जब लोग आपकी नकल करने लगें और आपसे अधिक सफल होने लगें तो समझ लेना कि आप खिलाड़ी (प्लेयर) नहीं प्रशिक्षक (कोच) हैं।
#तुषारापात®
तुषार सिंह 'तुषारापात' हिंदी के एक उभरते हुए लेखक हैं जो सोशल मीडिया के अनेक मंचों पे बहुत लोकप्रिय हैं इनके लिखे कई लेख, कहानियाँ, कवितायें और कटाक्ष सभी प्रमुख हिंदी अख़बारों में प्रकाशित होते रहते हैं तथा रेडियो fm पर भी कई कार्यक्रमो के लिए आपने लिखा है। कुछ हिंदी फिल्मों के लिए आप स्क्रिप्ट भी लिख रहे हैं। आप इन्हें यहाँ भी पढ़ सकते हैं: https://www.facebook.com/tusharapaat?ref=hl
जब लोग आपकी नकल करने लगें और आपसे अधिक सफल होने लगें तो समझ लेना कि आप खिलाड़ी (प्लेयर) नहीं प्रशिक्षक (कोच) हैं।
#तुषारापात®
"वाह मेरे राजा...आज तो पहली तनख़्वाह पाए हो..चल चलके कहीं अय्याशी मारते हैं" विकास के साथ काम करने वाले उसके दोस्त मनोज ने कहा पर विकास के न के अंदाज़ में सर हिलाने पर मनोज आगे बोला "क्यूँ बे..माँ तेरी रही नहीं..बीवी अभी है नहीं..अठ्ठारह के हो चुके हो..पइसा का ब्याह के लिए बचाना है...चल न ठेके पे चलते हैं..सुना है आज शा..लू की म..स्तत नौटंकी भी है"
विकास तनख़्वाह के पैसे जेब मे संभालते हुए बोलता है "नहीं यार आज नहीं वैसे भी मुझे इस तरह की अय्याशी का शौक नहीं" वो किसी तरह उससे पीछा छुड़ा के तेज कदमों से चल देता है पीछे से मनोज आवाज़ देता है "तो किस तरह की अय्याशी पसन्द है तुझे"
वो मनोज की बात को अनसुना करके कदमों को और तेज कर देता है चलते हुए उसके जहन में उसके बचपन की एक याद उभरने लगती है.......................(पूर्वदृश्य/फ्लैशबैक)............................
"हिच्च..हिच्च..हिक...अम्मा..अम्म.." खाना खाते खाते अचानक से जब विकास को हिचकियाँ आने लगीं तो उसने सुषमा को पुकारा, सुषमा जल्दी से पानी का गिलास लेकर उसकी ओर दौड़ी
"कितनी बार कहा है तुमसे कि पानी लेकर खाने बैठा करो.." वो अपने आठ साल के बच्चे को डाँटती भी जा रही थी और पानी भी पिला रही थी.."रोज का तुम्हारा ये नाटक है...जब देखो तब हिच्च हिच्च..छोटा छोटा कौर काहे नहीं खाता तू"
विकास के गले मे रोटी का टुकड़ा फँस गया था इसी कारण उसे हिचकियाँ आ रहीं थी और उसकी आँखों में पानी भी आ गया था.. सुषमा के पानी पिलाने से उसे राहत हुई तो वो खिसिया के उससे कहता है " छोटा कौर...और कितना छोटा कौर खाऊँ..इतनी जरा सी दाल में पूरी रोटी कैसे खाया करूँ" अपने छोटे भाई बहनों की ओर वो गुस्से से देख के आगे कहता है "सारी दाल तो ये मुन्ना.. विजय.. और ये सुन्नु गटक जाते हैं"
