Thursday, 4 May 2017

गुलाबी

जाने क्यों उस दिन आसमान गुलाबी था?...हवा-ए-इश्क जिस्म की पाँचों खिड़कियों से गुज़र के तुम्हें हवामहल बनाये थी...लाज के पत्ते अपनी शाख छोड़ रहे थे...नारंगी सूरज आँखों में डूब सुरूर के लाल डोरे तैरा रहा था..आदमी जब इश्क में  जयपुर बना हो तो...कानपुर का काला आसमान भी उसे गुलाबी दिखाई देता है।

-तुषारापात®

Wednesday, 3 May 2017

आँख

आँख में सबके है कुछ न कुछ जुरूर
आँसू,जादू,नींद,सपने,माशूक,गुरूर,सुरूर

#तुषारापात®

सिक्सटी वर्ड्स स्टोरी

वो स्लम एरिया में जाता है पूरी बस्ती में घूम घूम कर ,वहाँ रहने वालों की जिंदगी की रेसिपी नोट करता है और रात को वापस लौट के अगले दिन का मेन्यू बनाने में लग जाता है,भूखे पेटों के किस्सों को चटपटा मसाला लगा के,भरे पेट वालों के सामने परोसने वाला वो कोई रसोइया नहीं,एक कहानीकार है।

-तुषारापात®

Monday, 1 May 2017

नींव के पत्थर

"सर...कुछ फिनिशिंग वर्क बाकी है..पर आप निश्चिन्त रहें 28 अप्रैल तक हमारा मल्टीप्लेक्स पब्लिक के लिए बिल्कुल तैयार हो चुका होगा..और सर..29 को फ्राइडे है तो नई फिल्म्स के शो भी हमें मिल जाएंगे...एवरीथिंग इज अंडर कंट्रोल..सर ..वी विल लॉन्च इट विथ अ ब्लास्ट" प्रोजेक्ट हेड माथुर ने चहकते हुए कहा

सिंघानिया साहब ने पूरी बात सुनी और धीरे से बस इतना ही बोले "हम्म" उनके हम्म से भी माथुर का उत्साह कम नहीं हुआ और वो बॉस को इंप्रेस करने के लिए आगे बोला "सर..पाँच स्क्रीन वाला अपना ये मल्टीप्लेक्स शहर का इकलौता और अनोखा मल्टीप्लेक्स होगा...ओपेनिंग डे के शो के लिए शहर के सभी बड़े हॉट शॉट्स को जल्द ही इनविटेशन भेज दिया जायेगा और सर मुंबई से कुछ स्टार भी....."

"माथुर...छोटे लेवल के सभी लेबर्स के आखिरी दो दिनों की पेमेंट रोक लेना..कहना कि पेमेंट ओपनिंग के दिन मिलेगी"सिंघानिया ने माथुर की चहकती बात को काटते हुए गंभीर स्वर में कहा और पाइप से धुआँ उगलते हुए आगे कहा "और हाँ..माथुर ओपनिंग 29 को नहीं 1 को होगी"

"ओह्ह लगता है महाराज जी ने 1 तारीख का मुहूर्त दिया है.. नो..नो प्रॉब्लम सर..एक को कर लेते हैं..लेकिन सर इन छोटे लोगों की पेमेंट अगर रोक दी तो परेशानी..ओके..ओके.. सर..आई गॉट इट सर...उस दिन अगर कोई छोटा मोटा काम निकल आया तो इन्हें फिर से बुलाना आसान नहीं होता..बट जब..पेमेंट फँसी होगी तो बुलाने से झट से आ जायेंगे..ब्रिलियंट सर.. इन नालायकों को ऐसे ही कंट्रोल में रखना चाहिए..सुपर्ब आईडिया" माथुर ने हाँ के अंदाज में बार बार सर हिलाते हुए कहा

1 मई को बड़ी धूमधाम से सिंघानिया मल्टीप्लेक्स की ओपनिंग होती है शहर के राजनीतिज्ञ,माननीय सांसद महोदय,मंत्री,बड़े व्यापारी,अफसर, मीडिया,बुद्धिजीवियों आदि के साथ शहर के उच्च तथा उच्च मध्य वर्ग के निमंत्रित लोग मुंबई से आए अभिनेता-अभिनेत्रियों के साथ जश्न का आनंद ले रहे हैं अलग अलग स्क्रीन जिन्हें ऑडी एक,ऑडी दो का नाम दिया गया है उनमें नई रिलीज हुई फिल्मों का शो 15-15 मिनट के अंतर पे रखा गया है

"द सिंघानियां ग्रुप आए हुए सभी गेस्ट्स का वेलकम करता है और शुक्रिया अदा करता है..फ्रेंड्स थोड़ी ही देर में फिल्म के शो शुरू होने वाले हैं आप सब इन फिल्मस का लुत्फ़ जरूर उठाइयेगा..
सबसे पहले ऑडी वन में शो शुरू होगा..आप सब ऑडी टू और ऑडीज थ्री..फोर..एंड फाइव में रेस्पेक्ट फुल्ली इनवाइट किए जाएंगे... पर सबसे पहले मैं ऑडी-वन के शो के लिए बहुत ही खास लोगों को आमंत्रित करना चाहता हूँ..आप सब उनका तालियों के साथ स्वागत कीजिये" कहकर सिंघानिया ने हॉल के दरवाजे की ओर इशारा किया सबने उधर देखा इस मल्टीप्लेक्स को बनाने वाले सभी मजदूर हाथों में चार दिनों की पेमेंट के लिफाफे पकड़े ऑडी एक में प्रवेश कर रहे थे।

नींव के पत्थरों पर न प्लास्टर होता है और न हीं रंग रोगन पर पूरी इमारत का बोझा ढोने वाले नींव के पत्थरों का पूजन अवश्य होना चाहिए।

-तुषारापात®

Sunday, 30 April 2017

लव स्टोरी

"हेलो..एक्सक्यूज़ मी...ये तुम्हारा रुमाल..वहाँ..शायद तुमसे गिर गया था" राजीव चौक मेट्रो पे लड़के ने दौड़के आगे जाती लड़की के पास जाकर कहा

लड़की रुमाल लेती है और कहती है "हम्म..'शायद'..नहीं नहीं...जानबूझकर..ताकि इतनी भीड़ में मैं देख सकूँ कि कौन कौन मेरा रुमाल गिरता हुआ देखता है.."

लड़की के इस अटपटे से उत्तर से लड़का बौखला जाता है "अरे.. मतलब..मैंने देखा तो..."

"देखा तो क्या..इसका मतलब तुम पहले से मुझे देख रहे थे..तभी तुम्हें मेरा रुमाल गिरता दिखा..." लड़की ने उसकी बात काटते हुए कहा "

"यार कमाल है...एक तो भलाई करो..और ऊपर से बातें सुनो..हद है.." लड़का भी गुस्से में आ गया

"भलाई..भलाई क्या..तुम लड़के..पहली ही मुलाकात में रुमाल देकर ये बता देते हो..कि देखो मैं तुम्हें आगे जाकर खूब रुलाने वाला हूँ..तो अभी से ये रुमाल रख लो" लड़की ने गुस्से से उसके मुँह पर रुमाल फेंका और वहाँ से चल दी

लड़के ने गुस्से से चीख के कहा "गो टू हेल" और रुमाल फेंकने जा ही रहा था कि रुमाल पे उसे कुछ लिखा हुआ दिखता है वो पढ़ता है " जहाँ पे मैं खड़ी थी..मेरे बाजू में एक बूढ़े अंकल ने भी रुमाल गिराया था..पर तुम्हें मेरा ही रुमाल गिरते दिखा...भीड़भाड़ वाली जगहों पे बुजुर्गों की मदद किया करो..सबसे अच्छी भलाई यही होगी...और हाँ ये रुमाल वो नहीं है जो तुमने उठा के दिया था..रुमाल मैंने बदल दिया है...स्माइल यू आर ऑन कैमेरा"

आजकल के जमाने में रुमाल गिरने और उठाने से लव स्टोरी नहीं बल्कि बकरा या बकरी बनते हैं।

