Wednesday, 25 April 2018

ठूँठ

एक पेड़ था मैं हरा भरा
तेज आंधी ने धरा में औंधा धरा
मैंने देखा है सिसकते हुए
अपने फलों को नुचते हुए
हरी हरी छोटी टहनियाँ
चर गईं मुझे बकरियाँ
काट न पाए
क्योंकि था जड़ीला बड़ा
ठूँठ का संबोधन मुझे मिला
इधर उधर लुढ़कते
सागर किनारे पहुँच गया
ठूँठ हूँ पर पेड़ का
सागर पे उगते सूरज को देख
हर्षित हुआ
लोगों ने खेल खेल कर सागर में गिरा दिया 
एक लठ्ठ सा तैरता हूँ अब
नाव बनता तो कोई देता दिशा
तुम्हें लगता है बनूगा एक दिन जहाज मैं
मुझे पता है ठूंठ हूँ मैं
अभी दिख रहा हूँ तुम्हें तैरता हुआ
मगर क्षितिज पे दूर सागर में
दिखूँगा नजर में तुम्हारी डूबता हुआ।

#ठूँठ
#तुषारापात®

Tuesday, 24 April 2018

चुगलियाँ

चुगलियाँ वो चिट्ठियाँ हैं जिस पते की होती हैं उसके दाएं बाएं के मकान में भेजी जातीं हैं।

~तुषारापात®

Sunday, 22 April 2018

बग़ावत

क्या कलम ने ही सारी लिखावट की है
कहकर मेरी उंगलियों ने बग़ावत की है

-तुषारापात®

Thursday, 19 April 2018

मन्नत

"तो क्या माँगा तुमने भगवान से" आभास ने अपने पैर पे दूसरा पैर चढ़ाया और उसकी ओर घूमते हुए पूछा

"मन्नतें..किसी को ..बताईं नहीं जाती..वरना पूरी नहीं होतीं..ये तो भक्त और भगवान के बीच की बात है" अमितिभा बस के झटकों के साथ अपने स्वर को बिठाते हुए चुलबुलाहट से बोली

आभास पहले तो बनावटी मुँह बनाता है फिर झूठे रौब के साथ कहता है "पता है मेरे लिए ही कुछ माँगा होगा..अब जिसके लिए माँगा है उसे बताने में क्या हर्ज...वैसे भी पति को सबकुछ जानने का हक़ है..शास्त्र कहता है"

"बस बस..'गुप्ता' साहब..धोती कुर्ता और केसरिया गमछा पहनके खुद को ज्यादा 'पंडित' मत समझो.." अमितिभा उसकी धोती खींचने की एक्टिंग करते हुए बोली

"अरे यार..ज्यादा भाव मत खाओ..बताओ न..नहीं तो मैं अपनी मन्नत सबको बता दूँगा.. आभास ने उसे डराया

अमितिभा ने हँसते हुए कहा "अच्छा अच्छा..मैंने माँगा.. मैंने माँगा कि मेरे जिद्दी पति की..गंदे पति की..सिगरेट पीने की गंदी आदत छूट जाए.."

"चल झूठी..." आभास ने कहा और उन दोनों की नोंकझोंक यूँ ही चलती रही

बालाजी के दर्शन करके दोनो जयपुर से आगरा जाती बस को हाई-वे से पकड़ के भरतपुर जा रहे थे और गर्म दोपहरी के इस सफर को अपनी नोकझोंक के छींटों से भिगो रहे थे कुछ देर में बस एक ढाबे पे रुकती है,कंडक्टर की आवाज आती है कि दस मिनट का स्टॉप है जिन्हें चाय नाश्ता करना है कर लें

"तुम कुछ खाओगी." आभास ने पूछा

"नहीं..अभी आधे घंटे पहले ही दर्शन करके तो लंच किया है" अमितिभा ने कहा

"ठीक है..मैं अभी आता हूँ..अब ये मुँह मत बनाओ..दर्शनों के चक्कर मे सुबह से नहीं पी..बस एक दो कश मारकर आता हूँ..कोल्डड्रिंक पियोगी?"
आभास ने उसके चेहरे पे नाराजगी का भाव देख के पूछा