ये बात सुनते ही उसके पास बैठी सुषमा ने उसे गले से लगा लिया "अरे मेरा प्यारा बेटा..कोई बात नहीं..कल तेरे लिए ढेर सारी दाल बना दूँगी..ले अब ये रोटी खत्म कर.." सुषमा ने उसे बहलाने के लिए कहा और दाल की खाली कटोरी में चुटकी भर नमक और थोड़ा पानी डाल कर उसमें रोटी का टुकड़ा डुबो के उसे खिलाने लगी
विकास ने उसके हाथ के कौर को हटाते हुए कहा "अम्मा तुम रोज यही कहती हो..बाबा जब भगवान के घर से वापस आएंगे..तो उनसे..न. तुम्हारी खूब शिकायत करूँगा"
उस वक्त उसने ये बात कह दी थी और उठ कर भाग गया था पर आज धुँधली याद में जब उसे अपनी माँ की आँखों में आए नमकीन पानी की बूँदें उसी दाल की कटोरी में गिरते दिखाई दीं तो वो अतीत से दौड़ता हुआ वर्तमान में आ गया, वो लगभग भागते हुए अपने कमरे में पहुँचा और उखड़ती साँसों पे काबू पाने की कोशिश करने लगा छोटे भाई मुन्ना ने उसे आया देखकर कहा "दादा तरकारी नहीं है..रोटी बना लूँ..चुपड़ के खा लेंगे..या कुछ पैसे दो विजय से तरकारी मँगवा.." वो आगे कुछ और कहता कि विकास ने कहा "विजय..सुन्नु..और तुम..चलो सब फटाफट तैयार हो जाओ..आज दावत में चलना है"
वो सबको लेकर पास के एक साधारण से ढाबा कम रेस्टोरेंट में जाता है सब सहमे से थे पर खुश भी बहुत थे ,वेटर आता है आर्डर के लिए पूछता है तो विकास उसे दो अलग अलग सब्जी..कुछ रोटियां,और दाल का आर्डर करता है वेटर आर्डर सुनता है और पूछता है "चावल?"
विकास सबकी ओर देखता है किसी ने भी चावल की इच्छा नहीं जताई तो वो कहता है "नहीं"
"तुम चार लोग हो..कोई और भी आएगा क्या?" वेटर हैरानी से पूछता है
"नही" विकास ने जवाब दिया, वेटर ने कहा "तो चार आदमी और फुल दाल इतनी..."
इससे पहले कि वेटर आगे कुछ कहता विकास ने रौबीले स्वर में उससे कहा " एक आलू मटर..एक सूखी आलू गोभी...बारह रोटी..और 'छह' फुल दाल .." वेटर कंधे उचका कर आर्डर लाने चला जाता है।
-तुषारापात®
"तो तुम्हें लगता है लक्ष्मण...मैंने अहंकार में आकर राम से युद्ध किया" नाभि में रामबाण लिए रावण मृत्युशय्या पे पड़े पड़े बोला
"हाँ रावण तेरे अहंकार ने ही तुझे ये गति दी..वो तो भइया ने मुझे आदेश दिया तुझसे ज्ञान प्राप्त करने का...वरना मैं तेरे अंतिम समय में भी तेरे पास न आता" लक्ष्मण ने अपने जगप्रसिद्ध क्रोध के साथ उत्तर दिया
रावण ने हँसते हुए कहा "जिसने नौ ग्रहों को अपने वश में कर रखा था...जिसने 1000 वर्ष तक इस धरा,आकाश और पाताल पे राज किया..और जिसने श्री हरि विष्णु को अवतार लेने पर विवश कर दिया वो रावण अहंकारी है..तो क्या..मेरे पुत्र इंद्रजीत के नाग पाश से पराजित व्यक्ति को इतना अहंकार शोभा देता है?"
