Friday, 4 March 2016

आविष्कार का पिता

"अ..देखिये मिसेज...अरर..मिस...मेरा मतलब...आवश्यकता जी.. ये बम्बई दिल्ली के जैसा कोई बड़ा शहर तो है नहीं..ये एक छोटा सा मगर अपनी संस्कृति से बहुत गहराई के साथ जुड़ा हुआ शहर है...और आप अपनी स्थिति तो बेहतर जानती ही हैं..तो इस तरह की बातों को एक कान से सुनिए और दूसरे से निकाल दिया कीजिये ...इसी में आपकी भलाई है"..अधेड़ चतुर्वेदी ने मीठी चाशनी में पगी मिर्च जैसे ये शब्द आवश्यकता से कहे

"लेकिन...चतुर्वेदी साहब..आते जाते हर रोज मोहल्ले वालों के ताने सुनना अब बर्दाश्त नहीं होता...आप मेरे लिए किसी और मोहल्ले में मकान ढूँढिये..यूँ यहाँ रहना मुश्किल है मेरा" आवश्यकता ने चतुर्वेदी की निगाहों का निशाना देखते हुए अपना आँचल ठीक करते हुए कहा

"आप समझ ही नहीं रहीं हैं..मैं जो कह रहा हूँ...अच्छा आप खुद ही बताइये..अब तक आप कितने मकान बदल चुकी हैं... कुछ दिन के बाद वहाँ भी यही सब शुरू होता है...बेहतर है आप किसी पॉश इलाके में मकान किराये पर लीजिये..पर उसके लिए आपका बजट नहीं है...अब इतने पैसे में तो..ऐसी ही जगह मिलेगी..और बड़ी मुश्किल होती है..मकान ढूँढने में..एक बिन बाप के बच्चे की माँ..." चतुर्वेदी कहते कहते चुप हो गया पर उसकी सांस्कृतिक आँखें आवश्यकता का पर्यटन कर रही थीं

"हाँ चतुर्वेदी साहब...पैसे की समस्या तो है ही..इतने कम किराये को भी समय से नहीं दे पाती..पर क्या करूँ..दिल छिल के रह जाता है जब लोग मेरे बेटे आविष्कार को...नाजायज और न जाने ऐसी कितनी गालियाँ सुना सुना के उसका मजाक बनाते हैं...नाजायज का ये ताना वो मासूम क्या जाने..." आवश्यकता की आवाज भर्रा गयी पर उसने खुद पे नियंत्रण किया पराये मर्द के सामने वो खुद को कमजोर नहीं दिखाना चाहती थी

"हम्म..अच्छी तरह समझता हूँ...वैसे आपका बेटा आविष्कार बहुत प्यारा लड़का है..और तेज दिमाग का भी है...अगर उसको कोई धनवान पिता का साया मिल जाए..जो उसको अच्छे स्कूल में पढ़ा लिखा सके..तो बहुत नाम करेगा..आपसे एक बात कहता हूँ..बुरा न मानियेगा..किसी पैसे वाले से शादी कर लीजिये..अभी तो आप जवान हैं...तीस से ज्यादा की नहीं होंगी..अगर आप कहें तो मैं आपसे..."चतुर्वेदी ने बड़ी धूर्तता से अपनी विधुरता को बदलने का प्रयास किया

"शायद आप ठीक ही कहते हैं...आवश्यकता आविष्कार की जननी है मगर धन उसका वो पिता है जिसके अभाव में आविष्कार जुगाड़ या कबाड़ बन के रह जाता है" उसने डूबी आवाज में चतुर्वेदी से कहा और इस बार कंधे से थोड़ा सरक आये आँचल को ठीक करने का कोई प्रयास नहीं किया।

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Monday, 29 February 2016

उन्तीस फरवरी

"तू शायर है..मैं तेरी शायरी..तू आशिक है..मैं तेरी आशिकी..तुझसे मिलने का मन करता है..ओ मेरे साजन" सन 1992 की हल्की सर्दियों की शाम थी चौपटियाँ चौराहे पे पुत्तन पान वाले के यहाँ गाना बहुत जोरों से बज रहा था पुत्तन की दुकान से सटी मुन्ना की किराने की दुकान पे निर्मला सकुचाई सी खड़ी थी दुकान पे भीड़ बहुत थी बहुत से धनवान लोग मुन्ना की दुकान से महीने भर का राशन ले रहे थे

"हाँ बताओ..तुम्हें क्या चाहिए.." मुन्ना ने गंदे कपड़े पहने खड़ी निर्मला को देखा और उसे जल्द रफा दफा करने के उद्देश्य से पूछा

"भइया.. एक किलो आटा... और अठन्नी का कड़वा तेल दे दो..और चवन्नी का नमक मिर्ची..." धीमी आवाज में निर्मला ने कहा

मुन्ना एक किलो आटा एक पन्नी में बाँध चूका था..और नमक की पुड़िया बाँधते हुए उसने पूछा "तेल के लिए शीशी लाइ हो?"

