Wednesday, 28 June 2017

बुद्धिजीवी

बुद्धिजीवी: जो सिगरेट पीते पीते बता देता है कि अगरबत्ती के धुएं से वायु प्रदूषण होता है।

-तुषारापात®

Sunday, 25 June 2017

ईद उल फ़ित्र

मायूसियों की बू पे चढ़ता नहीं अब उम्मीद का इत्र
अयूब के कुनबे से कहूँ कैसे मुबारक ईद-उल-फ़ित्र

-तुषारापात®

Tuesday, 20 June 2017

चश्मों के बाँध

देखकर गैर के काले मनकों में उसकी नथ का सफेद मोती
आँखों की उमड़ती नदी पे हमने चश्मों के काले बाँध रख लिए

-तुषारापात®

परिक्रमा

युक्ति भक्ति और शक्ति में
नहीं रहा द्वंद्व
कलियुग में कृतयुग की
कथा का संबंध?
शक्ति से भक्ति का
रच सकता जो प्रपंच
चाटुकारिता की युक्ति से
तोड़े वो सब बन्ध
आदर्शों के वचनों को
कहने वाला तू
एकाकी कर दिया जाएगा
आकाश की ओर
क्या ताकता?
वह पहले ही से
कथा वाचता
कर रमा-रमापति की परिक्रमा
उमा-नंदन प्रथम पूजन पाते हैं
पूरी पृथ्वी मापित करने वाले
कार्तिकेय श्रापित से रह जाते हैं।

-तुषारापात®

Monday, 12 June 2017

ऑफिसियल मेल


"कुछ कहना होता तो व्हाट्सएप्प नहीं एक मेल आता...कंपनी जॉब इंटरव्यू के रिजल्ट्स व्हाट्सएप्प पे नहीं बताती" उसका रूखा सा रिप्लाई आया

"सुमैरा..मुझे पता नहीं था कि तुम वहाँ की बॉस.." मैं अधूरा ही मैसेज भेज सका

"अब व्हाट्सएप्प मत करना.." उसने रिप्लाई किया और मुझे ब्लॉक कर दिया

अगले दिन अजीब सा ऑफिसियल मेल आया...रिजेक्टेड!.. रिजेक्टेड!... रिजेक्टेड!

मुझे सुमैरा को सात साल पहले कहे अपने शब्द याद आ गए "तलाक!..तलाक!..तलाक!..।"

-तुषारापात®

Monday, 5 June 2017

खुले खत का लिफाफा

नज़र की धार से
खुले ख़त का लिफाफा
गलत ही सही
काट तो दो कभी
सही के दो निशान
कब से यहाँ
नीले होने को तरसते हैं

#√√#तुषारापात®

Sunday, 21 May 2017

एयर कंडिशन्ड लड़का

चलते चलते कार का ए सी अचानक खराब हो गया,दोपहर का टाइम था तो धूप भी बहुत तेज थी,थोड़ी ही देर में विमल के सर से पसीना बहने लगा,वो बड़बड़ाने लगा "ये साले सर्विसिंग वाले भी...अच्छा खासा तैयार होके निकला था..पसीने ने सारे कपड़े खराब कर दिए"

सीतापुर में उसकी बिजिनेस मीटिंग है,अभी वो हाइवे पे पचीस तीस ही किलोमीटर चला था कि ए सी ने काम करना बंद कर दिया था वो पसीने से लथपथ था पर फिर भी कार के शीशे नीचे नहीं कर रहा था हाइवे पे उड़ती धूल और गाड़ियों के शोर से उसे बहुत कोफ्त होती थी।