-तुषारापात®

Friday, 28 April 2017

अक्षय तृतीया

"क्या पूरा पैसा?..रखवाया हुआ सारा रुपया ले जा रही हो..मालती.. क्या हुआ कुछ अनहोनी हो गई क्या?" भिखारन मालती ने जब अपने रखवाए हुए साढ़े आठ सौ रुपये मुन्ना बाबू से माँगें तो उसने आश्चर्य से यह पूछा

"सब ठीक है मुन्ना भाई...आज आखा तीज है न..बस इसीलिए रुपया चाहिए" मालती ने रुपये गिनते हुए जवाब दिया

मुन्ना हँसा और बोला "तो तुम क्या इन साढ़े आठ सौ से सोना खरीदने जा रही हो"

"नहीं...सोना दान देने" उसकी हँसी की परवाह न करते हुए उसने दृढ़ता से कहा और सामने वाले पंसारी की दुकान की ओर चल पड़ी, वहाँ उसने सारे पैसों में काफी सारा चावल और उसी अनुपात में दाल खरीदी

रात के दस बजे हैं महानगर के गोल चौराहे के पास की सड़क के दोनों ओर गाड़ियों का जमघट लगा है,दस बजने के बावजूद,अभी भी लोग आज अक्षय तृतीया होने के कारण लाला बद्री सर्राफ के यहाँ से सोना या उससे बने आभूषण खरीद रहे हैं,वहीं उसी सड़क से एक ओर जाती पतली सड़क के किनारे मालती अपने हाथों से पकाया दाल चावल अपने जैसे भिखारियों के बच्चों को परोस परोस के खिला रही है और कह रही है "आधे पेट नींद अच्छी नहीं आती न..तो लल्ला लोग आज खूब पेट भर भर के खाओ..और खूब अच्छी तरह से सोना."

चाँदी का चम्मच मुँह में लिए पैदा होने वाले 'सोना' खरीद रहे थे और ऐलुमिनियम के कटोरे वाली 'सोना' दान दे रही थी।

-तुषारापात®

Tuesday, 25 April 2017

कार और बैसाखी

"सिगरेट महंगी हो जावे...सिगरेट महंगी हो जावे.."मंदिर के बाहर बैठा एक विकलांग बूढ़ा ये बड़बड़ाए जा रहा था

अनुराग अपनी कार से उतरा और मंदिर के गेट पे बैठे उसी बूढ़े को 28 रुपए देकर वापस आया और अपनी कार स्टार्ट कर रहा था कि उसके साथ आया उसके ऑफिस का दोस्त राजीव बोला "यार अनुराग कई दिनों से पूछना चाहता था..ये तू...रोज आफिस से लौटते वक्त इस बूढ़े को 28 रुपए क्यों देता है..ये चक्कर क्या है यार..?"

हँसते हुए उसने जवाब दिया "वो क्या है कि पहले मुझे सिगरेट पीने की बहुत बुरी लत थी...फिर एक दिन किसी ने बताया कि एक सिगरेट आपकी जिंदगी के 10 मिनट कम कर देती है..सोचा अगर मुझे कुछ हो गया तो मेरे परिवार का क्या होगा..तो मैने पीनी छोड़ दी...काफी मुश्किल हुई..मगर किसी तरह छोड़ ही दी मैंने..रोज चार सिगरेट पीता था..तो अब उन्हीं चार सिगरेट का पैसा इस बेचारे बूढ़े को दे देता हूँ..शायद इन पैसों से उसकी जिंदगी में चालीस मिनट खुशी के आ जाते होंगे..और मेरी जिंदगी के चालीस मिनट तो बच ही जाते हैं "

"ओह्ह..समझा..मगर मुझे याद है..अभी कुछ दिन पहले तक तो तू इसे 20 रुपए ही दिया करता था फिर अब 28..." राजीव ने बूढ़े को देखते हुए कहा

अनुराग ने पहला गेयर डालते हुए कहा "अरे इस बजट में सिगरेट महंगी जो हो गई है" और हँसते हुए कार बढ़ा देता है उधर वो बूढ़ा जिसे रुपए मिले थे कार जाते देख उठता है और किसी तरह बैसाखी के सहारे घिसटते हुए पान की दुकान पे पहुँच के बीड़ी का बंडल माँगता है पान वाला उससे कहता है "बाबा बहुत बीड़ी पीते हो तुम..रोज चार पांच बंडल यूँ ही पीते रहे तो जल्दी ही मर जाओगे.."

बूढ़ा हँसता है और उससे पूछता है "ये चार बंडल से मौत चालीस मिन्ट और नजदीक आ जाती है...ई बात तो पक्की है न?"

अजीब नजारा था कार से चलने वाला जिंदगी का सफर धीरे धीरे काटना चाहता था और बैसाखी पे चलने वाला बहुत जल्दी में था।

#तुषारापात®

Wednesday, 22 February 2017

एकतरफा इश्क है एकतरफा सफर

एकतरफा इश्क है एकतरफा सफर
तेरा दिल मंजिल मेरा दिल मुसाफिर

लटों के छल्ले हैं ये फौलाद से
लगी है फाँसी इन जल्लाद से
खुली जुल्फ तेरी बाँध लेती नजर
एकतरफा इश्क है एकतरफा सफर

तेरा ख्याल है छोटा क्या बड़ा
साज हूँ सजावट का मैं तेरे बिना
तेरी साँसों पे बिछी है मेरी बहर
एकतरफा इश्क है एकतरफा सफर

बिना मांगे हाथ माँग भरूँ कैसे
सजा जाऊँगा एक दिन अपने लहू से
तेरी जुल्फों के बीच की ये डगर
एकतरफा इश्क है एकतरफा सफर

#तुषारापात®™

Friday, 10 February 2017

काम आरोपित हो रहा है रति पर

काम आरोपित हो रहा है रति पर
चाँद आमंत्रित है पूर्वा फाल्गुनी पर

नृत्य कर रहीं हैं यों तुम्हारी नाभि पर
उंगलियाँ सुर ढूँढ रहीं हों मानो बाँसुरी पर
काम का संदेश अधरों के भीतर फूँक मैं
स्पन्दित हो रहा हूँ तुम्हारी प्रतिध्वनि पर

केश-मेघ आच्छादित हैं गर्वीले नगों पर
एक पथ के दो पथिक हैं लचीले पगों पर
सहस्त्रों कल्पनाओं से दिग्भ्रमित पुरुषार्थी मैं
अच्युत हो रहा हूँ नारीत्व की तुम्हारी पगडंडी पर

तुम तुम्बधारिणी यों मानो कोई वीणा मादक
संग-गीत को आतुर आलिंगनबद्ध मैं वीणा वादक
तान का आरोह-अवरोह कर सुरों की छेड़छाड़ मैं
लयबद्ध हो रहा हूँ स्वांसों की तुम्हारी रागिनी पर

वाष्प मोती बढ़ रहे ऊपर भीतर दोनों के उष्ण रण
मद की ऊष्मा में ढूँढ रहे शीतलता का दुर्गम क्षण
प्रेम की घटी शीघ्र न घटित हो कहीं सोचता यह मैं
समय सा विस्तारित हो रहा हूँ तुम्हारी सारिणी पर

पुष्प बाण से भंग की थी इसने तपस्या त्रिनेत्री की
शिव पार्वती के विवाह में भूमिका थी रति पति की
अपनी समस्त वासनाओं की होलिका जलाकर मैं
घृत अर्पित कर रहा हूँ यज्ञ की तुम्हारी अग्नि पर

#तुषारापात®™

Friday, 20 January 2017

वो रात कुछ अजीब थी

वो रात कुछ अजीब थी ये रात भी अजीब है
वो कल भी पास पास था वो आज भी करीब है

मेरा नाम बुलाए वो या मैं उसे पुकार लूँ
नजर में उठा लूँ या नजर मैं उतार दूँ
मैं सोचती थी मुझसे निगाह चुरा रहा है वो
न जाने क्यों लगा मुझे दिल बहला रहा है वो

वो रात कुछ अजीब थी.......................

कई जवाब हैं मेरे न उसका इक सवाल था
मेरी आँखों में था पर बाँहों को मलाल था
मैं जानती हूँ अपनी निगाह जमा रहा है वो
धीरे धीरे खामोशी से दिल मिला रहा है वो

वो रात कुछ अजीब थी.......................