निर्मला ने अपने हाथ में पकड़ी पुरानी दवा की एक खाली शीशी उसकी ओर बढ़ाई मुन्ना ने झट से उसमे तेल नापा और उसे शीशी पकड़ाने के बाद दोनों हाथों को अपने बालों में पोछा और हिसाब लगा कर बोला " साढ़े सात रुपैये" निर्मला ने अपने पल्लू में बंधे नोट को निकालने के लिए गाँठ खोलने लगी

"अरे..पहले से नहीं निकाल पाई..हद है..बांधे ऐसे हो जैसे बड़ा खजाना होवे..जल्दी करो.."मुन्ना ने झुंझलाते हुए उससे कहा और अगले ग्राहक का परचा ले सामान निकालने लगा,किसी तरह पल्लू की गाँठ खुली और निर्मला ने उसे पैसे दिए और सामान ले घर की ओर चली रास्ते में उसने सब्जी के नाम पे अठन्नी के आलू भी खरीद लिए

ये उसका रोज का काम था..हर शाम जब उसका पति कमलेश दिहाड़ी करके आता..और उसे आठ रुपये देता..तब वो मुन्ना की दुकान दौड़ती सौदा लाने को..रोज कुआँ खोदना और रोज पानी पीने वाली हालत थी उनकी

निर्मला घर पहुँच के खाना बनाने लगी उसने अभी लाई आटे की पन्नी से एक मुट्ठी आटा निकालकर डालडा के एक बड़े प्लास्टिक के डिब्बे में डाला और बाकी आटे को गूंथने लगी

"निम्मो..सेठ ने कल छुट्टी रखी है मंडी में..कह रहा था काम गोदाम में होगा पर हिसाब के लिए मुनीम नहीं आएगा..तो..कल पैसा न मिलेगा..पता नहीं ई साले सेठ 29 फरवरी को कौन सा जश्न मनाते हैं" कमलेश ने बीड़ी सुलगाते हुए कहा

"ओह्ह..पर फरवरी में अबकी एक दिन बढ़ कैसे गया..वैसे तो 28 दिन की ही फरवरी होती है न" निर्मला ने आलू काटते हुए पूछा

"अरे..यहाँ मैं परेशान हूँ..कल खाएंगे क्या..और तुझको..फरवरी की गणित की पड़ी है..अच्छा सुन मुनीम जी बताये थे कि..धरती सूर्य का चक्कर एक साल और चौथाई दिन में लगाती है..तो ई ससुरा चौथाई दिन बढ़ते बढ़ते चार साल में एक दिन के बराबर हो जाता है..तो इसको उसी साल की फरवरी में जोड़ देते हैं...जिससे हिसाब किताब ठीक रहता है..अब क्या हिसाब किताब ठीक रहता है..ये हमको नहीं पता.. यहाँ अपना हिसाब तो गड़बड़ा गया है...लगता है कल भूखा रहना पड़ेगा"

"आप परेशान मत होइए..इतनी गणित तो हम नहीं जानते....पर हमारी माँ ने हमको सिखाया था..जब भी आटा लाओ..तो एक मुठ्ठी आटा अलग निकाल के एक बर्तन में डाल दो...अब घड़ी दो घड़ी की खुरचन से भगवान एक पूरा दिन बना देते हैं..तो हम भी...रोज की एक मुठ्ठी आटा से..कल अपने लिए..एक दिन का खाना बना देंगे" कहकर निर्मला ने डालडे का वो पीला डिब्बा कमलेश को दिखाया जिसमे रोज का बचाया आटा था

"वाह..निम्मो रानी..कमाल कर दिया तूने तो..अब जबकि एक दिन अधिक हो गया है तो तुझे और अधिक प्यार तो करना होगा" कमलेश के दिल से बोझ उतर गया और वो निर्मला को गले लगाने को आगे बढ़ा

"धत" कहकर निर्मला ने अपना मुँह पल्लू में छुपा लिया।

29 फरवरी हमें सिखाती है कि आज की छोटी छोटी बचत कल हमारे बहुत काम आ सकती है ।

-तुषारापात®™

Friday, 26 February 2016

कारोबार

के कोई तो चाहिए जिसके नाम पे बाज़ार लगे
चल तुझे ईसा बना के सलीबों का कारोबार करें


-तुषारापात®™

Tuesday, 23 February 2016

मौन

तुम्हारे खोखले शब्दों से ज्यादा मुझे तुम्हारा ठोस मौन पसंद है ।

-तुषारापात®™

Monday, 22 February 2016

हासिल

जो दहाई तक न पहुँचे उन्हें सब हुआ 'हासिल'

#आरक्षण_की_गणित
-तुषारापात®™

Thursday, 18 February 2016

कुंडली मिलान

"चिनॉय सेठ ! ..जिन घरों की छतें..आपस में मिली हुई होती हैं..उन घरों के लड़के लड़कियों की...कुंडलियाँ नहीं मिलायी जाती"

-तुषारापात®™

Monday, 15 February 2016

त्रिवेणी

"अरे..अरे..ये क्या..मुझे सर्दी लग गई तो" आयत ने अपने सर के ऊपर आई पानी की बूंदे पोछते हुए वेद से कहा

"गंगा के जल को तुम्हारी माँग में भर रहा हूँ.." वेद ने उसकी ओर एक और छींटा मारते हुए कहा

"क्यों गंगा को अपवित्र कर रहे हो...आयत गंगा में घुल गई तो काशी में तुम्हारे पापा इससे स्नान भी न करेंगे" आयत ने हँसी हँसी में कड़वी सच्चाई कह दी

"जिस गंगा के किनारे बड़े बड़े वेद पुराण विकसित हुए हों वो क्या एक आयत से अपवित्र हो सकती है...खैर...आज वैलेंटाइन डे पर...संगम की ये हसीं शाम..नाव पे तुम्हारा साथ... कम से कम आज तो ख्वाबों में तैरने दो...यथार्थ की जमीन पे तो रोज चलते ही हैं" वेद ने चुभी हुई सच्चाई के काँटे को गंगा में बहा देना चाहा

