Tuesday, 8 September 2015

रेतघडी


कभी महसूस किया
रेतघड़ी में बंद रेत का दर्द
जाने कितनी बार
कभी उलट के कभी पलट के
उसे वक्त के पोस्टमैन सा दौड़ाते हो
मीलों का सफर छोटी सी इक डिबिया मेँ
ज़र्रा ज़र्रा उसका गर्म होकर प्यासा है
अब तो उसे काल के इस चक्र से आज़ाद कर दो
नम होकर बिखर जाने दो
समंदर की रेत बन जाने को

-तुषारापात®™

दिल की गुल्लक

सिक्कों सी खनखनाती तुम्हारी हँसी
अपने दिल की गुल्लक में संभाल रखता हूँ
तुम किसी और को देखकर मुस्कुराने लगे
मैं आजकल बड़ा कंगाल रहता हूँ

तुषारापात®™

Monday, 7 September 2015

रौशनी की दुकान

दिख न जाये दिन में उनके ऐब
आँख पे हमारी,आस्था की पट्टी लपेटतें हैं
रात में लगाते हैं रौशनी की दुकान
सुना है वो सूरज की फ़ोटू बेचते हैं
समझ नहीं आता क्या करूँ
रोऊँ कि दिल खोल के हँसू
दीपक की लौ पे नाचने वाले पतंगे
अँधेरा मिटाने की बात करते हैं
-तुषारापात®™

Sunday, 6 September 2015

मन

कुछ बरस पहले मनगढ़ंत ये बात हुयी
बड़े जोर से मन की नाव डूब गयी
मन भर पानी आँखों से रिसता गया
एक तपता रेगिस्तान मन बनता गया
पागल मन मुसाफिर बन चलता रहा
पानी पानी पानी मन ही मन रटता रहा
चलते चलते मन को अपनी नदी मिली
अब तो मन की बरसों की प्यास बुझी
सचमुच की नदी से जब सबकुछ मन का मिलता था
बहलने को मन चाहता क्यूँ फिर एक जादूगरनी मरीचिका ?

-तुषारापात®™

मसले


नाजुक है जरा ध्यान से :-

"
यूँ बातों की एक फूँक में उड़ जाते थे
ठन्डे गरम,अपने सारे मसले
अब लफ़्ज़ों की हवा से ख़ामोशी की आग बढ़ जाती है "

-तुषारापात®™