धधकती आग है कहीं मिली हुई सी साँस से
गीली भाप भी है मुंदी मुंदी सी आँख में
मैं मानती हूँ कि सुहागा सुलगा रहा है वो
यही ख्याल है मुझे कि माँग सजा रहा है वो

वो रात कुछ अजीब थी ये रात भी अजीब है
वो कल भी पास पास था वो आज भी करीब है.......

#वो_शाम_कुछ _अजीब_थी(फीमेल वर्जन)
#तुषारापात®™

Sunday, 15 January 2017

चुनाव: धर्म और जाति मतदान का आधार

एक बार फिर से देश पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव देखने जा रहा है इसमें राष्ट्र के सबसे महत्वपूर्ण राज्यों में से एक उत्तर प्रदेश भी है जिसमें स्पष्ट बहुमत वाली सरकार अपने कार्यकाल को पूर्ण कर रही है।

जब भी चुनाव होता है तो इन दो बातों पर बहुत प्रमुखता से विचार किया जाने लगता है कि क्या चुनाव में जाति और धर्म मतदान का आधार हैं क्या समाज की अन्य समस्याएं नहीं हैं जो मतदान का आधार हों या क्या जाति और धर्म से अधिक महत्वपूर्ण मुद्दे जैसे कि विकास,गरीबी बेरोजगारी इत्यादि देश अथवा राज्यों में हैं ही नहीं।

बुद्धिजीवियों के बीच बड़ी बड़ी और बहुत लंबी चलने वाली परिचर्चाएं होती हैं जो कि प्रायः इस आधार की आलोचना करती हैं और सुधार के कई रास्ते भी सुझातीं हैं पर ये सुधार के मार्ग बहुत ही आदर्शवादी होते हैं व्यवहार से प्रायः इनका उतना नाता नहीं होता, इन्हीं परिचर्चाओं के आधार पर साधारण व्यक्ति भी कभी सरकार को तो कभी नेताओं को थोड़ा थोड़ा कोस लेते हैं और लोकतंत्र में अपना अपना पात्र निभाने की औपचारिकता पूरी कर देते हैं।

धर्म और जाति को मतदान के आधार के रूप में समझने के लिए हमें बहुत पीछे जाने की आवश्यकता पड़ेगी जहाँ से हम जान सकेंगे कि राजनीति में इन दोनों तत्वों का समावेश आखिर इतना प्रबल क्यों है राजनीति का उदय कहाँ से हुआ इसी में इसका उत्तर छिपा है। प्राचीन काल में मानव खानाबदोश था वो एक स्थान पे बस्ती बना के नहीं रहता था उस अवस्था में भी मानव अपने जैसे कई साथियों के साथ इधर उधर भ्रमण करता रहता था जिन्हें खानाबदोश कबीलों के नाम से आज हम जानते हैं अब उस कबीले की मूलभूत आवश्यकताओं जैसे भोजन,जीवन रक्षा आदि के लिए एक नेता की आवश्यकता महसूस की गई जिसे कबीले का सरदार कहा जाने लगा वह अपने कबीले के लिए कई सारे नियमों को बनाने वाला और उनका पालन कराने वाला होने लगा और यहीं से मानवीय सभ्यता में राजनीति का उद्भव हुआ,प्रत्येक कबीले का अपना विशिष्ट पहचान चिन्ह अथवा ध्वज भी कुछ समय के उपरांत अस्तित्व में आया और इसी प्रकार अन्य क़बीलों के मध्य संसाधनों इत्यादि के अधिकार के लिए आपसी संघर्ष भी होना आम बात थी, कहने का मतलब ये है कि प्रत्येक कबीला अपनी मान्यताओं,अपनी आवश्यकताओं और अपने हितों की रक्षा करता था और उनका विस्तार चाहता था न कि समूल मानव जाति का।

धीरे धीरे समय के साथ नदियों के किनारे मानव बसता गया और तात्कालिक समाज पहले से कुछ जटिल आकार लेता गया कई कबीले प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता के कारण आपसी संघर्षों को छोड़कर एक साथ एक विशाल भूभाग पर निवास करने लगे वो ऊपर से कई मोटी बातों,मान्यताओं और आर्थिक राजनैतिक रूप में तो एक रहे पर छोटे बड़े प्रत्येक कबीले ने अपने रीति रिवाज और सामाजिक मान्यताओं को भी बनाये रखा यहीं से जाति और धर्म का जन्म हुआ जो कि आज भी भारतीय समाज में महत्वपूर्ण रूप से प्रभावी है। कहने का तात्पर्य ये है कि जाति,धर्म आदि समाज के वर्गीकरण के तत्व थे न कि विभाजन के उस समय आज के जैसे निम्न,मध्यम,उच्च वर्गीय या ग्रामीण शहरी आदि आदि वर्गीकरण उतने स्पष्ट रूप में नहीं थे। आज सामाजिक सरंचना बहुत अधिक जटिल है विशाल जनसँख्या है और संसाधन सीमित हैं।

अब अगर आज कोई दल किसी धर्म विशेष या जाति विशेष पर चुनाव लड़ता है या इन दोनों सामाजिक प्रवृत्तियों को धयान में रखकर अपनी नीतियाँ बनाता है तो इसमें गलत क्या है आखिर ये आदि काल से समाज में व्याप्त प्रवृत्ति ही है जो उसे ऐसा करने का आग्रह करती है यदि आज भी समाज में धर्म और जाति प्रभावी कारक है तो इसका प्रभाव राजनीति में भी दिखेगा ही,जाति या धर्म की राजनीति के पीछे मुख्य उद्देश्य क्या है ये बात सबसे महत्वपूर्ण है यदि कोई दल किसी धर्म विशेष या समाज के ख़ास वर्ग के लिए संघर्ष कर रहा है तो इसे बुरी नजर से कैसे देखा जा सकता है प्रत्येक मानव खुद को फिर अपने लोगों को सत्ता के शिखर पर देखना चाहता है ये उसका मूल स्वभाव है और इसी प्रवृत्ति से समाज भी संचालित होता है। अब अगर आप इसे पश्चिमी देशों से तुलना करके देखेंगे तो ये सही नहीं होगा वहाँ का सामाजिक ढाँचा यहाँ से बहुत भिन्न है और वहाँ विकास कार्य आरम्भ हुए कई शताब्दियाँ बीत चुकी हैं जबकि भारतीय लोकतंत्र अभी 70 बरस का भी नहीं हुआ है अभी भारतीय समाज और भारतीय राजनीति संक्रमण के दौर में है धीरे धीरे ये अपने आदर्श स्वरुप को प्राप्त कर सकेगी अगर ये योजनाबद्ध तरीके से हुआ तो।

आप समाज को किसी न किसी रूप में वर्गीकृत तो करेंगे ही चलिए जाति हटा दीजिये धर्म हटा दीजिये इसके अलावा जितने वर्गीकरण आजके समय में संभव हैं उन्हें लागू कीजिये उसके बाद क्या आप कह सकते हैं कि चुनाव बाद बनने वाली सरकारें अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेंगी। सभासद अपने वार्ड तक,विधायक अपने विधानसभा क्षेत्र तक सांसद अपने लोकसभा क्षेत्र तक सीमित है क्या एक विधायक दुसरे विधानसभा के विकास कार्यों के लिए संघर्ष करता दिखता है ठीक इसी तरह ये जाति की राजनीति है वो भी इसी तरह एक सीमित दायरे में है यदि एक जाति विशेष या धर्म विशेष के लोगों का कुछ आर्थिक और सामाजिक विकास हो जाता है तो उनकी कट्टरता का लोप होने लगता है और तब ही ये प्रवृत्ति धुंधली होगी अब कई लोग कहेंगे कि इससे तो एक ही वर्ग विशेष का उद्धार होगा तो मेरा कहना है ऐसा नहीं होता समाज एक चक्रीय व्यवस्था है एक का भला अंततः दूसरे का भी भला करता ही है। और आजके चुनाव में 50 प्रतिशत के आसपास लोग मताधिकार का प्रयोग करते हैं और उसमें भी 10 या 11 प्रतिशत मत प्राप्त करने वाला चुनाव जीतता है तो ये भी कहा जा सकता है कि जीता हुआ व्यक्ति उस क्षेत्र की 90 फ़ीसदी जनता की पसंद ही नहीं होता पर फिर भी वो पूरी जनता के प्रति उत्तरदायी तो होता ही है।