"हाँ ये तो है..पर वैलेंटाइन डे पर कोई लड़का किसी लड़की को तीर्थ पे लेकर आता है क्या..बुढऊ हो तुम तो.." आयत ने ठिठोली की

"देखो...प्रेम का इससे अच्छा उदाहरण और कहाँ मिलेगा... देखो इस संगम को... यहाँ रोज ये नजारा रहता है.. ये किसी खास दिन का मोहताज नहीं.. रोज ही गंगा यमुना का संगम होता है यहाँ.. यमुना अपना सबकुछ गंगा में समाहित कर देती है..सबकुछ...अपना नाम तक.. पवित्र प्रेम की पराकाष्ठा है यहाँ" कहकर वेद उसका हाथ अपने हाथ में लेकर संगम के जल में डुबो देता है..ठंडा पानी उनके हाथों की गर्मी सोखने लगा

आयत चप्पू की तरह जल में अपना और उसका हाथ चलाने लगती है.."हाँ..पर इससे आगे कोई इसे संगम का जल नहीं कहता... सब इसे गंगा ही कहते हैं... शायद लोग 'गंगा' में 'जमुना' का मिलन नहीं स्वीकार करना चाहते.. यमुना गंगा से मिलकर..गंगा होकर पवित्र हो जाती है..मगर आयत कभी ऋचाओं जैसी पवित्रता नहीं पा सकती...आयत और वेद का संगम समाज को स्वीकार नहीं है....आयत ने डबडबाई आँखों से डूबते सूरज को देखते हुए कहा

"हाँ ये संगम उन्हें स्वीकार नहीं है..पर जानती हो क्यों..क्यों ये संगम स्वीकार नहीं है ?"वेद ने ऐसे कहा जैसे उससे पूछ न रहा हो बल्कि खुद को बता रहा हो

"क्यों" आयत की आँखें किसी भी क्षण बस पिघलने वाली थीं

"क्योंकि सही ज्ञान देने वाली सरस्वती बहुत पहले ही विलुप्त हो चुकी है" कहकर वेद अपने दोनों हाथों में संगम का जल भर के आयत की ठोड़ी के पास ले गया आयत की बाँयी आँख से एक धारा पिघल आई और संगम के जल में जा मिली त्रिवेणी पूर्ण हो चुकी थी ।

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Thursday, 11 February 2016

नाजायज औलादें

"हाय हाय...पापा गो बैक ...पापा गो बैक..पड़ोसी अंकल हमारा बाप है.. हम नजायज औलाद साबित होने तक लड़ेंगे...हर घर से नाजायज निकलेंगे"

कल को जब कोई तुम्हारी माँ का बलात्कार करने का प्रयास करे और जब उसे पकड़ के फाँसी दे दी जाय तो तुम उसका भी खूब जोर शोर से शहीद दिवस मनाना और जोर जोर से यही चिल्लाना यही नारे लगाना

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है तो इसका मतलब ये नहीं कि तुम राष्ट्रद्रोही बातें करो जिस आतंकवादी ने देश पे हमला किया और जिसे न्यायिक व्यवस्था ने दोषी सिद्ध किया उसे तुम हीरो बनाओ शहीद का दर्जा दो मैं पूछता हूँ
क्या ये न्यायपालिका की अवमानना नहीं ?
देश के लिए शहीद हुए सैनिकों का अपमान नहीं ?
और सबसे बड़ी बात क्या ये राष्ट्र का अपमान नहीं ?

कभी कश्मीर में ISIS के झंडे फहराये जाते हैं तो कभी JNU में भारत विरोधी नारे लगते हैं आखिर इन घटनाओ को बर्दाश्त क्यों किया जा रहा है मैं पहले भी अपने कई लेखों/कहानियों के माध्यम से कह चूका हूँ कि राष्ट्रविरोधी किसी भी गतिविधि और आतंकवाद का किसी भी रूप में यहाँ तक की मौखिक समर्थन करने वालों पे कड़ी कार्रवाई शीघ्र होनी चाहिए एक दो बार ऐसी कार्रवाई होगी तो अपने आप इन जैसे लोगों के दिमाग ठिकाने लग जाएंगे और इनका अप्रत्यक्ष समर्थन करने वाले भी चुप बैठ जायेंगे

जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करते हैं बहुत ज्यादा जरूरत है ऐसे लोगों के सरों में छेद बना देने की, रोग सर्प और शत्रु को उनकी प्रारम्भिक अवस्था में ही दमन कर देना चाहिए नहीं तो वो विकराल रूप धर लेता है
अगर सही समय पे कार्रवाई नहीं की गई तो हम नपुंसक ही सिद्ध होंगे लोकतंत्र के नाम पे ओढ़ी हुई इस नपुंसकता का त्याग करने का ये उचित समय है वरना बहुत देर हो जायेगी

ये एक सुनियोजित बौद्धिक आतंकवाद है सेक्युलरिज्म,सोशल जस्टिस, ह्यूमन राइट्स, समानता, वीवेन् एम्पावरमेंट अधिकार आदि के नाम पे युवाओं का ब्रेन वाश किया जा रहा है उनके दिमाग में जहर बोकर उन्हें बाग़ी बनाया जा रहा है देश में ही देश के विरोधी तैयार किये जा रहे हैं जिसके लिए सोशल मीडिया का भी खूब गलत प्रयोग हो रहा है पर एक बात युवाओं को बहुत अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए इच्छाधारी सर्प अगर नेवले का रूप ले लें तो भी वो भीतर से सांप ही रहते हैं वे नागों का पोषण ही करते हैं चाहे वो ऊपर से कितना भी ये दिखाएँ कि वो साँपों का संहार कर रहे हैं

