Monday, 13 November 2017

शो मस्ट गो ऑन

"भई वाह..सुधाकर जी..आज तो आपने कमाल कर दिया..क्या गज़ब के..डूब के भजन गाए आपने...पूरी पब्लिक भावों के समंदर में बह गई.. आज का आपका ये प्रोग्राम 'बच्चों के लिए भजन संध्या' तो सुपरहिट रहा.. सुपरहिट" चिल्ड्रेन्स डे की पूर्व संध्या पर आयोजित कार्यक्रम में जैसे ही सुप्रसिद्ध भजन गायक सुधाकर मिश्रा अपना अंतिम भजन गाकर बैक स्टेज आए उनसे मिलने को वहाँ पहले से तैयार खड़े मेयर चकोर सिधवानी उन्हें पकड़ के उनकी तारीफों के पुल बाँधने लगे, सुधाकर मिश्रा गुनगुना पानी जल्दी जल्दी पीते हुए उनका फरमाइशी अभिवादन कर कहते हैं "बहुत..बहुत..धन्यवाद मेयर साहब" और अपनी कार की ओर लगभग दौड़ के जाने लगते हैं

मेयर साहब उन्हें पीछे से रोकते हैं "अरे रुकिए तो..ये हमारी साली साहिबा आपकी बहुत बड़ी फैन हैं..खास आपके प्रोग्राम के लिए जबलपुर से यहाँ आई हैं..जरा एक दो तस्वीर..."

चकोर सिधवानी आगे कुछ और कहते कि सुधाकर ने उनकी साली साहिबा को नमस्कार किया और तेजी से उनसे आगे बढ़ते हुए कहा "मेयर साहब...माफ कीजियेगा अभी जरा जल्दी में हूँ..मेरा अपने शहर पहुँचना बेहद जरूरी है..तस्वीर फिर कभी....." कहकर वो मोबाईल कान से सटा,कार में बैठकर निकल गए

मेयर तिलमिला के रह गये, एक तो शहर के मेयर होने का नशा और दूसरे साली साहिबा और अपने अर्दली के सामने हुए अपने अपमान से वो भड़क गए "ये अपने को समझता क्या है..गवर्नर है क्या ये..साले की तारीफ पे तारीफ की..और मेयर होने के नाते इसका अपने शहर में इतना आदर सत्कार किया..इतने सारे स्कूलों से गरीब बच्चों को बुलवाया...और ये सीधे मुँह बात भी नहीं करके गया...जाओ जरा सुरेंद्र और विश्वास को तो लेकर आओ यहाँ" उन्होंने आयोजकों को बुलाने को अर्दली को लगभग डाँटने वाले अंदाज में भेजा, उसके बाद काफी देर तक मेयर साहब का 'कीर्तन' वहाँ चलता रहा।

भजन संध्या कार्यक्रम शुरू होने के पाँच मिनट पहले का दृश्य: (फ्लैशबैक)

"सर..सारे गेस्ट आ चुके हैं..हॉल पूरा खचाखच भरा है..सारे बच्चों को आपके कहने के अनुसार सबसे आगे बिठा दिया है..बस अब आपका इंतजार है...एंकर बस थोड़ी देर में आपको स्टेज पे इनवाइट करेगा.." सुरेंद्र ने सुधाकर के कमरे में आकर कहा

"ठीक है..मैं भी तैयार ही हूँ..वो हारमोनियम वगैरह वाले सबने अपनी जगह ले ली न" सुधाकर ने बस पूछने को पूछ दिया

"हाँ..सर..सब कुछ रेडी है बस आप आ जाइयेगा जब आपका नाम पुकारा जाए" कहकर सुरेंद्र स्टेज के काम संभालने चला गया

π...ऐसी लागी लगन मीरा हो गई मगन..π..सुधाकर मिश्रा कार्यक्रम के लिए तैयार थे कि तभी उनके मोबाइल की ये ट्यून बजती है वो झट से फोन उठाते हैं क्योंकि ये ट्यून उन्होंने घर के नंबर पे सेट की होती है... "हेलो..हेलो..हाँ..हाँ पिताजी बोलिये...पता नहीं फोन में नेटवर्क नहीं था बहुत देर से...नहीं नहीं अभी प्रोग्राम शुरू नहीं हुआ..अरे हुआ क्या बोलिये भी..इतना घबराए हुए क्यों लग रहे हैं" सुधाकर सांस रोक के दूसरी ओर से आवाज आने की प्रतीक्षा करने लगे