उत्तर प्रदेश में पिछले पाँच सालों से ऐसी पार्टी की सरकार रही जिसे एक धर्म विशेष और जाति विशेष के लोगों की हितों वाली पार्टी के तौर पे देखा जाता है पर क्या उसने सिर्फ सम्बंधित धर्म और जाति के लोगों के लिए ही काम किया और कोई विकास कार्य की ओर देखा ही नहीं तो ऐसा नहीं है प्रत्येक सरकार चाहे वो जिस भी दल की भी हो उसे हर हाल में विकास की ओर आना ही पड़ता है क्योंकि उसके बिना न समाज का भला होगा और न ही समाज के किसी वर्ग विशेष का,हाँ यहाँ उनकी नीयत क्या है इसका उल्लेख आगे किया गया है।

इस तरह की राजनीति में भी मुद्दे मुख्यतः वही रहते हैं जैसे गरीबी, बेरोजगारी,अशिक्षा और संसाधनों का अभाव इत्यादि इत्यादि बस इनका दायरा बहुत व्यापक न होकर सीमित हो जाता है और सम्पूर्ण जनता के लिए तो सरकार के पास न तो मानवीय संसाधन हैं और न ही आर्थिक संसाधन हैं,तो आवश्यकता यही है कि नियोजित विकास किया जाए उसके लिए अगर जाति या धर्म को आधार बनाया जाए तो भी इसमें कोई बुराई नहीं है और जिस देश में आरक्षण जैसी व्यवस्था चुनाव सहित अन्य क्षेत्रों में पहले से ही लागू हो वहाँ इन मुद्दों पे क्रंदन करना उचित नहीं लगता।

मुद्दे चाहे जाति आधारित हों या धर्म आधारित हों या चाहे विकास से जुड़े हों अगर नीयत नहीं होगी तो कोई भी लक्ष्य नहीं प्राप्त किया जा सकेगा बेईमानी भ्रष्टाचार के रहते प्रत्येक मुद्दा मात्र भावनात्मक शब्दों और लफ़्ज़ों का एक जाल होता है जिसमे आम आदमी फँसता है और छला जाता है सत्तारूढ़ दल के सत्ता बचाने के मुद्दे होते हैं और विपक्षी दलों के सत्ता पाने के मुद्दे होते हैं और सामाजिक आर्थिक विकास तो एक सतत प्रक्रिया के तौर पे चलते रहते हैं बस पार्टी विशेष की विचारधारा के अनुसार विकास की गति और दिशा बदलती रहती है।

तो श्मशान में उत्पन्न हुए क्षणिक वैराग्य की तरह के इस आदर्श कि धर्म या जाति आधारित मतदान गलत है,को छोड़कर हमें बस इतना विचार करना चाहिए कि प्रत्येक दल ने जो वादे किए थे उन्हें निभाया या नहीं या कितने प्रतिशत तक उन्हें निभाया यही एक सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है जिन वादों और बातों पे चुनाव लड़ा गया अगर सत्ता में आने के बाद उन वादों और कार्यों को पूर्ण किया गया तो विकास अवश्य ही होगा चाहे चुनाव में मुद्दे जाति आधारित रहें हो या धर्म आधारित हों या इनके आधार पर ही भले मतदान क्यों न हुआ हो तब भी इससे कोई विशेष अंतर नहीं पड़ेगा।

-तुषारापात®™

Wednesday, 11 January 2017

विवेकानन्द

"क्या आपने ईश्वर को देखा है?"....पंचवटी में भीड़ से घिरे परमहंस को इस प्रश्न ने चौंका दिया, उस वाणी में कठोरता तो नहीं परन्तु दृढ़ता बहुत थी और जिसे परमहंस के आसपास बैठे लोगों ने उस नवयुवक की धृष्टता मान उनके बोलने से पहले ही उस नवयुवक से प्रश्न कर दिया "न कोई अभिवादन न नमस्कार..प्रथम प्रश्न वो भी इतना तीक्ष्ण...सीधे ठाकुर से दुस्साहस करने वाला तू है कौन?"

"प्रश्न कल्पित होता है..इसलिए प्रायः उसे दुस्साहस की संज्ञा दी जाती है...प्रश्न के उत्तर में प्रश्न ये बताता है कि उत्तर देने का साहस किसी में नहीं है" नरेंद्र ने सीधे परमहंस की आँखों में देखते हुए कहा।

उसके उत्तर से परमहंस का हृदय अपार आनन्द से भर उठा वो मीठे स्वर में बोले "हाँ मैं ईश्वर से ऐसे ही बात करता हूँ...जैसे कि तुमसे कर रहा हूँ...परन्तु काष्ठ को चुम्बकत्व का अनुभव नहीं होता... उसके लिए या तो भक्त को लौह होना पड़ेगा...या चुंबक..."

इस बार नरेंद्र ने पहले उन्हें प्रणाम किया और फिर बोला "परन्तु अब तक जितने भी गुरु मिले सब कहते हैं वो पारस हैं और मुझ भंगुर लौह को स्वर्ण बनाना चाहते हैं....स्वर्ण सबसे मूल्यवान धातु है और देवताओं को अति प्रिय है.."

"स्वर्ण की सुरक्षा लौह के विशाल संदूकों और तालों से ही की जाती है..देवताओं के स्वर्ण मुकुटों की रक्षा लौह के तीर करते हैं... गुरु में पारस तत्व नहीं चुम्बक्तव होना चाहिए...परन्तु ऐसा कि वो समीप में आए लौह को चुम्बक बना दे और अपने समान ध्रुव से उसके ध्रुव को छिटक दे..उसे शिष्य को खुद से चिपकाए नहीं रखना चाहिए" परमहंस उस विपरीत ध्रुवी नरेंद्र की ओर आकर्षित हो रहे थे।

नरेंद्र संतुष्ट हो चुका था उसने सादर निवेदन किया "क्या इस लौह को कुछ चुम्बकीय ऊर्जा प्राप्त हो सकेगी?"

"तू पहले से ही चुम्बक है नरेंद्र...बस तेरा ध्रुव मुझे अपने समान करना है...फिर तू मेरी पूरी विकर्षित ऊर्जा से गति पायेगा और इस संसार को उसका 'स्वामी' मिल जाएगा...जो अपने से विपरीत ध्रुव वाले चुंबकों को जोड़ जोड़ कर एक महा चुम्बक बनायेगा... इस पूर्व देश और इसकी मान्यताओं के ठीक विपरीत मान्यताओं वाले पश्चिमी देश तेरे आगे नतमस्तक होंगे" इतना कहकर परमहंस माँ काली के मंदिर की ओर देखकर मंद मंद मुस्कुराने लगे,माँ ने ठाकुर से कहा "गदाधर! तुझे अपना पुत्र दे रही हूँ..तू इसके विवेक जागृत कर और इस संसार को तर्क का आनन्द दे"

माँ के इस वाक्य को रामकृष्ण के अतिरिक्त कोई न सुन सका परन्तु उनके चरणों को पकड़े बैठे नरेंद्र को कुछ फुसफुसाहट सी अवश्य सुनाई दे गई।

#तुषारापात®™(स्वामी के चरणों में लिपटी धूल के रूप में)

Monday, 9 January 2017

संडीला के लड्डू

"बालामऊ...हदोई...हदोई...बालामऊ" संडीला चौराहे पे बस जलपान इत्यादि के लिए रुकी थी और ड्राइवर का सहायक चिल्ला चिल्ला कर यात्रियों को बुला रहा था,हाथों में छोटी छोटी मटकियाँ पकड़े कई लड़के हर रुकी और रेंगती हुई बस के आगे पीछे लड्डू लड्डू की आवाजें लगा लगा के घूम रहे थे।