रावण की बात सुन लक्ष्मण कुछ लज्जित हुए,राम के वचनों को याद कर उन्होंने कुछ कहना उचित न समझा रावण ने अपने चरणों की ओर खड़े लक्ष्मण को देखा और विनम्र स्वर में आगे कहने लगा " लक्ष्मण इस संसार में सदैव याद रखने योग्य तथ्य ये हैं कि अपने भेद यदि किसी को दिए हैं तो उसे कभी अपने से दूर मत रखो..दूसरा कभी इन ग्रहों को साधने का प्रयास मत करना..यदि नौ के नौ ग्रह तुमने साध रखे हैं..तब कोई ऐसी प्रचंड ईश्वरीय शक्ति तुम पर आक्रमण करेगी कि तुम्हारा कोई शस्त्र उस को काट न सकेगा..इसलिए हे लक्ष्मण! काल के परे जाना है तो काल के साथ बहो..अपने शत्रु को सदैव बड़ा मानकर उसे छोटा बनाओ..ये अपने भ्राता राम से सीखो..और हे लक्ष्मण कभी भी स्त्री का अपमान मत करो क्योंकि यदि गाय में समस्त देवता वास करते हैं तो स्त्री में समस्त देवताओं की शक्तियाँ निवास करती हैं.." इस तरह रावण ने लक्ष्मण को सामाजिक राजनीतिक कई नीति वचन सुनाए
सबकुछ सुनकर लक्ष्मण बोले "मुझे आश्चर्य है कि इतने ज्ञानी होने पर भी आपने श्री राम से युद्ध किया..और मृत्यु को गले लगाया"
"हाँ मैंने राम से युद्ध किया..क्योंकि मैं अमर होना चाहता था" रावण ने रहस्यमयी स्वर में अपना अंतिम भेद लक्ष्मण पर प्रकट किया
लक्ष्मण और अधिक आश्चर्य से बोले "अमर होना चाहते थे..परन्तु आप तो पहले से ही अमर थे.."
"इतने वर्षों से इस संसार पे शाषन करते हुए मैंने जीवन के समस्त सुख भोगे..अपने ही सामने...न जाने कितने ही अपने पुत्र पुत्रियों भ्राताओं को मृत्यु को प्राप्त होते देखा..ये जो आज मेरे अनुज हैं मेरे पिता तुल्य व्यक्तियों की संतानें हैं..मैं अब विराम चाहता था..इस धरा पे कोई नहीं था और न ही कोई स्वर्ग और पाताल में था जो मुझे पराजित कर सकता था..इसलिए मैंने जगत के पालनहार से बैर लिया..इतना अहंकार का स्वांग किया कि उन्हें मेरा अहंकार तोड़ने आना ही पड़ा..परन्तु मैं चाहकर भी अपनी इस अमरता को खोना नहीं चाहता था.." रावण ने दर्द से कराहते हुए कहा
लक्ष्मण ने उत्सुकतावश शीघ्रता से पूछा " अमर होते हुए भी अमर होने के लिए मृत्यु का आलिंगन मुझे समझ नहीं आया"
"लक्ष्मण..इतने वर्षों में शिव साधना से मैं जान चुका था कि मेरी यह सांसारिक अमरता किसी न किसी क्षण समाप्तअवश्य होगी.. मेरी नाभि का ये अमृत मुझे सदा के लिए अमर नहीं रख सकता था.. परन्तु मेरी नाभि में उतरा हुआ ये रामबाण मुझे सदा के लिए अमर कर देगा...लक्ष्मण राम के साथ अब रावण अमर है राम की चर्चा रावण के बिना कभी पूर्ण नहीं होगी..और ऐसा करके मैंने विभीषण को दिए अपने भेद के प्रकट होने के भय से भी मुक्ति पा ली..अब मैं अमर हूँ.. मेरा कोई भेदी नहीं..ये अमृत लिए हुए अब विश्रामावस्था में चला जाऊँगा" रावण ने अत्यंत सुख से ये वचन कहे
लक्ष्मण ने उसको प्रणाम करते हुए कहा "हे महाज्ञानी..अब तो आपको सर्वोच्च विश्राम अर्थात मोक्ष प्राप्त होगा..आप श्री हरि के हाथों पुरस्कृत हुए हैं"