थोड़ी देर बाद उनके पिताजी की धीमी धीमी और रुआँसी आवाज़ मोबाइल में सुनाई देती है "बेटा..वो..बहू...बहू..की तबियत अचानक बिगड़ गई थी...वो..वो..उसे ब्लीडिंग...ब्लीड..बहुत ज्यादा खून आया...तो..डॉक्टर वसुंधरा के नर्सिंग होम में ले आए थे... तो..तो..वहाँ....डॉक्टरों ने बताया..कि...कि... बच्चा..मतलब... मिसकैरिज....हो गया है...बहू...बहू...पूरी तरह ठीक हैं पर बेहोश हैं...बेटे....डॉक्टर..ने..बहू को तो बचा लिया...पर बच्चा........................................................"

सुधाकर के हाथ से मोबाइल छूट गया, वो धम्म से सोफे पे बैठ गए तभी मंच से उन्हें तीसरी बार आवाज़ दी गई सुरेंद्र दौड़के उन्हें बुलाने आया और मन भर भारी पाँव उठाते वो मंच पे किसी तरह पहुँचे

मंच पे स्वागत आदि क्या क्या हुआ उन्हें कुछ याद नहीं था बस वो अपने आसन पे बैठे और सामने बैठे तमाम स्कूल के बच्चों को देखते हुए पहला भजन तुरंत गाने लगे "भए प्रगट कृपाला... दीन दयाला.... कौशल्या हितकारी....हरषित महतारी..." भजन की इस पंक्ति के साथ ही उनकी पलकों के बाँध से आँसूओं की नदी रिसने लगी।

चकोर चमकते सुधाकर को देख पाता है पर उसके पीछे की काली रात उसे दिखाई नहीं देती।

-तुषारापात®

Saturday, 11 November 2017

झूठा सच

झूठ है दिखता बसंतों में उगे सरसों की तरह
सच है मिलता किताबों में सूखे फूलों की तरह

#तुषारापात®

राम नाम सत्य है


"क्या इस बार भी सच हार जाएगा..झूठ की जीत आखिर कब तक यूँ ही होती रहेगी...क्या कोई भी सच के साथ नहीं है?"

"कोशिश करके देख लो..सच को लेकर आगे बढ़ो..देखो कौन साथ आता है तुम्हारे..लोग झूठ के विरोध में तो कभी आते ही नहीं.. और.. न ही सच के साथ चलते हैं..बस सच बोलने वाले के साथ थोड़ी दूर यूँ टहल आते हैं.. मानो दिल बहलाने को सिनेमा देख आए हों"

"पर लोग सिनेमा में भी तो सच की जीत की कहानियों पे ताली बजाते हैं फिर क्यों नहीं आएंगे सच के साथ"

"सिनेमा किन्नरों के स्वांग जैसा है जो क्षणिक दबाव बनाता है..सच के लिए ताली बजाने वाले हाथ झूठ के लिए कभी अपनी मुठ्ठियाँ नहीं कसते..."

"मुठ्ठियाँ न भी कसें..हाथ भी न उठाएं..मगर धीमी ही सही..मेरी आवाज में अपनी आवाज़ तो मिला सकते हैं..मैं सबसे आगे चलने को तैयार हूँ...मैं सच के लिए मरने के लिए भी तैयार हूँ"

"अपने आगे चलने की तुम्हारी तमन्ना ये जरूर पूरी कर देंगे.. तुम्हारे मरने के बाद ये सब आएंगे तुम्हारे जनाज़े के पीछे..ये कहते कहते कि राम नाम सत्य है...."

"तो क्या करूँ मैं..बचपन से मुझे सिखाया गया कि सच ही सबकुछ है..एक सच सौ झूठ पे भारी है..क्या किताबों में लिखा वो सब सच, झूठ था..इस सच के लिए लड़ते लड़ते हर जगह से निष्काषित हूँ मैं..और जिन लोगों ने मुझे निष्काषित किया वो मुझे ही भगौड़ा कहते हैं.."