आज बहुत आवश्यकता है कि हम ऐसे रूप बदलने वाले नागों को जो नेवला बन साँपों को तैयार कर रहें हैं उन्हें तुरंत कुचल दें और उनके लिए जो जरा सी भी बीन बजाता दिखे उसे तुरंत पोटली में बंद करें और इतना मारें कि अगली बार कोई बीन उठाने की हिम्मत न कर सके।

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Tuesday, 9 February 2016

अधूरा वाक्य

"तुम्हारा दिमाग तो ठीक है....ऐसी बाजारू लड़की के साथ घूमते फिरते हो...पूरी सोसायटी में नाक कटवाते फिर रहे हो...अपनी नहीं तो..कम से कम अपने इस इज्जतदार बाप की तो परवाह की होती...लोग क्या कहेंगे इतना बड़ा पत्रकार का बेटा...एक वेश्या के यहाँ आता जाता है.." एक बहुत बड़े पत्रकार जो टीवी पे आते हैं अपने जवान बेटे पे सुबह सुबह भड़क रहे थे

"पर पापा...मैं रागिनी से प्यार करता हूँ..और वो वैश्या नहीं है..लोगों ने उसे यूँ ही बदनाम कर रखा है मैं तो उसे सहारा दे रहा हूँ..." बेटे ने कहा

"चुप रह नालायक...जबान लड़ाता है...मुझे समझायेगा तू कौन क्या है..." रिपोर्टर साहब बेटे पे गरजे और अपनी पत्नी से बोले" सुनो इसे अच्छी तरह से समझा दो...अगर इसने ये सब हरकतें बंद नहीं की तो..मैं इसे घर से बाहर निकाल दूँगा...मैं स्टूडियो जा रहा हूँ" कहकर वो घर से बाहर अपनी कार में बैठ स्टूडियो आ गए

स्टूडियो में पहुँचते ही पत्रकार महोदय ने स्क्रिप्ट हाथ में ली और असिस्टेंट से पूछा "वो आ गई ?"

"नहीं सर..अभी नहीं आई..मेरी बात हो गई है वो रास्ते में हैं" असिस्टेंट ने जवाब दिया

"राजीव..आज का इसका इंटरव्यू आग लगा देगा..देखना तू..आज अपने चैनल की टी आर पी आसमान छुएगी...एक काम करना इंटरव्यू के बीच बीच में इसकी हॉट वाली ...मतलब वैसी वाली फोटो धुंधली करके लगा देना..समझ गए न" रिपोर्टर साहब खुशी से उछल रहे थे इतनी ही देर में वो मोहतरमा आ गईं जिनका इंटरव्यू होना था सब कुछ तैयार था इंटरव्यू शुरू हो गया

"सनी जी एक बात बताइये...आप एक बहुत प्रसिद्ध पॉर्न स्टार रही हैं.. फिर ये बॉलीवुड में आने का कैसे सोचा आपने...आई मीन टू से...आपको हिचक नहीं हुई... कि भारत जैसे एक सांस्कृतिक देश में आपको स्वीकार कर लिया जाएगा" उन्होंने एक एक शब्द पे बड़ा जोर देते हुए पूछा

"लुक... मुझे कोई हिचक नहीं हुई क्योंकि..आपके इण्डिया में ही मैं सबसे ज्यादा पॉपुलर रही हूँ..तो यहाँ तो...मुझे आना ही था" मोहतरमा ने बोल्डली अपना उत्तर दिया

ऐसे ही तमाम प्रश्न और उत्तरों का दौर चला और इंटरव्यू खत्म हुआ रिपोर्टर साहब ने अपने केबिन में उन मोहतरमा के साथ कुछ फोटो खींचने को अपने असिस्टेन्ट को कहा और हिदायत दी की इनमे जो सबसे अच्छी फोटो आये वो फ्रेम कराकर उनके केबिन की सेलिब्रेटी वाल पे टाँग दी जाय और मोहतरमा को उनकी गाड़ी तक बिठाने आ गए

"थैंक यू...सो मच...आपने मेरी बहुत हेल्प की...मैं अगर आपके किसी काम..."मोहतरमा ने बड़ी अदा से कार में बैठते हुए जानबूझकर अपना वाक्य अधूरा छोड़ दिया

"जिस काम में मैं एक्सपर्ट था वो मैंने किया...अब आप जिसमे एक्सपर्ट.."रिपोर्टर ने भी अपना मतलब पूरा होते देख अपना वाक्य अधूरा छोड़ दिया

"जरूर...आई विल काल यू.." कहकर मोहतरमा चली गईं

इधर रिपोर्टर का बेटा ये इंटरव्यू देख कर ये समझने की कोशिश कर रहा था कि बंद कमरे में एक समय में एक पुरुष के सामने धन के लिए नग्न होने वाली को वैश्या कहते हैं और सम्पूर्ण विश्व के सामने नग्न होने वाली को.....उसने भी अपने मन में ये वाक्य अधूरा छोड़ दिया।

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Tuesday, 2 February 2016

नास्तिक

"आप से कुछ पूछना चाहता हूँ"

"हाँ हाँ पूछिये"

"हो सकता है मेरी बातों से आपको अच्छा न लगे..पर मेरे मन में ये बात बार बार उठती है..तो..अगर आपको बुरा लगे तो मैं पहले ही क्षमा माँगता हूँ"

"अरे..ऐसी कोई बात नहीं आप निंसंकोच पूछिये"