कुछ यात्री पंडित जी के ढाबे पे चाय समोसे में व्यस्त थे और ज्यादातर यात्री बस अड्डे पे बनी तमाम दुकानों में से संडीला के प्रसिद्ध लड्डुओं को पैक कराने की जल्दी में थे लेकिन विशाल, प्राइवेट बस के इन चालकों और कंडक्टरों को बहुत अच्छे से जानता था,जब तक ये ड्राइवर की गर्दन तक सवारियाँ नहीं ठूँस लेंगे तब तक बस हिलेगी भी नहीं,उसकी नई नवेली पत्नी ने उसकी जगह रोक रखी थी इसलिए वो निश्चिन्त था लेकिन लड्डू किस दुकान से पैक कराए इस उधेड़बुन में था।

"असली प्रसिद्ध ननकहु वर्मा के पौत्र की दुकान...प्राचीन व एक मात्र विश्वसनीय ननकहु वर्मा के पौत्र के लड्डू......सबसे पहले वाले ननकहु दद्दू....और यहाँ हैं उनके स्वादिष्ट लड्डू..." वो एक एक दुकान के बोर्ड को पढ़ पढ़ के बुदबुदाए जा रहा था और आगे बढ़ता जा रहा था,चौथी या शायद पाँचवी दुकान पे पहुँच के वो रुक गया देखा वहाँ भीड़ उतनी नहीं थी और बोर्ड पे नाम के नाम पे बस इतना लिखा था 'लड्डू संडीला वाले" वो दुकान पे गया और वहाँ बैठे एक लगभग साठ साल के आदमी से एक लड्डू खरीद के चखा लड्डू अपनी प्रसिद्धि के अनुसार ही स्वादिष्ट था उसने रेट पूछ कर एक किलो लड्डू पैक करने को कहा और उससे पूछा "तुम्हारी दुकान का लड्डू तो बहुत ही स्वादिष्ट है...एक दो बार पहले ये ननकहु वर्मा वाली दुकानों का भी चखा है पर ऐसा स्वाद कहीं नहीं है... इनमें से असली ननकहु प्रसाद की दुकान कौन सी है?"

"ननकहु प्रसाद नहीं...ननकहु वर्मा...और जहाँ स्वाद मिला तुम्हें..शायद वही असली दुकान हो.." दुकानदार ने मुस्कुराते हुए कहा

"मतलब...असली ननकहु वर्मा के पौत्र आप..लेकिन..मगर... सबने अपनी दुकान पे..असली...पुराना...सबसे पुराना...लिखवा रखा है...फिर आपने क्यों नहीं?" विशाल ने आश्चर्य से पूछा

दुकानदार मटकी पर सुतली बाँधते हुए बोला "जो सबसे पहले दुकान खोलता है वो असली..पुरानी..प्रसिद्ध दुकान कैसे लिखा सकता है...क्योंकि उस समय तो वो अकेला होता है न..वो किसे साबित करेगा और क्यों...."

"मगर बाद में जब और दुकाने हो जाएं तब बोर्ड तो नया लिखवाया जा सकता है न.." विशाल उसके उत्तर से लाजवाब हो चुका था पर फिर भी बोला

"दादा जी अपना नहीं अपनी भूमि का नाम चाहते थे...इसलिए बस लड्डू संडीला वाले लिखाया गया...ये सब मेरे ही भाई बंधू हैं..इन्होंने उनका नाम लिया मगर हुनर नहीं..मिलावटी सामान बनाते हैं..ये उनकी इच्छा के विरुद्ध काम कर रहे हैं ये भी मिटेंगे...और मैं भी मिटूंगा...दस के मुकाबले एक आखिर कब तक टिकेगा" कहकर उसने रुपैये काटकर बचे हुए पैसे उसे वापस किये।

उस घटना के बाद विशाल आज अपने सत्रह वर्षीय पुत्र के साथ एक बार फिर लखनऊ से हरदोई जा रहा है संडीला चौराहे से गुजरती उसकी कार की खिड़कियों से लड्डू की एक भी दुकान उसे नहीं दिखाई दी,मटकियों मटकियों बिकने वाले लड्डूओं का घड़ा भर चुका था।

-तुषारापात®™

Friday, 30 December 2016

क्या कहना

"हेल्ल्लो..लो..ओ. ओ.....वन.टू..थ्री..सांग चेंज...आज मेरे यार की सादी है....आज मेरे यार सादी है...ओSSSSS ऐसा लगता हैSSS जैसे सारे संसार....."ऑर्केस्ट्रा वाला चमकती चाँदी के रंग की लाल टिप्पों वाली शर्ट पैंट पहने,हिमेश रेशमिया के अंदाज में माइक पकड़ के अपना सर झटक झटक के ये गाना गाने लगा,दो तीन उसके साथी भी अपनी पूरी ताकत से ड्रम पीपीरी इत्यादि पे जुट गए और सुरों को असुर बनाने लगे।

ऑर्केस्ट्रा के उस रथनुमा पीपे के पीछे,दूल्हे सुशील के सारे दोस्त देशी माधुरी के ईंधन की ऊर्जा से ओतप्रोत जनरेटर बने थे और गाने पे ऐसे झूम रहे थे मानो होड़ चल रही हो कि किदवई नगर का सबसे टॉप का बाराती नचनिया कौन है,उनके पीछे,लड़कियाँ,महिलाएं सौंदर्य प्रसाधन की दुकान बनी,डांस करते लड़कों को देख मंद मंद मुस्कुरा रही थीं,कोई कटरीना की तरह का लाचा तो कोई बाजीराव मस्तानी की दीपिका वाले लहंगे की सस्ती नकल पहन के इतरा रही थी, महिलाएं छपरे वाले गहनों से लदीं थीं जो बस देखने में ही भारी लगते थे,थे बहुत ही हल्के असली होने की गारंटी भी नहीं थी वैसे भी बारात में कोई कसौटी लेकर तो चलता नहीं,इसलिए सब अपने अपने गहनों को दिखाने में मन धन और तन से दिखाने में लगीं थीं।

उनके आसपास कुछ ऐसे भी बाराती थे जिनका मन नाचने को हो रहा था मगर अपनी इमेज मेंटन करने के चक्कर में अपनी नाक ऊपर किये चल रहे थे और कुछ ऐसे थे जो डर रहे थे कि नाचते लोगों में से कोई उन्हें देख के नाचने को न बुला ले, ऐसे लोगों की चाल में सकुचाहट थी,बारात के दोनो बार्डर पे कई औरतें लाइट को अपने सरों पे ढोते हुए चल रहीं थीं उनपे भला किसी का ध्यान क्यों कर होता ,जो रोशनी अपने सरों पे ले के चलते हैं उनके चेहरे हमेशा अँधेरे में रहते हैं।

निम्न मध्यमवर्गीय ये बारात मूलगंज चौराहे से रामबाग की कन्हैयालाल धर्मशाला की ओर बढ़ रही थी और संकरी मेस्टन रोड पर जाम लगाने में पूरी तरह सहायक सिद्ध हो रही थी।

घोड़ी पे बैठे दूल्हे राजा सफ़ेद कलर का सूट पहने हल्के नशे में थे उनके गले में दस दस के नोटों से बनी माला पड़ी थी अब बारात में उन्हें ये माला पहनने की सलाह किस जीजा ने दी ये विषय यहाँ छोड़ देते हैं,आसपास की दुकानों के और आते जाते लोग बारात का पूरा स्वाद अपने चक्षुओं से ले रहे थे, बारात ताकने वाली भीड़ में एक उच्च मध्यम परिवार के कुछ लोग जिनकी कार सड़क के बीच वाली पार्किंग में फँसी थी दूल्हे को देख आपस में बोले "ये दूल्हा तो नशे में लगता है...ये लोग अपनी शादी को भी नहीं छोड़ते...चरसी कहीं के..." तभी उनमें से एक बोला "ओह माय गॉड लुक ऐट हर... ये तो प्रेग्नेंट लगती है...ऑ.. बेचारी फिर भी इतनी भारी लाइट सर पे उठाए जा रही है.." सबने उस ओर देखा और अपने अपने मोबाइल से उस गर्भवती महिला की धड़ाधड़ तस्वीरें लेने लगे।