"सच कहूँ तो इस झूठ और सच की लड़ाई की बात ही बेमानी है..झूठ के सैनिक बहुत निर्दयी हैं..और सच..सच की कोई सेना ही नहीं है..बस एक पैदल है जो सच का झंडा उठाए दिखता है मानो कोई बहुत बड़ी सेना उसके पीछे आ रही हो..नियति ने उस पैदल के रूप में तुम्हें चुन लिया है..तुम मरोगे तो कोई और इस झंडे को पकड़ लेगा..पर.. उसके भी पीछे कोई सेना नहीं होगी..मेरी मानो झूठ में घुलमिल जाओ फिर देखो इस झंडे को कितना बढ़िया रथ मिल जाएगा..झूठ चारो ओर ऐसे फैला हुआ है जैसे बसन्त में सरसों ही सरसों हो और रही बात सच के किताबों में होने की..हाँ..सच किताबों में मिलता है..मगर सूखे फूलों की तरह.."

-तुषारापात®

Sunday, 5 November 2017

त्रिशूल

तीर होता तो निशाने पे लगता जाकर
मैं वहीं का वहीं रह गया जमीं के त्रिशूल की तरह

-तुषारापात®

शनिश्चरी इतवार

उलझे हैं अंतरे में मुखड़ा उदास बैठा है
आशिक महबूबा के बच्चे के साथ बैठा है

-तुषारापात®

Wednesday, 1 November 2017

अनलकी सेवेन

"लेकिन सर...ये देखिए इसमें..इस क्वेश्चन में भी मुझे सिर्फ सात नम्बर दिए गए हैं ..आश्चर्य की बात है कि सवाल को पूरा सही सॉल्व करने के बाद भी मुझे बीस में सात नंबर दिए गए जबकि..मैथ्स में तो..एक्यूशन सॉल्व करने के पूरे पूरे नंबर मिलते हैं" ज्ञान ने आर.टी.आई के तहत अपनी सिद्धान्त ज्योतिष के पहले पेपर की कॉपी निकलवाई थी और जानबूझकर दिए गए कम नंबरों पर वह अपने कोर्स कॉर्डिनेटर और सीनियर टीचर प्रोफेसर मिश्रा से इसी पर बहस कर रहा था

कोर्स कॉर्डिनेटर प्रोफेसर मिश्रा ने पान की पीक को ऐसे निगला मानो उसने खून का घूँट पिया हो पर बहुत ही डिप्लोमेटिक अंदाज में मुस्कुराते हुए उससे बोला "बेटा ज्ञान प्रताप ... देखो ये ज्योतिष का विषय है और तुम तो जानते हो कि ज्योतिष आर्ट्स सब्जेक्ट के अंडर आता है..अब आर्ट्स में कहीं किसी को पूरे पूरे नम्बर मिलते हैं"

"सही कहते हैं सर ट्रिग्नोमेट्री..ज्योतिष के अंडर आके गणित नहीं रहती बल्कि कला हो जाती है" ज्ञान अपने साथ हुए पक्षपात को बहुत अच्छी तरह समझ चुका था अभी उसे यहीं आगे और पढ़ना भी था तो वो व्यंग्यात्मक टोन में ये कहकर कॉर्डिनेटर के रूम से बाहर निकल आता है

उसके साथ पढ़ने वाला उसका दोस्त शरद उसे बाहर खड़ा मिलता है "क्या हुआ ज्ञानप्रताप सिंह..कुछ नहीं हुआ न..अबे तुम शिक्षा पांडे नहीं हो जो तुम्हें ये पूरे पूरे नंबर देंगे...पिछले सेमेस्टर तुमने आर टी आई दाखिल की थी तो तबसे और चिढ़ गया है ये प्रोफेसर"

"यार..थ्योरी में नंबर काटते तो अलग बात होती..पर यहाँ तो इन्होंने चापजात्य त्रिकोणमिति की पाँचवी प्रतिज्ञा पे नम्बर कम दिए हैं..जो मैंने उत्पत्ति सहित पूरी सही हल की थी ..हर सेमेस्टर की तरह इस सेमेस्टर भी मेरे साथ ये किया गया..और अब ये लोग कुछ मानने को भी तैयार नहीं..ये साला सात का नंबर ही मेरे लिए हमेशा अनलकी रहा है..इस क्वेश्चन का सीरियल नम्बर भी सातवाँ था..ज्ञान ने मायूस हो खीजते हुए कहा