"धत्त तेरे की..." अचानक लहराती कार को उसने किसी तरह संभाला  कार थोड़ी दूर जाकर ही सड़क के किनारे लग पाई,वो दरवाजा खोल के टायर पे लात मारता है कार का अगला टायर पंचर था गुस्से से तमतमाया वो इधर उधर देखता है कि पता करे पंचर वाले कि दुकान कहाँ है हालांकि उसकी कार में स्टेपनी है पर उसे टायर बदलने का काम बहुत ही खराब लगता है और इस समय तो वो अपने साफ कपड़े बिल्कुल ही खराब नहीं करना चाहता था,वो देखता है जिधर वो जा रहा था उसी ओर थोड़ी दूर पे खप्पर पड़ी कोई चाय वाय की दुकान है,वो उस ओर भारी कदमों से चल देता है तेज धूप में चलते हुए जब वो दुकान पे पहुँचता है तो पसीने से पूरा भीगा होता है प्यास से उसका गला सूखने लगा था वो दुकान के पास पड़े सायकिल के एक टायर को देखते हुए उस चायवाले से पूछता है "क्यों..यहाँ आसपास कोई पंचर बनाने वाला है क्या..कार का पंचर..."

"इहाँ तो नाई..पर 'सर' इहाँ सेरे तकरीबन पन्द्रा किलोमीटर आगे पेटोल पंप परिहां  हई" चाय वाले का जवाब सुनकर विमल का दिमाग और खराब हो गया उसने कहा "अच्छा पानी है?" उसके कहते ही चायवाले के यहाँ खड़ा एक 10-11 साल का लड़का झट से दौड़ के पास लगे हैण्डपम्प से पानी भरके के प्लास्टिक का मग उसके सामने रख देता है

"अरे बोतल वाला है?" विमल मग को दूर खिसकाते हुए चाय वाले से खीजते हुए पूछता है चायवाला उस लड़के को डाँटता है "तुम ससुरे के एक तउ इहाँ बेफालतू महियां खड़े राहत हो अऊर ग्राहकी कहियां अलग परेशान करत हउ" कहकर वो प्लास्टिक के नीले बक्से से बर्फ में दबी पानी की ब्रांडेड बोतल विमल के हाथ मे देता है विमल जल्दी से गटागट करके आधी बोतल खींच के पी जाता है और उस लड़के से कहता है "जरा चलके मेरे साथ टायर बदलवा देगा..पैसे दूँगा" लड़का तुरंत तैयार हो जाता है और दुकान पे अपने साथ लुढ़का के लाये उस सायकिल के टायर को उठा के कहता है "चलऊ"

विमल एक और पानी की बोतल खरीदता है और दोनों बोतल पकड़े हुए विमल और वो लड़का सायकिल का टायर पकड़े पकड़े कार की ओर चलने लगते हैं,कार के पास पहुँच के विमल हाथ मे पकड़ी पानी की बोतलें कार की सीट पे रख,डिग्गी खोल के स्टेपनी और जैक वगैरह निकाल के बाहर रखता है और अनमने मन से पंचर टायर के नट खोलना शुरू कर देता है बीच बीच में वो अपनी पैंट भी बचाने की कोशिश करता जाता है पास खड़ा लड़का उसे देखता है तो एक झटके में अपनी बुशर्ट उतार के सायकिल के टायर पे डालता है और नट खोलने वाले पाने की रॉड पे खड़े हो होकर नट खोलने लगता है किसी तरह दोनों मिलके टायर बदल लेते हैं,जैक वगैरह कार की पिछली सीट पे फेंकने के बाद पसीने से लथपथ विमल पानी की बोतल उठाता है और लड़के की तरफ देखता है लड़का भी पसीने से भीगा हुआ था वो बड़े मजे से अपनी बुशर्ट से अपना बदन पोछ रहा होता है विमल उससे पूछता है "पानी लोगे" और उसकी ओर पूरी भरी वाली बोतल और बीस का नोट बढ़ाता है

लड़का पसीने से भीगी शर्ट पहन चुका होता है उसे प्यास लगी थी वो बोतल और नोट झट से पकड़ता है नोट अपनी निक्कर में डाल वो बोतल झुका कर अपने हाथ से चुल्लु बना पानी पीना शुरू करता है और तुरंत ही रुक जाता है "उरे...यउ पानी तो बिल्कुलई बेस्वाद हई..यउ तउ अब अपने कहियां ए सी बनहिए" यह कहकर वो बोतल में बचा पानी अपने सर के ऊपर डाल लेता है और खाली बोतल से साइकिल के टायर को लुढ़काते हुए पानी से भीगी शर्ट और भीगे बाल उड़ाता चाय की दुकान की ओर दौड़ जाता है