घोड़ी पे बैठे सुशील का ध्यान उन फोटो खींचते लोगों पे गया और उसने उस महिला को भी देखा,वो उतरना चाहता था पर थोड़ी सकुचाहट और जाम लग जाने के डर से नहीं उतरा पर उसका मन बेचैन सा हो चुका था,धीरे धीरे बारात आगे बढ़ के कॉनपोर कोतवाली के सामने पहुँची वहाँ रास्ता चौड़ा होने के कारण रोड पे काफी जगह थी वो झट से घोड़ी से उतरा और भाग के उस लाइट उठाये औरत के पास पहुँचा उसने देखा कि करीबन 30 या 32 साल की वो महिला पेट से थी और बोझ उठाने के कारण इतनी सर्द रात में भी पसीने से तर थी सुशील का हाथ अपने गले में पड़ी नोटों की माला पे गया,माला तोड़ के उसने महिला के कंधे पे रखी और उसके सर से लाइट उठा के अपने हाथों में पकड़ ली।

बारात को अचानक ब्रेक लग गए ऑर्केस्ट्रा रुक गया सुशील के पिताजी दौड़ते हुए उसके पास आए और पूछा क्या हुआ तो उसने कहा "बाबू...सभी लाइट वाली औरतों का पूरा हिसाब कर दो.. और रिक्सा का पैसा भी दीजियेगा...बारात अब बगैर लाइट के आगे जायेगी..और इन सबसे कह दो खाना खा के ही जाएं" यह कहकर रौशनी के गुलदस्ते को जमीन पे रख वो घोड़ी की ओर जाने लगा उसके दोस्त नाचना छोड़ के उसके पास आए और पूछने लगे "क्या हुआ बे...उसके साथ फोटू खींचा रहे थे क्या.. नशा ज्यादा करे हो का"

सुशील उन्हें देख के बस मुस्कुराया और बुदबुदाते हुए घोड़ी पे चढ़ गया" बड़का लोग अच्छी बात करते हैं..फोटू भी अच्छी खींचते हैं बस करते कुछ नहीं...फेसबुकिया नशेड़ी कहीं के"

बारात बगैर लाइट के आगे बढ़ने लगी,ऑर्केस्ट्रा फिर शुरू होता है "ये देस है वीर जवानों का...अलबेलों का...मस्तानों का... इस देस का यारों... होSSSय...
क्या कहना.............................।"

#तुषारापात®™

Monday, 26 December 2016

कुकड़ूँ कूँ

गुस्साया सा तेज तेज कुकड़ूँ कूँ कुकड़ूँ कूँ क्यों करता रहता है
सुबह का सूरज देसी मुर्गे को अपने अंडे की जर्दी सा लगता है

-तुषारापात®™

चकरघिन्नी

नया साल आ गया है आ गया है,कहना कितना सही है मुझे नहीं पता क्योंकि मैं तो इसे अभी पुराने साल में ही लिख रहा हूँ और आप इस लेख को नए साल में पढ़ रहे हैं, कुछ अजीब नहीं लगता? ऐसा नहीं लगता मैं पिछले साल में ही आपको नए साल में ले आया हूँ या यूँ कहें कि जो समय अभी भविष्य में है मतलब जिसका पता ठिकाना ही नहीं उसमें मैं अपने शब्द भेज के अपने लिए आने वाले उस समय को भूतकाल बना चुका हूँ।

नहीं नहीं साहब मैं पागल नहीं कमअक्ल लेखक ही हूँ चलिए इस अजीबोगरीब भूमिका के बाद अब कुछ आगे की बात आपसे करते हैं,मैं दिसम्बर में बैठा हूँ और आप जनवरी में बैठे हैं और अब जरा सा और दिमाग लगाइए मैं अभी ये लिख रहा हूँ तो ये मेरा वर्तमान हुआ और आप इसे अभी पढ़ रहे हैं तो ये आपका वर्तमान है,लेकिन मेरा वर्तमान (इस लेख को लिखना) आपके लिए भूत हुआ और आपका वर्तमान (इसे पढ़ना) मेरे लिए मेरा भविष्य हुआ,हा हा हा खा गए न चक्कर? मेरे दोस्त यही है समय का चक्र और इसी चक्कर को हमें समझना है।

हर बार कैलेंडर बदलता है हर साल साल बदलता है किसी का जनवरी में तो किसी का अप्रैल में किसी पंडित का चैत्र में तो किसी विद्यार्थी का जुलाई में साल बदलता है जन्मदिन पर एक साल बदलता है शादी की सालगिरह पर साल बदलता है आदि आदि, कहने का मतलब है समय के चक्र में सबने अपनी अपनी रंगबिरंगी तीलियाँ लगा दी हैं एक चक्कर पूरा करके जब उनकी पसंदीदा रंगी तीली उनके सामने वापस आ जाती है उनके लिए उनका साल बदल जाता है

पर ये साल बदलने से कुछ होता भी है या हम फालतू में ही इसके आने का जश्न मनाते हैं आपका साल चाहे जिस भी तारीख को बदलता हो पर जब बदलता है तो आपकी सोच बदलती है विकसित होती है अब सोच दो तरह की होती है नकारात्मक और सकारात्मक,हम जश्न मनाते हैं क्योंकि हम सकारात्मक सोचते हैं अब कुछ लोग कहेंगें काहे का जश्न उलटे उम्र से एक साल कम हो गया तो उनसे कहना चाहूँगा कि तो तुम जाने वाले साल के लिए जश्न मनाओ इसलिए मनाओ क्योंकि गए हुए साल में तुम बचे रहे एक साल और जी लिया तुमने

मतलब साफ़ है सदा अपनी सोच को पॉजिटिव बनाए रखना है, ऊपर मैंने इसीलिए जिक्र किया कि मैं ये लेख पुराने साल में लिख रहा हूँ कि नए साल में आप इसे पढ़ेंगे आखिर कौन सी चीज है जो मुझे इतना विश्वास देती है कि ये छपेगा और आप तक पहुँचेगा ही वो एक चीज है उम्मीद एक लेखक की उम्मीद अपने पाठक तक पहुँचने की, बस यही उम्मीद जगाता है आने वाला नया साल, और जब तक उम्मीद है दोस्तों ये दुनिया कायम है।

समय एक पेड़ की तरह है जिसमें फल लगते हैं कुछ नए पत्ते निकलते हैं कुछ पुराने पत्ते गिरते हैं और ये प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है हमारा साल बदलना बस उस समय का एक छोटा सा पल है जिसमें हम हिसाब करते हैं कि कितने पत्ते टूटे कितने नए खिले, टूटे पत्तों पे गम न करो हताश मत हो ये मत सोचो कि हाय कितने फल हम खा न सके बेकार गए बल्कि ये सोचिए कि कितने नए फल उगेंगे जो हमारी झोली में आएंगे, साल हमारी बनाई इकाई है हमें इसे धनात्मक रखना है गया हुआ समय कहीं गया नहीं है वो आप मेंसे किसी बच्चे की लंबाई में बदल गया है तो किसी के बालों की थोड़ी सी सफेदी में कैद है अब ये आप पर है कि आप सफ़ेद बालों पे दुखी हों या फिर शान से कहें कि ये बाल मैंने धूप में सफ़ेद नहीं किये हैं।

अच्छा किसी बरहमन ने आपको बताया कि ये साल अच्छा है?
मैं कहता हूँ कि सबके लिए आने वाला साल अच्छा है जब कुछ अच्छा होता न दिखे तो समय के चक्र में से अपनी रंगीन तीली निकालकर उस जगह के थोड़ा पीछे लगा के उसे बीता साल बना दो और अपना साल बदल लो और फिर कहो ये साल तो अब अच्छा है बस उम्मीद और विश्वास की इस चकर घिन्नी को रुकने नहीं देना है हर साल अच्छा ही होगा।

तो आने वाले इस नए साल के लिए आप सभी को ढेरों शुभकामनाएं।

(कर्म दर्शन पत्रिका के मेरे कॉलम ऑफ दि रेकॉर्ड के लिए भेजा
है,एडिटर साहब ने मेल पर रिप्लाई किया छपेगा तो जरूर बस आप चरस अच्छी वाली पिया करें :) )