"छोड़ बे..जानते हो ही तुम यहाँ का हाल.. ये सब सिद्धांत ज्योतिष की पी एच डी की सीट पे शिक्षा को सेट करने के लिए गोलमाल किया जा रहा है..वैसे भी तुम्हें आगे फलित में प्रैक्टिस करनी है..डिग्री लो और आगे बढ़ो..ये चापीय त्रिकोणमिति घंटा काम आएगी फलित में...जाने दो एक दिन जब तुम बड़े ज्योतिषी बन चुके होगे..तो ये सब भूल भी चुके होगे.." शरद ने उसे हिम्मत देते हुए कहा

हुआ भी यूँ ही..डिग्री लेने के सात साल बाद ज्ञान आज एक बड़ा ज्योतिषी है और शहर में अपना एक अच्छा नाम रखता है एक दिन वो रात को टीवी देख रहा था कि कौन बनेगा करोड़पति के रिपीट शो में उसे उसके साथ पढ़ने वाली वही शिक्षा पांडे हॉट सीट पे दिखाई दी और कुछ ही देर में गणितीय ज्योतिष के एक आसान सवाल का जवाब न दे पाने के कारण छह लाख चालीस हजार पे क्विट करते भी दिखती है

ज्ञान के मन मे पुरानी प्रतिस्पर्धा जागने लगती है और वो कौन बनेगा करोड़पति में जाने के लिए रोज बार बार मैसेज, एस एम एस आदि करने लगता है पर वो चुना नहीं जाता और कौन बनेगा करोड़पति का वो सीजन भी खत्म हो जाता है पर इस बीच ज्ञान जनरल स्टडीज ,सामान्य ज्ञान इत्यादि की तैयारी करता रहता है

समय का चक्र ढुलकते ढुलकते ही चलता हो पर चलता ही जाता है और बीतते बीतते कौन बनेगा करोड़पति का नया सीजन शुरू होने के विज्ञापन आने लगते हैं इसबार न सिर्फ ज्ञान चुन लिया जाता है बल्कि वो हॉट सीट पे भी पहुँच जाता है

"देवियों और सज्जनों..मेरे सामने हॉट सीट पे बैठे हैं लखनऊ से आये ज्ञान प्रताप सिंह जो कि बहुत बहुत अच्छा खेल रहे हैं और एक करोड़ की भारी भरकम रकम जीत चुके हैं जोर दार तालियों से हम इनका अभिनंदन करते हैं और खेल को कल छोड़े गये बिंदु से आगे बढ़ाते हैं" अमिताभ बच्चन की आवाज से स्टूडियो गूँज रहा था ज्ञान उनके सामने बैठा था

"खेल के इस पड़ाव पे मैं आपको बता दूँ कि सोलहवाँ प्रश्न जो कि सात करोड़ के लिए है उसमें आप अपनी बची हुई कोई भी लाइफ लाइन प्रयोग नहीं कर पाएंगे और अगर आपने गलत उत्तर दिया तो आप सीधे तीन लाख बीस हजार पे जाकर नीचे गिरेंगे..इसलिये भाईसाहब..बहुत सोच समझ के.." अमिताभ ने अपने अंदाज में कहा

सर सोलह के अंकों का जोड़ सात होता है और सात करोड़ के लिए ये प्रश्न भी है..और सात के अंक से मेरी अच्छी यादें नहीं हैं..पर अब यहाँ तक आकर..देखते हैं क्या होता है" ज्ञान ने धड़कते दिल के साथ चेहरे पे आत्मविश्वासी मुस्कान लाते हुए कहा

"ज्ञान प्रताप जी...जिओ जैकपॉट..सात करोड़ के लिए..ये रहा अंतिम प्रश्न..आपके कंप्यूटर स्क्रीन पे..." कहकर अमिताभ बच्चन ने सोलहवाँ प्रश्न पढ़ना शुरू किया "चापीय त्रिकोणमिति के चापजात्य अध्याय के पाँचवे साध्य के उत्पत्ति श्लोक में इनमें से कौन सा शब्द ..नहीं..है..और ये रहे आपके ऑप्शन.."

