का कक्ष ही प्रतीत हो रहा है..क्या रात्रि के द्वितीय पहर में आप मेरे साथ उस कक्ष का निरीक्षण करने चल सकेंगे "आर्यसेना ने अपने अधरों से अधिक अपने पुष्ट उभारों से प्रश्न किया

ब्रह्मार्य ने अपने नयन सर्पों से वक्षों को चखा और उत्तर दिया "अवश्य देवी हम एकांत में ही निरीक्षण करेंगे सैनिकों को आदेशित करे देता हूँ....रात्रि प्रथम पहर के बाद वहाँ किसी का पहरा न रहेगा" यह तयकर दोनों मृत युवराज के शव की ओर चले ।

रात्रि के द्वितीय पहर में ज्येष्ठ युवराज के कक्ष में महामंत्री ने प्रवेश किया उनके पीछे आर्यसेना थी ब्रह्मार्य ने पीछे आती आर्यसेना से कहा "देवी मुझे तो यहाँ कुछ भी संदिग्ध नहीं दिख रहा..." "प्रिय....क्या तुम्हें अपना...काSSSSल नहीं दिखाई दिया.." कहकर आर्यसेना ने अपने कटिबन्ध से विषाक्त कटार निकाल कर महामंत्री की पीठ में उतार दी

"आह....दुष्टा..तूने मुझे काम के मद में....आह..ह..तू पाप की भागी.."इससे अधिक ब्रह्मार्य कुछ बोल नहीं पाये

"जा ऊपर मेरे सभी भ्राता तुझसे भेंट करेंगे" कहकर वो अपने कक्ष की ओर प्रस्थान कर गई

अगले दिवस भोर से ही राजभवन में हाहाकर मच गया आर्यधिराज राजपुरोहित,आर्यसेना और सेनापति अपने कुछ सैनिकों के साथ ज्येष्ठ युवराज के कक्ष में थे

"महाराज देखिये महामंत्री की पीठ में ज्येष्ठ युवराज आर्यजीत की कटार है...और ये कक्ष भी उन्हीं का है..आर्यस्थान राजवंश उन्हीं की आत्मा से श्रापित है" राजपुरोहित धर्मार्य ने महाराज को अपनी कही वाणी का पुनः स्मरण कराया, महाराज के समीप खड़े सेनापति सिंहार्य
किसी गहन मंथन में चले गए

"हाँ धर्मार्य..कदाचित कुल के दीपक से ही कुल भस्म हो रहा है"..दुखी आर्यधिराज ने राजपुरोहित से कहा "महामंत्री का अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ किया जाय"आदेश देकर वो आर्यसेना के साथ अपने कक्ष की ओर अग्रसर हुए

एक और हाहाकारी दिवस गत हुआ रात्रि का तीसरा पहर था आर्यसेना अपने कक्ष में निद्रा मग्न थीं...तभी कोई कक्ष में प्रवेश करता है हस्त में तलवार लिए हुए वह आर्यसेना की ओर बढ़ता है और सिंह की तरह वार करता है परन्तु ये क्या..यहाँ तो कोई नहीं था ...आर्यसेना उसके पीछे खड़ी थी उसने विषाक्त कटार उसकी पीठ से सटा दी...और..क्रोध में बोली "अपने बाजुओं को आकाश की ओर उठाओ..या स्वयं आकाश लोक में जाओ...सेनापति सिंहार्य.."

"दुष्टा...तू जीवित न रहेगी...तेरे सारे भ्राताओं के पास आज तुझे भी विदा करूँगा...उसके बाद उस वृद्ध राजन को....सेनापति अभी भी शक्ति के मद में था

"विदाई तो...आपकी होगी सेनापति...उस महामंत्री के पास..आप दोनों का षड़यंत्र मैं जान चुकी थी...इसी लिये युक्ति से पहले आपको भ्रमित किया ..ज्येष्ठ युवराज के कक्ष में मुख्य कपाट से भीतर जाकर अपनी पदचाप सुनाई और तत्काल बाहर आकर कपाट खटखटाया....कहकर उसने कटार सेनापति में उतार दी और मुड़कर बोली "महराज आपके राज्य का अंतिम शत्रु भी देवलोक को प्रस्थान कर गया