"अरे ये क्या है..ये लोग क्या खा रहे हैं आइसक्रीम है शायद...मेरे लिए ये ला दो" कुछ लोग दोने में कुल्फी जैसी कुछ चीज लाकर खा रहे थे वही अमितिभा ने भी उसे लाने को कह दिया

आभास ने सोचा कि जब तक ये कुल्फी खायेगी तब तक वो आराम से सिगरेट फूँक लेगा वो जल्दी से कुल्फी के ठेले पे गया,ठेला पान की गुमटी से सटा हुआ ही था,पता नहीं गर्मी ज्यादा होने के कारण ठेले पे भीड़ थी या मात्र दस रुपये की कुल्फी की एक प्लेट होने के कारण ऐसा था जो भी हो,ठेले पे बस की आधी सवारियों की भीड़ जमा थी, उसने दस रुपये का नोट हाथ में लेकर आगे बढ़ाया और व्यस्त ठेले वाले से बोला "भइया.. एक देना.."

कुल्फी वाले ने उसे देखा पर अपने काम मे लगा रहा पहले से खड़े लोगों को वो अल्युमिनियम कम टीन के छोटे छोटे डिब्बों से कुल्फी निकाल के चाकू से दो पीस में काट काट के दे रहा था आभास खड़ा अपनी बारी का इंतजार करने लगा एक दो मिनट के बाद उसने फिर कहा "अरे भाई एक मुझे भी दे दो"

कुल्फी वाला मशीन की रफ्तार से टीन के डब्बे मटके से निकालता और चाकू से कुल्फी काटके देता जा रहा था पर भीड़ ज्यादा होने के कारण समय तो लगना ही था आभास ने सोचा कि शायद ये एक कुल्फी के कारण उसकी बात नहीं सुन रहा है तो उसने पर्स से एक दस का नोट और निकालकर कहा.."भाई दो कुल्फी दे दो..बस छूट जाएगी.."

कुल्फी वाले ने फिर उसे देखा और अपना काम जारी रखा आभास अब बेचैन होने लगा सिगरेट की तलब भी बढ़ रही थी और घड़ी की सुइयां भीं,कुल्फी वाले ने जब उसके बाद आए आदमी को तीन कुल्फी निकालकर दीं तो उसके सब्र का बाँध टूटने ही वाला था उसके भीतर अहम की आग जाग रही थी,वो बस अब किसी भी क्षण इस कुल्फी वाले को गालियां देने वाला था ठेले पे आए उसे पाँच मिनट से ज्यादा हो चुके थे भीड़ अब छँट चुकी थी वो बस इंतज़ार कर रहा था कि अब ये क्या करता है और सोचता है कि अगर अब इसने नहीं दी तो दो हाथ तो इस नालायक के लगा ही दूँगा

ठेले वाले ने मटके से दो अल्युमिनियम के डब्बे छाँट के निकाले,ठेले पे रखे उसके बाद जाँच परखकर दो दोने उठाए उसके बाद चाकू को अच्छे से धोया और उसी धोए हुए चाकू से डिब्बे से कुल्फी निकालकर,कुल्फी को चार पीसों में काटा और दोनों में सजा के सम्मान की मुद्रा में आभास को देते हुए बोला "लीजिये पंडित जी!"

आभास अवाक रह गया उसका ध्यान एक बार अपने पहनावे की ओर गया और दूसरी ओर उसकी श्रद्धा की ओर, उसने ठेले वाले को रुपए दिए और दोनों हाथों में कुल्फी लेकर बस की ओर चल पड़ा पता नहीं क्यों वो अब सिगरेट नहीं पीना चाहता था।

~तुषार_सिंह तुषारापात®

Wednesday, 11 April 2018

बब्बर मूषक

होती होंगी तुम्हारे पास ज़माने भर की डिग्रियाँ
5 रुपैये में 10 निकाल देते हैं हम उनकी फोटोकॉपियाँ