"एक मिनट सर.. आपके ऑप्शन देने से पहले आपसे एक रिक्वेस्ट है.." ज्ञान ने उन्हें रोका

यूँ ऑप्शन देने से पहले ही रोक देने पे और ज्ञान के चेहरे की मुस्कान की विशालता और आँखों की नमीं को देख आश्चर्य में डूबे अमिताभ बोल पड़े "जी..जी..बिल्कुल कहिए..क्या बात है...ज्ञान"

ज्ञान नौ साल पुरानी अपनी प्रतिज्ञा पूरी करते हुए कहता है "सर मैं चाहता हूँ कि आप मेरी ओर से एक घोषणा कर दें कि प्रोफेसर बालमुकुंद मिश्रा आपका शिष्य 'ज्ञान' आपकी दी हुई 'शिक्षा' से छह करोड़ तिरानबे लाख साठ हजार रुपये अधिक जीत चुका है"

-तुषार सिंह 'तुषारापात'

Tuesday, 31 October 2017

ग्रीन टी विद हस्बैंड

चाय के दो कप
और एक कोस्टर तुम्हारी टेबल पे
सोच रही हूँ
कोस्टर पे किसका कप रखूँ
तुम्हारी चाय झुंझलाती
बात बात पे झूठे गुस्से
की गर्मी से
कप के आपे से बाहर हो जाती है
मेरी चाय चुपचाप सी
ठंडी तासीर लिए
गर्म कप की गहराइयों में छुपके बैठी
बीच बीच में कप की मुंडेर से
चोरी चोरी झाँक लेती है
पर तुम्हारी नजर के
एक शक्करी दाने के पड़ते ही
बेताब हो छलक जाती है
चाय के दो कप
और एक कोस्टर तुम्हारी टेबल पे
सोच रही हूँ इस टेबल को
तुम्हारे कप को न चूमने दूँ
और अपने से
इस निगोड़न का मूँह जला दूँ
दाग लगे इसपे तो
शायद तुम्हारी नजर हटे
आँख जमाये
कागज के परदे के पीछे
इस सौतन टेबल को
कलम से यहाँ वहाँ टटोलते हो
आज बताऊँगी
अंग अंग इसका जलाऊँगी
तुम एक हाथ से कागज की कसौटी पे
अपनी सोने की कलम घिसते हो
और दूजे से चाय की चुस्कियाँ ले
कोस्टर पे कप रखते समय
अपनी नजर की चिड़िया को
पल भर के लिए
मेरी पलकों पे ठहरा फुर्र कर देते हो
मैं यहाँ वहाँ कप के निशान बना
टेबल पे बिखरे कागजों से
उन्हें ढक के चल देती हूँ
तुम तो करते रहोगे रचनाएं महान
पर मेरी ईर्ष्या से रहोगे पूरे अनजान
लेकिन मेरे जाने के कुछ ही देर बाद
तुम एक कविता पोस्ट करते हो
"सौतन ने सौतन को दिया मुँह तोड़ परिचय
दायरे कटे और मैं बना सर्वनिष्ठ समुच्चय*

-तुषार सिंह 'तुषारापात'®

Saturday, 28 October 2017

बासी अखबार

मात पिता को दीजिए न बुढ़ापे में दुत्कार
नई पुड़िया के लिए फटते बासी अखबार

-तुषारापात®

Friday, 27 October 2017

चाँद की पैनी हसिया से रात कहाँ कटती है

कागजी बिस्तर पे कलम करवटें बदलती है
चाँद की पैनी हसिया से रात कहाँ कटती है

Wednesday, 25 October 2017

मुस्कुराहट

यूँ इस तरह अपनी हर हार से लड़ के जीता हूँ मैं
होठों की दरार खींच के आँखों के झरने पीता हूँ मैं

-तुषारापात®

Monday, 23 October 2017

त्रिभुज

.
                                           वो
                                        मास्टर
                                      जी ने कई
                                  बार पढ़ाया था
                              वृत्त की परिधि=2πr
                         ये सबक दिला जाती है याद
                   हर एक लड़की उसे छोड़ने के साथ
               जिसके पास एक भी फूटी 'पाई' नहीं होती
           उस कड़के 'व्यास' को कोई 'परिधि' नहीं मिलती

     #त्रिभुजी™                               -तुषार सिंह 'तुषारापात'