"देखिये..मैं एक नास्तिक हूँ..ईश्वर में विश्वास नहीं करता..मूर्ती पूजा धार्मिक कर्मकाण्ड पूजा पाठ इबादत नमाज इन सबको नहीं मानता ...मैंने इससे जुड़े सारे विचारों और सारी मान्यताओं का गहन अध्ययन भी किया है बहुत सारा विरोध भी सहा है...स्वामी विवेकानंद जी का राजा साहब को उनकी तस्वीर के लिए दिया गया वो उत्तर भी जानता हूँ और बुद्ध को मानने वालों को उनकी ही मूर्ति बनाते और पूजते भी देखा है...और ये भी सुना है कि ईश्वर को न मानना भी उसको स्वीकार करने जैसा है"

"मैं आपकी बात तो समझ रहा हूँ..पर ये समझ नहीं पा रहा हूँ कि आप मुझसे क्या पूछना चाह रहे हैं आप खुद ही अपने प्रश्न रख रहे हैं और उत्तर भी स्वयं रख रहे हैं"

"देखिये मैंने पहले ही आपसे कहा था..कि.शायद आपको अच्छा न लगे... पर मेरी परेशानी समझिये...मैं जानता हूँ कि आप धार्मिक और आध्यात्मिक इंसान हैं इसलिए सोचा आपसे...मैंने देखा है आप रोजमर्रा की बातों से कई कहानियाँ बनाते हैं और वो बड़ी कमाल की होती हैं कई बार उन्हें पढ़के मुझे राह सूझ जाती है...मैं बहुत बड़ी बड़ी बातों से ऊब चूका हूँ...ग्रंथों को पढ़ पढ़ कर भी समझ नहीं सका कि इस वक्त मेरी स्थिति क्या है मैं नास्तिक हूँ या नहीं बस यही मैं आपसे समझना चाहता हूँ वो भी कोई ऐसी रोजमर्रा की चीज से समझा दीजिये जो बहुत साधारण सी हो...प्लीज"

"हम्म...लीजिये चाय आ गई...मैं बनाता हूँ आपके लिए...चीनी कितनी एक चम्मच?"

"नहीं मुझे डायबिटीज है...शक्कर नहीं लेता...ऐसे मौकों के लिए सुगर फ्री रखता हूँ जेब में हमेशा...मैं इसकी दो गोलियाँ मिला लूँगा"

"ओह्ह...अच्छा अगर मैं ये कहूँ कि चीनी मात्र एक माध्यम है मीठे स्वाद को पाने के लिए और ये जो मिठास है वही ईश्वर है तो?...आपने चीनी छोड़ दी और स्वयं को नास्तिक घोषित कर दिया पर मिठास तो आप अभी भी चख रहे हैं बस माध्यम बदल दिया है...यही है आपकी स्थिति...लीजिये बिस्किट लीजिए।"

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Sunday, 31 January 2016

मध्यान्ह

अभिमान का सूर्य,सर पे चढ़ के,विनम्रता की परछाई छोटी कर देता है ।

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Friday, 29 January 2016

adultery warning

Seeing of 'MASALA' is injurious to sex -adultery warning

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Thursday, 28 January 2016

साड़ी vs दाढ़ी

'तेल' : 'खाड़ी युद्ध' करवा चुका है और अब 'साड़ी vs दाढ़ी युद्ध' करवा रहा है ।

#शनि_ शिंगणापुर
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Wednesday, 27 January 2016

कुछ नहीं हो सकता इस देश का

"कुछ नहीं हो सकता इस देश का...एक सरकार कुछ कड़े कदम उठाती है ..तो दूसरी पार्टी उन्हीं नियमों का....मुद्दा बनाके ....अगले चुनाव में अपनी सरकार बना लेती है और .....वो सारे कायदे कानून ठन्डे बस्ते में डाल दिए जाते हैं...लोग खुद सुधार नहीं चाहते "तुषार सिंह ड्राइंग रूम में बैठे अपने घनिष्ठ मित्र संजय से बड़ी ज्ञान ध्यान की बातें कर रहे थे

"हाँ..बिल्कुल सही कह रहे हो...तुम तो खूब लिखते रहते हो इन सब बातों पे...दरअसल मैं इसलिए तुम्हारे पास आया था...ऐसे ही एक मुद्दे पे...तुम्हारा एक लेख मिल जाता मुझे तो काम... बन जाता..." संजय ने कहा

"पर तुम्हें क्या जरूरत पड़ गई..मेरे लेख की.." तुषार सिंह ने आश्चर्य से पूछा

"यार..26 जनवरी के एक फंक्शन में चीफ गेस्ट बनके जाना है.. अरे वो अपना मिश्रा है न..उसके ही स्कूल में..तो तेरी लिखी स्पीच मार दूँगा.. और तालियाँ बटोर लूँगा हा हा हा " संजय ने आँख मारते हुए कहा

"हा हा हा...ठीक है ..रुक...अभी लिख देता हूँ..." तुषार सिंह ने हँसते हुए अभी ये कहा ही था कि उनकी पत्नी ट्विंकल की किचेन से आवाज आई

"कुछ जरुरी सामान ला दो पहले..फिर लिखने बैठना..राहुल भी आज नहीं आया है..चार पाँच चीजें हैं..तुम ले आओ प्लीज़..और हाँ भूल न जाओ इसलिए पर्चा बना दिया है"