-तुषारापात®

Tuesday, 10 April 2018

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ

उसके
एक हाथ में किताब
और दूसरे में
छोटा सा एक झोला है

चलते हुए उसकी बाहें
लक्ष्य की ओर जाती नाव की
दो पतवारों की तरह
उल्टी धारा को चीरतीं जा रहीं हैं

उसकी
कॉटन साड़ी की करारी प्लेटें
आदम ज़माने की हवा काट
हव्वा के झंडे की तरह लहरा रहीं हैं

कल लड़ी थी पढ़ी थी
अब अपने जैसी सभी को पढ़ा रही है
दलदल निचोड़ के उसमें कैद पानी को
कलकल बहा रही है कल बना रही है।

~तुषारापात®

Monday, 9 April 2018

खोटे सिक्के

सुना है टूटते हुए सितारे मुराद पूरी करते हैं
किस्मत की टकसाल के खोटे सिक्के चलते हैं?

~तुषारापात®

Monday, 2 April 2018

कबीरा

पति खड़ा मॉल में बचावे कैसे अपनी जेब
पकड़े पत्नी का हाथ विंडो शॉपिंग है सेफ

-तुषारापात®

Saturday, 24 March 2018

परीक्षा

"बताओ राम तुमने उस उद्दण्डी वराह को शब्द भेदी बाण से क्यों न समाप्त किया..क्यों उसे इतनी देर तक उत्पात मचाने दिया..लक्ष्मण आदि अन्य शिष्य अत्यन्त उत्सुक हैं कि आश्रम की इतनी अधिक हानि होने के पश्चात तुमने उसका वध किया..पहले क्यों नहीं" महर्षि वसिष्ठ ने कोमल स्वर में पूछा।

राम अपने स्थान से उठकर उनका अभिवादन करते हुए बोले "गुरुश्रेष्ठ के श्री चरणों में संध्या काल का प्रथम प्रणाम!..गुरुवर..अपराध के पश्चात ही दंड का विधान है ..पहले नहीं..और मर्यादा की भी यही पुकार थी...वराह भटकते हुए आश्रम में प्रविष्ट हुआ और हम मानवों की उपस्थिति के कारण अपनी मृत्यु के भय से वशीभूत होकर उग्रता से रेंक रहा था...मात्र इतने अपराध पे शब्द भेदी बाण का प्रयोग अनुचित होता..हाँ जब वो गुरु भ्राताओं पर आक्रमण कर उनके प्राण लेते मुझे दिखा तो उसका वध आवश्यक हो गया था...।"

गुरु वसिष्ठ संतुष्ट हुए परन्तु अन्य शिष्यों के ज्ञान वर्धन के लिए आगे पूछतें हैं "राम..मर्यादा क्या है?"

" गुरुश्रेष्ठ..यदि यह दुस्साहस संज्ञक न हो तो आप द्वारा प्रदत्त शिक्षा और ज्ञान में अपना विवेक समाहित कर कहता हूँ..सामान्य अर्थ में मर्यादा से तात्पर्य है लोक व्यवहार में प्रचलित नियमों और  मान्यताओं की सीमा के अंतर्गत किया गया आचरण परन्तु मर्यादा की विवेचना अत्यन्त विशाल है..शक्ति सम्पन्न होते हुए भी अपनी शक्ति को सीमा में रखना ही मर्यादा है.." राम ने अत्यंत विनम्र स्वर में कहा।

"शक्ति क्या है..राम..इसका मापन कैसे हो..क्या शक्ति सम्पन्न होते हुए भी मर्यादा में रहना कायरता न कहलाएगी?" वसिष्ठ आज मानो स्वयं को विराम दे राम को सांध्य वाचन का अवसर दे रहे थे।