Thursday, 19 October 2017

रंगोली

"दीप..दीप..सुनो जरा...प्लीज मेरे लिए रंगोली के कलर्स ला दो न..प्लीज जल्दी से...मेरी सारी फ्रेंड्स रंगोली बना चुकीं हैं..देखो अगर फिसड्डी रहने वाली तमिषा ने भी रंगोली बना के पिक पोस्ट कर दी. तो मैं ग्रुप में सबसे पीछे रह जाऊंगी..मुझे जल्दी से अपनी रंगोली पोस्ट करनी है "अवलि ने उतावलेपन से उसे अपना मोबाइल दिखाते हुए कहा

"अरे पर कलर्स तो तुम खुद लाने वालीं थीं..क्यों नहीं गईं.." दीप ने टीवी का चैनल बदलते हुए कहा

अवलि थोड़ा सा झुंझुला के बोली "जाने वाली थी न..नहीं गई..घर की साफ सफाई में उलझी रह गई..आज तो लख्मी भी नहीं आई..जाओ न जल्दी से कलर्स ला दो..कहीं दुकानों से मेरे फेवरिट कलर्स खत्म न हो जाएं"

दीप रंग लेने चला जाता है और अवलि लख्मी के मोबाइल पे कॉल लगाती है पर बार बार लगाने के बाद भी जब कॉल नहीं लगती तो वो मोबाइल रखकर,पूजा घर की सफाई में लग जाती है तभी डोर बेल की आवाज आती है वो दरवाजा खोलती है तो लख्मी के चौदह-पंद्रह वर्षीय लड़के धन्नू को सामने खड़ा पाती है वो उसे बताता की लक्ष्मी को उसके पति कमल ने शराब के नशे में बहुत पीटा है इसलिए वो आज काम पे नहीं आएगी

"ओह्ह..ठीक है" धन्नू से कहकर अवलि ने दरवाजा बंद कर लिया और फिर से पूजा वाले कमरे की सफाई करने लगी, पर न जाने क्यों अब उसका मन नहीं लग रहा था वो काफी देर उहापोह में रही किसी तरह पूजा घर साफ करने के बाद,घर लॉक कर वो एक्टिवा से लक्ष्मी की खोली पहुँच गई

"दीदी..खूब नशा करके आए..और हमको पीट के सारा पैसे छीन के ले गए..हमरा मोबाइल भी..." लख्मी उससे ये कहकर रोने लगी अवलि ने उसे किसी तरह चुप कराया तभी लख्मी की पाँच साल की बेटी रंगोली बाहर से खेल कूद के धूल में रंगी हुई अंदर आई और लख्मी से बोली "अम्मा हम नई फिराक कब पहनेंगे..तुम लाके कहाँ रखी हो..और और.." कहते कहते अचानक से उसकी नजर अवलि पे पड़ी तो वो चुप हो गई, लख्मी उसे गले लगा के अवलि से कहने लगी "हम जरा सा आलस कर गये..नहीं तो कल ही इसके लिए फिराक ले आए होते तो कम से कम उतना पैसा तो उनसे बच जाता..और इसका मन रह जाता"

अवलि ने उसको प्यार से अपने पास बुलाया, घर मे काम करने आनेपर कई बार लख्मी उसे अवलि के घर साथ लिए आती थी इसलिए वो अवलि के पास थोड़ी हिचक के बाद आ गई अवलि ने उसे गोद मे बिठा लिया और कहा "कौन से कलर की फ्रॉक तुम्हें अच्छी लगती है.."

"लाल और..और..जीमें खूब सारा सितारा हों.." रंगोली ने मासूमियत से अपनी पसंद बताई

ठीक है आप मेरे साथ चलोगे..मेरे पास खूब अच्छी लाल फ्रॉक है..और लाल लाल चूड़ियाँ भी हैं..आप पहनोगे." उसने रंगोली से कहा और लख्मी को इशारा किया कि वो इसे साथ ले जा रही है और शाम को आकर प्रसाद ले जाने के लिए कहा  ,लख्मी ने कृतज्ञता से हाँ में सर हिलाया

अवलि ने रंगोली को स्कूटर पे बिठाया और उसे लेकर पास की दुकान से उसकी पसंद की फ्रॉक,बिंदी,चूड़ी, कुछ खिलौनें दिलाये और उसकी जरूरत के कुछ और कपड़े खरीद के उसे साथ ले अपने घर आ गई

"कमाल हो यार..जब तुम्हें ही जाना था..मुझे क्यों दौड़ाया..फोन भी नहीं उठा रही..वो तो अच्छा था कि घर की एक चाभी मेरी बाइक की चाभी के गुच्छे...अरे ये लख्मी की बेटी है न..ये तुम्हारे साथ?" दीप ने आश्चर्य से पूछा, अवलि ने उसे सारी बात बताई तो उसने कहा "ठीक है..अच्छा हाँ वो तुम्हारे कलर्स वहाँ डाइनिंग टेबल पे रखे हैं.."