"क्या यार..तुम्हारा भी न..अच्छा लाओ ला देता हूँ..संजय तू बैठ..चाय पी..मैं अभी आता हूँ..कहकर उन्होंने परचा लेकर जेब में डाला और और टहलते हुए पास की किराने की दुकान पे पहुँच गए और पर्चे की लिखी दस बारह चीजें निकलवा लीं दुकानदार ने पैसे काटे और दूसरा ग्राहक देखने लगा

"अरे..भाई ले कैसे जाऊँगा..कुछ पन्नी वन्नी तो दो.." तुषार सिंह ने दुकानदार से कहा

"भाई साहब..सरकार ने पॉलिथीन पे बैन लगा दिया है...पलूशन बहुत होता है इससे..और कितने पशु इनको खाकर मर जाते हैं"दुकानदार ने कहा

"अरे यार..वो सब तो ठीक है..देखो एक आध पड़ी हो तो दो.." उन्होंने कहा

"न साहब..झोला लेकर चलने की आदत डालिये..वैसे भी पन्नी देने और लेने वाले पर अब सजा भी लागू है..आपकी एक पन्नी के लिए अपनी दुकानदारी चौपट कर लूँ क्या.." दुकानदार और ग्राहकों को डील न कर पाने के कारण झुँझला के बोला

"बात कैसे कर रहा है तू...मुझे क़ानून मत समझा..चुपचाप एक पन्नी में सारा सामान डाल के दे" तुषार सिंह तैश में आ गए और लगे दुकानदार को हड़काने लगे "तू मुझे जानता नहीं..मैं कौन हूँ..बड़ा आया कानून समझाने वाला.. कितने लोगों को मैं ज्ञान देता रहता हूँ..और तू मुझे समझा रहा है"

"ये लो..आप अपने पैसे वापस पकड़ो..पन्नी होती भी तो अब नहीं देता.. और अब सामान भी नहीं दूँगा.. दूसरों को सब ज्ञान देते हैं..पर खुद मानने पे आये तो धौंस दिखाते हैं..."दुकानदार ने गुस्से में पैसे उनको वापस कर दिए और सामान वापस अंदर रख लिया

तुषार सिंह अपना सा मुंह लेकर वापस घर में आ गए..उनकी पत्नी ने पूछा
"अरे सामान नहीं लाये..क्या हुआ ?"

"यार दिमाग मत खराब करो..अभी थोड़ी देर में जाऊँगा..एक कप चाय पिलाओ पहले..और हाँ..एक झोला देना मुझे...कुछ नहीं हो सकता इस देश का" आखिरी पंक्ति बुदबुदाते वो ड्राइंग रूम में चले गए ।

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Saturday, 23 January 2016

नेताजी अमर रहें

नेताजी को सच्ची श्रद्धांजलि देनी है तो ये मत कहिये

"तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूँगा"

ये तो उन्होंने हमसे कहा था अब हम उन्हें अपने जवाब में ये कहें जो वो हम सबसे सुनना चाहते थे

"मैं तुम्हें खून देता हूँ सुभाष! तुम मुझे आजादी दो"

जय हिन्द!

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Friday, 22 January 2016

सड़क का सीना

आज हमारे लखनऊ में माननीय प्रधानमंत्री जी आये जिससे हमारे यहाँ की सड़कें 56 इंच ज्यादा चौड़ी देखीं गईं

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इत्र

"आयत..इश्क इत्र की तरह होता है..ये..जिससे होता है वो तो महकता है...पर जिसे होता है वो ...बस...खाली शीशी सा रह जाता है" अपने हाथ में पकडे खाली ग्लास को उसे दिखाते हुए मैंने कहा

"एक पैग लगाने के बाद...ये शायराना होने की आदत गयी नहीं तुम्हारी... वेद..जानते हो खुश्बू की भी एक उम्र होती है..लगती है..खूब महकती है और.. फिर हवा में गुम हो जाती है..उसे बाँध के नहीं रखा जा सकता.."उसने मेरे हाथ से ग्लास लेकर टेबल पे रखते हुए सूनी आँखों से कहा

"शायद..पर इतने सालों बाद..आज फिर ये खुश्बू मेरे सामने है..और इत्र की खाली शीशी उसे भर लेना चाहती है.." मैंने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की

"वेद..नो..कंट्रोल...योर सेल्फ..मुझे भी बड़ा अजीब लगा था ये जानकर कि तुम और हदीस दोनों एक ही कंपनी में हो...और देखो..एक ही शहर... यहाँ लखनऊ में पोस्टेड हो..आई मीन....मतलब यार..ये कोई फिल्म है क्या... आये दिन किसी न किसी पार्टी में तुमसे सामना हो जाता है.." हदीस पे अपनी नजर जमाये हुए उसने कहा

"जानती हो अब मन करता है...शादी कर लूँ.. तुमसे भी सुन्दर किसी लड़की से ..शायद उसकी कमर में मेरी बाहें देखकर तुम्हें अहसास होगा कि मुझे कैसा लगता है जब हदीस..."बात अधूरी छोड़ के मैंने एक सिगरेट सुलगा ली और उसकी उस लट को देखने लगा जो उसे हमेशा परेशान करती थी

"अच्छा लगेगा..मुझे बहुत खुशी होगी..जल्दी शादी कर लो..तब शायद तुम मेरा दर्द बेहतर समझ पाओगे...शायद...तब भी नहीं" उसने अपनी उस लट को कान पे चढाने की नाकाम कोशिश की..हमेशा की तरह...और मेरे हाथ से सिगरेट छीन के फेंक दी