विमल कुछ देर केलिए उसे बस देखता ही रह जाता है,पानी पीता है और अपनी शर्ट का ऊपरवाला एक बटन खोलता है,दोनों आस्तीनों के बटन खोल के ऊपर मोड़कर,कार में बैठता है और कार स्टार्ट कर, आगे बढ़ा देता है,थोड़ा सा चलने पर वो लड़के के पास पहुँच जाता है,लड़का लुढ़कते टायर पर बोतल मार के चहकते हुए हॉर्न की आवाज की नकल करता है "पों..पो.."

विमल उसे देख के मुस्कुराता है उसकी कार उस एयर कंडिशन्ड लड़के के एक चक्रीय वाहन को  क्रॉस करके आगे बढ़ने लगती है इस बार उसकी कार के शीशे उतरे हुए हैं और पसीने से भीगे होने के कारण बाहर की गरम हवा उसे ठंडक पहुँचा रही है।

-तुषारापात®

Friday, 19 May 2017

गुलाबी

वो इतने हैं गुलाबी
के कैलेंडर ज़रा छू लें
तो हर तारीख़ इतवार हो जाए

और जिस कागज़ पे
वो अपने कर दें दस्तख़त
वही नोट -ए- दोहज़ार हो जाए

-तुषारापात®

Tuesday, 16 May 2017

तू मुझमें

कई बार
ये होता है
तू मुझमें
छुपा होता है
आईने में होती है
जो सूरत
उसकी आँखों में
तू दिखाई देता है

लबों के
हिलने से
अपना
लेने से
एक कान को तेरा
एक को मेरा
नाम
सुनाई देता है

कई बार
चौंक चौंक जाता हूँ
जब अपने चेहरे पे
हाथ फिराता हूँ
समझ में नहीं आता
तू मुझको
या मैं तुझे
छुआई देता हूँ

होता है
यूँ अपने भी साथ
कई बार
होता हूँ खाली हाथ
लहू बेच के
मगर तेरी तस्वीर पे
चढ़ा फूलों की
कमाई देता हूँ।

-तुषारापात®

Thursday, 11 May 2017

सिद्ध साधना

"ऑटोग्राफ प्लीज" बुक फेयर में मेरी लिखी एक पुरानी नावेल लिए एक हाथ मेरी ओर बढ़ता है...नावेल पकड़ी उन उंगलियों को मैं तुरंत पहचान लेती हूँ...मेरी जुल्फों में इन पोरों के प्रिंट आज तक मौजूद हैं.. "त.तुम..." अपने आसपास मौजूद प्रशंसकों को अपनी नई नावेल पे ऑटोग्राफ देते हुए मैं बस इतना ही बोल पाई उसे बैठने का इशारा किया और कुछ फैन्स को फटाफट नावेल साइन करके थोड़ा सा वक्त माँग एक ब्रेक लिया

"आज न्यूज़ में पता चला कि अपनी नई नावेल के लिए तुम दिल्ली आई हो तो चला आया...तुम्हारी सबसे पहली नावेल का ये पहला पहला प्रिंट आज तक तुम्हारे हस्ताक्षर को तरस रहा है..सोचा शायद आज बत्तीस साल के बाद..."पूरी बात कह उसने आखिरी सेन्टेन्स अधूरा छोड़ दिया

मैंने उसके हाथ से नॉवेल अपने हाथ मे ली और उसपे हाथ फिराया "अधूरी साधना..ये जब लिखी थी तो नहीं जानती थी कि कभी मैं ही पूरी नहीं हो पाऊँगी.. क्या करोगे मेरे हस्ताक्षर लेकर..'दी साधना मजूमदार फ्रॉम लंदन' मैं लिखना नहीं चाहती और वक्त ने तुम्हारी साधना लिखने नहीं दिया" मैंने आंखों में आई नमी को मुस्कुराहट की मिट्टी से सुखाते हुए कहा