ये प्रश्न सुनकर सूर्यवंशी राम के अधर स्वतः नवमी के चंद्र की तरह मुस्कुराने लगे  "अपने भीतर के किसी विशेष बल को अभ्यास द्वारा सिद्ध कर एक निश्चित मात्रा में संयोजित करने को शक्ति कहते हैं..इसका मापन संयम है...चरित्र संयम की इकाई है..गुरुवर.. इस सम्पूर्ण सृष्टि में प्रत्येक वस्तु दूसरे से शक्तिशाली अथवा क्षीण है..मानव से अधिक शक्तिशाली ये प्रकृति है..और इस प्रकृति का संचालक सूर्य है और इसी प्रकार उतरोत्तर अन्य तारे..आकाशगंगा आदि आदि हैं.. क्या सूर्य अपने ताप से इस पृथ्वी को भस्म नहीं कर सकता परन्तु वो मर्यादित रहता है..इसी प्रकार अनेक ग्रह अपनी अपनी मर्यादा में रहकर गतिमान हैं..ये विशाल ग्रह कभी भी अपनी सीमा को नहीं लाँघते.. मर्यादा तोड़ना तो क्षुद्र उल्काओं का कार्य है..अतः शक्ति सम्पन्न होते हुए भी अपनी मर्यादा में रहना 'पालन' है.. गुरुदेव.. कायरता नहीं।"

वसिष्ठ त्रेता में ही द्वापर की गीता को आत्मसात सा करते हुए बोले " आह! अद्भुत राम! मैं तुम्हें और सुनना चाहता हूँ..मर्यादा और कायरता का भेद और स्पष्ट करो"

"जिस प्रकार संसार के दुखों से पलायन तप नहीं है..उसी प्रकार शक्तिशाली शरीर और तीक्ष्ण बुद्धि के होते हुए भी कष्ट भोगना भी महानता नहीं है वरन कायरता है..परन्तु यदि यही कष्ट संसार की भलाई के लिए भोगे जाएं तो मर्यादा है.." राम अंत मे अपनी वाणी में रहस्य भर के चुप हुए जिसे सिर्फ वसिष्ठ भाँप सके "राम..मुझे प्रसन्नता है कि तुम्हें आगामी समय का भान है.. उस वराह को अभी गति नहीं प्राप्त होगी..परन्तु तुम्हारे बाण द्वारा मृत्यु को प्राप्त होने से वह प्रोन्नत अवश्य होगा और तुमसे पुनः भेंट करेगा"

राम ने आकाश में पुनर्वसु नक्षत्र की ओर देखा और रहस्मयी तथा भारी स्वर में बोले "गुरुश्रेष्ठ! प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया प्रकृति का विधान है..मैला खाने वाला यह वराह (शूकर) पुनर्जन्म लेकर मैले कुचैले वस्त्रों को स्वच्छ करने का कार्य करने वाला होकर पुनः मेरी परीक्षा लेने आएगा"

"सबकुछ जानकर भी अत्यंत संयमित रहने वाले हे रघुश्रेष्ठ!..राम!..संसार में तुम मर्यादा पुरुषोत्तम के नाम से भी जाने जाओगे!" वसिष्ठ ने आशीर्वाद मुद्रा में हस्त किया और भोजन के लिए इन शिष्यों की गुरुमाता अरुंधति से आग्रह किया।

~तुषार_सिंह #तुषारापात®

Friday, 23 March 2018

शहीद दिवस

कत्थे से नहीं लाल धरती उनके लहू से थी
पान की दुकां पे आज़ादी की गप्पें लड़ा रहे हैं

फाँसी का फंदा पहना था उन्होंने जिस उम्र में
उस उम्र में हम सिगरेट के छल्ले उड़ा रहे हैं

-तुषारापात®

Wednesday, 21 March 2018

फेमिनिस्ट

वो गुस्से से किचेन में गया
और अब तक जैसे
मेरी आवारा ख्वाहिशों को
रौंदता आया है
उबले आलूओं को मसल रहा है

कड़ाही को
कानों से उठा के
गैस के जलते चूल्हे पे दे पटकता है
मेरे दोनों काँधे पकड़ के
ऐसे ही तो रातों में मुझे झंझोड़ता रहा है

खूब सारा तेल डालके
जीरे की चटचटाहट से खुश हुआ
मगर मेरे सूखे खुले
बालों की लहलहाहट से
बड़ा छटपटाता है वो

प्याज लहसुन के जैसी
उसकी मुँह की दुर्गंध
कड़ाही से भी उठने लगी है अब
जली कटी उसकी बातों के दिए
जख्मों की तरह
प्याज गोल्डन ब्राउन से कुछ ज्यादा गहरा रहा है