कक्ष के दूसरी ओर छुपे महाराज जिन्हें आर्यसेना ने आज ही सारी बात बताई थी और स्वयं परीक्षण करने को कहा था,बाहर निकल आये "आह आर्यस्थान ने सर्पों का पालन किया...आर्यसेना हम तुमसे अति प्रसन्न हैं तुमने सेनापति और महामंत्री के षड़यंत्र से आर्यस्थान की रक्षा की...और महामंत्री को प्रथम समाप्त कर ये भी सिद्ध किया कि बुद्धि और शक्ति में से पहले बुद्धि को समाप्त करना चाहिए"

"महाराज...शक्ति को पहले मारने से बुद्धि दूसरी शक्ति खोज सकती है... परन्तु बुद्धि का वध प्रथम करने से शक्ति अस्त व्यस्त अनाथ सी हो जाती है" आर्यसेना ने उन्हें प्रणाम किया

"आह...राजनीति का इतना अच्छा ज्ञान...यह वृद्ध महाराज तुमसे आर्यस्थान का सिंहासन सुशोभित करने का आग्रह करता है" आर्यधिराज ने राज्य को उत्तराधिकारी देना चाहा

"रानी होने पे भी क्या मैं राज दरबार में जा सकूँगी...महाराज...राज दरबार की अति प्राचीन परम्परा और मर्यादा का..." आर्यसेना ने व्यंग्य बाण छोड़ा

"आह...कटाक्ष...आर्यसेना...जिस वृद्ध राजा के चारों पुत्रों को युवराज बनाने की आकांक्षा पे नियति ने 'तुषारापात' कर दिया हो..वह इसी व्यवहार का पात्र है...."आर्यधिराज के कंधे झुक गए

"जहाँ शक्ति (सेनापति)...बुद्धि (महामंत्री)...और.धर्म (राजपुरोहित) ने स्त्री का मान न किया हो उस राज्य का हश्र आप (आर्याधिराज) के जैसा ही होता है महाराज...सिंहासन सिंहिनियों के लिए बना ही कब है..मैं आपके राज्य को त्यागती हूँ..आपका 'आर्य' आपको लौटा रही हूँ पिताश्री...आज से 'आर्यसेना' 'देवदासी' के नाम से जानी जायेगी" कहकर वो संन्यास को चली।

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Wednesday, 6 April 2016

सूखी नदी

किसी ज्योतिषी को
न दिखाना हाथ अपना
मैं यूँ ही बताये देता हूँ
तुम्हारे हाथों की लकीरें
कुछ नहीं बस
सूखी हुयी नदियों के निशान हैं
कभी यहाँ भी बहुत लोग आबाद रहें होंगे
कई कई हाथ इन हाथों में डूबे रहते होंगे
तुम्हारे यौवन का मानसून सूख गया
तो लोगों ने अपनी बस्तियाँ भी उठा ली
सुना है ऐसे ही एक दिन
सिंधु घाटी सभ्यता भी खत्म हुयी थी
तुम्हारे हाथों की लकीरें सूखी हुयी नदियों के निशान हैं
और सूखी नदियों के किनारे 'आदमी' नहीं रहा करते

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Saturday, 2 April 2016

जीवित ज्यामिति

नारी एक केंद्र बिंदु है और पुरुष उस बिंदु से एक निश्चित दूरी पे भ्रमण करता दूसरा बिंदु,जिससे आकर्षण के वृत्त का निर्माण होता है पुरुष को मर्यादा की त्रिज्या को अल्प करने का प्रयास नहीं करना चाहिए ये अधिकार प्रकृति ने नारी को दिया है वो ही समय समय पर त्रिज्या का मान न्यून या अधिक करती है जब त्रिज्या का मान शून्य होता है तब दोनों बिंदु एक दूसरे पे आरोपित होते हैं और एक नए बिंदु का आविष्कार होता है तत्पश्चात दो केंद्र बिंदु वाले गृहस्थी का दीर्घवृत्त आकर लेने लगता है और पुरुष का पहले से अधिक मान की परिधि का भ्रमण आरम्भ होता है।

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Friday, 1 April 2016

अप्रैल का फूल स्वीकार कीजिये

कमाल की तारीख है 1 अप्रैल, 31 मार्च की आधी रात से, पूरी पहली अप्रैल तक ये सोच सोच के परेशान रहो कि न जाने कौन किस मोड़ पे अपने किस दाँव से आपका मुर्गा बना दे और आप मूरख मंडली में अपने को शामिल पाएं।