"एक टाइम रुकी हुई घड़ी..दोबारा से भी चल सकती है..वक्त सुइयों की बाहें फैलाएं फिर से खड़ा है..साधना..कुछ भी तो नहीं बदला..तुम भी वही हो और मैं भी..हाँ..तुम्हारी कमर थामने वाले ये हाथ अब कमजोर हो चुके हैं पर इतने नहीं कि...तुम्हारे हाथ न थाम सके" उसने अपने हाथों को आगे बढ़ाते हुए कहा

"सिद्ध..जानते हो पिछले बत्तीस सालों में अपने अड़तालीस नावेल मैं कैसे लिख सकी..शायद मेरी बेरंग जिंदगी ही कागजों को रंगीन करती गई...आज इस मुकाम पे हूँ..तो तुम्हारी वजह से.. तुमने मुझे न ठुकराया होता..." मैंने जैसे ही ये कहा तो वो दर्द से कराह उठा "दर दर की ठोकर खाने वाला किसी को क्या ठुकरा सकता है..सधी..कितने बरस मैं स्ट्रगल करता रहा..खुद को बनाने में..और उसके बाद न जाने कितने साल तुम्हें खोजने में..पर तुम तो अपनी मम्मी के साथ लंदन....पर क्या आज दो अधूरे टुकड़े उन बीते लम्हों के गोंद से नहीं जुड़ सकते..कितने खुश थे हम उन लम्हों में..."

फैन्स की भीड़ बढ़ने से मेरी टीम मुझे आने का इशारा करती है देखकर भी उन्हें अनदेखा करते हुए उससे कहती हूँ "वही लम्हें मेरी साँसे हैं.. सिद्ध..मैं उन्हें अब तुम्हारे साथ भी शेयर नहीं कर सकती..कम से कम उनका भरम तो बना हुआ है..और वैसे भी अब इस चेहरे पे झुर्रियाँ आ रहीं हैं..मेरे हर एक उपन्यास के साथ एक नई सलवट चेहरे पे बढ़ जाती है..यही मेरा ईनाम है..और इस ईनाम पे मैं लाल बिंदी का फुलस्टॉप नहीं लगाना चाहती" कहकर मैं जल्दी जल्दी उसकी लाई हुई नॉवेल के पहले पन्ने पे कुछ लिख के उसे वापस देती हूँ और यह कहकर वापस अपनी टीम के पास आ जाती हूँ "लम्हों की स्त्री उल्टी चलाने से वक्त की सलवटें नहीं मिटा करतीं।"

मेरी नजरें उसपे ही थीं नॉवेल पे मेरा लिखा पढ़ते हुए वो वापस जा रहा था "कुछ साधनाएं अधूरी ही रह जाती हैं उन्हें कोई सिद्ध नहीं कर सकता"

#तुषारापात®

Thursday, 4 May 2017

गुलाबी

जाने क्यों उस दिन आसमान गुलाबी था?...हवा-ए-इश्क जिस्म की पाँचों खिड़कियों से गुज़र के तुम्हें हवामहल बनाये थी...लाज के पत्ते अपनी शाख छोड़ रहे थे...नारंगी सूरज आँखों में डूब सुरूर के लाल डोरे तैरा रहा था..आदमी जब इश्क में  जयपुर बना हो तो...कानपुर का काला आसमान भी उसे गुलाबी दिखाई देता है।

-तुषारापात®

Wednesday, 3 May 2017

आँख

आँख में सबके है कुछ न कुछ जुरूर
आँसू,जादू,नींद,सपने,माशूक,गुरूर,सुरूर

#तुषारापात®

सिक्सटी वर्ड्स स्टोरी

वो स्लम एरिया में जाता है पूरी बस्ती में घूम घूम कर ,वहाँ रहने वालों की जिंदगी की रेसिपी नोट करता है और रात को वापस लौट के अगले दिन का मेन्यू बनाने में लग जाता है,भूखे पेटों के किस्सों को चटपटा मसाला लगा के,भरे पेट वालों के सामने परोसने वाला वो कोई रसोइया नहीं,एक कहानीकार है।