धनिया के दो चम्मच कड़ाही में पड़े
मेरी हथेली की लकीरों पे मेहंदी से
उसके नाम की मोहर जड़ी गई थी
पूरे बदन पे हल्दी भी मली गई थी
गर्म कड़ाही में
थोड़ी सी अभी हल्दी छिड़की गई है

लाल मिर्ची की
एक बारीक सी लाइन
काली कड़ाही के बीचो बीच खींच देता है
सर पे मेरे खिंची
सिंदूर की लक्ष्मण रेखा याद दिलाके
मेरे ऑफिस के मर्दों से हुई
नार्मल सी बातें भी खूब चटपटी बना लेता है

आलू के भुर्ते को
इस छुंछुनाते मसाले में मिलाके
कलछुरि को कड़ाही में
जोर जोर से हिलाके
मेरे मुँह में जलते अंगारे ठूँसने की
अपनी तमन्ना पूरी कर रहा है

सारा पानी तो
मेरे अरमानों पे फेर चुका है
इसलिए सूखी सब्जी बन रही है
तेज डाँट से हड़काने के बाद
धीमी झिड़कियों से समझाता है
गैस तेज से धीमी की थी
और अब बंद हो चुकी है

शुरू के पहले या दूसरे
करवाचौथ पे लाई
एक सस्ती साड़ी की तरह
धनिया की पत्तियों से
इस सब्जी को सजा रहा है

सब्जी तैयार है और
फेमिनिस्ट कविता भी

नहीं नहीं
नमक बताना नहीं भूली मैं
वो तो अभी एक्सट्रीम फेमिनिस्ट्स के
कॉमेंट्स में भर भर के आएगा
थोड़ा सा
मेरी थाली की सब्जी के काम आएगा
बाकी
'उस' सब्जी बनाने वाले के ज़ख्मों पर जाएगा।

~तुषार सिंह #तुषारापात®

Monday, 19 March 2018

समाधान की उपपत्ति

"मतलब मैं ये मान लूँ कि मेडिकल साइंस के पास मेरा कोई इलाज नहीं है..सिवाय..इन नींद की गोलियों के" उसने मेडिकल रिपोर्ट्स को फाइल में लगभग ठूँसते हुए डॉक्टर से झुंझलाके कहा

सीनियर डॉक्टर विकल्प वर्मा व्यावसायिक मुस्कान चेहरे पे लाते हुए उससे बोले "वेल..मिस्टर समाधान मेडिकल साइंस किसी डिसीज का क्योर करती है..वहम का..अरर..अ..आपकी तो सारी रिपोर्ट्स नार्मल हैं..कहीं कोई ऐसी बात पकड़ में नहीं आयी जिससे पता चले कि आखिर क्यों आप सही से नींद नहीं ले पाते"

समाधान काफी समय से सही से सो नहीं पा रहा था ऑफिस से थका मांदा होने पर भी रात रात भर करवट बदलता रहता था ,गहरी नींद उसके लिए ऐसे हो गई थी जैसे गूलर का फूल,सुबह उठता था तो उसके पूरे बदन में दर्द रहता था उसकी ऐसी हालत देख के उसकी पत्नी उपपत्ति ने लगभग उसे धकेल के डॉक्टर के पास दिखाने भेजा था और तब से वो डॉक्टरों और उनकी तरह तरह की रिपोर्ट्स में उलझ के अब थक सा चुका था उसे समझ नहीं आ रहा था कि डॉक्टर उसकी इस छोटी सी बीमारी को पकड़ क्यों नहीं पा रहे हैं।

डॉक्टर विकल्प आगे बोले "देखिए एम आर आई तक मे कुछ नहीं आया..मुझे लगता है कि आपकी परेशानी फिजिकली न होकर मेंटली है...आप एक काम करिये किसी अच्छे साइकेट्रिस्ट को कंसल्ट करिये.. आप चाहें तो मैं आपको रेफर कर देता हूँ..यू मस्ट कंसल्ट टू डॉक्टर संकल्प.."