मुझे लगता है इतनी सजगता रखना या आज के दिन इतना जागरुक होना अपने आप में खुद एक बहुत बड़ी मूर्खता है।

वैसे मुझे ऐसी कोई समस्या नहीं है हमें कोई मूर्ख नहीं बना सकता जो काम भगवान ने इतना बखूबी किया हो उसमें कौन माई का लाल या लाली अपनी टांग अड़ा सकता/सकती है।

आज के दिन आप सभी बुद्धिमानों को हम जैसे मूर्खों को धन्यवाद देना चाहिए क्योंकि बाबा न्यूटन के तीसरे नियम के अनुसार हम मूर्ख हैं तभी तो आप जैसे बुद्धिमानो की बुद्धिमानी है।

तो अप्रैल में खिलने वाले इस 'फूल' का लुत्फ़ उठाइये और बुद्धू बनके किसी को बुद्धिमान बनाने की ख़ुशी महसूस कीजिये।

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Thursday, 31 March 2016

धुआँ

धुआँ उठता है
तो हम डर जाते हैं
सभी अवगत जो हैं
उस कहावत से कि
बगैर आग के धुआँ नहीं होता
पर कहीं ये धुआँ
खुशियाँ भी लाता है
खुशहाली और धुआँ ?
अकाल पड़े किसी गाँव के
एक आँगन से उठता धुआँ
भूखे चेहरों को खुश कर जाता है ।

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Tuesday, 22 March 2016

शगुन फागुन का

तोरी नजर पिचकारी से हाय बलम मैं लाल भई
ढीली पड़ी मोरी करधनी ऊपर ऊपर सांस चढ़ी

भंग में डूबी तोरी अँखिया इन अखियन संग खूब लड़ीं
अंग अंग हरियाये गवा जइसे सिल पे पिसी भंग गई

छेड़ें सखियाँ पूछें कलमुँही चुनरी तोरी कहाँ गई
तीर के जैसे देखे देवर हाय देह मोरी कमान भई

मैदा जइसी गोरी चिट्टी तुम्हरी नजर मा भूनी गई
तोरी मीठी बातन के खोओ से गुझिया जैसी भरी

भीजत भीजत ताप चढ़ो लावो ठंडाई थोड़ी पीई
तोरे रंग में रंग के सजन जी मैं भी अब रंगीन भई

रास में तोरे रास बिहारी लोक लाज सब भुलाई दई
अंग लगी यों तुझसे जइसे सागर द्वारका समाई गई
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Sunday, 20 March 2016

जन गण मन

कल कुछ पुराने दोस्तों के साथ यहाँ के एक मशहूर लॉउन्ज में भारत पाकिस्तान टी 20 मैच देखने का प्रोग्राम बना हम लोगों को थोड़ी देर हो गई थी पर कोलकाता में बारिश होने के कारण मैच शुरू नहीं हुआ था इसलिये देर से पहुँचने पर भी मैच की एक भी एक्टिविटी हमने मिस नहीं की

लॉउन्ज के अंदर गया तो देखा कि न जाने कितने टीवी और प्रोजेक्टर स्क्रीन्स लगे हुए हैं और उनपे एशिया कप के भारत पाकिस्तान मुकाबले की हाइलाइट्स चल रही हैं कमेंट्री की आवाज फुल वाल्यूम पे थी लॉउन्ज अपने आप में एक स्टेडियम बना हुआ था जबरदस्त भीड़ थी पर हमारी बुकिंग थी तो हमें अपनी जगह मिल गई थी

मैच स्टार्ट होने से पहले के घटनाक्रम पे बाद में आऊँगा तो मैच शुरू होता है धोनी टॉस जीतते हैं पहले फील्डिंग का चुनाव करते हैं तो पाकिस्तान की बैटिंग शुरू होती है और पहली बॉल से लॉउन्ज में जो शोर शुरू हुआ वो मैच की आखिरी गेंद तक बढ़ता ही गया पाकिस्तान के एक एक विकेट गिरने पे तालियों और सीटियों की आवाज आपके कान को विकलांग बना सकती थी अश्विन की घूमती गेंदों पे यहाँ लॉउन्ज के लोग झूम उठते थे किसी तरह पाकिस्तान ने 118 रन बनाये और भारत को 119 का टारगेट दिया