"हा हा हा! लक्ष्मण..जानते हो..मेरे अंतिम समय में राम ने मेरे अनुज विभीषण को न भेजकर अपने अनुज को मेरे समीप क्यों भेजा इसी में ये रहस्य छुपा है..कि मुझे कभी मोक्ष प्राप्त नहीं होगा..विभीषण अपना पश्चाताप न कर सका उसपर मेरी मृत्यु का ऋण है..जब तक इस संसार में ये कहावत ..घर का भेदी लंका ढाए..रहेगी तब तक इस रावण को मोक्ष नहीं मिलेगा अर्थात घरों में जब तक आपसी फूट रहेगी अहंकार को कभी मोक्ष नहीं मिलेगा" रावण संभवतः अपना अंतिम अठ्ठाहस कर रहा था परंतु इस अठ्ठाहस की प्रतिध्वनि प्रत्येक विजयदशमी पे गूँजने वाली थी।
-तुषारापात®
तेरे जाने के बाद सूनी राह पर यूँ मेरा नजर रखना
कि मुसाफ़िर है रुका और मंजिल का सफर करना
वो किसी और मुल्क का बाशिंदा था चल दिया
तो अपने दिल में क्यूँ उसका पूरा शहर रखना
चले जाते हैं जिन्हें सुनाते हो हाले दिल बेबाकी से
इस बार बात रखना तो थोड़ा अगर मगर रखना
पिछली दफा कहा था उसने कि बड़े नासमझ हो
इस बार उनकी अंगड़ाइयों पर मत सबर रखना
के जिसके फेंके टुकड़ों पे बस्तियाँ बस जाती हैं
उसे ठुकराया है तुमने तो अच्छे से बसर करना
ये धड़कनो का हिसाब एक सा कब रहा 'तुषार'
दिल की बात कहो छोड़ो ग़ज़ल की बहर रखना
-तुषारापात®
इतनी रातों से वो तुझसे माँगता है दुआ
उसकी आँखों मे सुर्ख आयतें उतर आई हैं ख़ुदा
-तुषारापात®
तुम करार दो
अब न इंतज़ार हो
तुम करार दो
वो सुबह तो आए तारों की छाँव में
तुम विदा करा ले जाओ अपने गाँव में
मैं कुँवारी माटी तुम कुम्हार हो
अब न इंतज़ार हो
तुम करार दो
चाँद की अंगीठी पे ख्वाब के पतीले
भाप चाँदनी की करे नयन गीले
बिगड़ी रात को मेरी अब संवार दो
अब न इंतज़ार हो
तुम करार दो
कबसे जल रही थी मैं इस आग में
कोई चिंगारी नहीं अब राख में
मेरे भगीरथ तुम गंगा उतार दो
अब न इंतज़ार हो
तुम करार दो..............
#तुम_पुकार_लो #फीमेल_वर्जन
-तुषारापात®
बड़ी मिली जुली है ये जिंदगी जिंदगी
है उलझी कहीं तो कभी सुलझी सुलझी
कभी उड़ती रेत सी,बड़ी सूखी प्यासी
आँसूओं को पीती
कभी तर होकर,मन को बो कर
नई उमंगें जीती
कई रूप हैं,धूप है बदली बदली
बड़ी मिली जुली है ये जिंदगी जिंदगी....
कभी मैं ना जीती,कहीं न मैं हारी
पड़े पासे जैसे
इसके भंवर में , हथेली के चौसर पे
बिछे तारे ऐसे
बाजी है किस्मत की ये लगी लगी न लगी।
बड़ी मिली जुली है ये जिंदगी जिंदगी .....
#बड़ी_सूनी_सूनी_है(फीमेल_वर्जन) #मिली
-तुषारापात®
उत्तर को छोड़ दक्षिण गोल के होंगें यात्री
सूर्य अपने रथ पे लिए शारदीय नवरात्रि
#तुषारापात®
वो अकेले में रोता है और तुम्हारे सामने मुस्कुराता है
रात कैसी बीती ये सुबह का सूरज कभी नहीं बताता है
-तुषारापात®
उँगलियाँ तेरी मेरी उँगलियों में उलझीं
साँसों के तेरे ज़ोर से ज़ुल्फ़ें मेरी सुलझीं
लाल डिब्बे में अब एक हुआ अपना पता
लबों पे मेरे लगा के अपने होठों की मुहर
इश्क की चिट्ठियाँ तूने बदन पे लिक्खीं
उँगलियाँ तेरी मेरी उँगलियों में उलझीं.....