डॉक्टर से मनोचिकित्सक का नाम पता लेकर समाधान घर आता है और पत्नी उपपत्ति को सारी बात बताता है उपपत्ति उसकी बात सुन कहती है "अगर आप बुरा न माने तो एक बात कहूँ..वो कुंजी बुआ कह रहीं थीं..कि..कि..कहीं कोई ऊपरी बात तो नहीं.." उपपत्ति रुक कर पहले समाधान के चेहरे के भाव देखती है और पाती है कि वो ये बात सुनकर शांत है तो आगे की बात जल्दी जल्दी कह डालती है "  मैंने आपको पहले कभी बताया नहीं..कहा भी नहीं..पर आप जैसी परेशानियाँ मुझे भी होती रहीं हैं..शायद कोई बला वला हो..कुंजी बुआ बता रहीं थीं कि वो गुजरात में.. वो.. बाबा जी धाम है न..वहाँ.. वहाँ दर्शन करने से कैसी भी ऊपरी बाधा वगैरह हो..सब दूर हो जाती है..और वैसे भी आप पिछले पंद्रह सोलह साल से कहीं बाहर निकले भी नहीं हैं..इसी बहाने थोड़ी सैर.."

"उधर वो नालायक डॉक्टर कहता है कि मेरा दिमाग खराब है और इधर तुम कुंजी बुआ की अला बला बातें करके और दिमाग खराब कर रही हो..जाओ जरा चाय बना के लाओ..यार..क्या..क्या सुनना पड़ रहा है.." समाधान ने उसकी बात बीच में काटी और जूते मोजे उतार के हाथ मुँह धोने चला गया।

फिर कुछ महीने मनोचिकित्सक डॉक्टर संकल्प की संकल्पनाओं में समाधान फँसा रहा,मनोचिकित्सक ने उसकी नींद की दवा बंद करवा कर उससे तमाम बातें पूछीं कि कोई कर्ज़ की चिन्ता तो नहीं,रुपया पैसा फँसा होना,कोई सदमा, पुरानी बातें,कोई अधूरी इच्छा,अधूरा इश्क, मकान गाड़ी खरीदने या बेचने का या उससे जुड़ा कोई झंझट, बच्चों के भविष्य की चिंता, ऑफिस में कोई प्रेम प्रसंग,प्रोमोशन डिमोशन का खेल, नामर्दी, शीघ्रपतन आदि आदि ऐसी अनेकों बातों का जवाब जब नहीं में आया तो साइकेट्रिस्ट ने उसे अच्छी नींद लेने के कई तरीके सुझाए पर कोई उपाय काम नहीं आया और तब तक कुंजी बुआ का दबाव भी उसपर काफी हो चुका था तो समाधान को ऊपर नीचे की अलाएं बलाएं न मानते हुए भी उपपत्ति के साथ बाबा जी धाम जाना पड़ ही गया।

बाबा जी धाम वो लोग रात आठ बजे के आसपास पहुँचे थे तब तक दर्शनों का समय समाप्त हो चुका था समाधान ने पहले से ही धाम के पास के एक होटल में कमरा बुक करवा लिया था प्लान ये था कि रात भर आराम करके सुबह सुबह दर्शन आदि कर लिए जाएंगे।

होटल के कमरे में समाधान और उपपत्ति फ्रेश हुए और रूम सर्विस को फोन कर खाना आर्डर किया और लेट के खाना आने का इंतजार करने लगे बीस पच्चीस मिनट के बाद खाना आया सर्विस बॉय ने बेल बजाई तो उपपत्ति ने समाधान से कहा " देखिए शायद खाना आ गया है.. दरवाजे पे कोई है.." उपपत्ति की बात पर समाधान की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई तो उसे आश्चर्य हुआ उसने एक बार और कहा पर इस बार भी कोई प्रतिक्रिया नहीं,बेड के दूसरी ओर आकर उसने जब देखा तो पाया कि समाधान गहरी नींद में सो रहा है और हल्के हल्के खर्राटे भी ले रहा है  उसने पहले तो सर्विस बॉय से खाना लेकर उसे चलता किया और फिर से समाधान को सोते हुए देखने लगी, उपपत्ति की खुशी का तो ठिकाना ही नहीं था, उसने मन मे सोचा कि कुंजी बुआ ने क्या खूब जगह बताई कि धाम से एक डेढ़ किलोमीटर दूर ही इनपे इतना असर हुआ है, उसने समाधान को सोने दिया और थोड़ा बहुत खाना खाकर वो भी लेट गई।