-तुषारापात®

Monday, 1 May 2017

नींव के पत्थर

"सर...कुछ फिनिशिंग वर्क बाकी है..पर आप निश्चिन्त रहें 28 अप्रैल तक हमारा मल्टीप्लेक्स पब्लिक के लिए बिल्कुल तैयार हो चुका होगा..और सर..29 को फ्राइडे है तो नई फिल्म्स के शो भी हमें मिल जाएंगे...एवरीथिंग इज अंडर कंट्रोल..सर ..वी विल लॉन्च इट विथ अ ब्लास्ट" प्रोजेक्ट हेड माथुर ने चहकते हुए कहा

सिंघानिया साहब ने पूरी बात सुनी और धीरे से बस इतना ही बोले "हम्म" उनके हम्म से भी माथुर का उत्साह कम नहीं हुआ और वो बॉस को इंप्रेस करने के लिए आगे बोला "सर..पाँच स्क्रीन वाला अपना ये मल्टीप्लेक्स शहर का इकलौता और अनोखा मल्टीप्लेक्स होगा...ओपेनिंग डे के शो के लिए शहर के सभी बड़े हॉट शॉट्स को जल्द ही इनविटेशन भेज दिया जायेगा और सर मुंबई से कुछ स्टार भी....."

"माथुर...छोटे लेवल के सभी लेबर्स के आखिरी दो दिनों की पेमेंट रोक लेना..कहना कि पेमेंट ओपनिंग के दिन मिलेगी"सिंघानिया ने माथुर की चहकती बात को काटते हुए गंभीर स्वर में कहा और पाइप से धुआँ उगलते हुए आगे कहा "और हाँ..माथुर ओपनिंग 29 को नहीं 1 को होगी"

"ओह्ह लगता है महाराज जी ने 1 तारीख का मुहूर्त दिया है.. नो..नो प्रॉब्लम सर..एक को कर लेते हैं..लेकिन सर इन छोटे लोगों की पेमेंट अगर रोक दी तो परेशानी..ओके..ओके.. सर..आई गॉट इट सर...उस दिन अगर कोई छोटा मोटा काम निकल आया तो इन्हें फिर से बुलाना आसान नहीं होता..बट जब..पेमेंट फँसी होगी तो बुलाने से झट से आ जायेंगे..ब्रिलियंट सर.. इन नालायकों को ऐसे ही कंट्रोल में रखना चाहिए..सुपर्ब आईडिया" माथुर ने हाँ के अंदाज में बार बार सर हिलाते हुए कहा

1 मई को बड़ी धूमधाम से सिंघानिया मल्टीप्लेक्स की ओपनिंग होती है शहर के राजनीतिज्ञ,माननीय सांसद महोदय,मंत्री,बड़े व्यापारी,अफसर, मीडिया,बुद्धिजीवियों आदि के साथ शहर के उच्च तथा उच्च मध्य वर्ग के निमंत्रित लोग मुंबई से आए अभिनेता-अभिनेत्रियों के साथ जश्न का आनंद ले रहे हैं अलग अलग स्क्रीन जिन्हें ऑडी एक,ऑडी दो का नाम दिया गया है उनमें नई रिलीज हुई फिल्मों का शो 15-15 मिनट के अंतर पे रखा गया है

"द सिंघानियां ग्रुप आए हुए सभी गेस्ट्स का वेलकम करता है और शुक्रिया अदा करता है..फ्रेंड्स थोड़ी ही देर में फिल्म के शो शुरू होने वाले हैं आप सब इन फिल्मस का लुत्फ़ जरूर उठाइयेगा..
सबसे पहले ऑडी वन में शो शुरू होगा..आप सब ऑडी टू और ऑडीज थ्री..फोर..एंड फाइव में रेस्पेक्ट फुल्ली इनवाइट किए जाएंगे... पर सबसे पहले मैं ऑडी-वन के शो के लिए बहुत ही खास लोगों को आमंत्रित करना चाहता हूँ..आप सब उनका तालियों के साथ स्वागत कीजिये" कहकर सिंघानिया ने हॉल के दरवाजे की ओर इशारा किया सबने उधर देखा इस मल्टीप्लेक्स को बनाने वाले सभी मजदूर हाथों में चार दिनों की पेमेंट के लिफाफे पकड़े ऑडी एक में प्रवेश कर रहे थे।