"वैसे यूँ भी मिलना बुरा नहीं है..इतने सालों बाद फिर से वही कशमकश होती है...कौन सी साड़ी पहनूँ..कैसा मेकअप करूँ...दिल में हल्की ही सही पर एक गुदगुदी तो होती है..कि पार्टी में तुम्हारी आँखें मुझे देख रही होंगी" उसने दाँतो से अपने निचले होठ को हलके से चुभलाते हुए कहा...ये वो तब किया करती थी जब थोड़ा सा शरमाती थी और किसी बात पे थोड़ी अनमनी सी होती थी


"पर मुझे तो तुम विद आउट मेकअप ज्यादा अच्छी लगती हो जैसे सुबह सुबह उठती थीं बिलकुल रॉ ब्यूटी..." पुरानी यादों में चला गया था मैं

"मेरे लिए अभी भी तैयार होती हो..खाली शीशी से...उसकी बची हुई.. खुश्बू भी चुराई जा रही है" मैंने बनावटी शिकायत की

"वेद... एक कबाड़ी के लिए सेन्ट की खाली शीशी बड़ी कीमती होती है"
एक पुकार सी लगी मुझे उसकी इस बात में

मेरी आँखे उसकी आँखों में थीं और मेरे मुंह से बड़ी धीमी आवाज निकली
"काश..ये आयत..मुझपे उतरती"

उसकी पलकों पे ओस उतर आई...उसके होठ मानो मेरे होठों से लगकर.. मुझमें ....इत्र ही इत्र भर देना चाहते थे..पर दूर खड़े हदीस को देखते हुए उसने बस मुझसे ये कहा और मेरे पास से उठकर उसके पास चली गई "आयतें...वेद की नहीं हुआ करती"

#वेद_की_आयत_:_01

-तुषारापात®™

Tuesday, 19 January 2016

बीमार : ठाकुर या लोकतंत्र

"माफ कर दीजिये..मालिक..मालिकन जाते जाते हमसे कह गईं थीं..कि कि...मालिक का हाजमा दुरुस्त नहीं है...खाना हल्का बना के ही देना" रसोइये ने जमींदार साहब के बेंत से खुद को बचाते हुए कहा

"सूअर की औलाद...हमारा हाजमा सही नहीं है...या तू अपनी मर्जी से काम करने लगा है...कुत्ते के पिल्ले..हमें...जमींदार ..ठाकुर भवानी सिंह को... तू ये लौकी टमाटर की सब्जी परोसता है...रसोइये जो तू बाहमन न होता तो आज तेरी खाल खिंचवा लेता मैं" ठाकुर गुस्से से उसपे बेंत बरसाते हुए बोला

"गलती हुई गई...अरर..आगे से नहीं होगी..मालिक" रसोइया ठाकुर के पैर पकड़ के बोला,ठाकुर ने फिर भी उसे पीटना बंद नहीं किया मारते मारते उससे कहा "तू हमारा नौकर है...या मालिकन का...तुझे हमसे पूछना चाहिए था...तू भूल गया ठाकुरों के यहाँ चाहे औरतें हो या दलित दोनों की कीमत इन लौकी तुरई से ज्यादा कुछ नहीं है..और तू हमें यही सब्जियां खिलाने चला था..दूर हो जा हमारी नजरों से नहीं तो..."

रसोइया जल्दी से उठा और जैसे कोई हिरन शेर के जबड़े से निकल कर भागता है उससे भी तेजी से वो अपने लड़के को लेकर हवेली से बाहर दौड़ गया, जमींदार की क्रूरता और शौक का ये अद्भुत रूप घर के सभी नौकर चाकर और घर की औरतें भी देख रहीं थीं पर सब चुप थे सहमे थे पर मन ही मन आक्रोशित थे

और जैसे कि कहते हैं वक्त के पैर नहीं होते वो एक साँप की तरह रेंगते रेंगते अपनी केंचुल उतार के बदल जाता है वैसे ही अब ठाकुर भवानी सिंह बुढ़ा चुके हैं जमींदारी खत्म हो चुकी है देश आजाद हो चूका है धन सम्पदा की स्थिति बूढ़ी वैश्या के कोठे सी है ठाकुर अपनी बीमारी के कारण एक तीन टाँगों वाले अपने खानदानी पलंग पे पड़े हैं और एक दलित डॉक्टर के रहमोकरम पे हैं

"ठाकुर साहब..आपके इलाज में दवा से ज्यादा..परहेज की जरूरत है.. आप अपने खान पान में विशेष सावधानी बरतिये...सिर्फ उबली लौकी खाइये जरा सा भी मिर्च मसाला आपको भवानी माँ से मिलवा सकता है" चेहरे पे एक कुटिल मुस्कान लिए वो उनसे कहता है और ठाकुर असहाय से उसे जाते हुए देखता रह जाता है

डॉक्टर ठाकुर की पुरानी हवेली से बाहर निकल के कुछ दूर चलता है और एक विशाल मकान में आ जाता है एक व्यक्ति उससे पूछता है "क्या हाल है ठाकुर के..मरा नहीं अभी तक... खाने में लौकी ही बताई है न ...हमारे बाबूजी को इसी लौकी के कारण ...पीट पीट कर निकाल दिया था ससुरे ने.. "

"राम बाबू ..चिंता न करो..सब कुछ तुम्हारे बताये अनुसार ही कर रहा हूँ..ठाकुर को न मरने दूँगा..और न ही..जीने दूँगा.. मैं जानता हूँ कि उसके ठीक होने के लिए ये...लौकी तुरई के साथ साथ ...प्याज लहसुन और हल्के मसाले की सब्जी भी बहुत जरुरी है....पर मैं ये बात उसे कभी नहीं बताऊँगा..बस तुम हमारा ख्याल रखो आखिर हमारे जैसों दलितों के नाम पे ही तुम विधायकी जीते हो " डॉक्टर ने सच बात चापलूसी वाली जबान में हँसते हुए कही