"अच्छा..ठीक है." कहकर वो रंगोली को नहलाने के लिए ले गई उसे अच्छे से नहलाया-धुलाया फिर उसे फ्रॉक पहनाई चूड़ियाँ पहनाई बिंदी आदि लगाई और थोड़ी से परफ्यूम भी लगाई..वो एक एक काम करती जाए और मासूम रंगोली की छोटी छोटी खुशियाँ देख देख के दोगुने उत्साह से उसका अगला श्रृंगार करती जाए,दीप बीच बीच मे उसे लाए हुए रंगों की याद भी कई बार दिला गया  पर अवलि हर बार हूँ हूँ कर देती थी, उसे तैयार कर के उसने उसे खाना खिलाया और देखा अब वो बहुत खुश थी और सुंदर भी बहुत लग रही थी

इस सब में काफी समय बीत गया था अवलि थोड़ा थक भी गई थी पर अभी शाम के पूजन की तैयारी भी उसे करनी थी और रात का खाना भी बनाना था,लाये हुए रंग अभी भी टेबल पर रखे थे, सारे काम करते करते शाम हो गई और रंगोली बनाने का उसे टाइम ही नहीं मिला अब वो तैयार होके दीप के साथ पूजा कर रही थी, पूजा के बाद कुछ मेहमान भी घर आने वाले थे, बाहर आतिशबाजी की धूम धड़ाम और रोशनियाँ होना शुरू हो गईं थीं।

घर मे हर जगह दीपक लगा के वो अभी बैठी ही थी कि उसके मोबाइल पे उसकी सहेली तमिषा का फोन आता है " अरे कहाँ है तू..हम सबमें सबसे बड़ी और सबसे पहली रंगोली बनाने वाली मैडम आज दिवाली पे कहाँ गायब है..अपनी बनाई रंगोली पोस्ट कर न..या मुझसे डर गई इस बार"

अवलि उसकी बात सुनके कहती है "रुक जरा अभी पोस्ट करती हूँ.." वो दूर खेलती रंगोली को अपने पास बुलाती हैं और अपने फोन से उसकी कई सारी अच्छी अच्छी तस्वीरें खींचती है और पोस्ट करने जा ही रही होती है कि दीप उसे रोक देता है "अवलि मुर्दा संसार में जीती जागती रंगोलियाँ नहीँ भेजी जातीं...कुछ रंगोलियाँ सिर्फ अपने लिए ही होती हैं" अवलि उसकी बात समझ जाती है और अपनी सहेली तमिषा को फोन कर कहती है "यार इस बार मैं रंगोली नहीं बना पाई..तू जीत गई" वो फोन एक तरफ फेंक कर जीती जागती सजी धजी उस मासूम रंगोली को खेलते देख के अपनी हार का उत्सव मनाने लगी।

दीप-अवलि के घर के हर कोने में सजी हुई रंगोली घूम रही है और दरवाजे पे लख्मी हाथ जोड़े खड़ी है।

-तुषार सिंह 'तुषारापात'

Monday, 16 October 2017

हिरण्यगर्भ

जीवन की उत्पत्ति,
किसकी है
ये व्यक्त सृष्टि?,
क्या है कहीं इसका अंत
या है ये सीमा रहित अनन्त
यदि है अंत और आरम्भ
तो कहाँ हैं ब्रह्मा विष्णु और सारंग
कौन ये प्रश्न हममें कौंधाता है
उत्तर की दिशा दक्षिण बताता है
क्यों चाहता है वो
हमें आरम्भ का हो ज्ञान,
क्या आवश्यकता
जब अंतिम लक्ष्य है निर्वाण,