नींव के पत्थरों पर न प्लास्टर होता है और न हीं रंग रोगन पर पूरी इमारत का बोझा ढोने वाले नींव के पत्थरों का पूजन अवश्य होना चाहिए।

-तुषारापात®

Sunday, 30 April 2017

लव स्टोरी

"हेलो..एक्सक्यूज़ मी...ये तुम्हारा रुमाल..वहाँ..शायद तुमसे गिर गया था" राजीव चौक मेट्रो पे लड़के ने दौड़के आगे जाती लड़की के पास जाकर कहा

लड़की रुमाल लेती है और कहती है "हम्म..'शायद'..नहीं नहीं...जानबूझकर..ताकि इतनी भीड़ में मैं देख सकूँ कि कौन कौन मेरा रुमाल गिरता हुआ देखता है.."

लड़की के इस अटपटे से उत्तर से लड़का बौखला जाता है "अरे.. मतलब..मैंने देखा तो..."

"देखा तो क्या..इसका मतलब तुम पहले से मुझे देख रहे थे..तभी तुम्हें मेरा रुमाल गिरता दिखा..." लड़की ने उसकी बात काटते हुए कहा "

"यार कमाल है...एक तो भलाई करो..और ऊपर से बातें सुनो..हद है.." लड़का भी गुस्से में आ गया

"भलाई..भलाई क्या..तुम लड़के..पहली ही मुलाकात में रुमाल देकर ये बता देते हो..कि देखो मैं तुम्हें आगे जाकर खूब रुलाने वाला हूँ..तो अभी से ये रुमाल रख लो" लड़की ने गुस्से से उसके मुँह पर रुमाल फेंका और वहाँ से चल दी

लड़के ने गुस्से से चीख के कहा "गो टू हेल" और रुमाल फेंकने जा ही रहा था कि रुमाल पे उसे कुछ लिखा हुआ दिखता है वो पढ़ता है " जहाँ पे मैं खड़ी थी..मेरे बाजू में एक बूढ़े अंकल ने भी रुमाल गिराया था..पर तुम्हें मेरा ही रुमाल गिरते दिखा...भीड़भाड़ वाली जगहों पे बुजुर्गों की मदद किया करो..सबसे अच्छी भलाई यही होगी...और हाँ ये रुमाल वो नहीं है जो तुमने उठा के दिया था..रुमाल मैंने बदल दिया है...स्माइल यू आर ऑन कैमेरा"

आजकल के जमाने में रुमाल गिरने और उठाने से लव स्टोरी नहीं बल्कि बकरा या बकरी बनते हैं।

-तुषारापात®

Friday, 28 April 2017

अक्षय तृतीया

"क्या पूरा पैसा?..रखवाया हुआ सारा रुपया ले जा रही हो..मालती.. क्या हुआ कुछ अनहोनी हो गई क्या?" भिखारन मालती ने जब अपने रखवाए हुए साढ़े आठ सौ रुपये मुन्ना बाबू से माँगें तो उसने आश्चर्य से यह पूछा

"सब ठीक है मुन्ना भाई...आज आखा तीज है न..बस इसीलिए रुपया चाहिए" मालती ने रुपये गिनते हुए जवाब दिया

मुन्ना हँसा और बोला "तो तुम क्या इन साढ़े आठ सौ से सोना खरीदने जा रही हो"

"नहीं...सोना दान देने" उसकी हँसी की परवाह न करते हुए उसने दृढ़ता से कहा और सामने वाले पंसारी की दुकान की ओर चल पड़ी, वहाँ उसने सारे पैसों में काफी सारा चावल और उसी अनुपात में दाल खरीदी