धड़कनों के शोर से नहीं जागे हैं ये
उनींदे अरमानों की नींद टूटी है आज
चूड़ियाँ कलाइयों में हैं बार बार खनकीं
उँगलियाँ तेरी मेरी उँगलियों में उलझीं.....
कोई खतरे का नहीं है अब नामोंनिशाँ
लाँघ जाऊँ जो तेरे साथ लाज की रेखा
माँग में एक,गाल पे कई लाल रेखाएं हैं चमकीं
उँगलियाँ तेरी मेरी उँगलियों में उलझीं.....
सितारे मिलते हैं सितारों से मुश्किल से
मोम के ये टुकड़े आसमाँ में जो चमकते
मन्नतों की शमाएँ हैं जो थीं कभी पिघलीं
उँगलियाँ तेरी मेरी उँगलियों में उलझीं
साँसों के तेरे ज़ोर से ज़ुल्फ़ें मेरी सुलझीं
-तुषारापात®
"शर्मा..बहुत बड़ी नादानी कर रहे हो...रिटायर हो चुके हो..यहीं रहो ये सब कुछ बेचके..कहाँ अपने लड़के के पास जा रहे हो..." गुप्ता जी ने अपने चालीस साल पुराने दोस्त शर्मा के इलाहाबाद से दिल्ली शिफ्ट होने के फैसले पे ऐतराज जताते हुए कहा
शर्मा जी मुस्कुराए और बोले "भाई गुप्ता..बच्चों के बगैर दिल नहीं लगता...जिंदगी के पूरे दिन तो उन्हें पालने पोसने में लगा दिए..अब जिंदगी की आखिरी कुछ शामें बच्चों और उनके बच्चों के साथ भी न बिताने को मिले तो क्या फायदा..वैसे भी अब हम और तुम्हारी भाभी दिन पर दिन कमजोर हो रहे हैं..बेटे के पास रहेंगे तो वो खयाल रखेगा रात बिरात दवा दारू के लिए भागना अब मुझसे नहीं हो पाता"
"भूल गए वो रमन लाल का क्या हश्र किया था उसके बेटे और बहू ने...वो भी तुम्हारी तरह सब कुछ बेच के गया था...खाली हाथ लौटा और अब दोनों बुढ्ढे बुढ़िया यहीं किराए पे रह रहे हैं" गुप्ता ने तीखे स्वर में ऐसे कहा मानो उन्हें कोई अपना पुराना जख्म याद आ गया हो
"नहीं भाई गुप्ता...मेरा बेटा ऐसा नहीं है...पता है जब उसकी नौकरी इंफोसिस में लगी थी...उसने हमारे पैर छूते हुए कहा था कि पापा..मम्मी ये आप लोगों के कारण ही मैं आज यहाँ पहुँचा हूँ..और मैं ये बात कभी भूल नहीं सकता कि आप लोगों ने कितनी तकलीफों से मुझे पाला है...गुप्ता..वो और मेरी बहू बहुत अच्छे हैं मुझे यकीन है वो हमारा ख्याल अच्छे से रखेंगे.." शर्मा जी थोड़ा भावुक होते हुए बोले
गुप्ता ने बुरा सा मुँह बनाते हुए कहा "मुगालते में हो शर्मा..ये आजकल के लड़के..बहुएं..माँ बाप को नौकर बना के रखते हैं...ऐसी बेतुकी बाते तुम मुझसे तो मत ही करो..अक्ल से काम लो..तुम पश्चिम में सूरज उदय होने जैसी बात कर रहे हो..पछताओगे एक दिन.."