-तुषारापात®™

Friday, 23 December 2016

नाम

ताबिश,अब्बास,मोईन,बिलाल,शहजाद,अकरम,फैजल,इत्यादि से क्या पता चलता है? अच्छा असित,अमित,अव्यक्त,विजय,तुषार,वरुणेन्द्र, सिद्धार्थ,प्रदीप इन नामों से क्या पता चलता है? पहली नजर में आप सब एक साथ कहेंगें कि पहली पंक्ति के नाम मुस्लिम मजहब के लोगों के हैं और दूसरी पंक्ति के सभी नाम हिन्दू धर्म का पता देते हैं

तो मोटे तौर पे हम ये कह सकते हैं कि नाम का पहला शब्द धर्म का स्पष्ट/अस्पष्ट पता देता है अच्छा अब आते हैं नाम के दूसरे शब्द पे जो कि सरनेम होता है जैसे अहमद,जाफरी,शेख या चतुर्वेदी,मिश्र, सिंह आदि आदि इनसे क्या पता चलता है मोटे तौर पे ये जातिसूचक शब्द होते हैं जो दादा से पिता को और पिता से पुत्र को प्राप्त होता है

पहले नक्षत्र आधारित नाम की व्यवस्था हुआ करती थी प्रत्येक नक्षत्र के चार चरण होते हैं जिसका एक अलग अलग अक्षर होता है (मात्रा सहित) बालक नक्षत्र के जिस चरण में जन्म लेता था उसी चरण वाले अक्षर से आरम्भ होने वाले नाम दैवज्ञ (ज्योतिषी,पंडित) सुझा देते थे जिससे उस व्यक्ति के जन्म के समय का भी मोटा मोटा पता चलता था,इतनी लंबी भूमिका से तात्पर्य ये है कि जाति, नाम आदि समाज के वर्गीकरण की प्रक्रिया थी लेकिन दुर्भाग्य से उसे हमने विभाजन मान लिया तब सामाजिक सरंचना उतनी जटिल नहीं थी और जनसंख्या विरल थी अतः यह प्रक्रिया चलती थी पर आज समाज अत्यंत जटिल स्वरूप में है बाकी सब छोड़ भी दिया जाए तो भी नाम अभी भी अपना एक अलग महत्व रखता है लेकिन ये सब कुछ नहीं है।

अपने जिगर के टुकड़े को आप घर में कुछ भी प्यार से अजीब अजीब संबोधन से बुलाते हैं कुछ घरों में अभी भी पिता अपने सबसे बड़े पुत्र को भइया कहके बुलाते हैं उसका नाम नहीं लेते पर नाम बाहर वालों के लिए रखा जाता है नाम व्यक्तिगत नहीं सार्वजनिक संबोधन है इसलिए नामकरण अत्यधिक सतर्कता से करना चाहिए विशेष तौर पे उन्हें जिनका प्रत्येक कार्य समाज के एक बड़े हिस्से पर प्रभाव छोड़ता हो उन्हें जन भावना को आहत करने वाले नामों से बचना चाहिए पर ये कोई अंतिम सिद्धान्त नहीं है कि उन्हें ऐसा करना ही चाहिए।

नामकरण को लेकर बुद्धिजीवियों द्वारा पक्ष विपक्ष में कई तर्क कुतर्क दिए जा रहे हैं हालाँकि मैं तब लिख रहा हूँ जब ये मामला ठंडे बस्ते में जा रहा है लेकिन मैं इस मुद्दे पे नहीं इस प्रवृत्ति पे लिख रहा हूँ तो बुद्धिजीवियों नाम एक अति महत्वपूर्ण स्थान रखता है नाम हमें पशुओं से अलग करता है घोड़े घोड़े होते हैं शेर शेर होते हैं इसी प्रकार भेड़ों के झुण्ड होते हैं लेकिन मनुष्यों में सत्यपाल,अबोध, सुबोध,मुश्ताक आदि आदि होते हैं क्यों तुम भेड़ के झुण्ड बने जा रहे हो कुछ और रचनात्मक लिखने को शेष नहीं है तुम्हारे पास,तनिक विचार करना,किसी भी विषय पर अत्यधिक समाधन प्रस्तुत करना कभी कभी उस समस्या को और बढ़ा देता है।

और अंत में नाम को लेकर बवाल मचाने वालों से बस एक पंक्ति कहना चाहूँगा "तुम्हारी भावनाएं कभी आहत नहीं होती तुम बस भावनाएं आहत होने का ढोंग करते हो, और तुम्हारे इसी आडम्बर के ढोल की कर्कश ध्वनि में तुम्हारी तूती के गौरवपूर्ण सुर विलुप्त हो रहे हैं।

-तुषारापात®™

Wednesday, 21 December 2016

भाभी

"वाह...मजा आ गया...खाना तो जबरदस्त है ..ये दोनों सब्जियाँ मेरी पसन्दीदा हैं..भाभी..इस बार अगली कहानी आप पर" मैंने खुशी से चटकारे लगाते हुए कहा

किचेन के अंदर से भाभी की आवाज आई "वाकई में...या यूँ ही अपनी बीवी के सामने मेरी तारीफ की जा रही है...इसे जलाने के लिए" मैं कुछ कहता इससे पहले किचेन में उनका हाथ बँटा रहीं मेरी पत्नी जी बोल उठीं "और मैं जो रोज खाना बनाती हूँ...मुझपे तो आजतक एक भी कहानी नहीं लिखी गई"

"तुम पे तो अपनी आत्मकथा में लिखूँगा... कि कितनी बार बेकार खाने पे मुझे जबरदस्ती तारीफ करनी पड़ी...सच्ची आत्मकथा होगी तो ज्यादा पसंद की जायेगी" इस बात पे सभी के ठहाके गूँजे

"आप दोनों की शादी के 22 साल पूरे हो गए न...जानतीं हैं ये मुझे इसलिए याद रहता है...क्योंकि उस साल..हम आपके हैं कौन की धूम थी...और देखो रेणुका शहाणे से भी अच्छी और सुंदर भाभी हमारे घर को मिलीं...वैसे ये मैं तभी बोलना चाहता था पर छोटा होने के कारण कह नहीं सका..आपने इस घर को अपने प्यार से बाँध के रखा..आप तो एक आदर्श भाभी हैं बिल्कुल सूरज बड़जात्या की फिल्मों की तरह" मैंने डोंगे से पनीर की सब्जी लेकर अपनी कटोरी लबालब भरते हुए कहा

भाभी और पत्नी जी दोनों अब रोटियाँ सेंककर अपनी अपनी थाली लगा के मुझे और भैया को ज्वाइन कर चुकीं थीं भाभी ने डायनिंग टेबल पे बैठते हुए कहा "चलो चलो..तब तो महाशय डॉली के आगे पीछे देखे जाते थे...वो गाना याद है...काफी दिनों तक हम लोग तुम्हें 'डॉली सजा के रखना' गा गा कर चिढ़ाते रहते थे"

"भाभी...श..श...बीवी के सामने सीक्रेट्स नहीं खोलते...वैसे भी तब मैं एफिल टॉवर के जैसे सींकिया हुआ करता था...और वो आपके मामा की लड़की डॉली गोलकुंडा का किला लगती थी..अपनी तो ये 'संगम की नाँव' अच्छी है" मैंने पत्नी जी की तरफ थोड़ा सा घी बढ़ाते हुए कहा

"वैसे देवर के राइटर होने का इतना फायदा तो मिलना ही चाहिए... अच्छा ये तो बताओ तुम्हारी कहानी में मेरा किस तरह गुणगान होगा.." भाभी ने भैया की तरफ देखते हुए कहा भैया शान्त गाय की तरह खाना खाने में लगे रहे