रात के दस बजे हैं महानगर के गोल चौराहे के पास की सड़क के दोनों ओर गाड़ियों का जमघट लगा है,दस बजने के बावजूद,अभी भी लोग आज अक्षय तृतीया होने के कारण लाला बद्री सर्राफ के यहाँ से सोना या उससे बने आभूषण खरीद रहे हैं,वहीं उसी सड़क से एक ओर जाती पतली सड़क के किनारे मालती अपने हाथों से पकाया दाल चावल अपने जैसे भिखारियों के बच्चों को परोस परोस के खिला रही है और कह रही है "आधे पेट नींद अच्छी नहीं आती न..तो लल्ला लोग आज खूब पेट भर भर के खाओ..और खूब अच्छी तरह से सोना."

चाँदी का चम्मच मुँह में लिए पैदा होने वाले 'सोना' खरीद रहे थे और ऐलुमिनियम के कटोरे वाली 'सोना' दान दे रही थी।

-तुषारापात®

Tuesday, 25 April 2017

कार और बैसाखी

"सिगरेट महंगी हो जावे...सिगरेट महंगी हो जावे.."मंदिर के बाहर बैठा एक विकलांग बूढ़ा ये बड़बड़ाए जा रहा था

अनुराग अपनी कार से उतरा और मंदिर के गेट पे बैठे उसी बूढ़े को 28 रुपए देकर वापस आया और अपनी कार स्टार्ट कर रहा था कि उसके साथ आया उसके ऑफिस का दोस्त राजीव बोला "यार अनुराग कई दिनों से पूछना चाहता था..ये तू...रोज आफिस से लौटते वक्त इस बूढ़े को 28 रुपए क्यों देता है..ये चक्कर क्या है यार..?"

हँसते हुए उसने जवाब दिया "वो क्या है कि पहले मुझे सिगरेट पीने की बहुत बुरी लत थी...फिर एक दिन किसी ने बताया कि एक सिगरेट आपकी जिंदगी के 10 मिनट कम कर देती है..सोचा अगर मुझे कुछ हो गया तो मेरे परिवार का क्या होगा..तो मैने पीनी छोड़ दी...काफी मुश्किल हुई..मगर किसी तरह छोड़ ही दी मैंने..रोज चार सिगरेट पीता था..तो अब उन्हीं चार सिगरेट का पैसा इस बेचारे बूढ़े को दे देता हूँ..शायद इन पैसों से उसकी जिंदगी में चालीस मिनट खुशी के आ जाते होंगे..और मेरी जिंदगी के चालीस मिनट तो बच ही जाते हैं "

"ओह्ह..समझा..मगर मुझे याद है..अभी कुछ दिन पहले तक तो तू इसे 20 रुपए ही दिया करता था फिर अब 28..." राजीव ने बूढ़े को देखते हुए कहा

अनुराग ने पहला गेयर डालते हुए कहा "अरे इस बजट में सिगरेट महंगी जो हो गई है" और हँसते हुए कार बढ़ा देता है उधर वो बूढ़ा जिसे रुपए मिले थे कार जाते देख उठता है और किसी तरह बैसाखी के सहारे घिसटते हुए पान की दुकान पे पहुँच के बीड़ी का बंडल माँगता है पान वाला उससे कहता है "बाबा बहुत बीड़ी पीते हो तुम..रोज चार पांच बंडल यूँ ही पीते रहे तो जल्दी ही मर जाओगे.."

बूढ़ा हँसता है और उससे पूछता है "ये चार बंडल से मौत चालीस मिन्ट और नजदीक आ जाती है...ई बात तो पक्की है न?"