"ठीक है यार कुछ हुआ तो तेरा घर तो रहेगा ही मेरे लिए..वैसे ये मेरे बेटे की नहीं..मेरे दिए संस्कारों की परीक्षा है..अब देखना है कि क्या मैं इसमें पास होता हूँ या फिर..." शर्मा जी गुप्ता से गले लगते हुए भावुक स्वर में बोले और फिर अपनी पत्नी के साथ दिल्ली के लिए निकल गए
आज शर्मा जी को दिल्ली आए एक साल हो गया है उनके बेटे बहू दोनों जॉब करते हैं..वे दोनों अपनी अपनी कंपनी में बहुत ऊँची पोस्ट पे पहुँच चुके हैं...शर्मा और उनकी पत्नी घर मे अपने पोते के साथ खेलते जिंदगी की शामें सुख से बिता रहे हैं
"पापा..एक खुशखबरी है..मुझे कंपनी से बहुत बड़ा ऑफर मिला है..मैं अपनी कंपनी से छः महीने के लिए अमेरिका जा रहा हूँ...आई टी इंडस्ट्री में ये मौका बहुत कम लोगों को मिलता है..हाँ कहने से पहले सोचा आपसे पूछ लूँ " शर्मा जी के बेटे राघवेंद्र ने सबसे पहले ये खुशखबरी अपने पिता को सुनाई
शर्मा जी ने गदगद होते हुए कहा "वाह बेटा ये तो बहुत फक्र की बात है..तेरे पापा मम्मी तो कभी यू.पी के भी बाहर नहीं निकले...और हमारे बेटे को सीधे अमेरिका जाने का मौका मिल रहा है..सब जगदम्बा की कृपा है..जरूर जाओ बेटा"
राघवेंद्र अमेरिका चला जाता है उसके पीछे शर्मा जी की बहू वैदेही ने उनकी जिम्मेदारी बहुत अच्छी तरह से संभाल ली और तीन महीने यूँ ही बीत गए एक दिन शर्मा जी के बेटे का अमेरिका से फोन आता है
"पापा..आपको याद है एक बार संगम के मेले में..एक हवाई जहाज वाला बड़ा सा झूला लगा था...वो जिसका चार्ज एक आदमी के लिए दो रुपैये था उस वक्त..उसमें कई बच्चे अपने अपने पापा मम्मी के साथ बैठ के झूल रहे थे...मैंने भी आपसे जिद की थी कि मुझे आपके साथ बैठना है..पर आपने मुझे किसी और अंकल के साथ बिठा दिया था.. मैं झूले में तो बैठा था पर बाद में आपसे बहुत गुस्सा हुआ था कि आप साथ में क्यों नहीं बैठे थे..पर बड़े होके मुझे समझ आ गया था कि आपके लिए उस समय दो रुपैये भी बहुत होते थे" राघवेंद्र का गला रुंध आया,उसने आगे कहा "पापा मेरी अमेरिका से वापसी का समय पास आ रहा है...आप मना मत करना..मैंने वैदेही को सब समझा दिया है वो वीजा टिकेट वगैरह का इंतजाम कर लेगी..आप और मम्मी वैदेही और कुशेन्द्र के साथ अमेरिका घूमने आ जाओ..वापसी हम सब साथ मे करेंगे...मैं इस बार अपने मम्मी पापा के साथ सच के हवाई जहाज में बैठना चाहता हूँ" राघवेंद्र की बात सुनकर शर्मा जी के गाल आँसूओं से भीगे चले जा रहे थे..वैदेही उनके पास खड़ी थी उसे फोन पकड़ा के वो घर के मंदिर में माँ अम्बे के पास नयनों में भर आए जल का अर्पण करने चले गए
आखिर वो दिन भी आता है जब शर्मा जी सपरिवार अमेरिका में राघवेंद्र के पास पहुँच जाते हैं और रात में आराम करने के बाद वहाँ की पहली सुबह देख रहे होते हैं वो राघवेंद्र से इलाहाबाद गुप्ता का नंबर मिलाने को कहते हैं