सुबह के दस बजे नहा धोकर तैयार हुई उपपत्ति समाधान को खुशी खुशी जगा रही थी "उठो भी कितना सोएंगे..दर्शनों को भी तो चलना है..चाय भी आ गई है.. उठ जाइये.."

समाधान अँगड़ाई लेते हुए उठता है और चौंक के कहता है "अरे ये कैसे..मैं इतनी देर तक..सोता..कैसे सोता रहा..खाना..खाया..अरे आज तो बदन दर्द भी न के बराबर है.."

उपपत्ति उसे चाय की प्याली देते हुए कहती है "सब धाम का चमत्कार है..चलिए अब जल्दी से नहा लीजिये"

समाधान उसके हाथ से चाय की प्याली लेकर एक ओर रख थोड़ी देर कुछ सोचता है और फिर अचानक से बेड से उतर के पलंग पे बिछी चादर हटा के कुछ ढूँढने लगता है उपपत्ति उसे ऐसा करते देख कहती है "अरे..अरे..अब ये क्या करने लगे..चलो भी..चाय पीकर..तैयार हो जाओ..देर हो रही है दर्शन के लिए चलना है"

"अब यहाँ तक आए हैं तो चल भी लेंगे ..पर..अब दर्शन करने की जरूरत नहीं रही..वैसे अगर तुम पहले मुझे बता देतीं कि तुम्हें भी सही से नींद नहीं आती थी तो यहाँ तक भी आना नहीं पड़ता" समाधान रहस्मयी ढंग से मुस्कुरा के उससे कहता है और पलंग पे बिछे गद्दे की कंपनी का नाम अपने मोबाइल में नोट करने लगता है।

यदि समाधान के साथ उपपत्ति का भी ज्ञान हो तो किसी कुंजी की आवश्यकता नहीं पड़ती।

~तुषार सिंह #तुषारापात®

Sunday, 18 March 2018

नव संवत्सर

ज्यूँ चैत अमावस बीत गई
हाड़ माँस कंपित शीत गई
धरती ने ओढ़ा अम्बर नया
सृष्टि घोषित नव संवत्सर भया
अब भय कैसा कैसी विपदा
ये चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा
हे भारतवर्ष! अब हर्ष कर!
नववर्ष कर ! नव वर्ष कर!

#तुषारापात®

Friday, 16 March 2018

आधुनिक हिचकी

मिस्ड कॉल आधुनिक हिचकी है।

~तुषारापात®

Wednesday, 14 March 2018

जिंदगी


नई कहानी,न नए किरदार बनाने देती है
जिंदगी भारी है बहुत कहाँ कलम उठाने देती है

#तुषारापात®

Monday, 12 March 2018

ख़ुदा खानाबदोश है


"उसके लिए..उसके लिए..ये गुम्बदौ-मीनारें बनाने से क्या फायदा.. उसको अगर यहाँ रहना ही होता..या कभी कभार आना भी होता..तो वो ये सब कुछ बनाने से पहले..अपना घर ऑफिस वगैरह..अपनी मर्जी का अपने हिसाब का..यहाँ न बनाता?...साफ मतलब है..वो यहाँ रहना ही नहीं चाहता था...सोचो जरा..पूरी दुनिया बनाने वाला अपना घर बनाने का ज़िम्मा हमें..मतलब..हम नौसिखियों को सौंपेगा? ..जनाब ख़ुदा खानाबदोश है..ठिया ठिकाना नहीं रखता..वो तो बस हमारे जैसे न जाने कितनों के ठिकाने बनाता जाता है..आगे बढ़ता जाता है...वो अब जब वापस आएगा तो अपनी ज़मीन वापस खींचने आएगा...तब तक हम सब ख़ाक होके अपनी खाल इस जमीं में मिला चुके होंगे.. न न भाई..मेरी तौबा..उसका घर बनाने में अगर कुछ ऊँच नीच हो गई..तो वो हमें फिर से ज़िन्दा करके..हमारी  ज़िन्दा खालें खींचेगा..।"