स्वप्न में अनुभव हुआ
सृष्टि से पहले का दृश्य-श्रव्य,
पराध्वनिक चक्षुओं से
हिरण्यगर्भ का देखा पराश्रव्य,
एक सात्विक ब्रह्मण्डाणु
था गर्भ में अवस्थित,
शंख-पद्म रजत तारे
शुक्राणु सदृश्य निषेचन को स्पर्धित,
आहा! एक हुआ सफल
ब्रह्मण्डाणु का भेद कर कोट,
गूँजा चहुँओर भंयकर ओम नाद
तमस प्रकाशित हुआ हुआ महा विस्फोट,

समस्त सृष्टि तत्व जन्में
मिश्रित अनेक स्वरूपों की रचना को
ले स्व स्व पालन धर्म का दायित्व,
हैं विशिष्ट पर प्रत्येक सहिष्णु
ये 'वि'शिष्ट और सहि'ष्णु' गुणों का
संधि रूप ही है श्री श्री-'विष्णु'तत्व,
ब्रह्म दिखे विष्णु मिले पर कहाँ सारंग?,
स्वप्न में व्याकुल खोजता
सृष्टि को कौन करेगा भंग,
सहसा किसी ने कर लिया शंका वरण
एक हस्त ने सम्मुख किया दिव्य दर्पण
आह! सृष्टि का होगा
हमारे हाथों विनाश,
मद का तीसरा नेत्र करेगा
जब दो चक्षुओं का ग्रास,
इसलिए आरम्भ का कराया ज्ञान,
करना होगा ऐसा सुनियोजित संहार
कि हो शत-प्रतिशत
प्रारंभिक अवस्था का निर्माण,

हिरण्यगर्भ कैसे हुआ उत्पन्न
कहाँ से प्रेषित हुआ दिव्य स्वप्न
किसने किया निषेचन का निर्देशन
कौन है जिसने सम्मुख किया दरपन
क्या कोई अन्य है सूत्रधार
क्या अनेक हैं ब्रह्माण्डीय संसार
कौन है ये गुप्त परमब्रह्म
क्या मुझे हो रहे हैं भ्रम
प्रश्न समस्त रह गये ये अनुत्तरित
सूर्यदेव ने कर दिया स्वप्न मेरा खंडित।
सूर्यदेव ने कर दिया स्वप्न मेरा खंडित।

(इस रचना की उत्पत्ति एक गायनोकॉलोजिस्ट मित्र के क्लीनक पे हुई, 'पराश्रव्य' को अल्ट्रासाउंड समझें...इस रचना को आकार देते समय मेरा रोम रोम सिहर उठा था मेरा आग्रह है इसे एक बार साधारण तौर पे पढ़ने के बाद दूसरी बार थोड़ी ऊँची वाणी में पढ़ें शायद वो स्पंदन आप महसूस कर सकें 🙏)

-तुषारापात®

Saturday, 14 October 2017

खुली किताब

भरी जवानी में पति चल बसा है उसका
मोहल्ले के कुछ 'हमदर्द' मर्द तैयार बैठे हैं

खुली किताब के पन्ने कभी तो फड़फड़ाएंगे, नोचे जाएंगे।

-तुषारापात®

Friday, 13 October 2017

कोई उल्लू बोलता है

छत पे सोते हुए
कभी खटिए से गिरे हो?
रात के तीन बजे
जब अचानक से नींद टूटे
और आँख के सामने सितारे हों
चार पावों से गिरके ऐसा लगता है
मानो कोई मुर्दा अर्थी से जुदा होकर
खुली कब्र से आसमान ताक रहा है

मर के सब ऊपर क्यों जाते हैं?
भौतिकी के सिद्धांत याद आ रहे हैं
ग्रेविटी काम करती है
सिर्फ शरीर पे?
आत्मा पे इसका क्यों जोर नहीं

अंधेरे में ये सितारे क्यों टिमटिमाते हैं?
स्वर्ग में रौशनी बहुत है क्या
मरके जाने वाले शायद जल्दी में होते होंगें
काले आसमान में ये
चमकते सुराख़ कर जाते हैं

पर ये चाँद का झरोखा क्यूँ बना होगा?
ओह्ह हाँ सिंधु सभ्यता भी तो मरी थी
अच्छा अगर एक साथ सब मर जाएं तो
पहले से इतने सुराख़ वाला
ये पर्दा टिक पायेगा क्या?

समझा
ऊपर रहने वाले देव
हमारी रक्षा क्यूँ करते हैं
आकाश फट जाएगा
तो स्वर्ग में बैठे देवता धरा पे जो आ जाएंगे।

#तुषारापात®