"हेल्लो कौन? अरे..हाँ शर्मा..बोल कैसा है..सब ठीक तो है..बड़े दिनों बाद याद आई.." इलाहाबाद में संगम के पश्चिमी किनारे पर सूरज डुबोते हुए गुप्ता ने एक साँस में कहा
इधर शर्मा ने अमेरिका से कहा "सब ठीक है गुप्ता..अमेरिका में हूँ..अपने बेटे के साथ 'पश्चिम' में सूरज को उगता देख रहा हूँ।"
-तुषारापात®
एक बार कहा था उसने
यूँ ही हँसी हँसी में
कभी तुम्हारे साथ डिनर करेंगे
लंच पे भला क्यों बहक रहे हैं
और जमाना ले उड़ा वो बात
दोस्तों ने भी खूब खिंचाई की
उस एक हँसी ठिठोली के
कई किस्से अब तक महक रहे हैं
लंच में खिचड़ी खाती थी
डाल के मक्खन मेरे साथ
अब उसकी लाज के चावल
किसी और घी में लहक रहे हैं
हमसे मत पूछो 'तुषार'
क्या हुआ था हमारा हाल
कई ख्याली पुलाव पके थे
आँख के चूल्हे अब तक दहक रहे हैं
-तुषारापात®
पत्थर के बदले फल देने वाले पेड़ को बाँझ झाड़ियाँ कायर कहती हैं।
-तुषारापात®
"बाबा जी..बाबा जी नमस्ते...मेरे पति बहुत बीमार हैं..अपना आशीर्वाद हमे प्रदान करें..बाबा जी उन्हें जल्दी से अच्छा कर दीजिए" माइक पकड़ते ही आस्था ने रोते रोते बाबा जी के दरबार मे गुहार लगाई, बाबा हजारों भक्तों की गोलाकार भीड़ से कोई दो सौ मीटर की दूरी पर बने एक ऊँचे सिंहासननुमा आसन पे बैठे थे उनकी सफेद रंगी दाढ़ी जो कि वास्तव में काली थी उनके चारों ओर लगे स्टैंडिंग एसीयों की ठंडी हवा से हल्के हल्के उड़ रही थी आस्था की पुकार सुनते ही वो अपनी बड़ी गोल आँखों से उसे देखते हुए रटे रटाये शब्द बोलते हैं "चिंता मत कर बेटी...सब ठीक होगा..कल्याण होगा"
आस्था रुआंसे स्वर में बोली "बाबा जी..उनका बड़े डॉक्टर के पास इलाज चल रहा है डॉक्टरों का कहना है आधे आधे चांस हैं..आपकी कृपा हो जाती तो.." अभी वो अपनी बात पूरी कर भी नहीं पाती है कि पास खड़े बाउंसर टाइप का शख्स उसके हाथ से माइक छीन के दूसरे व्यक्ति को थमा देता है बाबा आस्था के लिए आशीर्वाद की मुद्रा में अपना दायाँ हाथ उठाते हैं और अगले ग्राहक मतलब भक्त की ओर चेहरा कर लेते हैं
पाँच हजार रुपये 'दान' करके वह अस्पताल में अपने पति के पास आती है उसका पति विश्वास कुछ बोलने की स्थिति में नहीं है,विश्वास के बेड के पास बैठे उसके ससुर सेठ सूरदास ने उससे कहा "बहू..हो आई बाबाजी के पास क्या कहा उन्होंने..वैसे तो मैं ही जाता उनके दर्शनों को..पर सुना है वो औरतों की फरियाद जल्दी सुनते हैं..तो तुझे भेजा था.. जल्दी ही उनके आशीर्वाद से विश्वास ठीक हो जाएगा .. हाँ..ये साले डॉक्टर पता नहीं क्या ऑपरेशन वगैरह बता रहे हैं..चल तो मेरे साथ जरा डॉक्टर विवेक के पास"
वह अपने ससुर के साथ डॉक्टर के केबिन में पहुँचती है कुछ देर इंतजार करने के बाद वो और उसके ससुर डॉक्टर विवेक के सामने बैठे हुए थे
उसके ससुर ने डॉक्टर से पूछा "कौन सा ऑपरेशन बता रहे थे आप?"