और जब भारत की बल्लेबाजी शुरू हुई तब तक लॉउन्ज पूरा पैक हो चूका था विराट ने अपने नाम को चरितार्थ करते हुए भारत को जीत दिलाई उनकी एक एक शॉट इतनी परफेक्ट थी इतना सधा हुआ हाथ जैसे कोई बेहतरिन कारीगर चिकन की कढ़ाई कर रहा हो और उनका अपने पचासे पे सचिन तेंदुलकर को प्रणाम करना दिल को छु गया और ये सन्देश दे गया कि आप चाहे जितने सफल हों शिखर पे हों अपने से बड़ों का सम्मान नहीं छोड़ना चाहिए हमेशा की तरह धोनी के बल्ले से जीत का रन निकला और क्रिकेट के भगवान ने तिरंगा लेकर फहराना शुरू किया पर उनके बाजू में खड़े वृद्ध लेकिन युवाओं से भी अधिक सक्रीय हम सबके प्रिय अभिनेता अमिताभ बच्चन जी को जोश में तिरंगा फहराते देख मन गर्व से भर उठा दाँत पीस पीस कर जिस तरह उन्होंने अपनी खुशी जाहिर की वो टीम इंडिया को मैच की जीत पे मिला सबसे बड़ा तोहफा था

एक बहुत अच्छा और अनोखा अनुभव रहा ये मेरे लिए ऐसा लगा मैं भी स्टेडियम में ही हूँ खैर अब आते हैं उस बात पे जिसके लिए इतनी लंबी कहानी कही तो कल जब मैच शुरू होने जा रहा था तो आपको पता ही है दोनों देशों के राष्ट्रगान गाये जाते हैं पहले पाकिस्तान का राष्ट्रगान गया गया स्टेडियम में सन्नाटा हो चूका था और अब सदी के महानायक द्वारा अपना राष्ट्रगान गाया जाना था जैसे ही धुन बजी मैं अपनी सीट से खड़ा हो गया मेरे साथ मेरे सारे दोस्त खड़े हो गए लॉउन्ज का स्टाफ और लॉउन्ज में आये ज्यादातर लोग खड़े हो गए वहाँ सिर्फ अमिताभ बच्चन की आवाज सुनाई दे रही थी और राष्ट्रगान की एक एक पंक्ति एक एक रोम में जोश और गर्व भर रही थी उस समय की अनुभूति मैं बयाँ नहीं कर सकता

राष्ट्रगान खत्म होता है और फिर से हो हल्ला शुरू हो जाता है राष्ट्रगान के दौरान जो लोग खड़े नहीं हुए थे वे मोटी खाल के अधेड़ उम्र के पढ़े लिखे लोग थे जो अपने सोफे पे पसरे रहे और हम लोगों को देखकर खींसे निपोरते रहे उनके अलावा लॉउन्ज में ज्यादातर युवा ही थे हाँ वही युवा पीढ़ी जिसपे आरोप लगता रहता है वो नशे में डूबी नालायक नश्ल है वही लोग कल राष्ट्रगान के समय सबसे पहले खड़े हुए और उनसे एक पीढ़ी पहले के लोग बैठे दाँत दिखाते रहे उन्हें आखिर में शर्म जरूर आई होगी जब उन्होंने इतनी उम्र होने के बावजूद अमिताभ बच्चन को एक बच्चे की तरह जोश में तिरंगा फहराते देखा होगा

नई पीढ़ी बिंदास है बेबाक है बेफिक्र है पर जिम्मेदार है उन्हें कोसना छोड़ कर और अपने प्रवचनो के बजाय अपने आचरण से उन्हें दिशा निर्देश दें तभी कोई बात बनेगी वरना इंडिया इंडिया का नारा लगाते सब दिखेंगे पर इंडिया बनाता कोई नहीं दिखेगा ।

वैसे आपमें से कौन कौन कल टीवी पे राष्ट्रगान सुनकर खड़ा हुआ था ? उत्तर मुझे नहीं खुद को दीजियेगा ।