अजीब नजारा था कार से चलने वाला जिंदगी का सफर धीरे धीरे काटना चाहता था और बैसाखी पे चलने वाला बहुत जल्दी में था।

#तुषारापात®

Wednesday, 22 February 2017

एकतरफा इश्क है एकतरफा सफर

एकतरफा इश्क है एकतरफा सफर
तेरा दिल मंजिल मेरा दिल मुसाफिर

लटों के छल्ले हैं ये फौलाद से
लगी है फाँसी इन जल्लाद से
खुली जुल्फ तेरी बाँध लेती नजर
एकतरफा इश्क है एकतरफा सफर

तेरा ख्याल है छोटा क्या बड़ा
साज हूँ सजावट का मैं तेरे बिना
तेरी साँसों पे बिछी है मेरी बहर
एकतरफा इश्क है एकतरफा सफर

बिना मांगे हाथ माँग भरूँ कैसे
सजा जाऊँगा एक दिन अपने लहू से
तेरी जुल्फों के बीच की ये डगर
एकतरफा इश्क है एकतरफा सफर

#तुषारापात®™

Friday, 10 February 2017

काम आरोपित हो रहा है रति पर

काम आरोपित हो रहा है रति पर
चाँद आमंत्रित है पूर्वा फाल्गुनी पर

नृत्य कर रहीं हैं यों तुम्हारी नाभि पर
उंगलियाँ सुर ढूँढ रहीं हों मानो बाँसुरी पर
काम का संदेश अधरों के भीतर फूँक मैं
स्पन्दित हो रहा हूँ तुम्हारी प्रतिध्वनि पर

केश-मेघ आच्छादित हैं गर्वीले नगों पर
एक पथ के दो पथिक हैं लचीले पगों पर
सहस्त्रों कल्पनाओं से दिग्भ्रमित पुरुषार्थी मैं
अच्युत हो रहा हूँ नारीत्व की तुम्हारी पगडंडी पर

तुम तुम्बधारिणी यों मानो कोई वीणा मादक
संग-गीत को आतुर आलिंगनबद्ध मैं वीणा वादक
तान का आरोह-अवरोह कर सुरों की छेड़छाड़ मैं
लयबद्ध हो रहा हूँ स्वांसों की तुम्हारी रागिनी पर

वाष्प मोती बढ़ रहे ऊपर भीतर दोनों के उष्ण रण
मद की ऊष्मा में ढूँढ रहे शीतलता का दुर्गम क्षण
प्रेम की घटी शीघ्र न घटित हो कहीं सोचता यह मैं
समय सा विस्तारित हो रहा हूँ तुम्हारी सारिणी पर

पुष्प बाण से भंग की थी इसने तपस्या त्रिनेत्री की
शिव पार्वती के विवाह में भूमिका थी रति पति की
अपनी समस्त वासनाओं की होलिका जलाकर मैं
घृत अर्पित कर रहा हूँ यज्ञ की तुम्हारी अग्नि पर

#तुषारापात®™

Friday, 20 January 2017

वो रात कुछ अजीब थी

वो रात कुछ अजीब थी ये रात भी अजीब है
वो कल भी पास पास था वो आज भी करीब है

मेरा नाम बुलाए वो या मैं उसे पुकार लूँ
नजर में उठा लूँ या नजर मैं उतार दूँ
मैं सोचती थी मुझसे निगाह चुरा रहा है वो
न जाने क्यों लगा मुझे दिल बहला रहा है वो

वो रात कुछ अजीब थी.......................

कई जवाब हैं मेरे न उसका इक सवाल था
मेरी आँखों में था पर बाँहों को मलाल था
मैं जानती हूँ अपनी निगाह जमा रहा है वो
धीरे धीरे खामोशी से दिल मिला रहा है वो

वो रात कुछ अजीब थी.......................

धधकती आग है कहीं मिली हुई सी साँस से
गीली भाप भी है मुंदी मुंदी सी आँख में
मैं मानती हूँ कि सुहागा सुलगा रहा है वो
यही ख्याल है मुझे कि माँग सजा रहा है वो

वो रात कुछ अजीब थी ये रात भी अजीब है
वो कल भी पास पास था वो आज भी करीब है.......

#वो_शाम_कुछ _अजीब_थी(फीमेल वर्जन)
#तुषारापात®™