"देखिए सूरदास जी..आपके बेटे की स्प्लीन से खून रिस रहा है इसके लिए हमे एक विशेष तरह का ऑपरेशन करना पड़ेगा जिसमें उसकी पैर की नस के रास्ते एक पतला तार डाल कर स्प्लीन में खून बहने की जगह को ब्लॉक किया जाता है" अनुभवी और बेहद ईमानदार बड़े डॉक्टर विवेक ने उन्हें एम्बलॉइज़ेशन को सरल शब्दों में समझाते हुए कहा
"इस ऑपरेशन की कितनी गारंटी है? मतलब इसके बाद विश्वास ठीक तो हो जाएगा ?
"अब गारंटी तो मैं नहीं ले सकता मगर 90 फीसदी केसेस में मरीज पूरी तरह ठीक हो जाता है"
"पैसा कितना लगेगा डॉक्टर साहब" सेठ ने सीधे स्वर में डॉक्टर से पूछा
"अ..जी देखिए ये थोड़ा महँगा ऑपरेशन है पहले तो इसमें लाखों रुपये लगते थे पर अब ये काफी सस्ता हुआ है ..आपके केस में एक लाख पचीस हजार के आसपास लगेगा ये मान के चलिए..."
आस्था जानती थी कि ये उसके धनाढ्य परिवार के लिए कोई खास रकम नहीं है तो जल्दी से हाँ कहने वाली थी पर उसके ससुर ने उसे चुप रहने का इशारा कर डॉक्टर से कहा "ये तो बहुत ज्यादा है..डॉक्टर साहब कुछ गुंजाइश हो जाती तो.. "
"ठीक है अगर आपको पैसों की दिक्कत है तो मैं अपनी फीस छोड़ देता हूँ..आप एक लाख जमा कर दीजिए..." डॉक्टर विवेक ने उनसे यह कहा एक पर्चा लिखा और अपने काम मे व्यस्त हो गया
सेठ जी डॉक्टर के केबिन से निकलते ही आस्था से बोले "देखा बहू कैसे इन कांइयां डॉक्टरों को सीधा किया जाता है..ला ये पर्चा मुझे दे..और तू विश्वास के पास जाकर बैठ..मैं रुपैया जमा करा के आता हूँ"
अगले दिन विश्वास का ऑपरेशन होता है और वो सफल रहता है चार दिनों के बाद उसे अस्पताल से छुट्टी मिल जाती है सेठ सूरदास उसे लेकर बाबा जी के आश्रम पहुँचते हैं और बाबा के चरणों मे गिरकर कहते हैं "बाबा जी ये मेरा बच्चा विश्वास आपकी ही कृपा से ठीक हुआ है..आपकी सदा जय हो..."
"तुम्हारी बहू नहीं आई" बाबा ने अपनी दाढ़ी सहलाते हुए पूछा
"जी वो जरा...इन दिनों..अशुद्ध...मतलब बीमार है" विश्वास ने सकुचाते हुए कहा
इसी बीच सेठ सूरदास ने अपने बैग से 2000 के 25 नोटों की एक गड्डी निकालकर बाबा की ओर बढ़ाई "एक भक्त की ओर से ये छोटी सी भेंट स्वीकार करें"
बाबा ने आशीर्वाद देने को बढ़ाया अपना हाथ पीछे करते हुए कहा "न न बच्चा..हम माया को हाथ भी नहीं लगाते..ये सहजयोगी परमानंद जी को दे दो" सेठ जी ने पास खड़े उनके सहयोगी को नोटों की गड्डी दे दी बाबा ने आशीर्वाद की मुद्रा में अपना दायाँ हाथ ऊपर उठाते हुए कहा "अगली बार अपनी बहू को भी आशीर्वाद हेतु अवश्य लाना"
"जी बाबा जी" डॉक्टर की 'कांइयांगिरी' पकड़ने वाले चतुर सेठ ने यहाँ कोई प्रश्न न किया और बाबा के चरणों में अपना और अपने पुत्र का मत्था टेक दिया।
आस्था और विश्वास जब विवेक का साथ छोड़ते हैं तो सूरदास हो जाते हैं।
-तुषारापात®