नाटक 'ख़ुदा खानाबदोश है' से एक अंश।
~तुषारापात®

खानाबदोश

तुम बनाते रहो उसके लिए खूब गुम्बदो-मीनारें
ख़ुदा खानाबदोश है ठिया ठिकाना नहीं रखता

#तुषारापात®

Sunday, 11 March 2018

प्रोफाइल

तुम्हारी प्रोफाइल देखी
और देखीं कई ब्लैक एंड वाइट तस्वीरें वहाँ
तुम्हारे भीतर का सुनहरा अँधेरा दीप्त था

तुम्हारी प्रोफाइल देखी
और देखीं कई सारी रचनाएँ तुम्हारी
कलम किसी पशोपेश में शायद लिप्त था

तुम्हारी प्रोफाइल देखी
और देखीं कई कवियों की कविताएं वहाँ
न जाने क्यों कलाकारों का वो डेरा सुप्त था

तुम्हारी प्रोफाइल देखी
और जागी तुम्हारी वाल पे आने की प्यास
मैं अपने प्रशंसकों से अब तक तो तृप्त था

~तुषारापात®

गुलाबी इतवार

दिले नादां,बचपने वाला ढूँढता है क्यूँ,अब तो तेरी जवानी है
इतवार की लाली उड़ गई तो क्या,रंगत अब इसकी गुलाबी है

वक्त की धूप,जिंदगी के रंग फीके कर गई,ये आम कहानी है

~तुषारापात®

Saturday, 10 March 2018

नजर के तीर, आँखों के धनुष और लटों की डोरी

ये तो
तुम जानते ही होगे
कि
धनुष की डोरी
खींचने और छोड़ने से
तीर
निशाने पे जा लगते हैं
और ये भी
सब जानते ही हैं
कि
आँख के धनुष से
छोड़े गए
नजर के टेढ़े तीर भी
दिलों पे सीधे सीधे लगते हैं
मगर
क्या तुम ये जानते हो
कि
नजर के तीर भला
किस डोरी से चलते हैं
अभी अभी
दिल मेरा
ताजा ताजा
निशाना बना है
मेरे सामने बैठी उसने
बार बार
चेहरे पे आतीं
अपनी लटें
कानों पे चढ़ा के
हर बार मुझे देखा है।

~तुषारापात®

जायदाद

मेरी जायदाद बढ़ने के मशहूर किस्से हुए
मेरे तीन बेटे थे मेरे घर के चार हिस्से हुए

~तुषारापात®

मुक़द्दर की जलेबियाँ-हथेलियाँ

जब भी चूमा है हथेली को ये कसैली लगी है
मौला तूने कैसी ये मुक़द्दर की जलेबी लिखी है

~तुषारापात®

जिंदगी का जूता

नंगे पैर आते हैं हम नंगे पैर जाते हैं
पर ज़िंदगी तेरे जूते बहुत काटते हैं

~तुषारापात®

चाय की प्याली

मेरे
बाएं कान में
अपने दाएं हाथ की
उंगलियाँ फँसा के
वो
हौले हौले
छू रहा है मुझे
चाय की प्याली की तरह

~तुषारापात®

Friday, 9 March 2018

चुंगी

आँखों की चुंगियाँ बंद करके
आओ ख़्वाबों की तस्करी करें

~तुषारापात®

Monday, 5 March 2018

काली सफेद

उड़ गए हैं सारे रंग इस बरस भी होली में
जिंदगी फिर काली सफेद है फिर वही शतरंज की बिसात है।

-तुषारापात®

Tuesday, 27 February 2018

शाम

किसी भी लिबास में उतरे ये शाम
उदासी के बुर्के में लिपट जाती है

उम्मीद का अपना सूरज डूब गया
रात किस्मत के सितारों से चिढ़ाती है

#तुषारापात®