-तुषारापात®™

Friday, 11 March 2016

गुल्लक की कैद

आज फिर एक पार्टी में उससे मुलाकात हो गई..हमेशा की तरह हदीस कंपनी के हॉट शॉट्स के साथ अपने कॉन्टैक्टस बनाने के लिए उनके आगे पीछे घूम रहा था..और वो एक फिरोजी रंग की साड़ी में अपनी खूबसूरती छुपाने की नाकाम कोशिश करते हुए बॉस की मैम के साथ इधर उधर की बातें कर रही थी..उसके चेहरे से साफ था..कि वो बोर हो रही थी..तभी मैम किसी दूसरे गेस्ट का वेलकम करने चली गईं..एक सॉफ्ट ड्रिंक का गिलास ले मैं उसकी तरफ बढ़ा

"आज तो कोई आसमान लपेट के जमीं पे उतरा है..पर चाँद से चेहरे पे ये ग्रहण क्यों" मैंने उसे ग्लास देते हुए कहा

उसने मेरे हाथ से ग्लास लिया एक सिप लगाया और बोली "हम्म... शायरी... लगता है ये सितारा शराब में डूब के आया है..वैसे थैंक्स मेरी नहीं..मेरी साड़ी की तारीफ ही सही.."

"आसमान से टूटा सितारा..अक्सर नशे के समन्दर में गिरता है.. खैर मेरी छोड़ो तुम बताओ...आयत..कॉलेज की सबसे ब्रिलियंट लड़की आज एक हाउस वाइफ बन के कैसे रह गई...याद है कितना झगड़ा किया था तुमने मुझसे ये कहकर कि मैं अभी शादी नहीं करना चाहती मुझे ये करना है वो बनना है ऑल दैट.." पिछली यादों की रौ मैं थोड़ा तल्ख़ हो उठा

उसने एक सांस में ग्लास खाली किया...ग्लास पास की टेबल पे रखा और बोली "ओह इतनी कड़वाहट वेद...कॉलेज टाइम पे हम सपनों में जीते हैं...बाद में पता चलता है हमें कि..दुनिया के कटोरे में सपने रेजगारी की तरह होते हैं.. जो खनकते खूब हैं पर उनसे कुछ खरीदा नहीं जा सकता.. भूल जाते हैं दुनिया नोटों से चलती है चिल्लर से नहीं.."

"पर तुम्हारे जैसे नायाब सिक्के को सहजने के लिए ये गुल्लक हमेशा थी" मैंने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा

उसने अपना हाथ मेरे हाथ में रहने दिया एक नजर हदीस को देखा और मुझसे बोली" वेद..जानते हो नायाब होना या लाजवाब होना बहुत बेबस भी बनाता है..खासतौर पे एक लड़की को...लड़की जितनी ज्यादा ब्यूटीफुल हो..टैलेंटेड हो..उतने ही ज्यादा लड़के उसे अपना बनाने के लिए लगे रहते हैं"

"अच्छा..तो अब मैं तुम्हारे लिए उस भीड़ का एक हिस्सा भर हो गया.. आयत...खूब दुनियादारी सीख ली तुमने भी"मैं उसकी बात काटते हुए बोला

"बात पूरी न होने देने की आदत अब तो छोड़ दो..." उसने अपना हाथ छुड़ाते हुए कहा

"हम्म..बताओ...सुनूँ तो बेमिसाल बेबस कैसे हो जाता है" मैंने डिब्बी से एक सिगरेट निकाली पर सुलगाई नहीं

"तुमने कॉइन्स कलेक्टर देखे हैं...जो अनोखे अनोखे सिक्के इकठ्ठा करते हैं.. वेद...सिक्के का अनोखा होना ही उसकी मुसीबत बनता है ..उसे पकड़ के गुल्लक में बंद कर दिया जाता है...और...बाजार की खुली हवा से महरूम कर दिया जाता है..अनोखे सिक्के को गुल्लक में बंद होना ही है...फिर क्या फर्क पड़ता है वो वेद की गुल्लक हो या हदीस की" कहकर वो चली गई

"आयत..तो कम से कम इस खाली गुल्लक को तोड़ती ही जाओ.." मैं चीख के उससे ये कहना चाहता था पर वो जा चुकी थी...गुल्लक के मुंह में सिक्के की जगह सुलगती सिगरेट लग चुकी थी और धुआँ खनकने लगा था।

-तुषारापात®™