"अपनी चिंता तुम हमपे छोड़ दो...बिल्कुल न डरो....बस इस ठाकुर को ऐसे ही तड़पाओ..और इसकी भनक भी इसे बिलकुल न लगने देना...कि इसकी सेहत के लिए सारी सब्जियाँ बहुत जरुरी हैं... इसके यहाँ लौकी तुरई..दलित के जैसे अछूत थे न...अब तुम प्याज लहसुन जैसे सवर्ण को उसके यहाँ ऐसे ही दलित बनाये रहो...बस तुम ठाकुर को बीमार बनाये रखो ..और मैं इस लोकतंत्र को.."

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Monday, 18 January 2016

नमाज या अंदाज

तू खुदा बदल/मस्जिद बदल/नमाज़ बदल
होगी दुआ पूरी/बस जरा अपने/अंदाज बदल

-तुषारापात®™

Sunday, 17 January 2016

सोया आलू

मुझे अपनी माँ के हाथ की बनी सोया आलू की सब्जी (सोया मेथी वाला सोया) लेकिन बगैर मेथी के बहुत पसंद है जब तक उसका सीजन रहता है मैं बहुत चाव से उनसे बनवा के खाता रहता हूँ।

बस मेरी उनसे हर बार एक ही शिकायत रहती है कि वो उसमे आलू कम और सोया ज्यादा से ज्यादा रखें पर वो चाहें जितना भी कम आलू रखें ज्यादा ही हो जाता है,उनसे जब भी पूछता तो वो हँस के कहतीं पता नहीं कम तो करती हूँ पर बनने के बाद सब्जी में आलू ही आलू दिखता है सोया न जाने कहाँ गायब हो जाता है । मुझे एक समय ये तक लगने लगा की वो जानबूझ कर आलू तो नहीं डाल देतीं कि शायद कहीं उन्हें ऐसी ही सब्जी पसंद हो।

आख़िरकार इसके पीछे का कारण तलाशने का मैंने सोचा और उनसे पूछा की ऐसा क्यों हो जाता है ? बातों बातों में मुझे ये रहस्य समझ में आ गया जब उन्होंने ये बताया "बेटा तुम्हारे पापा को भी ये सब्जी बहुत पसंद थी पर वो इसमें आलू ज्यादा पसंद करते थे और अगर सोया ज्यादा हो जाये तो वो काफी गुस्सा हो जाते थे यहाँ तक कि खाना छोड़ के उठ जाया करते थे तो उनके हिसाब की सब्जी 40 साल से बनाते बनाते अब आदत ऐसी पड़ गयी है कि मैं चाहे जितना भी आलू कम करना चाहती हूँ कम कर नहीं पाती।"

फिर मैंने पूछा की नाना जी के यहाँ भी तो बनती होगी ये सब्जी वहाँ कैसी बनती थी आखिर आप मायके में इतने साल रही हैं वहाँ की भी कुछ आदतें रही होंगी ? उन्होंने कहा " नहीं वहाँ ये सब्जी बनती ही नहीं थी क्यूंकि तुम्हारे नाना जी को सोया आलू बिलकुल भी पसंद नहीं था, मैं और माँ कभी कभार मेरी मौसी मतलब तुम्हारी नानी की बहन के यहाँ जब जाते थे तो वहाँ सोया मेथी आलू की सब्जी खाने को मिलती थी जो हम दोनों को बहुत पसंद थी।"

इतना कहकर वो अपने किचेन के काम में लग गयी और मैं बस सोचता रह गया की माँ को सोया मेथी आलू पसंद है एक तो ये बात ही मुझे पता नहीं थी ऊपर से मैं उनसे इस उम्र में उनकी 40 साल से पड़ी आदत के विरुद्ध जाने की एक तरह से ज़िद करता रहा और तो और खुद माँ ने पिछले 40 सालों से अपनी पसंद की सोया मेथी आलू की सब्जी चखी भी नहीं।

शायद ये बात आपको बहुत छोटी लगे पर मेरे लिए ये बहुत ही सोचने वाली बात हो गयी पूरी रात मैं भावुक होकर सोया आलू की सब्जी और दीपिका पादुकोण की माय चॉइस में उलझा रहा।

सच में एक नारी स्वयं को अपने पिता के अनुसार फिर पति के अनुरूप और उसके बाद अपने बच्चों के हिसाब से अपने को कितनी सहजता से ढाल लेती है और उसके बाद भी अपने बच्चों के बच्चों के लिए भी वो एक नया रूप ले लेती है पर हम पुरुष ये बहुत ही महत्वपूर्ण बात कभी समझ ही नहीं पाते हम बस पिता,पति और पुत्र के रूप में उसपे अधिकार जमाते रहते हैं।

अब अगर आप कभी भी महिला अधिकार/बराबरी/आरक्षण की बात को समर्थन दें तो उसे संसद में उठाने/लागू कराने की बात से बहुत पहले अपने घर से शुरू करियेगा यकीन मानिये संसद में खुद ब खुद लागू हो जायेगा।

(आज फिर से सोया आलू की सब्जी घर में बनी है तो ये पुरानी पोस्ट आप सबके साथ शेयर कर रहा हूँ आप भी इसे निसंकोच शेयर कर सकते हैं इस सोये आलू से शायद हम जाग सकें ।)

-तुषारपात®™