"उसमें कोई सेंटिमेंटल..या बढ़ा चढ़ा के बात नहीं होगी..जब भी देवर भाभी के रिश्ते की बात आती है...तो या तो उसे हँसी मजाक के रिश्ते का नाम दिया जाता है या पता नहीं क्यों..एक जबरदस्ती की सफाई सी देती हुई आदर्श बात जरूर जोड़ी जाती है...कि भाभी माँ जैसी होती है...या माँ के समान होती है... न साली आधी घरवाली होती है और न ही भाभी आधी माँ होती है...हम अतिश्योक्ति में क्यों जीते हैं... जैसे माँ का एक अलग रिश्ता है बहन का अलग रिश्ता होता है वैसे ही भाभी सिर्फ भाभी होती है..और इस शब्द का अपना अलग महत्व है अलग पद है..इसे बयां नहीं किया जा सकता...रिश्ते परिभाषित करने से बनावटी हो जाते हैं..." शायद मेरे अंदर का साहित्यकार जाग गया था

"वाह क्या बात कही...सही है प्रेम के अनेकों रूप हैं...माँ पापा भाई बहन सबसे हम प्रेम करते हैं पर इनकी व्याख्या नहीं करते..जहाँ व्याख्या करनी पड़े वहाँ प्रेम अपना स्वरूप खो देता है...अच्छा खाना क्यों रोक दिया...रुको ये रोटी वापस रखो ये लो ये गर्म है.." उन्होंने मेरी थाली से ठंडी रोटी हटा के कैसरोल से गर्म रोटी रखते हुए कहा

काफी देर से चुप भैया बोले "हाँ और इस प्रेम में समय समय पर भैया की जेब से निकालकर देवर को शाहरुख़ खान स्टाइल के कपड़े खरीदने के लिए पैसा देना भी शामिल है" एक बार फिर से सबके ठहाके गूँजे

"वैसे भाभी मैंने कभी आपसे कहा नहीं...आज कहता हूँ ..आप बिल्कुल ख़ामोशी वाली वहीदा रहमान की तरह लगतीं हैं...वही ग्रेस वही सौंदर्य... सदाबहार हैं आप इन बाइस सालों में जरा नहीं बदलीं..कसम से आपको तो संतूर का ऐड करना चाहिए" उनकी तारीफ कर मैंने भैया को चिढ़ाया

"हाय...वहीदा रहमान...मतलब...ख़ामोशी फिल्म में जैसे वो हो गईं थीं...मैं भी पागल हो जाऊँगी" उन्होंने हँसते हँसते कहा

मैंने बड़ा संजीदा सा चेहरा बनाते हुए कहा "वो तो आप पहले से थीं वरना भैया से शादी क्यों करतीं"

"वो तो मुझे तुम्हारी भाभी बनना था न इसलिए...वरना कौन इनसे शादी करता" और उनकी हाजिरजवाबी से एक बार फिर मैं लाजवाब हो चुका था।

#रिश्तों_में_शब्दों_की_अतिश्योक्ति_नहीं_भावों_की_अभिव्यक्ति_होनी_चाहिए
(पसंद आये तो शेयर करिये अपनी अपनी भाभी के लिए उन्हें अच्छा लगेगा)
#तुषारापात®™ उनके लिए जिनके लिए हमेशा तुषार रहूँगा छोटा वाला।

Thursday, 15 December 2016

इकाईयों को हासिल नहीं मिलते

"आज दोपहर वो खुद ही आकर दे गया...सबको इनवाइट किया है...मिसेज खान विथ फॅमिली" ऑफिस से लौट के वो डाइनिंग टेबल पर रखे कार्ड को उठा के देख ही रही थी कि पीछे से उसकी माँ बोल उठीं

कहीं बहुत गहराई से उसकी आवाज निकली "हूँ..." उसने एक गहरी साँस ली पर छोड़ी बहुत आहिस्ता से,धीरे से पर्स टेबल पे रखा,बाल खोले और कुर्सी ऐसे खींची कि बिल्कुल भी आवाज न हो और खींच के उसपे हौले से बैठ गई,कार्ड अभी भी उसके हाथों में था "हासिल वेड्स...." आगे के नाम को उसने पढ़ा नहीं... तख़्त दान में देने वाले ये नहीं देखा करते कि उनके बाद उसपर कौन बैठा

"इक्कु...आज तेरा जन्मदिन है बेटा...और आज ही वो अपनी शादी का कार्ड दे गया....और शादी अपने जन्मदिन पर कर रहा है...ये सब क्या है...?" अम्मी ने चाय की प्याली उसके आगे रखते हुए कहा

"कुछ नहीं..." उसने कहा और आधी बात धीमे से बुदबुदाई "ये तोहफा है एक दूसरे को हमारे जन्मदिन का..." कहकर उसने चाय का एक घूँट भरा और निगलते ही कुछ ही दिन पुरानी हुई यादें उसके सीने में जलने लगीं

"इकाई...तुम होश में तो हो...यहाँ मैं तुम्हारे जन्मदिन 9 दिसम्बर पर सोच रहा था कि सबको ऑफिसियली बता दूँगा कि हम दोनों बहुत जल्द शादी....और तुम कह रही हो ये सब भूल जाऊँ...तुम मुझसे शादी नहीं..." हासिल ने उसके दोनों कंधे पकड़ के उसे झंझोड़ते हुए कहा

वो पत्थर की बनी बैठी रही बस उसके लब हिले " 9 नम्बर का रूलिंग प्लानेट मंगल होता है जो सेनापति है और सेनापति को ताज नहीं मिला करता....उसे अपनी सेना के लिए लड़ना होता है बस"

"तुम और तुम्हारी ये ब्लडी न्यूमरोलॉजी....देखो इकाई मैं जानता हूँ हमारी शादी आसान नहीं है...तुम्हारे पापा के जाने के बाद से...बट यू डोन्ट वरी... तुम्हारे घर का खर्च भी मैं उठा लूँगा और तुम्हारी दोनों बहनों की शादी भी अच्छे से...हम करवाएंगे न...याSSSर.." सब्र से काम लेते लेते आखिर में वो फिर से चीख उठा

"मैं फैसला कर चुकी हूँ...मैं किसी से भी शादी नहीं करूंगी" इकाई ने पथराई आँखों से कहा

"मैं तो ये भी नहीं कर सकता मेरी अम्मी का कोई ठिकाना नहीं कब वो चल बसें...ठीक है...अब तुम्हारे जन्मदिन पर ही..इकाई...मैं अपनी शादी का कार्ड भेजूँगा...और हाँ शादी भी अपने जन्मदिन 13 दिसम्बर को ही करूँगा...इस तरह हम दोनों के लिए एक दूसरे को याद करके रोने के दो ही दिन रहेंगे..दो नए दिन नहीं जुड़ेंगे" हासिल ने सरेंडर कर दिया हासिल की मर्जी नहीं चलती उसे तो अगले नम्बर पर जाना ही पड़ता है

अचानक चाय से इकाई के होंठ जले तो वो वापस आई उसकी अम्मी कुछ कहे जा रहीं थीं पर उसके कानों में कुछ नहीं जा रहा था उसने धीरे से कहा "9 अंक की इकाई सबसे बड़ी होती है अम्मी..उसमे अगर एक भी जुड़ जाए तो वो जीरो हो जाती है..और अगर कुछ और वो जोड़ ले तो वो छोटी हो जाती है फिर उससे छोटी इकाइयों का क्या होगा...और वैसे भी अम्मी..इकाइयों को हासिल नहीं मिला करते" और अपने कमरे में जाकर दरवाजा बंद कर लिया,लेकिन इस बार दरवाजा बंद करने की आवाज बहुत जोर से आई।

-तुषारापात®™

Tuesday, 29 November 2016

आलपिनों की मूठें

आओ बैठें साथ जरा देर
किस्सों के आँगन में
अल्फ़ाज़ों से बुनी चटाई पे
धूप का हुक्का पीते हैं
फिर शाम उतर आएगी
रात की बाहें थामे हुए
ओस की नन्हीं बूँदों से
इन दोनों आँखों में
इक इक माला बन जायेगी
चाँद के हवन कुंड में
सूरज जब आएगा
उनचास फेरों के बाद
फिर पग फेरे को
तुम अपने घर चली जाना
हर दफे टूटता ये ख्वाब
हर बार एक सितारा बढ़ता है
ऊपरवाले के ब्लैकबोर्ड पे
फिर नई अर्जी टँकती है
जो दिखती सितारों की पट्टी
वो आसमान के सीने पे
चमकती आलपिनों की मूठें हैं।

#तुषारापात®™